विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1063, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ भविष्यपर्व ] \hfill शततमोऽध्यायः \hfill १०३७
यादवेश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। सूत और मागधजन उन जगदीशवरके सामने गये ॥ १०-११ ॥
स्तुत्या स्तुतं हरिं विष्णुमीश्वरं कमलेक्षणम् ।
गताश्च यादवाः सर्वे परिवव्रुर्जनार्दनम् ॥ १२ ॥
जिनकी स्तुति की गयी थी, उन कमलनयन सर्वव्यापी ईश्वर जनार्दन हरिके पास समस्त यादव गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ १२ ॥
कृष्णस्तु गरुडं भूयो गच्छ त्वं नाकमूत्तमम् ।
इत्युक्त्वा गरुडं विष्णुर्विसृज्य यदुनन्दनः ॥ १३ ॥
दारुकं पुनराहेदं रथमानय मे प्रभो।
इसके बाद यदुनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः गरुड़से कहा—'तुम उत्तम स्वर्गलोकको जाओ' ऐसा कहकर उन्होंने गरुड़को तो विदा कर दिया और पुनः दारुकसे कहा—'सामर्थ्यशाली सारथे ! तुम मेरा रथ ले आओ' ॥ १३॥
स तथेति प्रतिज्ञाय रथमादाय सत्वरम् ॥ १४ ॥
रथोऽयं भगवन् देव किमतः कृत्यमस्ति मे।
इत्युक्त्वा रथमादाय प्रणम्याग्रे स्थितो हरेः ॥ १५ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर सारथि तुरंत रथ ले आया और बोला—'भगवन् ! देव ! यह रथ उपस्थित है। इसके अतिरिक्त मेरे लिये क्या आज्ञा है ?' ऐसा कहकर दारुक रथ ले आया और भगवान्को प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया ॥ १४-१५ ॥
गतेऽथ गरुडे विष्णू रथमारुह्य सत्वरम् ।
यत्र युद्धं समभवत् तत्र याति स्म केशवः ॥ १६ ॥
गरुड़के चले जानेपर केशव श्रीकृष्ण तुरंत रथपर आरूढ़ हुए और जहाँ युद्ध हो रहा था, वहाँ गये ॥ १६ ॥
तत्र गत्वा महाराज युध्यतां च महात्मनाम् ।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खं दध्मौ यद्वृष्णोत्तमः ॥ १७ ॥
महाराज ! वहाँ जाकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उन जूझते हुए महामनस्वी वीरोंके बीचमे पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्ख बजाया ॥ १७ ॥
पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु कृष्णं दृष्ट्वा रणोत्सुकम् ।
सात्यकिं पृष्ठतः कृत्वा वासुदेवमुपागमत् ॥ १८ ॥
पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णको युद्धके लिये उत्सुक देख सात्यकिको पीछे करके उन वसुदेवनन्दनके समीप चला ॥
क्रुद्धोऽथ सात्यकी राजन् वारयामास पौण्ड्रकम् ।
न गन्तव्यमितो राजन्नैष धर्मः सनातनः ॥ १९ ॥
राजन् ! यह देख क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने पौण्ड्रकको रोका और कहा—'राजन् ! तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये। यह सनातन धर्म नहीं है ॥ १९ ॥
जित्वा मां गच्छ राजेन्द्र परं योद्धुं महारणे ।
क्षत्रियोऽसि महावीर स्थिते मयि रणोत्सुके ॥ २० ॥
एष ते गर्वमखिलं नाशयिष्यामि संयुगे।
'राजेन्द्र ! इस महासमरमें मुझे परास्त करके तुम दूसरेसे युद्ध करनेके लिये जाओ । महावीर ! तुम क्षत्रिय हो, जबतक मैं युद्धके लिये उत्सुक हूँ, तबतक तुम्हें अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। मैं अभी युद्धस्थलमें तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ' ॥ २०॥
इत्युक्त्वा चाग्रतस्तस्थौ गच्छतो यादवेश्वरः ॥ २१ ॥
पौण्ड्रस्य शिनिनप्ता तु पश्यतः केशवस्य ह ।
अवज्ञाय शिनेः पौत्रं कृष्णमेव जगाम ह ॥ २२ ॥
ऐसा कहकर शिनिके पोते यादवेश्वर सात्यकि श्रीकृष्णके देखते-देखते जाते हुए पौण्ड्रकके आगे खड़े हो गये तो भी वह सात्यकिकी अवहेलना करके श्रीकृष्णकी ओर चल दिया ॥
निर्भर्त्स्य सहसा भूयः सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।
गदया प्राहरत् पौण्ड्रं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ २३ ॥
तब क्रोधसे भरे हुए सात्यकिने सहसा उसे डाँटकर भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते पुनः पौण्ड्रकपर गदासे प्रहार किया ॥ २३ ॥
यथाप्राणं यथायोगं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
दृष्ट्वाय भगवानेवं सात्यकिं प्रशशंस ह ॥ २४ ॥
सत्यपराक्रमी सात्यकिने पूरी सावधानी और शक्तिका उपयोग करके पौण्ड्रकपर गदा चलायी थी। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २४ ॥
निवार्य सात्यकिं कृष्णो यथेष्टं क्रियतामसौ ।
उपारमद् यथायोगं सात्यकिः कृष्णवारितः ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् 'वह जैसा चाहे वैसा ही करे' यह कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिको रोक दिया। श्रीकृष्णके रोकनेपर सात्यकि यथावसर युद्धसे विरत हो गये ॥ २५ ॥
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह ।
भो भो यादव गोपाल इदानीं क्व गतो भवान् ॥ २६ ॥
तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गये थे ? ॥
त्वां द्रष्टुमद्य सम्प्राप्तो वासुदेवोऽस्मि साम्प्रतम् ।
हत्वा त्वां सबलं कृष्ण बलैर्बहुभिरन्वितः ॥ २७ ॥
अहमेको भविष्यामि वासुदेवो महीतले ।
'मैं इस समय तुमसे ही मिलने आया हूँ। आजकल मैं ही वासुदेव नामसे विख्यात हूँ। श्रीकृष्ण ! मैं बहुत-सी सेनाओंके साथ हूँ। इस समय सेनासहित तुम्हारा वध करके मैं अकेला ही इस भूतलपर वासुदेव रहूँगा ॥ २७॥
यच्चक्रं तव गोविन्द प्रथितं सुप्रभं महत् ॥ २८ ॥