भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1049

भविष्यपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः १०२३


आदिदेवः पुराणात्मा दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
हास्यमेतन्महाराज यच्च वै तत्र संस्थितम् ॥ २२ ॥
शाङ्गं खड्गं तथा राजन् महाघोरं न दाप्यते ।
अतीव हासकालोऽयं तव सम्प्रति वर्तते ॥ २३ ॥

महाराज ! आदिदेव, पुराणपुरुष श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्पका दलन कर देंगे। तुम जो कुछ सोचते या कहते हो, यह उपहासकी बात है। राजन् ! श्रीकृष्णके पास जो शाङ्ग-धनुष और महाभयंकर खड्ग है, उनका तुम्हारे इन अस्त्रोंसे उच्छेद नहीं हो सकता। इस समय तुम्हारे लिये यह महान् हासका समय आ पहुँचा है ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकनारदसंवादे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और नारदका संवादविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥


त्रिनवतितमोऽध्यायः

नारदजीका श्रीकृष्णके पास जाना और पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमण

वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज पौण्ड्रो मदबलान्वितः ।
नारदं विप्रवयं तं प्रोवाच नृपसंसदि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला पौण्ड्रक कुपित हो उस राजसभामें विप्रवर नारदजीसे बोला— ॥ १ ॥

किमिदं प्राह विप्रर्षे राजाहं च द्विजैः सह ।
गच्छ त्वं काममथ वा मुने शापप्रदः सदा ॥ २ ॥
भीतस्त्वत्तो महाबुद्धे गच्छ त्वं काममद्य हि ।

'ब्रह्मर्षे ! आप यह क्या कहते हैं ? मैं राजा हूँ और इन ब्राह्मणोंके साथ हूँ। मुने ! आप सदा शाप देनेवाले हैं, अतः अपनी इच्छाके अनुसार यहाँसे चले जाइये। महाबुद्धे ! मैं आपसे डरता हूँ, अतः चाहें तो अभी चले जाइये' ॥ २ ॥

इत्युक्तो नृपवर्येण तूष्णीमेव स नारदः ॥ ३ ॥
जगामाकाशगमनो यत्र तिष्ठति केशवः ।

नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकके ऐसा कहनेपर आकाशचारी नारदजी चुपचाप वहाँसे उस स्थानको चले गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण थे ॥ ३ ॥

स गत्वा विष्णुसंकाशं विष्णोः सर्वमशंसत ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुर्यथेष्टं वदतामिति ।
दर्पं तस्यापनेष्यामि श्वोभूते द्विजसत्तम ॥ ५ ॥

श्रीकृष्णके पास जाकर उन्होंने उनसे उसकी सारी बातें कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'द्विजश्रेष्ठ ! पौण्ड्रक जैसा चाहे बकता रहे, कल मैं उसका घमंड दूर कर दूँगा' ॥ ४-५ ॥

इत्युक्त्वा विररामेव तस्मिन् वदरिकाश्रमे ।
ततः पौण्ड्रो महाबाहुर्बलैर्बहुभिरीश्वरः ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर उस बदरिकाश्रममें भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो रहे। इधर सामर्थ्यशाली महाबाहु पौण्ड्रकने बहुत-सी सेनाओंके साथ द्वारकापुरीको प्रस्थान किया ॥ ६ ॥

अश्वैरनेकसाहस्रैर्गजैर्बहुभिरन्वितः ।
शस्त्रकोटिसमायुक्तः स राजा सत्यसंगरः ॥ ७ ॥

अनेक सहस्र अश्वों, बहुसंख्यक हाथियों और करोड़ों अस्त्र-शस्त्रोंसे संयुक्त हुआ वह सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥

अनेकशतसाहस्रैः पत्तिभिश्च समन्वितः ।
एकलव्यप्रभृतिभी राजभिश्च समन्ततः ॥ ८ ॥

उसके साथ कई लाख पैदल सैनिक थे। एकलव्य आदि राजा उसे सब ओरसे घेरकर चलते थे ॥ ८ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि नागानामयुतं तथा ।
अर्बुदं पत्तिसंघानां तद्बलं समपद्यत ॥ ९ ॥

आठ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक अर्बुद (दस करोड़) पैदल सैनिकोंसे वह सारी सेना सम्पन्न थी ॥ ९ ॥

एतेन च बलेनाजौ प्रस्फुरन् नृपसत्तमः ।
विरराज महाराज उदयस्थो महारविः ॥ १० ॥

महाराज ! इस विशाल सेनासे युद्धस्थलमें प्रकाशित होनेवाला नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रक उदयगिरिपर प्रकाशमान महासूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥

स ययौ मध्यरात्रेण नगरीं द्वारकामथ ।
पत्तयो दीपिकाहस्ता रात्रौ तमसि दारुणे ॥ ११ ॥

उसने आधी रातके समय द्वारकापुरीपर धावा किया। रातके उस भयंकर अन्धकारमें पैदल सैनिकोंके हाथोंमें जलती हुई मशालें ले रखी थीं ॥ ११ ॥

ययुर्विविधशस्त्रौघाः सम्पत्तन्तो महाबलाः ।
द्वारकां वीर्यसम्पन्नां महाघोरां नृपोत्तमाः ॥ १२ ॥

वे महाबली श्रेष्ठ नरेश नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो पराक्रमशालिनी महाघोर द्वारकापुरीपर आक्रमण करनेके लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