विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1047, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः १०२१
खङ्गो नन्दकनामासौ ममायं विपुलॊ दृढः।
अन्तकस्यान्तको घोरस्तस्य खङ्गस्य नाशकः ॥ ११ ॥
'मेरा यह विशाल खड्ग बहुत मजबूत है। इसका नाम नन्दक है। यह घोर खड्ग कालका भी काल और श्रीकृष्णके खड्गका नाश करनेवाला है ॥ ११ ॥
तत्राहं च गदी खड्गी शङ्खी चक्री तनुत्रवान्।
युधि जेता च कृष्णस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
मां च ब्रूत नृपाश्चैव गदिनं चक्रिणं तथा।
शङ्खिनं शार्ङ्गिणं वीरं ब्रूत नित्यं नृपोत्तमाः ॥ १३ ॥
'इस प्रकार मैं गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र और कवचसे युक्त होकर युद्धमें श्रीकृष्णको जीत लूँगा। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है; अतः श्रेष्ठ नरपतियो ! अब तुम लोग मुझे ही सदा गदाधर, चक्रपाणि, शङ्खधारी एवं शार्ङ्गधनुर्धर वीर कहा करो ॥ १२-१३ ॥
वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदूत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम् ॥ १४ ॥
'मुझे ही वासुदेव कहो, उस यदुश्रेष्ठ गोपको नहीं। उस गोपबालकको मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा ॥१४॥
सख्युर्मम वलाद्धन्ता नरकस्य महात्मनः।
मां तथा यदि न ब्रूत दण्ड्या भारशतैः शतम्॥ १५॥
सुवर्णस्य च निष्कस्य धान्यस्य बहुशस्तदा।
'महामनस्वी नरकासुर मेरा मित्र था, उसको इस गोपर्ने बलपूर्वक मार डाला है, (इसलिये मैं भी इसका वध करूँगा); अतः यदि तुमलोग मुझे वासुदेव नहीं कहोगे तो मैं तुमपर दस हजार भार सुवर्ण एवं निष्कका तथा बहुत-सी धान्य-राशिका दण्ड लगाऊँगा' ॥ १५ ½ ॥
तथा ब्रुवति राजेन्द्र मनसा दुस्सहं यथा ॥ १६ ॥
केचिल्लज्जासमायुक्ता आसंस्ते बलवत्तराः।
रसज्ञा बलवीर्यस्य राजानस्ते सदा नृप ॥ १७ ॥
राजाधिराज पौण्ड्रकके इस तरह मनको असह्य लगने-वाली बात कहनेपर कुछ प्रबल नरेश लज्जित होकर चुप रह गये। राजन् ! वे सब नरेश बल-वीर्यके रसज्ञ थे॥ १६-१७॥
अपरे तु नृपा राजन्नेवमेवेति चुक्रुशुः।
अन्ये बलमदोत्सिक्ता जेष्यामः केशवं रणे ॥ १८ ॥
राजन् ! दूसरे चापलूस नरेश 'ठीक है ! ठीक है !!' ऐसा कोलाहल करने लगे तथा बलके मदसे उन्मत्त हुए अन्य राजा कहने लगे कि हम युद्धमें श्रीकृष्णको अवश्य जीतेंगे ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकोक्तौ एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रककी गर्वोक्तिविषयक इक्यानेवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
द्विनवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रकके यहाँ नारदजीका आगमन और उसके साथ उनकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततः कैलासशिखरान्निर्गतो मुनिसत्तमः।
नारदः सर्वलोकज्ञः पौण्ड्रस्य नगरं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता मुनिश्रेष्ठ नारद कैलासशिखरसे निकलकर पौण्ड्रकके नगरकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
अवतीर्य नभोभागात् प्रत्यागम्य नरोत्तमम्।
द्वाःस्थेन च समाज्ञप्तः प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ २ ॥
आकाशसे उतरकर द्वारपालसे राजाज्ञा प्राप्त करके उन्होंने राजाके उत्तम भवनमें प्रवेश किया और वे उस नर-श्रेष्ठ पौण्ड्रकसे मिले ॥ २ ॥
अर्घ्यादिसमुदाचारं नृपाल्लब्ध्वा महामुनिः।
निषसादासने शुभ्रे ह्यास्तृते शुभवाससा ॥ ३ ॥
राजासे अर्घ्य आदि अतिथि-सत्कार पाकर वे महामुनि सुन्दर वस्त्र बिछे हुए शुभ्र आसनपर विराजमान हुए ॥३॥
कुशलं पृष्टवान् भूयो नृपः स मुनिसत्तमम्।
उवाच नारदं भूयः पौण्ड्रको वलगर्वितः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् बलके घमंडमें भरे हुए राजा पौण्ड्रकने पहले तो मुनिश्रेष्ठ नारदसे कुशल-समाचार पूछा, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४ ॥
भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वकार्येषु पण्डितः।
प्रथितो देवसिद्धेषु गन्धर्वेषु महात्मसु ॥ ५ ॥
सर्वत्रगो निराबाधो गत्वा सर्वत्र सर्वदा।
अगम्यं तव विप्रेन्द्र ब्रह्माण्डे न हि किंचन।
'विप्रवर ! आप सर्वत्र कुशल हैं, समस्त कार्योंमें पण्डित हैं। देवताओं, सिद्धों और महात्मा गन्धर्वोंमें आपकी ख्याति है। आप बिना किसी बाधाके सर्वत्र जा सकते हैं। सदा सब जगह आपकी पहुँच है। इस ब्रह्माण्डमें कोई भी स्थान आपके लिये अगम्य नहीं है ॥ ५-½ ॥
नारदेदं वद त्वं हि यत्र यत्र गतो भवान् ॥ ६ ॥