विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1052, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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गदाओंका, परिघोंसे परिघोंका, साथ ही सब ओर शूलोंसे शूलोंका उच्छेद कर डालते थे ॥ १८ ॥
एवं तेषां महाराज कुर्वतां रणमुत्तमम् ।
संग्रामः सुमहानासीच्छब्दश्चापि महानभूत् ॥ १९ ॥
महाराज जनमेजय ! इस प्रकार उत्तम युद्ध करते हुए उन योद्धाओंमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया और महान् कोलाहल होने लगा ॥ १९ ॥
भूतानि सुबहून्याजौ शब्दवन्ति महान्ति च ।
प्रादुरासंन् सहस्राणि शङ्खानां भीमनिःस्वनः ॥ २० ॥
उस युद्धस्थलमें बहुत-से बड़े-बड़े प्राणी भाँति-भाँतिके शब्द करते हुए सहस्रोंकी संख्यामें प्रकट हो गये। वहाँ होने-वाली शङ्खोंकी ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी ॥ २० ॥
रात्रौ प्रादुरभूच्छब्दः संग्रामे रोमहर्षणः ।
वर्तमाने महायुद्धे वृष्णीनां चैव तैः सह ॥ २१ ॥
केचिद् ग्रस्ताः समापेतुः पृथिव्यां पृथिवीक्षितः ।
रात्रिमें उस संग्रामके भीतर बड़ा रोमाञ्चकारी शब्द प्रकट होने लगा। शत्रुओंके साथ होनेवाले वृष्णिवंशियोंके उस महायुद्धमें कितने ही भूपाल कालके ग्रास बनकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २१३ ॥
केचिच्च पतिताः श्लिष्टाः विप्रकीर्णशिरोरुहाः ॥ २२ ॥
पेतुरुर्व्यां महावीर्या राजानः शस्त्रपाणयः ।
कितने ही महापराक्रमी राजा हाथमें शस्त्र लिये ही एक दूसरेसे सटे हुए गिरते और सिरके बाल बिखेरे धराशायी हो जाते थे ॥ २२३ ॥
केचित् तु भिन्नवर्माणः समापेतुः सहस्रधा ॥ २३ ॥
परस्परं समाश्रित्य परस्परवधैषिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महात्मानः समन्तात् क्षतविग्रहाः ॥ २४ ॥
पेतुर्गतासवः केचिद् यमराष्ट्रविवर्धनाः ।
एवं ते निहता राजन् योधिनः सर्व एव तु ॥ २५ ॥
कितने ही योद्धा कवच विदीर्ण हो जानेके कारण सहस्रों टुकड़े होकर गिर पड़ते थे। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले कितने ही महामनस्वी योद्धा परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करके सब ओरसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेपर प्राणशून्य होकर गिर पड़ते और यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करते थे। राजन् ! इस प्रकार युद्धमें भाग लेनेवाले वे सब नरेश वहाँ मारे गये ॥ २३-२५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूर एकलव्यो निषादपः ।
धनुर्गृह्य महाघोरं कालान्तकयमोपमः ॥ २६ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामास यादवान् ।
इसी बीचमें निषादोंका अधिपति शूरवीर एकलव्य, जो काल, अन्तक और यमके समान भयंकर था, महाघोर धनुष लेकर सहस्रों बाणोंद्वारा यादवोंको पीड़ा देने लगा ॥ २६३ ॥
परःशतैः शराणां तु निशितैर्मर्मभेदिभिः ॥ २७ ॥
वृष्णीनां च बलं सर्वं पोथयामास सर्वतः ।
युध्यतः शस्त्रपाणींश्च क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ २८ ॥
उसने सैकड़ों तीखे और मर्मभेदी बाणोंसे वृष्णिवंशियोंकी सारी सेनाको मार गिराया। हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर जूझनेवाले अत्यन्त बलशाली क्षत्रियोंको भी धराशायी कर दिया ॥ २७-२८ ॥
निशठं पञ्चविंशत्या शराणां नतपर्वणाम् ।
सारणं दशभिर्विद्ध्वा हार्दिक्यं पञ्चभिः शरैः ॥ २९ ॥
उग्रसेनं नवत्याशु वसुदेवं च सप्तभिः ।
उद्धवं दशभिश्चैव ह्यक्रूरं पञ्चभिः शरैः ॥ ३० ॥
उसने झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे निशठको, दस बाणोंसे सारणको, पाँचसे कृतवर्माको, नब्बे बाणोंसे उग्रसेनको तथा सात सायकोंद्वारा वसुदेवको भी उग्रतापूर्वक घायल करके दस बाणोंसे उद्धवको और पाँच सायकोंसे अक्रूरको भी बींध डाला ॥ २९-३० ॥
एवमेकैकशः सर्वे निहता निशितैः शरैः ।
विद्राव्य यादवीं सेनां नाम विश्राव्य वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
इस प्रकार एक-एक करके उस पराक्रमी वीरने तीखे बाणोंद्वारा सभी यादव-वीरोंको घायल कर दिया तथा यादवी सेनाको भगाकर वह अपना नाम सुनाते हुए इस प्रकार कहने लगा— ॥ ३१ ॥
एकलव्यो यदुवृषान् वीर्यवान् वलवानहम् ।
इदानीं सात्यकिर्वीरः क्व यास्यति महाबलः ॥ ३२ ॥
मदमत्तो हली साक्षात् क्व यातीह गदाधरः ।
इत्याह सिंहनादेन सिंहान् विस्त्रापयन्निव ॥ ३३ ॥
'मैं बलवान् एवं पराक्रमी वीर एकलव्य हूँ। इस समय महाबली वीर सात्यकि मुझसे बचकर कहाँ जायँगे ? बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाले साक्षात् हलधर हाथमें गदा लिये कहाँ जा रहे हैं ?' इस प्रकार वह यदुकुलके श्रेष्ठ वीरोंको ललकार कर कहता और अपने सिंहनादसे सिंहोंको भी विस्मित-सा किये देता था ॥ ३२-३३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे चतुर्र्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकवधके प्रसङ्गमें रात्रिकालका युद्धविषयक चौरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