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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
१०२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तत्र तत्र तपःसिद्धो लोके प्रथितवीर्यवान् ।
पौण्ड्र एव च विख्यातो वासुदेवेति शब्दितः ॥ ७ ॥
'नारदजी ! यह तो बताइये, आप जहाँ-जहाँ गये हैं, वहाँ-वहाँ यह तपःसिद्ध और लोकमें विख्यात बलशाली पौण्ड्रक ही 'वासुदेव' नामसे विख्यात है न ? ॥ ६-७ ॥

शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी तूणी तनुत्रवान् ।
विजेता राजसिंहानां दाता सर्वस्य सर्वदा ॥ ८ ॥
'मैं ही शङ्खधारी, चक्रपाणि, गदाधर और शार्ङ्गधनुर्धर हूँ। तलवार और तरकस लेकर कवच धारण करके अनेकानेक राजसिंहोंपर विजय पानेवाला मैं ही हूँ। मैं ही सदा सबको सब कुछ देनेवाला हूँ ॥ ८ ॥

भोक्ता राज्यस्य सर्वस्य शास्ता राज्ञां बलाद् बली ।
अजेयः शत्रुसैन्यानां रक्षिता स्वजनस्य च ॥ ९ ॥
'मैं समस्त राज्यका भोक्ता और बलपूर्वक शासन करनेवाला बलवान् राजा हूँ, शत्रुसैनिकोंके लिये अजेय तथा स्वजनोंका रक्षक हूँ ॥ ९ ॥

योऽद्य गोपकनामासौ वासुदेवेति शब्दितः ।
तस्य वीर्यबले न स्तो नाम्नोऽस्य मम धारणे ॥ १० ॥
'आजकल जो वह गोप वासुदेव नामसे विख्यात हो रहा है, उसमें इतना बल और पराक्रम नहीं है, जिससे वह मेरा नाम धारण कर सके ॥ १० ॥

स हि गोपो वृथा बाल्याद् धारयत्येव नाम मे ।
इदं निश्चित्य विप्रन्द्र एक एव भवाम्यहम् ॥ ११ ॥
वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।
'वह ग्वाला अज्ञानवश व्यर्थ ही मेरा नाम धारण करता है। विप्रवर ! आप निश्चितरूपसे यह जान लीजिये कि मैं उस बलवान् यादवको जीतकर अकेला ही इस जगत्में वासुदेव रहूँगा ॥ १११/२ ॥

वृष्णीन् सर्वान् बलात् क्षिप्त्वा निहनिष्ये च तां पुरीम् ॥
द्वारकां विष्णुनिलयां योद्धा चाहं महामते ।
एते च बलिनः सर्वे नृपा मम समागताः ॥ १३ ॥
'समस्त वृष्णिवंशियोंको बलपूर्वक पराजित करके श्रीकृष्णकी निवासभूता द्वारकापुरीको नष्ट कर डालूँगा। महामते ! मैं स्वयं तो युद्ध करूँगा ही, ये समस्त बलवान् राजा भी मेरी ओरसे युद्धके लिये आये हैं ॥ १२-१३ ॥

अश्वाश्च वेगिनः सन्ति रथा वायुजवा मम ।
उष्ट्रा मत्ताः सहस्रं च गजा नियुतमेव च ॥ १४ ॥
एतेनाहं बलेनाजौ हनिष्ये केशवं रणे ।
'मेरे पास बहुत-से वेगशाली अश्व हैं, वायुके समान वेगशाली रथ हैं, सहस्रों मतवाले ऊँट और लाखों मदमत्त हाथी हैं। इस विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें मैं श्रीकृष्णका वध कर डालूँगा ॥ १४१/२ ॥

तस्मादेवं सदा विप्र वद ब्रह्मन् पुरे मम ॥ १५ ॥
इन्द्रस्यापि सदा विप्र वद नारद साम्प्रतम् ।
प्रार्थनैषा मम विभो नमस्ये त्वां तपोधन ॥ १६ ॥
'विप्रवर ! ब्रह्मन् ! आप प्रत्येक नगरमें मेरे लिये सदा ऐसी ही बात कहें। नारद बाबा ! इस समय इन्द्रके समक्ष भी आपको सदा मेरे बल-पराक्रमकी ही बात करनी चाहिये। विभो ! तपोधन ! यही मेरी प्रार्थना है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ' ॥ १५-१६ ॥

नारद उवाच

सर्वत्रगः सदा चास्मि यावद् ब्रह्माण्डसंस्थितिः ।
आचार्यः सर्वकार्येषु गमने केनचिन्नृप ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा—नरेश्वर ! जहाँतक ब्रह्माण्डकी स्थिति है, मैं सदा सर्वत्र जा सकता हूँ। किसी भी पुरुषको अपने समस्त कार्योंके लिये मेरी शरण लेनी चाहिये। सर्वत्र जानेकी कलामें तो मैं आचार्य ही हूँ ॥ १७ ॥

किं तु वक्तुं तथा राजन्नुत्सहे नृपसत्तम ।
महीं शासति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ १८ ॥
विष्णौ सर्वत्रगे देवे दुष्टान् हत्वा सबान्धवान् ।
वासुदेवेति को नाम तिष्ठत्यस्मिन् धराविति ॥ १९ ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! तुम जैसा चाहते हो, वैसी बात कहनेका उत्साह मैं कैसे कर सकता हूँ। जबतक बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त दुष्टोंका वध करके सर्वत्र जा सकनेवाले सर्वव्यापी देव, देवेश्वर, चक्रपाणि जनार्दन इस पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, तबतक उन श्रीहरिके रहते हुए दूसरा कौन वासुदेव कहला सकता है ॥ १८-१९ ॥

को नाम वक्तुमेवेदं कृष्णे शासति गोमती ।
अज्ञानाद् वक्तुमेवं च समर्थाः प्राकृता जनाः ॥ २० ॥
सूर्य-किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले द्युलोक और भूलोकपर जबतक श्रीकृष्णका शासन चल रहा है, तबतक कौन मनुष्य ऐसी बात कह सकता है। कि, पौण्ड्रक वासुदेव है'। तुम्हारे-जैसे मूढ़ मनुष्य ही अज्ञानवश ऐसी बात कहनेमें समर्थ हो सकते हैं ॥ २० ॥

हरिः सर्वत्रगो विष्णुर्दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
अचिन्त्यविभवो विष्णुः शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ २१ ॥
सर्वत्र जानेकी क्षमता रखनेवाले, अचिन्त्य वैभवशाली, पापहारी, सर्वव्यापी, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर विष्णु तुम्हारे घमंडको दूर कर देंगे ॥ २१ ॥

भविष्यपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः १०२३


आदिदेवः पुराणात्मा दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
हास्यमेतन्महाराज यच्च वै तत्र संस्थितम् ॥ २२ ॥
शाङ्गं खड्गं तथा राजन् महाघोरं न दाप्यते ।
अतीव हासकालोऽयं तव सम्प्रति वर्तते ॥ २३ ॥

महाराज ! आदिदेव, पुराणपुरुष श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्पका दलन कर देंगे। तुम जो कुछ सोचते या कहते हो, यह उपहासकी बात है। राजन् ! श्रीकृष्णके पास जो शाङ्ग-धनुष और महाभयंकर खड्ग है, उनका तुम्हारे इन अस्त्रोंसे उच्छेद नहीं हो सकता। इस समय तुम्हारे लिये यह महान् हासका समय आ पहुँचा है ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकनारदसंवादे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और नारदका संवादविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥


त्रिनवतितमोऽध्यायः

नारदजीका श्रीकृष्णके पास जाना और पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमण

वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज पौण्ड्रो मदबलान्वितः ।
नारदं विप्रवयं तं प्रोवाच नृपसंसदि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला पौण्ड्रक कुपित हो उस राजसभामें विप्रवर नारदजीसे बोला— ॥ १ ॥

किमिदं प्राह विप्रर्षे राजाहं च द्विजैः सह ।
गच्छ त्वं काममथ वा मुने शापप्रदः सदा ॥ २ ॥
भीतस्त्वत्तो महाबुद्धे गच्छ त्वं काममद्य हि ।

'ब्रह्मर्षे ! आप यह क्या कहते हैं ? मैं राजा हूँ और इन ब्राह्मणोंके साथ हूँ। मुने ! आप सदा शाप देनेवाले हैं, अतः अपनी इच्छाके अनुसार यहाँसे चले जाइये। महाबुद्धे ! मैं आपसे डरता हूँ, अतः चाहें तो अभी चले जाइये' ॥ २ ॥

इत्युक्तो नृपवर्येण तूष्णीमेव स नारदः ॥ ३ ॥
जगामाकाशगमनो यत्र तिष्ठति केशवः ।

नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकके ऐसा कहनेपर आकाशचारी नारदजी चुपचाप वहाँसे उस स्थानको चले गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण थे ॥ ३ ॥

स गत्वा विष्णुसंकाशं विष्णोः सर्वमशंसत ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुर्यथेष्टं वदतामिति ।
दर्पं तस्यापनेष्यामि श्वोभूते द्विजसत्तम ॥ ५ ॥

श्रीकृष्णके पास जाकर उन्होंने उनसे उसकी सारी बातें कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'द्विजश्रेष्ठ ! पौण्ड्रक जैसा चाहे बकता रहे, कल मैं उसका घमंड दूर कर दूँगा' ॥ ४-५ ॥

इत्युक्त्वा विररामेव तस्मिन् वदरिकाश्रमे ।
ततः पौण्ड्रो महाबाहुर्बलैर्बहुभिरीश्वरः ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर उस बदरिकाश्रममें भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो रहे। इधर सामर्थ्यशाली महाबाहु पौण्ड्रकने बहुत-सी सेनाओंके साथ द्वारकापुरीको प्रस्थान किया ॥ ६ ॥

अश्वैरनेकसाहस्रैर्गजैर्बहुभिरन्वितः ।
शस्त्रकोटिसमायुक्तः स राजा सत्यसंगरः ॥ ७ ॥

अनेक सहस्र अश्वों, बहुसंख्यक हाथियों और करोड़ों अस्त्र-शस्त्रोंसे संयुक्त हुआ वह सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥

अनेकशतसाहस्रैः पत्तिभिश्च समन्वितः ।
एकलव्यप्रभृतिभी राजभिश्च समन्ततः ॥ ८ ॥

उसके साथ कई लाख पैदल सैनिक थे। एकलव्य आदि राजा उसे सब ओरसे घेरकर चलते थे ॥ ८ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि नागानामयुतं तथा ।
अर्बुदं पत्तिसंघानां तद्बलं समपद्यत ॥ ९ ॥

आठ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक अर्बुद (दस करोड़) पैदल सैनिकोंसे वह सारी सेना सम्पन्न थी ॥ ९ ॥

एतेन च बलेनाजौ प्रस्फुरन् नृपसत्तमः ।
विरराज महाराज उदयस्थो महारविः ॥ १० ॥

महाराज ! इस विशाल सेनासे युद्धस्थलमें प्रकाशित होनेवाला नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रक उदयगिरिपर प्रकाशमान महासूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥

स ययौ मध्यरात्रेण नगरीं द्वारकामथ ।
पत्तयो दीपिकाहस्ता रात्रौ तमसि दारुणे ॥ ११ ॥

उसने आधी रातके समय द्वारकापुरीपर धावा किया। रातके उस भयंकर अन्धकारमें पैदल सैनिकोंके हाथोंमें जलती हुई मशालें ले रखी थीं ॥ ११ ॥

ययुर्विविधशस्त्रौघाः सम्पत्तन्तो महाबलाः ।
द्वारकां वीर्यसम्पन्नां महाघोरां नृपोत्तमाः ॥ १२ ॥

वे महाबली श्रेष्ठ नरेश नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो पराक्रमशालिनी महाघोर द्वारकापुरीपर आक्रमण करनेके लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥

१०२४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रथं महान्तमारुह्य शस्त्रौघैश्च समावृतम्।
पट्टिशासिसमाकीर्णं गदापरिघसंकुलम् ॥ १३ ॥
शक्तितोमरसंकीर्णं ध्वजमालासमाचितम्।
किङ्किणीजालसंयुक्तं शरासिप्राससंयुतम् ॥ १४ ॥
महाघोरं महारौद्रं युगान्तजलदोपमम्।
धनुर्गदासमाकीर्णं महावाद्योपमं महत् ॥ १५ ॥
अग्न्यर्कसदृशाकारं ययौ द्वारवतीमनु।
गृहीतदीपिको राजा वीर्यवान् बलवान् नृप ॥ १६ ॥

नरेश्वर ! पराक्रमी एवं बलवान् राजा पौण्ड्रक भी मशालें साथ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुआ। वह रथ नाना प्रकारके शस्त्रसमूहोंसे भरा हुआ था। पट्टिश, खड्ग, गदा और परिघोंसे परिपूर्ण था, शक्ति, तोमर, बाण, खड्ग और प्राससे सम्पन्न था, अनेकों ध्वज उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। घुँघरू लगी हुई झालरोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें धनुष और गदाएँ यथा-स्थान रखी गयी थीं। वह महाघोर महारौद्र विशाल रथ प्रलयकालीन मेघ एवं महावाद्यके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाला था। उसका स्वरूप अग्नि और सूर्यके तुल्य प्रकाशमान था ॥ १३–१६ ॥

हन्तुमैच्छज्जगन्नाथं वृष्णींश्चैव समन्ततः।
आकर्षन् बलमुख्यांस्तान् राज्ञः सर्वान् महाद्युतिः ॥ १७ ॥
पुरद्वारं समासाद्य बलं संस्थाप्य यत्नतः।
इदं प्रोवाच राजा तु नृपान् सर्वानवस्थितान् ॥ १८ ॥

महातेजस्वी राजा पौण्ड्रक जगदीश्वर श्रीकृष्णको तथा उनके चारों ओर खड़े होनेवाले वृष्णिवंशी वीरोंको मार डालना चाहता था। वह अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य सभी राजाओंको अपने साथ खींच ले गया और नगरद्वारपर पहुँचकर वहाँ सेनाको यत्नपूर्वक स्थापित करके सब ओर खड़े हुए समस्त नरेशोंसे इस प्रकार बोला— ॥ १७-१८ ॥

ताड्यतामत्र भेरी तु नाम विश्राव्य मामकम्।
युध्यतां युध्यतामत्र देयं वा प्रतिदीयताम् ॥ १९ ॥
आगतः पौण्ड्रको राजा युद्धार्थी वीर्यवत्तरः।
हन्तुकामः समग्रान् वै कृष्णबाहुबलाश्रयान् ॥ २० ॥

“वीरो ! रणभेरी बजाओ और मेरा नाम सुनाकर कहो—'यादवो ! यहाँ आकर युद्ध करो ! युद्ध करो !! अथवा देने योग्य राजकीय कर प्रदान करो। महान् पराक्रमी राजा पौण्ड्रक युद्धके लिये पधारे हैं और श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेवाले तुम समस्त यादवोंका वध करना चाहते हैं'” ॥ १९-२० ॥

