भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1051

भविष्यपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः [ १०२५


वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर समस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी जमाव हो रहा है। वे सब-के-सब महान् अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए प्रलयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषतः रात्रिके समय यह महान् संकट प्राप्त हुआ है। यह देख और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे अस्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन सभी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी थीं ॥ १-२ ॥

सात्यकिर्बलभद्रश्च हार्दिक्यो निशठस्तथा ॥ ३ ॥
उद्धवोऽथ महाबुद्धिरुग्रसेनो महाबलः ।
अन्ये च यादवाः सर्वे कवचप्रग्रहे रताः ॥ ४ ॥

सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, परम बुद्धिमान् उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य सब यादववीर कवच बाँधने लगे ॥ ३-४ ॥

समस्तयुद्धकुशला रात्रौ सन्नाहयोधिनः ।
शस्त्रिणः खड्गिनश्चैव सर्वे शस्त्रसमाकुलाः ॥ ५ ॥

ये सब-के-सब सम्पूर्ण युद्धोंमें कुशल, रातमें भी कमर कसकर जूझनेवाले, शस्त्रधारी और खड्गधारी थे। सभी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ५ ॥

युद्धाय समपद्यन्त बहवो बाहुशालिनः ।
रथिनो गजिनश्चैव सादिनः सायुधास्तथा ॥ ६ ॥

वे बहुसंख्यक बाहुशाली वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके साथ रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और शस्त्रधारी पैदल योद्धा भी थे ॥ ६ ॥

नित्ययुक्ता महात्मानो धन्विनः पुरुषोत्तमाः ।
निर्ययुर्नगरात् तूर्णं दीपिकाभिः समन्ततः ॥ ७ ॥

वे नित्य उद्यत रहनेवाले, महामनस्वी, धनुर्धर, पुरुषप्रवर वीर सब ओरसे मशालोंके साथ तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ ७ ॥

कुतः पौण्ड्रक इत्येवं वदन्तः सर्वसात्वताः ।
दीपिकादीपितो देशो निस्तमाः समपद्यत ॥ ८ ॥

वे समस्त यादव यह कहते हुए निकले कि 'कहाँ है पौण्ड्रक?' मशालोंसे प्रकाशित हुआ वह देश सर्वथा अन्धकाररहित हो गया ॥ ८ ॥

ततो वितिमिरो देशः समन्तात् प्रत्यपद्यत ।
युद्धं समभवद् घोरं वृष्णिभिः शत्रुभिः सह ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् वह स्थान सब ओरसे अन्धकारशून्य हो गया। उस समय वहाँ शत्रुओंके साथ वृष्णिवंशियोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

ततो महान् समभवत् संनादो रोमहर्षणः ।
हया हयैः समायुक्ताः गजाश्च गजयूथपैः ॥ १० ॥
रथा रथैः समायुक्ताः सादिभिः सादिनस्तथा ।

फिर तो महान् कोलाहल होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। घोड़े घोड़ोंसे, गजराज गजराजोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ १० ॥

खड्गिनः खड्गिभिः सार्धं गदिभिर्गदिनस्तथा ॥ ११ ॥
परस्परव्यतीकारो रण आसीत् सुदारुणः ।
महाप्रलयसंक्षोभः शब्दस्तेषां महात्मनाम् ॥ १२ ॥

खड्गधारी वीर खड्गधारियोंसे और गदाधारी गदाधारियोंसे लड़ने लगे। उस रणभूमिमें उभयपक्षके सैनिकोंका परस्पर बड़ा भयंकर बोल-मेल हो गया। उन महामनस्वी वीरोंके गर्जन-तर्जनका शब्द महाप्रलयके समय उमड़े हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११-१२ ॥

धावन्तः प्रहरन्त्येतान् घ्नन्त्येतान् सर्वतो नृपान् ।
अयमेष महाबाहुः खड्गी पतति वीर्यवान् ॥ १३ ॥
अयमेष शरो घोरो वर्ततेऽतिसुदारुणः ।
गदी चायं महावीर्यः सर्वान् नो बाधते नृपः ॥ १४ ॥

दोनों ओरके योद्धा धावा करके विपक्षी सैनिकोंपर प्रहार करते और इन समस्त नरेशोंको घायल करते थे। (वहाँ आपसमें इस प्रकारकी चर्चाएँ होती थीं) 'यह खड्गधारी महाबाहु पराक्रमी वीर धराशायी हो रहा है। यह अत्यन्त दारुण बाण बड़ा ही भयंकर है। यह गदाधारी महापराक्रमी नरेश हम सब लोगोंको पीड़ा दे रहा है ॥ १३-१४ ॥

अयं रथी शरी चापी गदी तूणी तनुत्रवान् ।
पट्टिशी सर्वतो याति कुन्तपाणिरयं बली ॥ १५ ॥

'यह धनुष, बाण, गदा, तरकस, कवच, पट्टिश और कुन्त धारण करनेवाला बलवान् रथी वीर रणभूमिमें सब ओर विचर रहा है ॥ १५ ॥

अयमत्र महाशूली संश्रितः सर्वतो दिशम् ।
गजोऽयं सविषाणाग्रो वर्तते सर्वतः प्रति ॥ १६ ॥

'यह महाशूलधारी योद्धा यहाँ सारी दिशाओंमें चक्कर लगाता है। यह हाथी अपने दाँतोंका अग्रभाग सामने किये सब ओर दौड़ लगाता है' ॥ १६ ॥

अतिसर्वव्रगः शूरो वेगवान् वातसंनिभः ।
शराञ्छरैः समाहन्ति दण्डान् दण्डैर्जगत्पते ॥ १७ ॥

राजन् ! कोई-कोई वेगशाली शूरवीर वायुके समान अत्यन्त तीव्र गतिसे सर्वत्र जा पहुँचता और अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंका तथा दण्डोंसे उनके दण्डोंका नाश कर देता था ॥ १७ ॥

कुन्तान् कुन्तैः समाजघ्नुर्गदाभिश्च गदास्तथा ।
परिघान् परिधैः सार्धं शूलाञ्छूलैः समन्ततः ॥ १८ ॥

कितने ही योद्धा कुन्तों (भालों) से कुन्तोंका, गदाओंसे


म० १० ३३-