भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1050

१०२४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रथं महान्तमारुह्य शस्त्रौघैश्च समावृतम्।
पट्टिशासिसमाकीर्णं गदापरिघसंकुलम् ॥ १३ ॥
शक्तितोमरसंकीर्णं ध्वजमालासमाचितम्।
किङ्किणीजालसंयुक्तं शरासिप्राससंयुतम् ॥ १४ ॥
महाघोरं महारौद्रं युगान्तजलदोपमम्।
धनुर्गदासमाकीर्णं महावाद्योपमं महत् ॥ १५ ॥
अग्न्यर्कसदृशाकारं ययौ द्वारवतीमनु।
गृहीतदीपिको राजा वीर्यवान् बलवान् नृप ॥ १६ ॥

नरेश्वर ! पराक्रमी एवं बलवान् राजा पौण्ड्रक भी मशालें साथ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुआ। वह रथ नाना प्रकारके शस्त्रसमूहोंसे भरा हुआ था। पट्टिश, खड्ग, गदा और परिघोंसे परिपूर्ण था, शक्ति, तोमर, बाण, खड्ग और प्राससे सम्पन्न था, अनेकों ध्वज उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। घुँघरू लगी हुई झालरोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें धनुष और गदाएँ यथा-स्थान रखी गयी थीं। वह महाघोर महारौद्र विशाल रथ प्रलयकालीन मेघ एवं महावाद्यके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाला था। उसका स्वरूप अग्नि और सूर्यके तुल्य प्रकाशमान था ॥ १३–१६ ॥

हन्तुमैच्छज्जगन्नाथं वृष्णींश्चैव समन्ततः।
आकर्षन् बलमुख्यांस्तान् राज्ञः सर्वान् महाद्युतिः ॥ १७ ॥
पुरद्वारं समासाद्य बलं संस्थाप्य यत्नतः।
इदं प्रोवाच राजा तु नृपान् सर्वानवस्थितान् ॥ १८ ॥

महातेजस्वी राजा पौण्ड्रक जगदीश्वर श्रीकृष्णको तथा उनके चारों ओर खड़े होनेवाले वृष्णिवंशी वीरोंको मार डालना चाहता था। वह अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य सभी राजाओंको अपने साथ खींच ले गया और नगरद्वारपर पहुँचकर वहाँ सेनाको यत्नपूर्वक स्थापित करके सब ओर खड़े हुए समस्त नरेशोंसे इस प्रकार बोला— ॥ १७-१८ ॥

ताड्यतामत्र भेरी तु नाम विश्राव्य मामकम्।
युध्यतां युध्यतामत्र देयं वा प्रतिदीयताम् ॥ १९ ॥
आगतः पौण्ड्रको राजा युद्धार्थी वीर्यवत्तरः।
हन्तुकामः समग्रान् वै कृष्णबाहुबलाश्रयान् ॥ २० ॥

“वीरो ! रणभेरी बजाओ और मेरा नाम सुनाकर कहो—'यादवो ! यहाँ आकर युद्ध करो ! युद्ध करो !! अथवा देने योग्य राजकीय कर प्रदान करो। महान् पराक्रमी राजा पौण्ड्रक युद्धके लिये पधारे हैं और श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेवाले तुम समस्त यादवोंका वध करना चाहते हैं'” ॥ १९-२० ॥

इति ते प्रेषिताः सर्वे समीयुः सूचकान् बहून्।
दीपिकाश्च प्रदीव्यन्ते बह्वयः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
इतश्चेतश्च राजानो युध्यन्ते युद्धलालसाः।
पुरीं ते पुरतस्तत्र क्षत्रियाः शस्त्रिणस्तदा ॥ २२ ॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः शस्त्रधारासमाकुलाः।
कुतोऽयं वृष्णिप्रवरः कुतो राजा जगत्पतिः ॥ २३ ॥
कुतोऽयं सात्यकिर्वीरः कुतो हार्दिक्य एव च।
कुतो नु बलभद्रश्च सर्वयादवसत्तमः।
इत्येवं कथयन्तो वै राजानः सर्व एव ते ॥ २४ ॥
आदाय शस्त्राणि बहूनि सर्वतः
शरांश्च चापानि बहूनि सर्वे।
युद्धाय सन्नाहनिबद्धशो युयु-
र्हरेः पुरीं द्वारवतीं नृपोत्तमाः ॥ २५ ॥

इस प्रकार भेजे गये वे समस्त नरेश बहुसंख्यक सूचकों (बाहर-भीतरके वृत्तान्तको जाननेवाले यादव भटों) से मिले। उस समय बहुतेरी मशालें लाखोंकी संख्यामें जल रही थीं। युद्धकी लालसा रखनेवाले राजाओंने इधर-उधर युद्ध छेड़ दिया था। वहाँ पुरीके द्वारपर शस्त्रधारी क्षत्रिय सिंहनाद करते हुए शस्त्रोंकी धारा बरसा रहे थे और कहते थे 'कहाँ है वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर ? कहाँ है राजा जगदीश्वर ? कहाँ है यह वीर सात्यकि ? कहाँ है कृतवर्मा और कहाँ है सर्वयादवशिरोमणि बलभद्र ?' ऐसा कहते हुए वे समस्त श्रेष्ठ राजा सब ओरसे बहुतेरे अस्त्र-शस्त्र, बाण और बहुसंख्यक धनुष ले युद्धके लिये कमर कसकर श्रीहरिकी द्वारकापुरीपर धावा बोलने लगे ॥ २१–२५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकस्य द्वारकागमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमणविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥


चतुर्नवतितमोऽध्यायः

यादववीरोंद्वारा पौण्ड्रककी सेनाका और एकलव्यद्वारा यादवसेनाका संहार

वैशम्पायन उवाच
ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसंचयम्।
रात्रौ च व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १ ॥
महावातसमुद्भूतं कल्पान्ते सागरोपमम्।
संनद्धाः समपद्यन्त शस्त्रिणो युद्धलालसाः ॥ २ ॥
गृहीतदीपिकाः सर्वे यादवाः शस्त्रयोधिनः।