इति ते प्रेषिताः सर्वे समीयुः सूचकान् बहून्।
दीपिकाश्च प्रदीव्यन्ते बह्वयः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
इतश्चेतश्च राजानो युध्यन्ते युद्धलालसाः।
पुरीं ते पुरतस्तत्र क्षत्रियाः शस्त्रिणस्तदा ॥ २२ ॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः शस्त्रधारासमाकुलाः।
कुतोऽयं वृष्णिप्रवरः कुतो राजा जगत्पतिः ॥ २३ ॥
कुतोऽयं सात्यकिर्वीरः कुतो हार्दिक्य एव च।
कुतो नु बलभद्रश्च सर्वयादवसत्तमः।
इत्येवं कथयन्तो वै राजानः सर्व एव ते ॥ २४ ॥
आदाय शस्त्राणि बहूनि सर्वतः
शरांश्च चापानि बहूनि सर्वे।
युद्धाय सन्नाहनिबद्धशो युयु-
र्हरेः पुरीं द्वारवतीं नृपोत्तमाः ॥ २५ ॥

इस प्रकार भेजे गये वे समस्त नरेश बहुसंख्यक सूचकों (बाहर-भीतरके वृत्तान्तको जाननेवाले यादव भटों) से मिले। उस समय बहुतेरी मशालें लाखोंकी संख्यामें जल रही थीं। युद्धकी लालसा रखनेवाले राजाओंने इधर-उधर युद्ध छेड़ दिया था। वहाँ पुरीके द्वारपर शस्त्रधारी क्षत्रिय सिंहनाद करते हुए शस्त्रोंकी धारा बरसा रहे थे और कहते थे 'कहाँ है वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर ? कहाँ है राजा जगदीश्वर ? कहाँ है यह वीर सात्यकि ? कहाँ है कृतवर्मा और कहाँ है सर्वयादवशिरोमणि बलभद्र ?' ऐसा कहते हुए वे समस्त श्रेष्ठ राजा सब ओरसे बहुतेरे अस्त्र-शस्त्र, बाण और बहुसंख्यक धनुष ले युद्धके लिये कमर कसकर श्रीहरिकी द्वारकापुरीपर धावा बोलने लगे ॥ २१–२५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकस्य द्वारकागमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमणविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥


चतुर्नवतितमोऽध्यायः

यादववीरोंद्वारा पौण्ड्रककी सेनाका और एकलव्यद्वारा यादवसेनाका संहार

वैशम्पायन उवाच
ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसंचयम्।
रात्रौ च व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १ ॥
महावातसमुद्भूतं कल्पान्ते सागरोपमम्।
संनद्धाः समपद्यन्त शस्त्रिणो युद्धलालसाः ॥ २ ॥
गृहीतदीपिकाः सर्वे यादवाः शस्त्रयोधिनः।

भविष्यपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः [ १०२५


वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर समस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी जमाव हो रहा है। वे सब-के-सब महान् अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए प्रलयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषतः रात्रिके समय यह महान् संकट प्राप्त हुआ है। यह देख और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे अस्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन सभी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी थीं ॥ १-२ ॥

सात्यकिर्बलभद्रश्च हार्दिक्यो निशठस्तथा ॥ ३ ॥
उद्धवोऽथ महाबुद्धिरुग्रसेनो महाबलः ।
अन्ये च यादवाः सर्वे कवचप्रग्रहे रताः ॥ ४ ॥

सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, परम बुद्धिमान् उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य सब यादववीर कवच बाँधने लगे ॥ ३-४ ॥

समस्तयुद्धकुशला रात्रौ सन्नाहयोधिनः ।
शस्त्रिणः खड्गिनश्चैव सर्वे शस्त्रसमाकुलाः ॥ ५ ॥

ये सब-के-सब सम्पूर्ण युद्धोंमें कुशल, रातमें भी कमर कसकर जूझनेवाले, शस्त्रधारी और खड्गधारी थे। सभी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ५ ॥

युद्धाय समपद्यन्त बहवो बाहुशालिनः ।
रथिनो गजिनश्चैव सादिनः सायुधास्तथा ॥ ६ ॥

वे बहुसंख्यक बाहुशाली वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके साथ रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और शस्त्रधारी पैदल योद्धा भी थे ॥ ६ ॥

नित्ययुक्ता महात्मानो धन्विनः पुरुषोत्तमाः ।
निर्ययुर्नगरात् तूर्णं दीपिकाभिः समन्ततः ॥ ७ ॥

वे नित्य उद्यत रहनेवाले, महामनस्वी, धनुर्धर, पुरुषप्रवर वीर सब ओरसे मशालोंके साथ तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ ७ ॥

कुतः पौण्ड्रक इत्येवं वदन्तः सर्वसात्वताः ।
दीपिकादीपितो देशो निस्तमाः समपद्यत ॥ ८ ॥

वे समस्त यादव यह कहते हुए निकले कि 'कहाँ है पौण्ड्रक?' मशालोंसे प्रकाशित हुआ वह देश सर्वथा अन्धकाररहित हो गया ॥ ८ ॥

ततो वितिमिरो देशः समन्तात् प्रत्यपद्यत ।
युद्धं समभवद् घोरं वृष्णिभिः शत्रुभिः सह ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् वह स्थान सब ओरसे अन्धकारशून्य हो गया। उस समय वहाँ शत्रुओंके साथ वृष्णिवंशियोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

ततो महान् समभवत् संनादो रोमहर्षणः ।
हया हयैः समायुक्ताः गजाश्च गजयूथपैः ॥ १० ॥
रथा रथैः समायुक्ताः सादिभिः सादिनस्तथा ।

फिर तो महान् कोलाहल होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। घोड़े घोड़ोंसे, गजराज गजराजोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ १० ॥

खड्गिनः खड्गिभिः सार्धं गदिभिर्गदिनस्तथा ॥ ११ ॥
परस्परव्यतीकारो रण आसीत् सुदारुणः ।
महाप्रलयसंक्षोभः शब्दस्तेषां महात्मनाम् ॥ १२ ॥

खड्गधारी वीर खड्गधारियोंसे और गदाधारी गदाधारियोंसे लड़ने लगे। उस रणभूमिमें उभयपक्षके सैनिकोंका परस्पर बड़ा भयंकर बोल-मेल हो गया। उन महामनस्वी वीरोंके गर्जन-तर्जनका शब्द महाप्रलयके समय उमड़े हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११-१२ ॥

धावन्तः प्रहरन्त्येतान् घ्नन्त्येतान् सर्वतो नृपान् ।
अयमेष महाबाहुः खड्गी पतति वीर्यवान् ॥ १३ ॥
अयमेष शरो घोरो वर्ततेऽतिसुदारुणः ।
गदी चायं महावीर्यः सर्वान् नो बाधते नृपः ॥ १४ ॥

दोनों ओरके योद्धा धावा करके विपक्षी सैनिकोंपर प्रहार करते और इन समस्त नरेशोंको घायल करते थे। (वहाँ आपसमें इस प्रकारकी चर्चाएँ होती थीं) 'यह खड्गधारी महाबाहु पराक्रमी वीर धराशायी हो रहा है। यह अत्यन्त दारुण बाण बड़ा ही भयंकर है। यह गदाधारी महापराक्रमी नरेश हम सब लोगोंको पीड़ा दे रहा है ॥ १३-१४ ॥

अयं रथी शरी चापी गदी तूणी तनुत्रवान् ।
पट्टिशी सर्वतो याति कुन्तपाणिरयं बली ॥ १५ ॥

'यह धनुष, बाण, गदा, तरकस, कवच, पट्टिश और कुन्त धारण करनेवाला बलवान् रथी वीर रणभूमिमें सब ओर विचर रहा है ॥ १५ ॥

अयमत्र महाशूली संश्रितः सर्वतो दिशम् ।
गजोऽयं सविषाणाग्रो वर्तते सर्वतः प्रति ॥ १६ ॥

'यह महाशूलधारी योद्धा यहाँ सारी दिशाओंमें चक्कर लगाता है। यह हाथी अपने दाँतोंका अग्रभाग सामने किये सब ओर दौड़ लगाता है' ॥ १६ ॥

अतिसर्वव्रगः शूरो वेगवान् वातसंनिभः ।
शराञ्छरैः समाहन्ति दण्डान् दण्डैर्जगत्पते ॥ १७ ॥

राजन् ! कोई-कोई वेगशाली शूरवीर वायुके समान अत्यन्त तीव्र गतिसे सर्वत्र जा पहुँचता और अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंका तथा दण्डोंसे उनके दण्डोंका नाश कर देता था ॥ १७ ॥

कुन्तान् कुन्तैः समाजघ्नुर्गदाभिश्च गदास्तथा ।
परिघान् परिधैः सार्धं शूलाञ्छूलैः समन्ततः ॥ १८ ॥

कितने ही योद्धा कुन्तों (भालों) से कुन्तोंका, गदाओंसे


म० १० ३३-

१०२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गदाओंका, परिघोंसे परिघोंका, साथ ही सब ओर शूलोंसे शूलोंका उच्छेद कर डालते थे ॥ १८ ॥

एवं तेषां महाराज कुर्वतां रणमुत्तमम् ।
संग्रामः सुमहानासीच्छब्दश्चापि महानभूत् ॥ १९ ॥

महाराज जनमेजय ! इस प्रकार उत्तम युद्ध करते हुए उन योद्धाओंमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया और महान् कोलाहल होने लगा ॥ १९ ॥

भूतानि सुबहून्याजौ शब्दवन्ति महान्ति च ।
प्रादुरासंन् सहस्राणि शङ्खानां भीमनिःस्वनः ॥ २० ॥

उस युद्धस्थलमें बहुत-से बड़े-बड़े प्राणी भाँति-भाँतिके शब्द करते हुए सहस्रोंकी संख्यामें प्रकट हो गये। वहाँ होने-वाली शङ्खोंकी ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी ॥ २० ॥

रात्रौ प्रादुरभूच्छब्दः संग्रामे रोमहर्षणः ।
वर्तमाने महायुद्धे वृष्णीनां चैव तैः सह ॥ २१ ॥
केचिद् ग्रस्ताः समापेतुः पृथिव्यां पृथिवीक्षितः ।

रात्रिमें उस संग्रामके भीतर बड़ा रोमाञ्चकारी शब्द प्रकट होने लगा। शत्रुओंके साथ होनेवाले वृष्णिवंशियोंके उस महायुद्धमें कितने ही भूपाल कालके ग्रास बनकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २१३ ॥

केचिच्च पतिताः श्लिष्टाः विप्रकीर्णशिरोरुहाः ॥ २२ ॥
पेतुरुर्व्यां महावीर्या राजानः शस्त्रपाणयः ।

कितने ही महापराक्रमी राजा हाथमें शस्त्र लिये ही एक दूसरेसे सटे हुए गिरते और सिरके बाल बिखेरे धराशायी हो जाते थे ॥ २२३ ॥

केचित् तु भिन्नवर्माणः समापेतुः सहस्रधा ॥ २३ ॥
परस्परं समाश्रित्य परस्परवधैषिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महात्मानः समन्तात् क्षतविग्रहाः ॥ २४ ॥
पेतुर्गतासवः केचिद् यमराष्ट्रविवर्धनाः ।
एवं ते निहता राजन् योधिनः सर्व एव तु ॥ २५ ॥

कितने ही योद्धा कवच विदीर्ण हो जानेके कारण सहस्रों टुकड़े होकर गिर पड़ते थे। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले कितने ही महामनस्वी योद्धा परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करके सब ओरसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेपर प्राणशून्य होकर गिर पड़ते और यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करते थे। राजन् ! इस प्रकार युद्धमें भाग लेनेवाले वे सब नरेश वहाँ मारे गये ॥ २३-२५ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शूर एकलव्यो निषादपः ।
धनुर्गृह्य महाघोरं कालान्तकयमोपमः ॥ २६ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामास यादवान् ।

इसी बीचमें निषादोंका अधिपति शूरवीर एकलव्य, जो काल, अन्तक और यमके समान भयंकर था, महाघोर धनुष लेकर सहस्रों बाणोंद्वारा यादवोंको पीड़ा देने लगा ॥ २६३ ॥

परःशतैः शराणां तु निशितैर्मर्मभेदिभिः ॥ २७ ॥
वृष्णीनां च बलं सर्वं पोथयामास सर्वतः ।
युध्यतः शस्त्रपाणींश्च क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ २८ ॥

उसने सैकड़ों तीखे और मर्मभेदी बाणोंसे वृष्णिवंशियोंकी सारी सेनाको मार गिराया। हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर जूझनेवाले अत्यन्त बलशाली क्षत्रियोंको भी धराशायी कर दिया ॥ २७-२८ ॥

निशठं पञ्चविंशत्या शराणां नतपर्वणाम् ।
सारणं दशभिर्विद्ध्वा हार्दिक्यं पञ्चभिः शरैः ॥ २९ ॥
उग्रसेनं नवत्याशु वसुदेवं च सप्तभिः ।
उद्धवं दशभिश्चैव ह्यक्रूरं पञ्चभिः शरैः ॥ ३० ॥

उसने झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे निशठको, दस बाणोंसे सारणको, पाँचसे कृतवर्माको, नब्बे बाणोंसे उग्रसेनको तथा सात सायकोंद्वारा वसुदेवको भी उग्रतापूर्वक घायल करके दस बाणोंसे उद्धवको और पाँच सायकोंसे अक्रूरको भी बींध डाला ॥ २९-३० ॥

एवमेकैकशः सर्वे निहता निशितैः शरैः ।
विद्राव्य यादवीं सेनां नाम विश्राव्य वीर्यवान् ॥ ३१ ॥

इस प्रकार एक-एक करके उस पराक्रमी वीरने तीखे बाणोंद्वारा सभी यादव-वीरोंको घायल कर दिया तथा यादवी सेनाको भगाकर वह अपना नाम सुनाते हुए इस प्रकार कहने लगा— ॥ ३१ ॥

एकलव्यो यदुवृषान् वीर्यवान् वलवानहम् ।
इदानीं सात्यकिर्वीरः क्व यास्यति महाबलः ॥ ३२ ॥
मदमत्तो हली साक्षात् क्व यातीह गदाधरः ।
इत्याह सिंहनादेन सिंहान् विस्त्रापयन्निव ॥ ३३ ॥

'मैं बलवान् एवं पराक्रमी वीर एकलव्य हूँ। इस समय महाबली वीर सात्यकि मुझसे बचकर कहाँ जायँगे ? बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाले साक्षात् हलधर हाथमें गदा लिये कहाँ जा रहे हैं ?' इस प्रकार वह यदुकुलके श्रेष्ठ वीरोंको ललकार कर कहता और अपने सिंहनादसे सिंहोंको भी विस्मित-सा किये देता था ॥ ३२-३३ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे चतुर्र्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकवधके प्रसङ्गमें रात्रिकालका युद्धविषयक चौरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः १०३७


पञ्चनवतितमोऽध्यायः

पौण्ड्रकद्वारा पूर्वद्वारके परकोटोंको तोड़नेका प्रयत्न, सात्यकि आदि यादववीरोंका रक्षाके लिये पहुँचना, सात्यकिका वायव्यास्त्रद्वारा पौण्ड्रकसैनिकोंको भगाकर पौण्ड्रकको युद्धके लिये ललकारना और पौण्ड्रककी गर्वोक्ति

