विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1048, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तत्र तत्र तपःसिद्धो लोके प्रथितवीर्यवान् ।
पौण्ड्र एव च विख्यातो वासुदेवेति शब्दितः ॥ ७ ॥
'नारदजी ! यह तो बताइये, आप जहाँ-जहाँ गये हैं, वहाँ-वहाँ यह तपःसिद्ध और लोकमें विख्यात बलशाली पौण्ड्रक ही 'वासुदेव' नामसे विख्यात है न ? ॥ ६-७ ॥
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी तूणी तनुत्रवान् ।
विजेता राजसिंहानां दाता सर्वस्य सर्वदा ॥ ८ ॥
'मैं ही शङ्खधारी, चक्रपाणि, गदाधर और शार्ङ्गधनुर्धर हूँ। तलवार और तरकस लेकर कवच धारण करके अनेकानेक राजसिंहोंपर विजय पानेवाला मैं ही हूँ। मैं ही सदा सबको सब कुछ देनेवाला हूँ ॥ ८ ॥
भोक्ता राज्यस्य सर्वस्य शास्ता राज्ञां बलाद् बली ।
अजेयः शत्रुसैन्यानां रक्षिता स्वजनस्य च ॥ ९ ॥
'मैं समस्त राज्यका भोक्ता और बलपूर्वक शासन करनेवाला बलवान् राजा हूँ, शत्रुसैनिकोंके लिये अजेय तथा स्वजनोंका रक्षक हूँ ॥ ९ ॥
योऽद्य गोपकनामासौ वासुदेवेति शब्दितः ।
तस्य वीर्यबले न स्तो नाम्नोऽस्य मम धारणे ॥ १० ॥
'आजकल जो वह गोप वासुदेव नामसे विख्यात हो रहा है, उसमें इतना बल और पराक्रम नहीं है, जिससे वह मेरा नाम धारण कर सके ॥ १० ॥
स हि गोपो वृथा बाल्याद् धारयत्येव नाम मे ।
इदं निश्चित्य विप्रन्द्र एक एव भवाम्यहम् ॥ ११ ॥
वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।
'वह ग्वाला अज्ञानवश व्यर्थ ही मेरा नाम धारण करता है। विप्रवर ! आप निश्चितरूपसे यह जान लीजिये कि मैं उस बलवान् यादवको जीतकर अकेला ही इस जगत्में वासुदेव रहूँगा ॥ १११/२ ॥
वृष्णीन् सर्वान् बलात् क्षिप्त्वा निहनिष्ये च तां पुरीम् ॥
द्वारकां विष्णुनिलयां योद्धा चाहं महामते ।
एते च बलिनः सर्वे नृपा मम समागताः ॥ १३ ॥
'समस्त वृष्णिवंशियोंको बलपूर्वक पराजित करके श्रीकृष्णकी निवासभूता द्वारकापुरीको नष्ट कर डालूँगा। महामते ! मैं स्वयं तो युद्ध करूँगा ही, ये समस्त बलवान् राजा भी मेरी ओरसे युद्धके लिये आये हैं ॥ १२-१३ ॥
अश्वाश्च वेगिनः सन्ति रथा वायुजवा मम ।
उष्ट्रा मत्ताः सहस्रं च गजा नियुतमेव च ॥ १४ ॥
एतेनाहं बलेनाजौ हनिष्ये केशवं रणे ।
'मेरे पास बहुत-से वेगशाली अश्व हैं, वायुके समान वेगशाली रथ हैं, सहस्रों मतवाले ऊँट और लाखों मदमत्त हाथी हैं। इस विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें मैं श्रीकृष्णका वध कर डालूँगा ॥ १४१/२ ॥
तस्मादेवं सदा विप्र वद ब्रह्मन् पुरे मम ॥ १५ ॥
इन्द्रस्यापि सदा विप्र वद नारद साम्प्रतम् ।
प्रार्थनैषा मम विभो नमस्ये त्वां तपोधन ॥ १६ ॥
'विप्रवर ! ब्रह्मन् ! आप प्रत्येक नगरमें मेरे लिये सदा ऐसी ही बात कहें। नारद बाबा ! इस समय इन्द्रके समक्ष भी आपको सदा मेरे बल-पराक्रमकी ही बात करनी चाहिये। विभो ! तपोधन ! यही मेरी प्रार्थना है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ' ॥ १५-१६ ॥
नारद उवाच
सर्वत्रगः सदा चास्मि यावद् ब्रह्माण्डसंस्थितिः ।
आचार्यः सर्वकार्येषु गमने केनचिन्नृप ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा—नरेश्वर ! जहाँतक ब्रह्माण्डकी स्थिति है, मैं सदा सर्वत्र जा सकता हूँ। किसी भी पुरुषको अपने समस्त कार्योंके लिये मेरी शरण लेनी चाहिये। सर्वत्र जानेकी कलामें तो मैं आचार्य ही हूँ ॥ १७ ॥
किं तु वक्तुं तथा राजन्नुत्सहे नृपसत्तम ।
महीं शासति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ १८ ॥
विष्णौ सर्वत्रगे देवे दुष्टान् हत्वा सबान्धवान् ।
वासुदेवेति को नाम तिष्ठत्यस्मिन् धराविति ॥ १९ ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! तुम जैसा चाहते हो, वैसी बात कहनेका उत्साह मैं कैसे कर सकता हूँ। जबतक बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त दुष्टोंका वध करके सर्वत्र जा सकनेवाले सर्वव्यापी देव, देवेश्वर, चक्रपाणि जनार्दन इस पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, तबतक उन श्रीहरिके रहते हुए दूसरा कौन वासुदेव कहला सकता है ॥ १८-१९ ॥
को नाम वक्तुमेवेदं कृष्णे शासति गोमती ।
अज्ञानाद् वक्तुमेवं च समर्थाः प्राकृता जनाः ॥ २० ॥
सूर्य-किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले द्युलोक और भूलोकपर जबतक श्रीकृष्णका शासन चल रहा है, तबतक कौन मनुष्य ऐसी बात कह सकता है। कि, पौण्ड्रक वासुदेव है'। तुम्हारे-जैसे मूढ़ मनुष्य ही अज्ञानवश ऐसी बात कहनेमें समर्थ हो सकते हैं ॥ २० ॥
हरिः सर्वत्रगो विष्णुर्दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
अचिन्त्यविभवो विष्णुः शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ २१ ॥
सर्वत्र जानेकी क्षमता रखनेवाले, अचिन्त्य वैभवशाली, पापहारी, सर्वव्यापी, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर विष्णु तुम्हारे घमंडको दूर कर देंगे ॥ २१ ॥