भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1065

भविष्यपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः १०३९


इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ ४४ ॥
'मानद ! रथपर आरूढ हो युद्धके लिये तैयार हो जाओ।

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कृष्णपौण्ड्रकयुद्धे शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्ण और पौण्ड्रकका युद्धविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥


एकाधिकशततमोऽध्यायः

पौण्ड्रक और श्रीकृष्णका युद्ध तथा पौण्ड्रकका वध

वैशम्पायन उवाच

ततः शरं समादाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
पौण्ड्रं जघान सहसा निशितेन शरेण ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर प्रतापी भगवान् वासुदेवने बाण लेकर सहसा उस पैने बाणके द्वारा पौण्ड्रकपर प्रहार किया ॥ १ ॥

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु शरैर्दशभिराशुगैः ।
वासुदेवं जघानाशु वार्ष्णेयं वृष्णिनन्दनम् ॥ २ ॥

पौण्ड्रक वासुदेवने भी दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वृष्णिवंशी एवं वृष्णिकुलनन्दन वासुदेवपर शीघ्र ही आघात किया॥

दारुकं पञ्चविंशत्या हयान् दशभिरेव च ।
सप्तत्या वासुदेवं तु यादवं वासुदेवकः ॥ ३ ॥

उस मिथ्या वासुदेवने दारुकको पचीस, घोड़ोंको दस और यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको सत्तर बाण मारे ॥ ३ ॥

ततः प्रहस्य सुचिरं केशवः केशिसूदनः ।
धृष्टोऽसाविति मनसा सम्पूज्य यदुनन्दनः ॥ ४ ॥

तब केशिहन्ता यदुनन्दन केशवने देरतक हँसकर मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'पौण्ड्रक बड़ा ढीठ है' ॥

आकृष्य शार्ङ्गं बलवान् संधाय रिपुसूदनः ।
नाराचेन सुतीक्ष्णेन ध्वजं चिच्छेद केशवः ॥ ५ ॥

उसके बाद शत्रुसूदन बलवान् केशवने शार्ङ्ग धनुषको खींचकर उसपर तीखे नाराचका संधान किया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी ध्वजा काट डाली ॥ ५ ॥

सारथेश्च शिरः कायादाहृत्य यदुनन्दनः ।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ६ ॥
रथं राज्ञः समाहत्य तदोभौ पार्ष्णिसारथी ।
चक्रे च तिलशः कृत्वा हसन् किंचिदिव स्थितः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीहरिने उसके सारथिके सिरको धड़से अलग करके चार उत्तम सायकोंद्वारा चारों घोड़ोंको मारकर उस राजाके रथको भी तोड़-फोड़ डाला तथा दोनों पार्श्वक्षकोंको घायल करके उसके रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला और वे कुछ मुसकराते हुए-से खड़े हो गये ॥

पौण्ड्रको वासुदेवस्तु रथादुत्प्लुत्य सत्वरः ।
आदाय निशितं खड्गं प्राहिणोत् केशवाय सः ॥ ८ ॥

तब पौण्ड्रक वासुदेव तुरंत ही रथसे कूद पड़ा और एक तीखी तलवार लेकर उसने भगवान् केशवपर चला दी ॥

स खड्गं शतधा कृत्वा तूष्णीमासीच्च केशवः ।
ततः परं महाघोरं परिघं कालसन्निभम् ॥ ९ ॥
गृहीत्वा वासुदेवाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्राहिणोद् वृष्णिवीराय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ १० ॥

भगवान् केशव उस तलवारके सौ टुकड़े करके चुपचाप रथपर बैठे रहे। तत्पश्चात् प्रतापी पौण्ड्रक वासुदेवने एक कालके समान महाघोर परिघ लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उसे वृष्णिवीर भगवान् वासुदेवपर चला दिया ॥ ९-१०॥

तद् द्विधा जगतां नाथश्चकार यदुनन्दनः ।
ततश्चक्रं महाघोरं सहस्रारं महाप्रभम् ॥ ११ ॥
त्रिंशद्भारसमायुक्तमायसायसममित्रहा ।
आदायाथ महाराज केशवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

तब जगदीश्वर यदुनन्दनने उस परिघके दो टुकड़े कर दिये। महाराज ! तत्पश्चात् शत्रुसूदन पौण्ड्रकने महाघोर परम कान्तिमान् सहस्रों अरोंसे युक्त ठोस भार लोहेके बने हुए क्षेपणीय चक्रको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥

पश्येदं निशितं घोरं तव चक्रविनाशनम् ।
अनेन तव गोविन्द दर्पं दर्पवतां वर ॥ १३ ॥
अपनेष्यामि वार्ष्णेय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।

‘दर्पवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! देखो, यह भयंकर एवं तीखा चक्र तुम्हारे चक्रका विनाश करनेवाला है। वार्ष्णेय ! मैं इसी चक्रसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण कर दूँगा ॥ १३½ ॥

त्वामुद्दिश्य महाघोरं कृतमन्यद् दुरासदम् ॥ १४ ॥
यदि शक्तो हरे कृष्ण दारयेदं महास्पदम् ।

‘अरे ! कृष्ण ! तुम्हारे उद्देश्यसे ही मैंने यह महाभयंकर