वैशम्पायन उवाच
निवृत्तेष्वथ सैन्येषु वृष्णिवीरेषु चैव हि।
भीतेष्वथ महाराज हतेषु युधि सर्वतः॥ १ ॥
दीपिकासु प्रशान्तासु निःशब्दे सति सर्वतः।
जितमित्येव यन्मत्वा वृष्णीनां बलमुत्तमम्॥ २ ॥
ततः पौण्ड्रो महावीर्यो बभाषे सैनिकान् स्वकान्।
शीघ्रं गच्छत राजेन्द्राइङ्कैः कुन्तैः पुरीमिमाम्॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! जब यादवोंकी सारी सेना और वृष्णिवंशी वीर युद्धमें घायल और भयभीत होकर सब ओरसे लौट गये, सारी मशालें बुझ गयीं और चारों ओर सन्नाटा छा गया, तब यह समझकर कि वृष्णिवंशियोंकी उत्तम सेना पराजित हो गयी, महापराक्रमी पौण्ड्रक अपने सैनिकोंसे बोला—'राजेन्द्रगण! शीघ्र जाओ और टक्कों तथा कुन्तोंसे इस पुरीको खोद डालो॥ १—३ ॥'

कुठारैः कुन्तलैश्चैव पाषाणैः सर्वतोदिशम्।
कर्षणस्थैः सुपाषाणैः सर्वतो यात भूमिपाः॥ ४ ॥

'भूमिपालो! कुठार, कुन्तल (हल), पाषाण तथा पत्थर फेंकनेवाले यन्त्रोंपर रखे गये बड़े-बड़े प्रस्तर-खण्ड लेकर इस पुरीके चारों ओर चले जाओ॥ ४ ॥'

भिद्यन्तां प्राकारचयाः प्रासादाश्च समन्ततः।
गृह्णन्तां कन्यकाः सर्वा दास्यश्चैव समन्ततः॥ ५ ॥

'इस पुरीके परकोटे विदीर्ण कर डालो, महलोंको भी सब ओरसे गिरा दो, समस्त यादव कन्याओं और दासियोंको भी अपने अधिकारमें कर लो॥ ५ ॥'

गृह्णन्तां वसुमुख्यानि धनानि सुवहून्यथ।
ते तथेति महात्मानो राजानः सर्व एव तु॥ ६ ॥
कुठारैः सर्वतश्चैव चिच्छिदुः पौण्ड्रकाज्ञया।
प्राकारांश्चैव सर्वत्र प्रासादान् नरसंचयान्॥ ७ ॥

'मुख्य-मुख्य रत्न और बहुत सी धनराशियोंको लूट लो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी महामनस्वी नरेश पौण्ड्रककी आज्ञासे कुठारोंद्वारा सब ओरसे पुरीके परकोटोंको तथा सब ओर मनुष्योंके समुदायसे भरे हुए महलोंको छिन्न-भिन्न करने लगे॥ ६-७ ॥

अथ तत्र महाशब्दः प्रादुरासीत् समन्ततः।
टङ्केषु पात्यमानेषु प्राकारेषु महाबलैः॥ ८ ॥

उन महाबली वीरोंद्वारा जब परकोटोंपर टङ्क गिराये जाने लगे, उस समय चारों ओर बड़ा भारी शब्द होने लगा॥ ८ ॥

पूर्वद्वारे महाराज भित्त्वाः प्राकारसंचयाः।
श्रुत्वा शब्दं महाघोरं सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः॥ ९ ॥

महाराज! पूर्वद्वारपर जो बहुत-से परकोटे थे, वे प्रायः विदीर्ण कर दिये गये। परकोटोंके गिराये जानेका महाभयंकर शब्द सुनकर सात्यकि क्रोधसे मूर्छित हो गये॥ ९ ॥

मयि सर्वं समारोप्य केशवो यादवेश्वरः।
गतः कैलासशिखरं द्रष्टुं शंकरमव्ययम्॥ १० ॥
अवश्यं हि मया रक्ष्या पुरी द्वारवती त्वियम्।
इति संचिन्त्य मनसा धनुरादाय सत्वरम्॥ ११ ॥
रथं महान्तमारुह्य दारुकस्य महात्मनः।
पुत्रेण संस्कृतं घोरं यन्ता च स्वयमेव हि॥ १२ ॥

उन्होंने सोचा—'यदुनाथ केशव इस पुरीकी रक्षाका सारा भार मुझपर ही रखकर अविनाशी भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतके शिखरपर गये हैं। अतः इस समय इस द्वारकापुरीकी रक्षा मुझे अवश्य करनी चाहिये। मन-ही-मन ऐसा सोचकर वे तुरंत धनुष लेकर एक विशाल एवं भयंकर रथपर आरूढ हुए, जिसे महात्मा दारुकके पुत्रने सजाया था और वह स्वयं ही उसका सारथि बना था॥ १०—१२ ॥'

धनुर्महत् तदादाय शरांश्चाशीविषोपमान्।
आमुच्य कवचं घोरं शस्त्रसम्पातदुःसहम्॥ १३ ॥
अङ्गदी कुण्डली तूणी शरी चापी गदासिमान्।
ययौ युद्धाय शैनेयः संस्मरन् केशवं वचः॥ १४ ॥

वे वह विशाल धनुष और विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण लेकर शस्त्रोंका प्रहार जिसकी टंकारको कठिनतासे सह सके ऐसे भयंकर कवचको धारण करके बाजूबंद, कुण्डल, तरकस, बाण, धनुष, गदा और खड्गसे संयुक्त हो सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको स्मरण करते हुए युद्धके लिये चल दिये॥ १३-१४ ॥

दीपिकादीपिते देशे ययौ सात्यकिरुत्तमः।
तथैव बलदेवोऽपि रथमारुह्य भास्वरम्॥ १५ ॥
गदी शरी महावीर्यः प्रायाद् रणचिकीर्षया।
सिंहनादं प्रकुर्वन्तो मुञ्चन्तो भैरवं रवम्॥ १६ ॥

जो स्थान मशालोंसे प्रकाशित था, वहीं उत्तम वीर

१०२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सात्यकि गये। उसी प्रकार महापराक्रमी बलदेव भी युद्ध करनेकी इच्छासे गदा और धनुष-बाण ले तेजस्वी रथपर आरूढ हो वहाँ तीव्र गतिसे गये। उनके साथके सभी सैनिक भयंकर सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ १५-१६॥

उद्धवोऽपि बली साक्षाद्गजमारुह्य सत्वरम्।
मत्तं महारवं घोरं संग्रामे नीतिमत्तरः॥ १७॥
ययौ नीतिं विचिन्वानः परां प्रीतिं महाबलः।
अन्ये च वृष्णयः सर्वे ययुः संग्रामलालसाः॥ १८॥

नीतिमानोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी बलवान् उद्धव भी उत्तम नीति और प्रीतिका अनुसंधान करते हुए महान् गर्जन करनेवाले भयंकर मतवाले हाथीपर आरूढ़ हो तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिये। अन्य सब वृष्णिवंशी योद्धा भी संग्रामकी लालसा लेकर वहाँ गये॥ १७-१८॥

रथान् गजान् समारुह्य हार्दिक्यप्रमुखस्तथा।
दीपिकाभिश्च सर्वत्र पुरोवृत्ताभिरीश्वराः॥ १९॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः स्मरन्तः केशवं वचः।

कृतवर्मा आदि प्रधान-प्रधान सामर्थ्यशाली योद्धा भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंका स्मरण करके रथों और हाथियोंपर आरूढ़ हो सर्वत्र अपने आगे मशालोंको जलवाकर सिंहनाद करते हुए चले॥ १९ १/२॥

पूर्वद्वारं समागम्य वृष्णयो युद्धलालसाः॥ २०॥
ते समेत्य यथायोगं स्थितास्तत्र महाबलाः।

पूर्वद्वारपर आकर युद्धकी इच्छावाले महाबली वृष्णिवंशी योद्धा यथायोग्य एक दूसरेसे मिलकर युद्धकी लालसासे वहाँ डट गये॥ २० १/२॥

स्थिते सैन्ये महाघोरे दीपिकादीपिते पथि॥ २१॥
शिनिर्वीरः शरी चापी गदी तूणीरवान् विभो।
वायव्यास्त्रं समादाय योजयित्वा महाशरम्॥ २२॥
आकर्णं तूर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमुत्तमम्।
मुमोच परसैन्येषु शिनिर्वीरः प्रतापवान्॥ २३॥

राजन्! मशालोंसे प्रकाशित हुए पथपर जब वह महाभयंकर सेना खड़ी हो गयी, तब धनुष, बाण, तरकस और गदासे युक्त हो वीरवर प्रतापी सात्यकिने वायव्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने महान् बाणको संयुक्त करके उस उत्तम एवं श्रेष्ठ धनुषको पूरे कानतक खींचकर वह अस्त्र शत्रुओंकी सेनापर छोड़ दिया॥ २१—२३॥

वायव्यास्त्रेण ते सर्वे तत्रस्था नरसत्तमाः।
विजिता ह्यस्त्रवीर्येण यत्र तिष्ठति पौण्ड्रकः॥ २४॥

वहाँ खड़े हुए शत्रुपक्षके सभी श्रेष्ठ योद्धा वायव्यास्त्रसे पीड़ित हो उस अस्त्रकी शक्तिसे पराजित हो वहीं जा पहुँचे, जहाँ पौण्ड्रक खड़ा था॥ २४॥

तत्र गत्वा स्थिताः सर्वे निर्धूता वातरंहसा।
यत्र पूर्वे स्थिताः सर्वे विद्रुता राजसत्तमाः॥ २५॥

वायुके वेगसे कम्पित हो वे सभी श्रेष्ठ नरेश भागकर उसी स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ पहले खड़े थे॥ २५॥

तत्र स्थित्वा च शैनेयः शरमादाय सत्वरम्।
निशितं सर्पभोगाभं चभाषे सात्यकिस्तदा॥ २६॥

पूर्वद्वारपर खड़े हुए शिनिवंशी सात्यकि तुरंत ही एक सर्पाकार तीखा बाण ले बोले—॥२६॥

क्क इदानीं महाबुद्धिः पौण्ड्रको राजसत्तमः।
स्थितोऽस्मि व्यवसायेन शरी चापी महाबलः॥ २७॥
यदि द्रष्टा दुरात्मानं ततो हन्ता नृपाधमम्।
भृत्योऽस्मि केशवस्याहं जिघांसुः पौण्ड्रकं स्थितः॥२८॥

'राजाओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् पौण्ड्रक इस समय कहाँ है? मैं महाबली सात्यकि धनुष-बाण लेकर उसके साथ युद्धके निश्चयसे यहाँ खड़ा हूँ। यदि उस दुरात्मा नीच नरेशको मैं देख लूँगा तो बिना मारे नहीं रहूँगा। मैं भगवान् श्रीकृष्णका सेवक हूँ और पौण्ड्रकका वध करनेके लिये यहाँ खड़ा हूँ॥ २७-२८॥

छित्त्वा शिरस्तु तस्यास्य सर्वक्षत्रस्य पश्यतः।
बलिं दास्यामि गृध्रेभ्यः श्वभ्यश्चैव दुरात्मनः॥ २९॥

'मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उस दुरात्माका सिर काटकर गीधों और कुत्तोंको उसकी बलि दे दूँगा॥ २९॥

को नाम ईदृशं कर्म चौरवच्च समाचरेत्।
सुप्तेषु निशि सर्वत्र यादवेषु महात्मसु॥ ३०॥
चौरोऽयं सर्वथा राजा न हि राजा बलान्वितः।
यदि शक्तो न कुर्याच्च चौर्यमेवं नृपाधमः॥ ३१॥

'रातमें जब सर्वत्र महात्मा यादव सो रहे हों, कौन श्रेष्ठ पुरुष इस तरह चोरकी भाँति जघन्य कर्म कर सकता है? यह बलवान् राजा नहीं, सर्वथा चोर है। यदि इस नीच नरेशमें शक्ति होती तो यह इस तरह चोरी न करता॥३०-३१॥

अहोऽस्य बलिनो राज्ञश्चौरकार्यं प्रकुर्वतः।
सर्वथाऽऽगमनं तस्य न हि पश्यामि साम्प्रतम्॥ ३२॥

'अहो! चोरका काम करनेवाले इस बलवान् राजाका मेरे सामने किसी तरह आगमन नहीं हो रहा है। मैं उस चोरको इस समय देख नहीं पा रहा हूँ'॥ ३२॥

इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरः प्रजहास महाबलः।
विस्फार्य सुदृढं चापं संदधे कार्मुके शरम्॥ ३३॥

ऐसा कहकर महाबली वीर सात्यकि जोर-जोरसे हँसने लगे। उन्होंने अपने सुदृढ़ धनुषको कानतक खींचकर उसपर बाणका संधान किया॥ ३३॥

भविष्यपर्व ]षण्णवतितमोऽध्यायः१०२९

आकर्ण्य वचनं वीरः सात्यकेस्तस्य धीमतः।
क्व नु कृष्णः क्व गोपालः कुतः सोऽथ प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
स्त्रीहन्ता पशुहन्ता च क्व च स्वामीति सेवितः।
स इदानीं क्व वर्तत गृहीत्वा मम नाम तत् ॥ ३५ ॥

बुद्धिमान् वीर सात्यकिका यह वचन सुनकर वीर पौण्ड्रक बोल उठा—'कहाँ है कृष्ण ! कहाँ है वह ग्वाला ? स्त्री और पशुकी हत्या करनेवाला कृष्ण इस समय कहाँ है ? जो यहाँ स्वामी बनकर सेवा लेता है, वह मेरा शत्रु कहाँ है ? मेरा नाम ग्रहण करके वह अब कहाँ छिपा हुआ है ? ॥ ३४-३५ ॥

हन्ता सख्युर्महावीर्यो नरकस्य महात्मनः।
ममैव तात युद्धेऽस्मिन् हते तस्मिन् दुरात्मनि ॥ ३६ ॥

'उसने मेरे ही मित्र महात्मा नरकासुरका वध किया है, इसीलिये वह महापराक्रमी बना फिरता है। तात ! इस युद्धमें उस दुरात्माके मारे जानेपर मेरा क्रोध शान्त होगा ॥

गच्छ त्वं कामतो वीर योद्धुं न क्षमते भवान्।
अथवा तिष्ठ किंचित्तु ततो द्रक्ष्यसि मे बलम् ॥ ३७ ॥

'वीर ! तुम इच्छानुसार लौट जाओ। तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी क्षमता नहीं है। अथवा थोड़ी देर ठहर जाओ, फिर स्वयं ही मेरा बल देख लोगे ॥ ३७ ॥

शिरस्ते पातयिष्यामि शरैर्घोरैर्दुरासदैः।
हतस्य तव वीरेह भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ३८ ॥

'वीर ! मैं भयंकर दुर्जय बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर काट गिराऊँगा ! इस रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे जानेपर यहाँकी भूमि तुम्हारा रक्तपान करेगी ॥ ३८ ॥

