विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1064, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अनेन मम चक्रेण पीडितोऽस्मि च तद्रणे ।
चक्रमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ॥ २९ ॥
नाशयिष्यामि तत् सर्वं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।
'गोविन्द ! तुम्हारा जो विख्यात, उत्तम प्रभासे युक्त और महान् चक्र है, उसका मेरे इस चक्रसे अभी नाश हो जायगा। इसके लिये मुझे खेद है। माधव ! परंतु रणभूमिमें अब तुम्हें 'मेरे पास चक्र है' ऐसा सोचकर उसके बलका घमंड नहीं होना चाहिये; क्योंकि आज मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारे उस सारे बलका नाश कर डालूँगा ॥ २८-२९ १/२ ॥
शार्ङ्गीति मां विजानीहि न त्वं शार्ङ्गीति शिष्यसे ॥ ३० ॥
शङ्खमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ।
शङ्खी चाहं गदी चाहं चक्री चाहं जनार्दन ॥ ३१ ॥
'जनार्दन ! तुम मुझे शार्ङ्गी भी समझो। 'केवल तुम्हीं शार्ङ्गी नामसे यहाँ शेष हो' ऐसा न समझो। माधव ! मेरे पास शङ्ख है। ऐसा समझकर तुम्हें अब उसके बलका भी घमंड नहीं करना चाहिये; क्योंकि मैं शङ्खी भी हूँ, गदाधर भी हूँ और चक्रपाणि भी हूँ ॥ ३०-३१ ॥
मामेव हि सदा ब्रूयुर्जानन्तो वीर्यशालिनः ।
आदौ त्वं बलवद् वृद्धान् हत्वा स्त्रीबालकान् बहून् ॥ ३२॥
गाश्च हत्वा महागर्वस्तव सम्प्रति वर्तते ।
तत् तेऽहं व्यपनेष्यामि यदि तिष्ठसि मत्पुरः ॥ ३३ ॥
'जगत्में जो पराक्रमशाली और ज्ञानी पुरुष हैं, वे अब सदा मुझे ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला कहेंगे। पहलेकी बात है, तुमने बलवानोंमें बड़े-चढ़े कुछ कंसके अनुचरोंका, स्त्री (पूतना) का तथा बहुत-से बालकोंका (छः गर्मोंका कंसद्वारा) वध करके कुछ गौओं (वत्सासुर, अरिष्टासुर आदि) का भी वध किया था। इसीसे तुम्हें अपनी वीरतापर बड़ा गर्व है। यदि मेरे सामने खड़े रह गये तो तुम्हारे उस गर्वको चूर्ण कर दूँगा ॥ ३२-३३ ॥
शस्त्रं गृहाण गोविन्द यदि योद्धुं व्यवस्थितः ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय तस्थौ पार्श्वे जगत्पतेः ॥ ३४ ॥
'गोविन्द ! यदि तुम युद्धके लिये खड़े हो तो शस्त्र ग्रहण करो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण हाथमें लेकर जगदीश्वर श्रीहरिके पास खड़ा हो गया ॥ ३४ ॥
एतद् वचनमाकर्ण्य वासुदेवेन भाषितम् ।
स्मितं कृत्वा हरिः कृष्णो बभाषे पौण्ड्रकं नृपम् ॥३५॥
कामं वद नृप त्वं हि पातक्ष्यसि सदा नृप ।
गोघाती बालघाती च स्त्रीहन्ता सर्वथा नृप ॥ ३६ ॥
मिथ्या वासुदेवके इस कथनको सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराये और उस पौण्ड्रक नरेशसे इस प्रकार बोले— 'नरेश्वर ! तुम इच्छानुसार जो-जो चाहो कहो। मैं सदा पातकी ही हूँ। मैंने सर्वथा गोहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या की है ॥ ३५-३६ ॥
चक्री भव गदी राजञ्छाङ्गीं च सततं भव ।
नामधेयं वृथा मह्यं वासुदेवेति च प्रभो ॥ ३७ ॥
'राजन् ! तुम सदा चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले बने रहो। प्रभो ! मेरा वासुदेव यह मिथ्या नाम भी लिये रहो ॥ ३७ ॥
शार्ङ्गी चक्री गदी शङ्खीत्येवमादि वृथा मम ।
किं तु वक्ष्यामि किंचित्ते शृणुष्व यदि मन्यसे । ३८।
'शार्ङ्गी, चक्री, गदी और शङ्खी आदि जो मेरे नाम हैं, उनका भी व्यर्थ भार लिये रहो; परंतु मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, यदि ठीक समझो, तो सुनो ॥ ३८ ॥
क्षत्रिया बलिनो ये तु स्थिते मयि जगत्पतौ ।
तथानुब्रुवते त्वां हि जीवत्येव मयि प्रभो ॥ ३९ ॥
'प्रभो ! मुझ जगदीश्वरके जीते-जी ही बलवान् क्षत्रिय तुम्हें वैसे (मेरे-जैसे) नामोंद्वारा पुकारते हैं ॥ ३९ ॥
यन्मे चक्रं महाघोरमसुरान्तकरं महत् ।
तत्तुल्यं तव चक्रं तु वृत्ततो न तु वीर्यतः ।
आयुधेष्वथ सर्वत्र शब्दसादृश्यमस्ति ते ॥ ४० ॥
'मेरा जो असुरोंका अन्त करनेवाला महाघोर एवं महान् चक्र है, तुम्हारा चक्र केवल गोलाईमें उसकी समानता करता है, शक्तिमें नहीं। तुम्हारे सम्पूर्ण आयुधोंमें भी मुझसे नाममात्रकी समता है, शक्तिरतः नहीं ॥ ४० ॥
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा ।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ॥ ४१ ॥
'राजन् ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात् प्राणियोंका सदा प्राणदान करनेवाला हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका रक्षक तथा सर्वदा दुष्टोंका शासक हूँ ॥ ४१ ॥
कत्थनं सर्वकार्ये हि जित्वा शत्रून् नृपाधम ।
अजित्वा किं भवान् ब्रूते स्थिते मयि च शस्त्रिणि ॥ ४२ ॥
'नृपाधम ! तुम्हें शत्रुओंको जीतकर ही सब प्रकारसे बड़ी-बड़ी बातें बनानी चाहिये। जब मैं शस्त्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तब तुम मुझे पराजित किये बिना ऐसी बातें क्यों कहते हो ? ॥ ४२ ॥
हत्वा मां ब्रूहि राजेन्द्र यदि शक्तोऽसि पौण्ड्रक ।
स्थितोऽहं चक्रमाश्रित्य रथी चापी गदासिमान्॥ ४३॥
'राजेन्द्र पौण्ड्रक ! यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे मारकर अपनी प्रशंसा करो। मैं रथ, धनुष, गदा और खड्गसे युक्त हो चक्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ ॥ ४३ ॥
रथमारुह्य युद्धाय सन्नद्धो भव मानद ।