श्रोष्यते स तथा गोपो हतः सात्यकिरित्यपि।
यो गर्वस्तस्य गोपस्य सर्वदा वर्तते महान् ॥ ३९ ॥
विनश्यति स तु क्षिप्रं हते त्वयि यदूत्तम ।

'वह ग्वाला भी सुन लेगा कि सात्यकि मारा गया। यदुश्रेष्ठ ! उस गोपको जो सदा महान् गर्व बना रहता है, वह तुम्हारे मारे जानेपर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा ॥ ३९॥

त्वयि रक्षां समादिश्य गोपः कैलासपर्वतम् ॥ ४० ॥
गत इत्येवमस्माभिः श्रुतं पूर्वे महामते।

'महामते ! हमलोगोंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वह गोप तुम्हारे ऊपर नगरकी रक्षाका भार रखकर कैलास-पर्वतपर गया है ॥ ४०॥

शरं गृहाण निशितं यदि शक्तोऽसि सात्यके।
इत्युक्त्वा बाणमादाय ययौ योद्धुं व्यवस्थितः॥ ४१ ॥

'सात्यके ! यदि तुममें शक्ति हो तो कोई तीखा बाण हाथमें लो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण लेकर आगे बढ़ा और युद्धके लिये डट गया ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे सात्यकिपौण्ड्रकभाषणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक-वधके प्रसंगमें रात्रियुद्धके समय सात्यकि और पौण्ड्रकका संवादविषयक पंचानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥


षण्णवतितमोऽध्यायः

पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध

वैशम्पायन उवाच

ततः क्रुद्धो महाराज सात्यकिर्वृष्णिपुङ्गवः।
उवाच वचनं राजन् वासुदेवं स्मरन्निव ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! तदनन्तर वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिने कुपित होकर भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए-से इस प्रकार कहा—॥

अवोचदीदृशं वाक्यं वासुदेवं नृपाधमः।
को नाम जगतां नाथमित्थं ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ २ ॥

'पौण्ड्रक ! तू राजाओंमे अधम है। इसीलिये भगवान् वासुदेवके प्रति तूने ऐसी बात कह डाली है। अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जगन्नाथ श्रीकृष्णके प्रति ऐसी बात कह सकेगा ? ॥ २ ॥

मृत्युस्त्वां सर्वथा याति वदन्तं तादृशं वचः।
जिह्वा ते शतधा दीर्याद् वदतस्तादृशं वचः ॥ ३ ॥

'वैसी कठोर बात कहते हुए तेरे पीछे-पीछे सर्वथा मृत्यु चल रही है। इस तरहकी अनुचित बात कहते समय तेरी जिह्वाके सौ-सौ टुकड़े हो जाने चाहिये ॥ ३ ॥

एष ते पातयिष्यामि शिरः कायाच्च पौण्ड्रक।
यन्नाम वासुदेवेति तव सम्प्रति वर्तते ॥ ४ ॥
यावत् पतति कायात् ते शिरस्तावत् प्रवर्तते।
स एव श्वो न भगवान् वासुदेवो भविष्यसि ॥ ५ ॥

'पौण्ड्रक ! मैं अभी तेरा सिर धड़से काट गिराऊँगा। इस समय जिनका वासुदेव नाम तेरे साथ जुड़ा हुआ है, वह तभीतक है, जबतक कि धड़से तेरा सिर नीचे नहीं गिर जाता। अब कलसे तू भगवान् वासुदेव नहीं रह जायगा (कालका ग्रास बन जायगा) ॥ ४-५ ॥

एक एव जगन्नाथः कर्ता सर्वस्य सर्वगः।
दुरात्मन् सर्वथा देवो भविष्यति न संशयः॥ ६ ॥

१०३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'दुरात्मन् ! जो सबके कर्ता और सर्वव्यापी हैं, वे एकमात्र जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही सर्वथा वासुदेव बने रहेंगे- इसमें संशय नहीं है ॥ ६॥
एष तेऽहं शिरः कायात् पातयिष्यामि राजक ।
यदसौ भगवान् विष्णुर्नागमिष्यति साम्प्रतम् ॥ ७॥
अस्त्रवीर्यं बलं चैव सर्वं दर्शय साम्प्रतम् ।
नातः परतरं राजन् वीर्यं च तव वर्तते ॥ ८ ॥
'तुच्छ नरेश ! मैं अभी तेरे मस्तकको शरीरसे काट गिराता हूँ । इस समय वे भगवान् श्रीकृष्ण जबतक लौटकर नहीं आ जाते, तबतक ही तू अपना सारा अस्त्रबल और पराक्रम दिखा ले । राजन् ! इससे बढ़कर तुझे अपने बल-पराक्रमको प्रकट करनेका अवसर नहीं मिलेगा ॥ ७-८ ॥
सर्वं दर्शय यत्नेन स्थितोऽस्मि व्यवसायवान् ।
शरी चापी गदी खड्गी सर्वथाहमुपस्थितः ॥ ९ ॥
'मैं युद्धका निश्चय लेकर खड़ा हूँ । तू यत्नपूर्वक अपनी सारी शक्ति दिखा । मैं धनुष, बाण, गदा और खड्गसे युक्त हो सर्वदा तेरा सामना करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ ९ ॥
नैतन्नगरमायासीः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ।
सर्वथा कृतकृत्योऽस्मि दृष्ट्वा त्वां वासुदेवकम् ॥ १० ॥
'मैं सच कहता हूँ, तू आजसे पहले इस नगरमें नहीं आया था । तुझ-जैसे वासुदेवके पुतलेको देखकर मैं कृतकृत्य हो गया हूँ ॥ १० ॥
तवाहं तिलशः कृत्वा श्वभ्यो दास्यामि राजक ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय वासुदेवं महाबलः ॥ ११ ॥
आकर्णपूर्णमाकृष्य विव्याध निशितं शरम् ।
'अधम नरेश ! तेरे शरीरके तिलके बराबर टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तोंको बाँट दूँगा । वासुदेव नामधारी पौण्ड्रकसे ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने एक तीखा बाण लेकर उसे कान-तक खींचकर छोड़ा और पौण्ड्रकको घायल कर दिया ॥
स तेन विद्धो यदुना वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
वमञ्छोणितमत्युष्णमङ्गानेत्रान्नृपोत्तम ।
नृपश्रेष्ठ ! यदुवंशी वीर सात्यकिके द्वारा बाणसे घायल किये जानेपर प्रतापी वीर वासुदेव अपने अङ्गों और नेत्रोंसे अत्यन्त गरम-गरम रक्त बहाने लगा ॥ १२३ ॥
ततश्चुक्रोध नृपतिर्वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १३ ॥
नवभिर्दशभिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः ।
विव्याध सात्यकिं राजा नदंश्च बहुधा किल ॥ १४ ॥
तब प्रतापी राजा वासुदेव भी कुपित हो उठा । उसने बारंबार सिंहनाद करते हुए झुकी हुई गाँठवाले नौ-दस बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १३-१४ ॥
ततो नाराचमादाय निशितं यमसंनिभम् ।
धनुराकृष्य भगवान् वासुदेवो नृपोत्तम ॥ १५ ॥
विव्याध सात्यकिं भूयो निशि प्रह्लादयन् स्वकान् ।
नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् तथाकथित भगवान् वासुदेव पौण्ड्रकने धनुष खींचकर उसपर यमराजके समान भयंकर तीखे नाराचका संधान किया और उस रातमें अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १५३ ॥
नाराचेन समाविद्धः सात्यकिः सत्यसङ्गरः ॥ १६ ॥
ललाटे सुदृढं वीरो वृष्णीनामग्रणीस्तदा ।
निपसाद रथोपस्थे निश्चेष्ट इव सत्तमः ॥ १७ ॥
ललाटमें उस नाराचकी गहरी चोट खाकर वृष्णिवंशके अग्रगण्य वीर सत्यप्रतिज्ञ सात्यकि, जो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे, अपने रथके पिछले भागमें निश्चेष्टकी भाँति बैठ गये ॥
ततः स पौण्ड्रको राजा विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।
सारथिं पञ्चविंशत्या हयांश्च चतुरो नृप ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारथिको और पचीस बाणोंसे सात्यकिके चारों घोड़ोंको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १८ ॥
ते हया रुधिराक्ताङ्गाः सारथिश्च समन्ततः ।
विह्वलाः समपद्यन्त वासुदेवस्य पश्यतः ॥ १९ ॥
वे घोड़े और सारथि सब ओरसे घायल हो खूनसे लथ-पथ हो गये और वासुदेवके सामने ही अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ १९ ॥
वासुदेवो रथे चापि सिंहनादं समाददे ।
तेन नादेन तत्राभूद् विबुद्धः सात्यकिर्नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! वासुदेव अपने रथपर बैठा हुआ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा । उसकी उस गर्जनासे सात्यकि मूर्च्छासे जग उठे ॥ २० ॥
विद्धान् हयांस्तथा दृष्ट्वा सारथिं च तथागतम् ।
शैनेयोऽथ महावीर्यो रुषितो नृपसत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अपने घोड़ों और सारथिको इस प्रकार घायल हुआ देख महापराक्रमी सात्यकि रोषसे भर गये ॥ २१ ॥
अलं द्रक्ष्यामि ते वीर्यमित्युक्त्वा बाणमाददे ।
विव्याध तेन बाणेन वक्षस्येनं महाबलः ॥ २२ ॥
वे बोले—'अब देखूँगा कि तुझमें कितना बल है ।' ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने बाण हाथमें लिया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
ततश्चचाल तेनाऽसौ वासुदेवः शरेण ह ।
सुस्राव रुधिरं घोरमत्युष्णं वक्षसो नृप ॥ २३ ॥
रथोपस्थे पपाताशु निःश्वसन्नुरगो यथा ।
कृत्यं चापि न जानाति केवलं निपसाद ह ॥ २४ ॥
राजन् ! उस बाणसे घायल होकर वासुदेव युद्धस्थलमें

भविष्यपर्व ]षण्णवतितमोऽध्यायः१०३१

काँप उठा और उसकी छातीसे अत्यन्त गरम-गरम भयंकर रक्तकी धारा बहने लगी। वह फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचता हुआ तुरंत रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उसे कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। वह केवल रथपर बैठा रहा॥

सात्यकिस्तु रथं विद्ध्वा दशभिः सायकैस्तथा ।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन वासुदेवस्य वृष्णिपः ॥ २५ ॥

इधर वृष्णिवंशके पालक वीर सात्यकिने दस बाणोंसे रथको छिन्न-भिन्न करके एक भल्लसे वासुदेवकी ध्वजा काट डाली ॥ २५ ॥

हयांश्च चतुरो हत्वा बाणैः सारथिमेव च ।
युयुधानोऽथ राजेन्द्र पौण्ड्रकस्य च पश्यतः ॥ २६ ॥
सारथेश्च शिरः कायादहरत् स रथात् तदा ।
रथग्रन्थिश्च चिच्छेद हयाश्च व्यसवोऽभवन् ॥ २७ ॥

राजेन्द्र ! इसके बाद सात्यकिने पौण्ड्रकके देखते-देखते बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ों और सारथिको घायल करके सारथिके सिरको धड़से अलग करके रथसे नीचे गिरा दिया। रथकी ग्रन्थियोंको काट डाला, पौण्ड्रकके घोड़े भी प्राणहीन हो गये ॥ २६-२७ ॥

चक्रं च तिलशः कृत्वा बाणैर्दशभिरञ्जसा ।
जहास विपुलं राजन् वासुदेवं महाबलः ॥ २८ ॥

तदनन्तर दस बाणोंसे अनायास ही रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला। राजन् ! यह सब करके महाबली सात्यकि वासुदेवपर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ २८ ॥

ततः परं महत्प्रायं सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
शब्दं कृत्वा बली साक्षात् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २९ ॥
शरैः सप्ततिसंख्याकैरर्दयामास सत्वरम् ।

इसके बाद वृष्णिनन्दन बलवान् वीर सात्यकिने जोर-जोरसे सिंहनाद करके सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते सत्तर बाण मारकर मिथ्या वासुदेवको तुरंत पीड़ित कर दिया ॥

ते शराः शलभाकारा निपेतुः सर्वशस्तदा ॥ ३० ॥
शिरस्तः पार्श्वतश्चैव पृष्ठतः पुरतस्तथा ।
केवलं धैर्यनिश्चयस्तृषार्तः शरवान् यथा ॥ ३१ ॥
यथा मनस्वी रिक्तश्च तथा तिष्ठति पौण्ड्रकः ।

वे बाण टिड्डियोंके समान सब ओरसे उसपर पड़ने लगे। सिरपर, अगल-बगलमें, पीठपर और सामनेसे उन बाणोंकी चोट खाता हुआ वह केवल धैर्यके सहारे प्याससे पीड़ित पुरुषकी भाँति बाणोंसे बिंधा हुआ खड़ा रहा । जैसे उदार पुरुष निर्धन हो जाय और किसीको कुछ दे न सके, इसी प्रकार पौण्ड्रक प्रतीकारशून्य होकर वहाँ चुपचाप खड़ा रहा ॥ ३०-३१ १/२ ॥

ततश्चुक्रोध बलवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
अर्धचन्द्रं समादाय विव्याध युधि सात्यकिम् ।

इसके बाद बलवान् एवं प्रतापी वीर वासुदेवने कुपित हो अर्धचन्द्र लेकर युद्धस्थलमें सात्यकिको घायल कर दिया !

विद्ध्वा सप्तभिरायान्तं क्रोधेन प्रस्फुरन्निव ॥ ३३ ॥
विद्धोऽथ सात्यकिस्तेन शरैः पञ्चभिराशुगैः ।
चापं चिच्छेद पौण्ड्रस्य सिंहनादं व्यनिनदत् ॥ ३४ ॥

उस समय वासुदेव क्रोधसे उद्दीप्त-सा हो रहा था । उसने अपने सामने आते हुए सात्यकिको सात बाणोंसे बींध डाला। उसके द्वारा घायल किये गये सात्यकिने पाँच शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौण्ड्रकके धनुषको काट डाला और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३३-३४ ॥

वासुदेवो गदां गृह्य भ्रामयित्वा पदात्पदम् ।
त्वरितं पातयामास सात्यकेर्वक्षसि प्रभो ॥ ३५ ॥

प्रभो ! तब वासुदेवने गदा हाथमें लेकर उसे पग-पगपर घुमाते हुए तुरंत सात्यकिकी छातीपर दे मारा ॥ ३५ ॥

सव्येन तां समाकृष्य करेण यदुनन्दनः ।
शरं प्रगृह्य विव्याध सात्यकिर्युधि पौण्ड्रकम् ॥ ३६ ॥

यदुनन्दन सात्यकिने उस गदाको बायें हाथसे खींचकर एक बाण हाथमें ले उसके द्वारा पौण्ड्रकको युद्धमें घायल कर दिया ॥ ३६ ॥

तमन्तरे गृहीत्वाशु वासुदेवः प्रतापवान् ।
शक्तिभिर्दशभिश्चैव सात्यकिं निजघान ह ॥ ३७ ॥

इसी बीचमें प्रतापी वासुदेवने सात्यकिको लक्ष्य करके शीघ्र ही दस शक्तियोंद्वारा प्रहार किया ॥ ३७ ॥

ताभिर्विद्धो रणे वीरः सात्यकिः सत्यसंगरः ।
अपास्य धनुरन्यत् तद् धनुरदाय सत्वरम् ।
आजघान तदा वीरो वृष्णीनामग्रणीर्नृप ॥ ३८ ॥

राजन् ! उन शक्तियोंसे बिंधे हुए सत्यप्रतिज्ञ वीर सात्यकिने उस धनुषको फेंककर तुरंत दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा वृष्णिवंशके उस अग्रणी वीरने उस समय शत्रुओंको घायल करना आरम्भ किया ॥ ३८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक छियानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥

१०३२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सप्तनवतितमोऽध्यायः

सात्यकि और पौण्ड्रकका युद्ध

वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो गदापाणिः सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
वासुदेवं जघानाशु गदया तीक्ष्णया नृप ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! तदनन्तर वृष्णि-कुलको आनन्दित करनेवाले सात्यकिने कुपित हो गदा हाथमें ले ली और उस दुःसह गदासे शीघ्र ही वासुदेवपर आघात किया ॥ १ ॥

सात्यकिं वासुदेवस्तु गदयाभ्यहनद् बली ।
तावुद्यतगदौ वीरौ शुशुभाते सुदारुणौ ॥ २ ॥
दृप्तौ वने यथा सिंहौ परस्परवधैषिणौ ।
इसी तरह बलवान् वीर वासुदेवने भी सात्यकिपर गदासे प्रहार किया। गदा उठाये वे दोनों अत्यन्त भयंकर वीर वनमें एक दूसरेके वधकी इच्छावाले दो बलाभिमानी सिंहोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥

ततः स सात्यकिः क्रुद्धः सव्यं मण्डलमागमत् ॥ ३ ॥
दक्षिणं वासुदेवस्तु तं जघान स्तनान्तरे ।
युयुधानोऽथ वीरस्तु बाह्वोर्मध्यमताडयत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने बायें पैंतरेका आश्रय लिया और वासुदेवने दाहिने पैंतरेका। उसने सात्यकिकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही वीर सात्यकिने भी उसकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल) में गदासे आघात किया ॥ ३-४ ॥

दृढं स ताडितो वीरो जानुभ्यामपतद् भुवि ।
तत उत्थाय वीरस्तु ललाटेऽभ्यहनद् गदाम् ॥ ५ ॥
विषण्णः किंचिदास्थाय तत उत्थाय सत्वरम् ।
गदयाभ्यहनद् वीरः सात्यकिः पौण्ड्रसत्तमम् ॥ ६ ॥
उस गदाकी गहरी चोट खाकर वीर वासुदेव घुटनोंके बल गिर पड़ा। फिर उठकर उस वीरने सात्यकिके ललाटपर गदा मारी। सात्यकि भी कुछ पीड़ित हो बैठे रह गये, फिर तुरंत उठकर वीर सात्यकिने पौण्ड्रदेशके उस श्रेष्ठ योद्धा वासुदेवपर गदासे चोट की ॥ ५-६ ॥

वासुदेवो बली वीरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ।
जघान गदया वृष्णिं निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ७ ॥
वीर वासुदेव बड़ा बलवान् था। वह साक्षात् दूसरे मृत्युके समान प्रतीत होता था। वह सात्यकिकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे उन्हें दग्ध कर डालेगा। उसने गदासे सात्यकिपर चोट की ॥ ७ ॥

स तया ताडितो धूर्णिर्गदया बाहुमुक्तया ।
आलम्ब्य भूमिं सहसा मृत्योरङ्कगतो यथा ॥ ८ ॥
उसकी भुजाओंद्वारा छोड़ी गयी उस गदासे आहत हो सात्यकिने सहसा धरतीका सहारा ले लिया, मानो वह मृत्युके अङ्कमें पहुँच गये हों ॥ ८ ॥

संज्ञां पुनः समालभ्य पाणिभ्यां दृढमेव च ।
गदां तस्य महाराज गृहीत्वा प्रयहेण ह ॥ ९ ॥
द्विधा कृत्वा महागुर्वी गदां कालायसीं शुभाम् ।
उत्सृज्य सहसा वीरः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ १० ॥
महाराज ! फिर होशमें आकर उन्होंने शत्रु की चलायी हुई गदाको उछलकर दोनों हाथोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और काले लोहेकी बनी हुई उस सुन्दर एवं बड़ी भारी गदाके सहसा दो टुकड़े करके उसे दूर फेंक दिया। इसके बाद वीर सात्यकिने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९-१० ॥

तत उत्सृज्य राजा तु वासुदेवो महाबलः ।
सव्येन सात्यकिं गृह्य दक्षिणेन करेण ह ॥ ११ ॥
मुष्टिं कृत्वा महाघोरां वासुदेवः प्रतापवान् ।
ताडयामास मध्ये तु स्तनयोः सात्यकेर्नृप ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! तब महाबली एवं प्रतापी राजा वासुदेवने उस गदाको त्यागकर सात्यकिको बायें हाथसे पकड़ लिया और दाहिने हाथसे बड़ी भयंकर मुट्ठी बाँधकर सात्यकिके दोनों स्तनोंके बीचमें प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥

शैनेयो वृष्णिवीरस्तु गदामुत्सृज्य सत्वरम् ।
तलेनाभ्यहनद् वीरो वासुदेवं रणाजिरे ॥ १३ ॥
तब वृष्णिवीर सात्यकिने भी तुरंत अपनी गदा नीचे डाल दी और समराङ्गणमें वासुदेवको एक तमाचा जड़ दिया ॥ १३ ॥

तलेन वासुदेवोऽपि सात्यकिं सत्यसंगरम् ।
तयोरेवं महाघोरं तलयुद्धं प्रवर्तत ॥ १४ ॥
फिर वासुदेवने भी सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिको थप्पड़से मारा। इस प्रकार उन दोनोंमें बड़ा भयंकर थप्पड़ोंका युद्ध आरम्भ हो गया ॥ १४ ॥

जानुभ्यां मुष्टिभिश्चैव बाहुभ्यां शिरसा तथा ।
उरसोरः समाहत्य जानुभ्यां जानुनी तथा ॥ १५ ॥
कराभ्यां करमाहत्य तौ युद्धं संप्रचक्रतुः ।
तालयोस्तत्र राजेन्द्र वृक्षयोः संनिकर्षयोः ॥ १६ ॥
वने यथा निरुत्पन्नस्तथैवाभून्महास्वनः ।
राजेन्द्र ! घुटनोंसे, मुक्कोंसे, भुजाओंसे और मस्तकसे भी उस समय उनमें युद्ध होने लगा। वे छातीसे छातीपर,

भविष्यपर्व ]
अष्टनवतितमोऽध्यायः
१०३३


घुटनोंसे घुटनोंपर और हाथोंसे हाथोंपर आघात करते हुए युद्ध करते थे। जैसे वनमें दो निकटवर्ती तालवृक्षोंके टकरानेका शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनोंके युद्धमें बड़ी भारी आवाज हो रही थी॥ १५-१६॥

तावाभौ प्रथितौ वीरावुभौ पौण्ड्रकसात्यकी ॥ १७ ॥
निशि स्तिमितमूकायां शस्त्रं त्यक्त्वा महाबलौ।
युयुधाते महारङ्गे मल्लौ द्वाविव विश्रुतौ ॥ १८ ॥

उस नीरव एवं निस्तब्ध निशामें समराङ्गणमें वे दोनों प्रख्यात वीर महाबली पौण्ड्रक और सात्यकि अपना-अपना शस्त्र त्यागकर विशाल अखाड़ेमे उतरे हुए दो सुप्रसिद्ध पहलवानोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे ॥ १७-१८ ॥

उभे सेने महाराज्ञोः संशयं जग्मतुस्तदा ।
किं नु स्यात् सात्यकिर्वीरो हतस्तेन भविष्यति ॥ १९ ॥
आहोस्वित् वासुदेवस्तु हतस्तेन महात्मना ।

महाराज उग्रसेन और पौण्ड्रक दोनोंकी सेनाएँ उस समय संशयमें पड़ गयी थीं कि 'क्या वीर सात्यकि वासुदेवके द्वारा मारे जायेंगे अथवा वासुदेव ही उस महात्माके द्वारा मार डाला जायगा ॥ १९॥

अद्य वै तौ महावीरौ परस्परवधैषिणौ ॥ २० ॥
युध्यमानौ महावीरौ तदा स्वर्गं गमिष्यतः ।
अन्यथा नोपरम्येतां युद्धाद् वीरौ सुनिश्चितौ ॥ २१ ॥

'आज वे दोनों महावीर एक दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए निश्चय ही स्वर्गलोकको चले जायेंगे; अन्यथा ये दोनों दृढ़ निश्चयवाले वीर युद्धसे विरत नहीं होंगे ॥ २०-२१ ॥

अहो वीर्यमहो धैर्यमेतयोर्बलशालिनोः ।
एतौ महाबलौ लोके एतौ प्रकृतिसत्तमौ ॥ २२ ॥
नैवं युद्धं महाघोरमासीद् देवासुरेष्वपि ।
न श्रुतो न च वा दृष्टः संग्रामोऽयं कदाचन ॥ २३ ॥

'अहो ! इन बलशाली वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों इस जगत्में महाबली हैं और ये ही स्वभावतः श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवताओं और असुरोंमें भी कभी ऐसा महाभयंकर युद्ध नहीं हुआ था। ऐसा संग्राम न तो कभी सुना गया था और न कभी देखनेमें आया था' २२-२३

एते वै सैनिका ब्रूयुः सेनयोरुभयोरपि ।
रात्रौ निशीथे मेघौघे दृष्ट्वा युद्धं सुदारुणम् ॥ २४ ॥

इस प्रकार दोनों सेनाओंके सैनिक मेघोंकी घटासे घिरे हुए रात्रिके निशीथकालमें उस भयंकर युद्धको देखकर उपर्युक्त बाते कहते थे ॥ २४ ॥

अथ तौ बाहुभिर्वीरौ सनिपेततुरञ्जसा ।
दशभिर्मुष्टिभिर्जघ्ने सात्यकिः पौण्ड्रकं तदा ॥ २५ ॥

तदनन्तर वे दोनों वीर अनायास ही परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय सात्यकिने पौण्ड्रकको दस मुक्के मारे ॥ २५ ॥

पञ्चभिः सात्यकिं पौण्ड्रः समाजघ्ने महाबलः ।
तयोश्चटचटाशब्दो ब्रह्माण्डक्षोभणो महान् ।
प्रादुरासीत् तु सर्वत्र सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ २६ ॥

महाबली पौण्ड्रकने सात्यकिको पाँच मुक्के मारे। उन दोनोंके मुक्कोंका महान् चटचट शब्द समूचे ब्रह्माण्डको क्षुब्ध किये देता था। वह शब्द सबको विस्मयमें डालतों हुआ-सा सर्वत्र प्रकट होता (सुनायी पड़ता) था ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक सत्तानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥


अष्टनवतितमोऽध्यायः

बलभद्र और एकलव्यका युद्ध तथा बलभद्रद्वारा निषादोंका संहार

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्ध एकलव्यो निषादपः ।
बलभद्रमभि क्षिप्रं धनुरादाय सत्वरम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें निषादराज एकलव्य कुपित हो तुरंत धनुष लेकर बलभद्रजीके सामने गया ॥ १ ॥

नाराचैर्दशभिर्विद्ध्वा वाणैश्च दशभिः परैः।
विच्छेद धनुर्गुर्वी तत् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २ ॥

उसने दस नाराचोंसे उन्हें घायल करके दूसरे दस बाणोंसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उनके धनुषको बीचसे काट डाला ॥ २ ॥

सूतं दशभिराहत्य रथं त्रिंशद्भिरेव च।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन निषादस्य जगत्पतिः ॥ ३ ॥

तब जगदीश्वर बलरामजीने दस बाणोंसे निषादके सारथिको आहत करके तीस बाणोंसे उसके रथको जगह-जगहसे तोड़ डाला ॥ ३ ॥

ततः परं महच्चापं निषादो वीर्यसम्मतः ।
दृढमौर्व्या समायुक्तं दशतालप्रमाणतः ॥ ४ ॥

१०३४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कामपालं शरेणाशु जघान जनमध्यतः।
तत्पश्चात् पराक्रमी निषादने एक विशाल धनुष, जिसकी लंबाई लगभग साढे चार हाथकी थी तथा जो सुदृढ प्रत्यङ्गा-से युक्त था, लेकर तुरंत ही एक बाणद्वारा उस जन-समुदायके मध्यभागमें बलभद्रजीको घायल कर दिया ॥४॥
बलदेवो महावीर्यः सर्पः शेष इव श्वसन् ॥ ५ ॥
दशभिस्तद्धनुर्दिव्यं शरैः सर्पसमैर्बलः।
चिच्छेद मुष्टिदेशे तु माधवो माधवाग्रजः ॥ ६ ॥
तब श्रीकृष्णके बड़े भाई मधुवंशी महापराक्रमी बलदेवजीने फुफकारते हुए शेषनागके समान लंबी साँस खींचकर दस सर्पाकार बाणोंद्वारा एकलव्यके दिव्य धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ ५-६ ॥
एकलव्यो निषादेशः खड्गमादाय सत्वरः।
प्राहिणोद् बलमादाय निशितं घोरविग्रहम् ॥ ७ ॥
यह देख निषादराज एकलव्यने बड़ी उतावलीके साथ एक तेज धारवाली भयंकर तलवार लेकर उसे बलदेवजीपर दे मारा ॥ ७ ॥
तमन्तरे पटुर्वीरो वृष्णिवीरः प्रतापवान्।
तिलशः पञ्चभिर्बाणैश्चकार यदुनन्दनः ॥ ८ ॥
युद्ध करनेमें कुशल प्रतापी वृष्णिवीर शौर्यसम्पन्न यदुनन्दन बलरामने पाँच बाणोंद्वारा बीचमें ही उस तलवारको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
ततोऽपरं महत् खड्गं सर्वकालायसं शुभम्।
प्राहिणोत् सारथेः कायमालोक्यथ निषादजः ॥ ९ ॥
तदनन्तर निषादपुत्रने बलभद्रजीके सारथिके शरीरको लक्ष्य करके एक दूसरा विशाल खड्ग चलाया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ और सुन्दर था ॥ ९ ॥
तं चापि दशभिर्वीरो माधवो यदुनन्दनः।
बाह्वोरन्तरयोश्चैव निर्विभेद महारणे ॥ १० ॥
परंतु यदुनन्दन वीर माधवने उस महासमरमें उसकी दोनों भुजाओंके बीचमें ही दस बाण मारकर उस खड्गके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १० ॥
ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः ॥ ११ ॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
तब महाबली निषादराजने घण्टा-मालाओंसे सुशोभित एक शक्ति हाथमें लेकर उसे बलदेवजीपर चलाया और बड़ा भयंकर सिंहनाद किया ॥ ११॥
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत् ॥ १२ ॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ १३ ॥
तथैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
वह सर्वकल्याणी शक्ति जब बलदेवजीके पास आयी, तब प्रतापी बलभद्रजीने ऊपरको उठती हुई उस महाघोर शक्तिको हाथसे पकड़ लिया। फिर सबको विस्मयमें डालते हुए-से माधवने उसी शक्तिसे निषादराजकी छातीमें तत्काल गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२-१३॥
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः ॥ १४ ॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः ॥ १५ ॥
अपनी ही शक्तिसे ताड़ित होकर वीर निषादराजका सारा शरीर व्याकुल हो उठा और वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। बलरामद्वारा आहत हुआ निषाद एकलव्य प्राणसंशयकी स्थितिमें पहुँच गया था ॥ १४-१५॥
निषादास्तस्य राजेन्द्र शतशोऽथ सहस्रशः।
अष्टाशीतिसहस्राणि निषादास्तस्य योधिनः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र ! उस निषादके सैकड़ों और हजारों निषाद सहायक थे। उसकी सेनामें अठासी हजार निषाद योद्धा मौजूद थे ॥ १६ ॥
गदिनः खड्गिनश्चैव महेष्वासा महाबलाः।
शरैरनेकसाहस्रैः शक्तिभिश्च परश्वधैः ॥ १७ ॥
गदाभिः पट्टिशैः शूलैः परिघैः प्रासतोमरैः।
कुन्तैश्च कुठारैश्च यादवानां महौजसाम् ॥ १८ ॥
शलभा इव राजेन्द्र दीप्यमानं हुताशनम्।
ते शरैः पातयांचक्रू रामं राममिवापरम् ॥ १९ ॥
राजाधिराज ! वे जैसे पतंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे महाबली महाधनुर्धर निषाद गदा और खड्गसे युक्त हो अनेक सहस्र बाणों, शक्तियों, फरसों, गदाओं, पट्टिशों, शूलों, परिघों, प्रासों, तोमरों, कुन्तों और कुठारोंद्वारा महाबली यादवोंके बीचमें खड़े हुए दूसरे श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी बलरामपर प्रहार करने लगे। उन्होंने उनपर बहुत-से बाण मारे ॥ १७–१९ ॥
केचित् कुठारैराघ्नन्तः केचित् कुन्तैः परश्वधैः।
गदाभिः केचिदाघ्नन्ति शक्तिभिश्च तथा परे ॥ २० ॥
निजघ्नुः सहसा रामं स्फुरन्तं पावकं यथा।
प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले बलरामपर कुछ निषादोंने कुठारोंसे प्रहार किया, कुछ निषादोंने कुन्तों और फरसोंद्वारा आघात किया। कोई गदासे चोट करते थे तो कोई शक्तियोंसे। इस प्रकार उन्होंने सहसा प्रहार आरम्भ कर दिया ॥ २०॥
ततः क्रुद्धो हली साक्षाद्वलमुद्यम्य सत्वरम् ॥ २१ ॥
सर्वानार्कषयामास मुसलेन हि पीडयन्।

भविष्यपर्व ] नवनवतितमोऽध्यायः [ १०३५


तब क्रोधमें भरे हुए हलधर साक्षात् हल उठाकर उसके द्वारा तुरंत ही सबको खींचने और मूसलसे मारने लगे ॥ २१३ ॥

ते हन्यमाना राजेन्द्र निषादाः पर्वताश्रयाः ॥ २२ ॥
निपेतुर्धरणीपृष्ठे शतशोऽथ सहस्रशः ।

राजेन्द्र ! उनके मूसलकी मार खाकर सैकड़ों और हजारों पर्वतवासी निषाद पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २२३ ॥

क्षणेन तन्महाराज हत्वा सर्वान् महाबलान् ॥ २३ ॥
सिंहवद् व्यनदंस्तत्र तस्थौ रामो महाबलः ।

महाराज ! क्षणभरमें उन समस्त महाबली निषादोंका वध करके महापराक्रमी बलराम सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ खड़े हो गये ॥ २३३ ॥

ततो रात्रौ महाघोराः पिशाचाः पिशिताशनाः ॥ २४ ॥
आकृष्य मांसयूथानि भक्षयन्तः समासते ।
पिबन्तः शोणितं कोष्ठात् संछिद्य च शवं बहु ॥ २५ ॥

तदनन्तर रातमें बड़े भयंकर मांसभक्षी पिशाच ढेर-के-ढेर मांस खींचकर खाने लगे । वे मरे हुए वीरोंके कोष्ठसे रक्त पीते और बहुत से मुर्दोंको काट-काटकर खाते थे २४-२५

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि एकलव्यसैन्यवधे अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें एकलव्यकी सेनाका वधविषयक अठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥


नवनवतितमोऽध्यायः

बलभद्र और एकलव्यका तथा पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध

वैशम्पायन उवाच

क्रव्यादाः सर्व एवाशु भक्षयन्तस्तदा शवम् ।
हसन्तो विविधं घोरं नादयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! समस्त मांसभक्षी जीव उस समय शीघ्रतापूर्वक मृतकोंका मांस खाते और नाना प्रकारका घोर अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे ॥ १ ॥

राक्षसाश्च पिशाचाश्च पिबन्तः शोणितं बहु ।
आशिखं भुञ्जते राजञ्छवस्य पिशिताशनाः ॥ २ ॥

राजन् ! कच्चा मांस खानेवाले राक्षस और पिशाच बहुत-सा रक्त पीते और नखसे शिखतक मृतकोंका मांस खाकर तृप्त होते थे ॥ २ ॥

नृत्यन्ति स्म तदा राजन् नगर्यां रणतोषिताः ।
काका बलाका गृध्राश्च श्येना गोमायवस्तथा ॥ ३ ॥
भक्षयन्तः प्रवर्तन्ते राक्षसाश्चैव दारुणाः ।

नरेश्वर ! उस नगरीमें उस युद्धसे संतुष्ट हुए कौए, बक, गृध्र, श्येन और गीदड़ उस समय नृत्य करते थे । भयानक राक्षस भी मृतकोंके मांस-भक्षणमें लगे थे ॥ ३३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरो निषादो लब्धसंज्ञकः ॥ ४ ॥
हतान् सर्वान् समालोक्य निषादान् नगचारिणः ।
गदामादाय कुपितो राममेव जगाम ह ॥ ५ ॥

इसी बीचमें वीर निषाद एकलव्यको चेतना प्राप्त हुई, समस्त पर्वतवासी निषादोंको मारा गया देख, कुपित हो गदा लेकर वह बलरामजीकी ओर चला ॥ ४-५ ॥

जघान गदया राजन्नंसदेशे निषादपः ।
ततो रामो गदी राजन् निषादं बाहुशालिनम् ॥ ६ ॥
आजघ्ने गदया क्रूरं मदमत्तो हलायुधः ।

राजन् ! उस निषादराजने बलरामजीकी हँसलीपर गदासे आघात किया । तब गदाधारी मदमत्त हलधर बलरामने उस बाहुशाली क्रूरकर्मा निषादको गदासे गहरी चोट पहुँचायी ॥

तयोश्च तुमुलं युद्धं गदाभ्यां समवर्तत ॥ ७ ॥
आकाशे शब्द आसीत् तु तयोर्युद्धे महाभुज ।
समुद्राणां यथा घोषः सर्वेषां संनिगच्छताम् ॥ ८ ॥

फिर तो उन दोनोंमें गदाओं द्वारा तुमुल युद्ध होने लगा । महाबाहो ! उन दोनोंके युद्धमें परस्पर मिलते हुए समस्त समुद्रोंके गम्भीर घोषकी भाँति आकाशमें बड़ा भारी शब्द होने लगा ॥ ७८ ॥

कल्पक्षये महाराज शब्दः सुतुमुलॊऽभवत् ।
क्षोभितो नागराजश्च नागाः क्षोभं समाययुः ॥ ९ ॥

महाराज ! प्रलयकालमे समुद्रोंका जो तुमुल घोष होता है, वैसा ही शब्द होने लगा । उससे नागराज शेष भी क्षुब्ध हो उठे और दिग्गजोंको भी महान् क्षोभ प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥

पृथिवी चान्तरिक्षं च सर्वं शब्दमयं बभौ ।
ततः स पौण्ड्रको राजा सात्यकिं वृष्णिनन्दनम् ॥ १० ॥
गदयैव जघानाशु सत्त्वरं रणकोविदः ।
युयुधानो बली राजन् वासुदेवं जघान ह ॥ ११ ॥

पृथिवी और आकाश-ये सब-के-सब शब्दमय ही प्रतीत होने लगे । इसी बीचमें रणकुशल राजा पौण्ड्रकने तुरंत ही वृष्णिनन्दन सात्यकिपर गदासे आघात किया । राजन् ! तब

१०३६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बलवान् सात्यकिने भी मिथ्या वासुदेवपर गदाका प्रहार किया ॥ १०-११ ॥

तयोश्च तुमुलः शब्दः प्रादुरासीन्महोरणे ।
चतुर्णां युध्यतां राजन् परस्परवधैषिणाम् ॥ १२ ॥
ब्रह्माण्डक्षोभणो राजञ्छब्द आसीत् सुदारुणः।
ततो रजः प्रादुरभूत् तस्मिन् संग्राममूर्धनि ॥ १३ ॥
तारका निष्प्रभा राजंस्तमस्येवं क्षयं गते ।
उषसि प्रतिबुद्धायां ततो निःशेषतां ययौ ॥ १४ ॥
उदितो भगवान् सूर्यश्चन्द्रश्च क्षयमाययौ ।
तेषां युद्धं प्रादुरभूत्तूर्णां बाहुशालिनाम् ।
देवासुरसमं राजन्नुदिते भास्करे महत् ॥ १५ ॥

राजन् ! उन दोनोंके महासमरमें बड़ा भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले इन चारों योद्धाओंका अत्यन्त भयानक शब्द समूचे ब्रह्माण्डमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला था । राजन् ! तदनन्तर उस संग्रामके मुहानेपर प्रातःकालकी लाली प्रकट हुई, तारे प्रकाशहीन हो गये । इसी तरह अन्धकार क्षीण होने लगा । उषःकालके जाग्रत् होनेपर अन्धकार पूर्णतः मिट गया । भगवान् सूर्यका उदय हुआ और चन्द्रमा क्षीण हो चले । राजन् ! भगवान् भास्करका उदय होनेपर उन चारों बाहुशाली वीरोंका महान् युद्ध होने लगा, जो देवताओं और असुरोंके संग्राम सा प्रतीत होता था ॥ १२—१५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकयुद्धे नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकयुद्धविषयक निन्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥


शततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका द्वारकामें आगमन और पौण्ड्रकसे उनकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रभाते विमले भगवान् देवकीसुतः ।
गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः पुरं बदरिकाश्रमात् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर देवकीनन्दन भगवान् जगन्नाथने बदरिकाश्रमसे अपनी द्वारकापुरीको जानेकी इच्छा की ॥१॥

नमस्कृत्य मुनीन् सर्वान् ययौ द्वारवतीं नृप ।
आरुह्य गरुडं विष्णुर्वेगेन महता प्रभुः ॥ २ ॥

नरेश्वर ! समस्त मुनियोंको नमस्कार करके भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो बड़े वेगसे द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

सुमहाञ्छुश्रुवे शब्दस्तेषां युद्धं प्रकुर्वताम् ।
गच्छता देवदेवेन पुरीं द्वारवतीं नृप ॥ ३ ॥

राजन् ! द्वारकापुरीकी ओर जाते हुए देवाधिदेव श्रीकृष्णने वहाँ युद्ध करते हुए उन समस्त योद्धाओंका महान् कोलाहल सुना ॥ ३ ॥

अचिन्तयज्जगन्नाथः को न्वयं शब्द उत्थितः ।
संग्रामसम्भवो घोर आर्यशैनैयसंयुतः ॥ ४ ॥

उसे सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण सोचने लगे—'यह कैसा युद्धजनक घोर शब्द प्रकट हो रहा है, जिसमें भैया बलराम और सात्यकिकी भी गर्जना मिली हुई है ॥ ४ ॥

व्यक्तमागतवान् पौण्ड्रो नगरीं द्वारकामनु ।
तेन युद्धं समभवत् पौण्ड्रकेण दुरात्मना ॥ ५ ॥
यदूंनां वृष्णिवीराणां युध्यतामितरेतरम् ।
शब्दोऽयं सुमहान् व्यक्तो नात्र कार्या विचारणा ॥ ६ ॥

'निश्चय ही पौण्ड्रकने द्वारकापुरीपर आक्रमण किया है। उसी दुरात्मा पौण्ड्रकके साथ यादवों एवं वृष्णिवीरोंका युद्ध हो रहा है। परस्पर युद्ध करनेवाले इन्हीं योद्धाओंका यह महान् शब्द प्रकट हो रहा है। इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है' ॥ ५-६ ॥

इत्येवं चिन्तयित्वा तु दध्मौ शङ्खं महारवम् ।
पाञ्चजन्यं हरिः साक्षात् प्रीणयन् वृष्णिपुङ्गवान् ॥ ७ ॥

ऐसा सोचकर साक्षात् श्रीहरिने वृष्णिशिरोमणि वीरोंको प्रसन्न करते हुए महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ ७ ॥

रोदसी पूरयामास तेन शब्देन केशवः ।
यादवा वृष्णयश्चैव श्रुत्वा शङ्खस्य ते रवम् ॥ ८ ॥
व्यक्तमायाति भगवान् पाञ्चजन्यरवो ह्ययम् ।

केशवने उस शङ्खध्वनिसे पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण कर दिया । उस शङ्खनादको सुनकर यादव और वृष्णिवंशी परस्पर कहने लगे—'निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्ण पधार रहे हैं। यह पाञ्चजन्यकी ही ध्वनि सुनायी पड़ती है' ॥ ८ १/२ ॥

इति ते मेनिरे राजन् वृष्णयो यादवास्तथा ॥ ९ ॥
निर्भयाः समपद्यन्त वृष्णयो यादवाश्च ते ।

राजन् ! यादवों और वृष्णिवंशियोंको इस बातका दृढ निश्चय हो गया । वे वृष्णि और यादव निर्भय हो गये ॥ ९ १/२ ॥

तस्मिन्नेव क्षणे दृष्टस्तार्क्ष्यश्च पततां वरः ॥ १० ॥
ततश्च देवकीसूनुर्दृष्टस्तैर्यादवेश्वरः ।
सूताश्च मागधाश्चैव पुरो यान्ति जगत्पतेः ॥ ११ ॥

उसी क्षण पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ दिखायी दिये। तदनन्तर

[ भविष्यपर्व ] \hfill शततमोऽध्यायः \hfill १०३७


यादवेश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। सूत और मागधजन उन जगदीशवरके सामने गये ॥ १०-११ ॥

स्तुत्या स्तुतं हरिं विष्णुमीश्वरं कमलेक्षणम् ।
गताश्च यादवाः सर्वे परिवव्रुर्जनार्दनम् ॥ १२ ॥

जिनकी स्तुति की गयी थी, उन कमलनयन सर्वव्यापी ईश्वर जनार्दन हरिके पास समस्त यादव गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ १२ ॥

कृष्णस्तु गरुडं भूयो गच्छ त्वं नाकमूत्तमम् ।
इत्युक्त्वा गरुडं विष्णुर्विसृज्य यदुनन्दनः ॥ १३ ॥
दारुकं पुनराहेदं रथमानय मे प्रभो।

इसके बाद यदुनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः गरुड़से कहा—'तुम उत्तम स्वर्गलोकको जाओ' ऐसा कहकर उन्होंने गरुड़को तो विदा कर दिया और पुनः दारुकसे कहा—'सामर्थ्यशाली सारथे ! तुम मेरा रथ ले आओ' ॥ १३॥

स तथेति प्रतिज्ञाय रथमादाय सत्वरम् ॥ १४ ॥
रथोऽयं भगवन् देव किमतः कृत्यमस्ति मे।
इत्युक्त्वा रथमादाय प्रणम्याग्रे स्थितो हरेः ॥ १५ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर सारथि तुरंत रथ ले आया और बोला—'भगवन् ! देव ! यह रथ उपस्थित है। इसके अतिरिक्त मेरे लिये क्या आज्ञा है ?' ऐसा कहकर दारुक रथ ले आया और भगवान्‌को प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया ॥ १४-१५ ॥

गतेऽथ गरुडे विष्णू रथमारुह्य सत्वरम् ।
यत्र युद्धं समभवत् तत्र याति स्म केशवः ॥ १६ ॥

गरुड़के चले जानेपर केशव श्रीकृष्ण तुरंत रथपर आरूढ़ हुए और जहाँ युद्ध हो रहा था, वहाँ गये ॥ १६ ॥

तत्र गत्वा महाराज युध्यतां च महात्मनाम् ।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खं दध्मौ यद्वृष्णोत्तमः ॥ १७ ॥

महाराज ! वहाँ जाकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उन जूझते हुए महामनस्वी वीरोंके बीचमे पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्ख बजाया ॥ १७ ॥

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु कृष्णं दृष्ट्वा रणोत्सुकम् ।
सात्यकिं पृष्ठतः कृत्वा वासुदेवमुपागमत् ॥ १८ ॥

पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णको युद्धके लिये उत्सुक देख सात्यकिको पीछे करके उन वसुदेवनन्दनके समीप चला ॥

क्रुद्धोऽथ सात्यकी राजन् वारयामास पौण्ड्रकम् ।
न गन्तव्यमितो राजन्नैष धर्मः सनातनः ॥ १९ ॥

राजन् ! यह देख क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने पौण्ड्रकको रोका और कहा—'राजन् ! तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये। यह सनातन धर्म नहीं है ॥ १९ ॥

जित्वा मां गच्छ राजेन्द्र परं योद्धुं महारणे ।
क्षत्रियोऽसि महावीर स्थिते मयि रणोत्सुके ॥ २० ॥
एष ते गर्वमखिलं नाशयिष्यामि संयुगे।

'राजेन्द्र ! इस महासमरमें मुझे परास्त करके तुम दूसरेसे युद्ध करनेके लिये जाओ । महावीर ! तुम क्षत्रिय हो, जबतक मैं युद्धके लिये उत्सुक हूँ, तबतक तुम्हें अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। मैं अभी युद्धस्थलमें तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ' ॥ २०॥

इत्युक्त्वा चाग्रतस्तस्थौ गच्छतो यादवेश्वरः ॥ २१ ॥
पौण्ड्रस्य शिनिनप्ता तु पश्यतः केशवस्य ह ।
अवज्ञाय शिनेः पौत्रं कृष्णमेव जगाम ह ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर शिनिके पोते यादवेश्वर सात्यकि श्रीकृष्णके देखते-देखते जाते हुए पौण्ड्रकके आगे खड़े हो गये तो भी वह सात्यकिकी अवहेलना करके श्रीकृष्णकी ओर चल दिया ॥

निर्भर्त्स्य सहसा भूयः सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।
गदया प्राहरत् पौण्ड्रं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ २३ ॥

तब क्रोधसे भरे हुए सात्यकिने सहसा उसे डाँटकर भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते पुनः पौण्ड्रकपर गदासे प्रहार किया ॥ २३ ॥

यथाप्राणं यथायोगं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
दृष्ट्वाय भगवानेवं सात्यकिं प्रशशंस ह ॥ २४ ॥

सत्यपराक्रमी सात्यकिने पूरी सावधानी और शक्तिका उपयोग करके पौण्ड्रकपर गदा चलायी थी। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २४ ॥

निवार्य सात्यकिं कृष्णो यथेष्टं क्रियतामसौ ।
उपारमद् यथायोगं सात्यकिः कृष्णवारितः ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् 'वह जैसा चाहे वैसा ही करे' यह कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिको रोक दिया। श्रीकृष्णके रोकनेपर सात्यकि यथावसर युद्धसे विरत हो गये ॥ २५ ॥

स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह ।
भो भो यादव गोपाल इदानीं क्व गतो भवान् ॥ २६ ॥

तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गये थे ? ॥

त्वां द्रष्टुमद्य सम्प्राप्तो वासुदेवोऽस्मि साम्प्रतम् ।
हत्वा त्वां सबलं कृष्ण बलैर्बहुभिरन्वितः ॥ २७ ॥
अहमेको भविष्यामि वासुदेवो महीतले ।

'मैं इस समय तुमसे ही मिलने आया हूँ। आजकल मैं ही वासुदेव नामसे विख्यात हूँ। श्रीकृष्ण ! मैं बहुत-सी सेनाओंके साथ हूँ। इस समय सेनासहित तुम्हारा वध करके मैं अकेला ही इस भूतलपर वासुदेव रहूँगा ॥ २७॥

यच्चक्रं तव गोविन्द प्रथितं सुप्रभं महत् ॥ २८ ॥

१०३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


अनेन मम चक्रेण पीडितोऽस्मि च तद्रणे ।
चक्रमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ॥ २९ ॥
नाशयिष्यामि तत् सर्वं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।

'गोविन्द ! तुम्हारा जो विख्यात, उत्तम प्रभासे युक्त और महान् चक्र है, उसका मेरे इस चक्रसे अभी नाश हो जायगा। इसके लिये मुझे खेद है। माधव ! परंतु रणभूमिमें अब तुम्हें 'मेरे पास चक्र है' ऐसा सोचकर उसके बलका घमंड नहीं होना चाहिये; क्योंकि आज मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारे उस सारे बलका नाश कर डालूँगा ॥ २८-२९ १/२ ॥

शार्ङ्गीति मां विजानीहि न त्वं शार्ङ्गीति शिष्यसे ॥ ३० ॥
शङ्खमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ।
शङ्खी चाहं गदी चाहं चक्री चाहं जनार्दन ॥ ३१ ॥

'जनार्दन ! तुम मुझे शार्ङ्गी भी समझो। 'केवल तुम्हीं शार्ङ्गी नामसे यहाँ शेष हो' ऐसा न समझो। माधव ! मेरे पास शङ्ख है। ऐसा समझकर तुम्हें अब उसके बलका भी घमंड नहीं करना चाहिये; क्योंकि मैं शङ्खी भी हूँ, गदाधर भी हूँ और चक्रपाणि भी हूँ ॥ ३०-३१ ॥

मामेव हि सदा ब्रूयुर्जानन्तो वीर्यशालिनः ।
आदौ त्वं बलवद् वृद्धान् हत्वा स्त्रीबालकान् बहून् ॥ ३२॥
गाश्च हत्वा महागर्वस्तव सम्प्रति वर्तते ।
तत् तेऽहं व्यपनेष्यामि यदि तिष्ठसि मत्पुरः ॥ ३३ ॥

'जगत्में जो पराक्रमशाली और ज्ञानी पुरुष हैं, वे अब सदा मुझे ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला कहेंगे। पहलेकी बात है, तुमने बलवानोंमें बड़े-चढ़े कुछ कंसके अनुचरोंका, स्त्री (पूतना) का तथा बहुत-से बालकोंका (छः गर्मोंका कंसद्वारा) वध करके कुछ गौओं (वत्सासुर, अरिष्टासुर आदि) का भी वध किया था। इसीसे तुम्हें अपनी वीरतापर बड़ा गर्व है। यदि मेरे सामने खड़े रह गये तो तुम्हारे उस गर्वको चूर्ण कर दूँगा ॥ ३२-३३ ॥

शस्त्रं गृहाण गोविन्द यदि योद्धुं व्यवस्थितः ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय तस्थौ पार्श्वे जगत्पतेः ॥ ३४ ॥

'गोविन्द ! यदि तुम युद्धके लिये खड़े हो तो शस्त्र ग्रहण करो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण हाथमें लेकर जगदीश्वर श्रीहरिके पास खड़ा हो गया ॥ ३४ ॥

एतद् वचनमाकर्ण्य वासुदेवेन भाषितम् ।
स्मितं कृत्वा हरिः कृष्णो बभाषे पौण्ड्रकं नृपम् ॥३५॥
कामं वद नृप त्वं हि पातक्ष्यसि सदा नृप ।
गोघाती बालघाती च स्त्रीहन्ता सर्वथा नृप ॥ ३६ ॥

मिथ्या वासुदेवके इस कथनको सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराये और उस पौण्ड्रक नरेशसे इस प्रकार बोले— 'नरेश्वर ! तुम इच्छानुसार जो-जो चाहो कहो। मैं सदा पातकी ही हूँ। मैंने सर्वथा गोहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या की है ॥ ३५-३६ ॥

चक्री भव गदी राजञ्छाङ्गीं च सततं भव ।
नामधेयं वृथा मह्यं वासुदेवेति च प्रभो ॥ ३७ ॥

'राजन् ! तुम सदा चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले बने रहो। प्रभो ! मेरा वासुदेव यह मिथ्या नाम भी लिये रहो ॥ ३७ ॥

शार्ङ्गी चक्री गदी शङ्खीत्येवमादि वृथा मम ।
किं तु वक्ष्यामि किंचित्ते शृणुष्व यदि मन्यसे । ३८।

'शार्ङ्गी, चक्री, गदी और शङ्खी आदि जो मेरे नाम हैं, उनका भी व्यर्थ भार लिये रहो; परंतु मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, यदि ठीक समझो, तो सुनो ॥ ३८ ॥

क्षत्रिया बलिनो ये तु स्थिते मयि जगत्पतौ ।
तथानुब्रुवते त्वां हि जीवत्येव मयि प्रभो ॥ ३९ ॥

'प्रभो ! मुझ जगदीश्वरके जीते-जी ही बलवान् क्षत्रिय तुम्हें वैसे (मेरे-जैसे) नामोंद्वारा पुकारते हैं ॥ ३९ ॥

यन्मे चक्रं महाघोरमसुरान्तकरं महत् ।
तत्तुल्यं तव चक्रं तु वृत्ततो न तु वीर्यतः ।
आयुधेष्वथ सर्वत्र शब्दसादृश्यमस्ति ते ॥ ४० ॥

'मेरा जो असुरोंका अन्त करनेवाला महाघोर एवं महान् चक्र है, तुम्हारा चक्र केवल गोलाईमें उसकी समानता करता है, शक्तिमें नहीं। तुम्हारे सम्पूर्ण आयुधोंमें भी मुझसे नाममात्रकी समता है, शक्तिरतः नहीं ॥ ४० ॥

गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा ।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ॥ ४१ ॥

'राजन् ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात् प्राणियोंका सदा प्राणदान करनेवाला हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका रक्षक तथा सर्वदा दुष्टोंका शासक हूँ ॥ ४१ ॥

कत्थनं सर्वकार्ये हि जित्वा शत्रून् नृपाधम ।
अजित्वा किं भवान् ब्रूते स्थिते मयि च शस्त्रिणि ॥ ४२ ॥

'नृपाधम ! तुम्हें शत्रुओंको जीतकर ही सब प्रकारसे बड़ी-बड़ी बातें बनानी चाहिये। जब मैं शस्त्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तब तुम मुझे पराजित किये बिना ऐसी बातें क्यों कहते हो ? ॥ ४२ ॥

हत्वा मां ब्रूहि राजेन्द्र यदि शक्तोऽसि पौण्ड्रक ।
स्थितोऽहं चक्रमाश्रित्य रथी चापी गदासिमान्॥ ४३॥

'राजेन्द्र पौण्ड्रक ! यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे मारकर अपनी प्रशंसा करो। मैं रथ, धनुष, गदा और खड्गसे युक्त हो चक्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ ॥ ४३ ॥

रथमारुह्य युद्धाय सन्नद्धो भव मानद ।

भविष्यपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः १०३९


इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ ४४ ॥
'मानद ! रथपर आरूढ हो युद्धके लिये तैयार हो जाओ।

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कृष्णपौण्ड्रकयुद्धे शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्ण और पौण्ड्रकका युद्धविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥


एकाधिकशततमोऽध्यायः

पौण्ड्रक और श्रीकृष्णका युद्ध तथा पौण्ड्रकका वध

वैशम्पायन उवाच

ततः शरं समादाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
पौण्ड्रं जघान सहसा निशितेन शरेण ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर प्रतापी भगवान् वासुदेवने बाण लेकर सहसा उस पैने बाणके द्वारा पौण्ड्रकपर प्रहार किया ॥ १ ॥

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु शरैर्दशभिराशुगैः ।
वासुदेवं जघानाशु वार्ष्णेयं वृष्णिनन्दनम् ॥ २ ॥

पौण्ड्रक वासुदेवने भी दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वृष्णिवंशी एवं वृष्णिकुलनन्दन वासुदेवपर शीघ्र ही आघात किया॥

दारुकं पञ्चविंशत्या हयान् दशभिरेव च ।
सप्तत्या वासुदेवं तु यादवं वासुदेवकः ॥ ३ ॥

उस मिथ्या वासुदेवने दारुकको पचीस, घोड़ोंको दस और यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको सत्तर बाण मारे ॥ ३ ॥

ततः प्रहस्य सुचिरं केशवः केशिसूदनः ।
धृष्टोऽसाविति मनसा सम्पूज्य यदुनन्दनः ॥ ४ ॥

तब केशिहन्ता यदुनन्दन केशवने देरतक हँसकर मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'पौण्ड्रक बड़ा ढीठ है' ॥

आकृष्य शार्ङ्गं बलवान् संधाय रिपुसूदनः ।
नाराचेन सुतीक्ष्णेन ध्वजं चिच्छेद केशवः ॥ ५ ॥

उसके बाद शत्रुसूदन बलवान् केशवने शार्ङ्ग धनुषको खींचकर उसपर तीखे नाराचका संधान किया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी ध्वजा काट डाली ॥ ५ ॥

सारथेश्च शिरः कायादाहृत्य यदुनन्दनः ।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ६ ॥
रथं राज्ञः समाहत्य तदोभौ पार्ष्णिसारथी ।
चक्रे च तिलशः कृत्वा हसन् किंचिदिव स्थितः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीहरिने उसके सारथिके सिरको धड़से अलग करके चार उत्तम सायकोंद्वारा चारों घोड़ोंको मारकर उस राजाके रथको भी तोड़-फोड़ डाला तथा दोनों पार्श्वक्षकोंको घायल करके उसके रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला और वे कुछ मुसकराते हुए-से खड़े हो गये ॥

पौण्ड्रको वासुदेवस्तु रथादुत्प्लुत्य सत्वरः ।
आदाय निशितं खड्गं प्राहिणोत् केशवाय सः ॥ ८ ॥

तब पौण्ड्रक वासुदेव तुरंत ही रथसे कूद पड़ा और एक तीखी तलवार लेकर उसने भगवान् केशवपर चला दी ॥

स खड्गं शतधा कृत्वा तूष्णीमासीच्च केशवः ।
ततः परं महाघोरं परिघं कालसन्निभम् ॥ ९ ॥
गृहीत्वा वासुदेवाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्राहिणोद् वृष्णिवीराय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ १० ॥

भगवान् केशव उस तलवारके सौ टुकड़े करके चुपचाप रथपर बैठे रहे। तत्पश्चात् प्रतापी पौण्ड्रक वासुदेवने एक कालके समान महाघोर परिघ लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उसे वृष्णिवीर भगवान् वासुदेवपर चला दिया ॥ ९-१०॥

तद् द्विधा जगतां नाथश्चकार यदुनन्दनः ।
ततश्चक्रं महाघोरं सहस्रारं महाप्रभम् ॥ ११ ॥
त्रिंशद्भारसमायुक्तमायसायसममित्रहा ।
आदायाथ महाराज केशवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

तब जगदीश्वर यदुनन्दनने उस परिघके दो टुकड़े कर दिये। महाराज ! तत्पश्चात् शत्रुसूदन पौण्ड्रकने महाघोर परम कान्तिमान् सहस्रों अरोंसे युक्त ठोस भार लोहेके बने हुए क्षेपणीय चक्रको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥

पश्येदं निशितं घोरं तव चक्रविनाशनम् ।
अनेन तव गोविन्द दर्पं दर्पवतां वर ॥ १३ ॥
अपनेष्यामि वार्ष्णेय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।

‘दर्पवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! देखो, यह भयंकर एवं तीखा चक्र तुम्हारे चक्रका विनाश करनेवाला है। वार्ष्णेय ! मैं इसी चक्रसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण कर दूँगा ॥ १३½ ॥

त्वामुद्दिश्य महाघोरं कृतमन्यद् दुरासदम् ॥ १४ ॥
यदि शक्तो हरे कृष्ण दारयेदं महास्पदम् ।

‘अरे ! कृष्ण ! तुम्हारे उद्देश्यसे ही मैंने यह महाभयंकर

१०४०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[हरिवंशे

दूसरा दुर्जय चक्र तैयार कराया है। यदि तुममें शक्ति हो तो इस विशाल चक्रको विदीर्ण करो' ॥ १४ १/२ ॥

इत्युक्त्वा तच्छतगुणं भ्रामयित्वा महाबलः ॥ १५ ॥
चिक्षेपाथ महावीर्यः पौण्ड्रको नृपसत्तमः ।

ऐसा कहकर महाबली महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकने उस चक्रको सौ बार घुमाकर श्रीकृष्णपर चला दिया ॥

अवप्लुत्य ततो देशात् तदुत्सृज्य महाबलः ॥ १६ ॥
सिंहनादं महाघोरं व्यनदद् वीर्यवांस्तदा ।

तब महाबली और पराक्रमशाली श्रीकृष्ण उस स्थानसे नीचे उतर गये और उस चक्रको विफल करके महाघोर सिंहनाद करने लगे ॥ १६ १/२ ॥

ततो विस्मयमापन्नो भगवान् देवकीसुतः ॥ १७ ॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमस्य पौण्ड्रस्य दुःसहम् ।

पहले तो भगवान् देवकीनन्दन उसका साहस देखकर विस्मित हो उठे और यह कहने लगे कि 'अहो ! पौण्ड्रकका दुःसह पराक्रम और धैर्य अद्भुत है' ॥ १७ १/२ ॥

इति मत्वा जगन्नाथ उत्थितश्च रथोत्तमात् ॥ १८ ॥
ततः शिलां समादाय प्रेषयामास केशवम् ।
तां शिलां प्रेषयामास तस्मै यदुकुलोद्वहः ॥ १९ ॥

यही सब सोचकर जगन्नाथ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथसे उतर पड़े थे । तदनन्तर पौण्ड्रकने एक शिलाखण्ड लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर चलाया, किंतु यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने वह शिला फिर उसीपर दे मारी ॥ १८-१९ ॥

पौण्ड्रेण सुचिरं कालं विक्रीड्य भगवान् हरिः ।
ततश्चक्रं समादाय निशितं रक्तभोजनम् ॥ २० ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीहरिने पौण्ड्रकके साथ चिरकालतक युद्धका खेल करके अपना तीखा चक्र हाथमें लिया, जो दैत्योंके रक्तका आहार करनेवाला था ॥ २० ॥

दैत्यमांसप्रदिग्धाङ्गं नारीगर्भविमोचनम् ।
शातकुम्भमयं घोरं दैत्यदानवनाशनम् ॥ २१ ॥
सहस्रारं शतारं तदद्भुतं दैत्यभीषणम् ।
ऐश्वर्यवर्म परमं नित्यं सुरगणार्चितम् ॥ २२ ॥

उस चक्रका अङ्ग-प्रत्यङ्ग दैत्योंके मांससे पुष्ट हुआ था । वह दैत्यनारियोंके गर्भ गिरा देनेवाला था । उसका निर्माण सुवर्णसे हुआ था । वह घोर चक्र दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाला था । उसके अरे कभी सहस्रोंकी संख्यामें प्रकट होते थे और कभी सैकड़ोंकी । ऐश्वर्य ही उसका कवच था । वह देवगणोंद्वारा पूजित उत्तम अस्त्र नित्य अद्भुत तथा दैत्योंको भयभीत करनेवाला था ॥ २१-२२ ॥

विष्णुः कृष्णस्तथा शार्ङ्ग नित्ययुक्तः सदा हरिः ।
जघान तेन गोविन्दः पौण्ड्रकं नृपसत्तमम् ॥ २३ ॥

सर्वव्यापी शार्ङ्गधनुर्धर पापहारी श्रीकृष्ण सदा उस अस्त्रसे युक्त रहते हैं । गोविन्दने उसी अस्त्रसे नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको मार डाला ॥ २३ ॥

तस्य देहं विदार्याशु चक्रं पिशितभोजनम् ।
कृष्णस्याथ करं भूयः प्राप सर्वेश्वरस्य ह ॥ २४ ॥

उसके शरीरको विदीर्ण करके वह मांसभोजी चक्र पुनः शीघ्र ही सर्वेश्वर श्रीकृष्णके हाथमें आ गया ॥ २४ ॥

ततः स पौण्ड्रको राजा गतासुः प्रापतद् भुवि ।
निहत्य भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ।
प्रतिपेदे सुधर्मां तु यादवैः पूजितो हरिः ॥ २५ ॥

तदनन्तर वह राजा पौण्ड्रक प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । जिनके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, वे सर्वसमर्थ भगवान् विष्णु हरि पौण्ड्रकका वध करके यादवोंसे पूजित हो सुधर्मा नामक सभा में चले गये ॥ २५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकवासुदेववधे एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रक वासुदेवका वधविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥


द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

एकलव्यका द्वीपान्तरगमन, भगवान् श्रीकृष्णका यादवोंको अपनी यात्राका संक्षिप्त वृत्तान्त बताना तथा अन्तःपुरमें रुक्मिणी और सत्यभामासे मिलकर उन्हें संतोष देना

वैशम्पायन उवाच

निषादेशं ततो रामः शक्त्या वीर्यवतां वरः ।
आजघान स्तनद्वन्द्वे सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने शक्तिसे निषादराज एकलव्यकी छातीमें प्रहार किया और फिर सिंहके समान गर्जना की ॥ १ ॥

ततः क्रुद्धो निषादेशो रामं मत्तं महाबलम् ।
गदया लोकविख्यातो जघान स्तनवक्षसि ॥ २ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए लोकविख्यात निषादराजने महाबली एवं बलके मदसे उन्मत्त हुए बलरामजीकी छातीमें गदासे चोट पहुँचायी ॥ २ ॥

आहतः स तु तेनाशु बलभद्रो महाबलः ।

भविष्यपर्व ]द्व्यधिकशततमोऽध्यायः१०४१

उभाभ्यां चैव रामस्तु कराभ्यां वृष्णिपुङ्गवः ॥ ३ ॥
गदां गृह्य महाघोरामायान्तीं प्राणहारिणीम् ।
दुद्रावाथ निषादेशः समुद्रं मकरालयम् ॥ ४ ॥
उसके द्वारा आहत होकर महाबली वृष्णिपुङ्गव वीर बलभद्र एवं बलरामने दोनों हाथोंसे अपनी ओर आती हुई उस प्राणहारिणी महाभयंकर गदाको पकड़कर एकलव्यपर आक्रमण किया। यह देखकर निषादराज एकलव्य मगर आदि जलजन्तुओंके निवासस्थान समुद्रकी ओर भागा ॥ ३-४ ॥
धावत्येवं तदा राज्ञि एकलव्ये निषादपे ।
धावत्येवं च रामोऽपि यत्र यातो निषादपः ॥ ५ ॥
निषादराज एकलव्यके इस प्रकार भागनेपर बलरामजी भी उसका पीछा करने लगे । वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे भी गये ॥ ५ ॥
सागरं स प्रविश्याशु गत्वा योजनपञ्चकम् ।
भीत एव तदा राजन्नेकलव्यो निषादपः ॥ ६ ॥
राजन् ! समुद्रमें घुसकर निषादराज एकलव्य पाँच योजन दूर चला गया और वहाँ बलभद्रजीसे डरता हुआ ही निवास करने लगा ॥ ६ ॥
कंचिद् द्वीपन्तरं राजन् प्रविश्य न्यवसत् तदा ।
इत्थं रामो निषादेशं जिगाय यदुनन्दनः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! किसी दूसरे द्वीपमें प्रवेश करके वह वहीं रहने लगा; इस प्रकार यदुनन्दन बलरामजीने निषादराजपर विजय पायी ॥ ७ ॥
तां सभां मणिरत्नाढ्यां प्रविवेश हलायुधः ।
सात्यकिर्युद्धसंसक्तस्तां सभां प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
तदनन्तर हलायुध बलरामजीने मणि तथा रत्नोंसे विभूषित उस सुधर्मा-सभामें प्रवेश किया । युद्धमें फँसे हुए सात्यकि भी उससे विरत हो सभामें लौट आये ॥ ८ ॥
अन्ये च यादवा राजन् यथायोगमुपस्थिताः ।
आसीनेषु च सर्वेषु वृष्णिवीरेषु सर्वतः ॥ ९ ॥
अभिवाद्य यथायोगं वृष्णीन् सर्वांश्च केशवः ।
उवाच वचनं काले भगवान् देवकीसुतः ॥ १० ॥
राजन् ! अन्य यादव भी यथावसर वहाँ उपस्थित हुए । जब सभी वृष्णिवंशी वीर वहाँ सब ओर बैठ गये, तब देवकी-नन्दन भगवान् केशवने योग्यताके अनुसार सभी वृष्णि-वंशियोंका अभिवादन करके उस समय यह बात कही—॥
दृष्टं कैलासशिखरं शंकरो नीललोहितः ।
स तु मह्यं यदुवराः प्रीतिमांश्च ददौ वरम् ॥ ११ ॥
'यदुवरो ! मैंने कैलासशिखरका दर्शन किया । वहाँ नीललोहित भगवान् शङ्करने मुझे प्रसन्न होकर वर दिया है॥
तत्र देवाः समायाता मुनयश्च तपोधनाः ।
दृष्ट्वा मां शंकरश्चैव प्रीतः स्तुत्वा समाययौ ॥ १२ ॥
'यहाँ देवता और तपोधन मुनि भी पधारे थे । भगवान् शङ्कर मुझसे मिलकर प्रसन्न हुए और मेरी स्तुति करके लौट गये ॥ १२ ॥
अत्यद्भुतं मया दृष्टं रात्रौ यादवसत्तमाः ।
पिशाचौ द्वौ महाघोरौ वदन्तौ मामिकां कथाम् ॥ १३ ॥
मृगयां चक्रतुस्तौ तु चिन्तयन्तौ तु मां सदा ।
'यादवशिरोमणियो ! इस यात्रामें रातके समय मैंने एक बड़ी अद्भुत बात देखी थी । दो महाभयंकर पिशाच मेरी ही कथा कहते और सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए शिकार खेल रहे थे ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा मां तौ तु राजेन्द्राः प्रीतिमन्तौ तपस्विनौ ॥ १४ ॥
भक्तिनम्रौ महात्मानौ प्रणामं चक्रतुस्तदा ।
'राजेन्द्रगण ! वे दोनों तपस्वी मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए । वे महात्मा थे, उन्होंने भक्तिभावसे नम्र होकर मुझे प्रणाम किया ॥ १४ ॥
ततोऽहं सर्वथा प्रीतस्तौ नीतौ स्वर्गमुत्तमम् ॥ १५ ॥
तोषयित्वा महादेवं मया चाद्य समागतम् ।
'तब मैंने सर्वथा प्रसन्न होकर उन दोनोंको उत्तम स्वर्ग-लोकमें भेज दिया । इसके बाद तपस्याद्वारा महादेवजीको संतुष्ट करके आज मैं यहाँ आया हूँ' ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततस्ते वृष्णयः सर्वे नृदेवदेवं शशंसिरे ॥ १६ ॥
सर्वथा कृतकृत्यास्ते ह्यभवन् केशवाश्रयाः ।
यादवाः सर्व एवैते स्वं स्वं जग्मुर्यथालयम् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब उन सभी वृष्णिवंशियोंने देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की । श्रीकेशवका आश्रय लेकर वे वृष्णिवंशी सर्वथा कृतकृत्य हो गये । तत्पश्चात् वे सभी यादव अपने-अपने घरको चले गये ॥ १६-१७ ॥
अभ्यन्तरे जगन्नाथः प्रविश्य हरिरीश्वरः ।
रुक्मिणीसत्यभामाभ्यामाचचक्षे यथाभवत् ॥ १८ ॥
फिर जगन्नाथ सर्वेश्वर श्रीहरिने भी अन्तःपुरमें प्रवेश करके रुक्मिणी और सत्यभामासे जो जैसे घटित हुई थीं, वे सारी बातें बतायीं ॥ १८ ॥
ते प्रीते प्रीतियुक्तेन केशवेन समन्विते ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं केशवस्य विचेष्टितम् ॥ १९ ॥
वे दोनों प्रीतियुक्त केशवके साथ वह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं । इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ कह सुनायीं ॥ १९ ॥
शशास पृथिवीं कृत्स्नां दुष्टान् हत्वा महाबलान् ।
नरकं घोरकर्माणं पौण्ड्रकं नृपसत्तमम् ॥ २० ॥
हयग्रीवं निशुम्भं च तथा सुन्दोपसुन्दकौ ।
ररक्ष विप्रान् देवेशो मुनीन् मुनिवरार्चितः ॥ २१ ॥