विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1061, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] नवनवतितमोऽध्यायः [ १०३५
तब क्रोधमें भरे हुए हलधर साक्षात् हल उठाकर उसके द्वारा तुरंत ही सबको खींचने और मूसलसे मारने लगे ॥ २१३ ॥
ते हन्यमाना राजेन्द्र निषादाः पर्वताश्रयाः ॥ २२ ॥
निपेतुर्धरणीपृष्ठे शतशोऽथ सहस्रशः ।
राजेन्द्र ! उनके मूसलकी मार खाकर सैकड़ों और हजारों पर्वतवासी निषाद पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २२३ ॥
क्षणेन तन्महाराज हत्वा सर्वान् महाबलान् ॥ २३ ॥
सिंहवद् व्यनदंस्तत्र तस्थौ रामो महाबलः ।
महाराज ! क्षणभरमें उन समस्त महाबली निषादोंका वध करके महापराक्रमी बलराम सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ खड़े हो गये ॥ २३३ ॥
ततो रात्रौ महाघोराः पिशाचाः पिशिताशनाः ॥ २४ ॥
आकृष्य मांसयूथानि भक्षयन्तः समासते ।
पिबन्तः शोणितं कोष्ठात् संछिद्य च शवं बहु ॥ २५ ॥
तदनन्तर रातमें बड़े भयंकर मांसभक्षी पिशाच ढेर-के-ढेर मांस खींचकर खाने लगे । वे मरे हुए वीरोंके कोष्ठसे रक्त पीते और बहुत से मुर्दोंको काट-काटकर खाते थे २४-२५
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि एकलव्यसैन्यवधे अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें एकलव्यकी सेनाका वधविषयक अठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
नवनवतितमोऽध्यायः
बलभद्र और एकलव्यका तथा पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
क्रव्यादाः सर्व एवाशु भक्षयन्तस्तदा शवम् ।
हसन्तो विविधं घोरं नादयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! समस्त मांसभक्षी जीव उस समय शीघ्रतापूर्वक मृतकोंका मांस खाते और नाना प्रकारका घोर अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे ॥ १ ॥
राक्षसाश्च पिशाचाश्च पिबन्तः शोणितं बहु ।
आशिखं भुञ्जते राजञ्छवस्य पिशिताशनाः ॥ २ ॥
राजन् ! कच्चा मांस खानेवाले राक्षस और पिशाच बहुत-सा रक्त पीते और नखसे शिखतक मृतकोंका मांस खाकर तृप्त होते थे ॥ २ ॥
नृत्यन्ति स्म तदा राजन् नगर्यां रणतोषिताः ।
काका बलाका गृध्राश्च श्येना गोमायवस्तथा ॥ ३ ॥
भक्षयन्तः प्रवर्तन्ते राक्षसाश्चैव दारुणाः ।
नरेश्वर ! उस नगरीमें उस युद्धसे संतुष्ट हुए कौए, बक, गृध्र, श्येन और गीदड़ उस समय नृत्य करते थे । भयानक राक्षस भी मृतकोंके मांस-भक्षणमें लगे थे ॥ ३३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो निषादो लब्धसंज्ञकः ॥ ४ ॥
हतान् सर्वान् समालोक्य निषादान् नगचारिणः ।
गदामादाय कुपितो राममेव जगाम ह ॥ ५ ॥
इसी बीचमें वीर निषाद एकलव्यको चेतना प्राप्त हुई, समस्त पर्वतवासी निषादोंको मारा गया देख, कुपित हो गदा लेकर वह बलरामजीकी ओर चला ॥ ४-५ ॥
जघान गदया राजन्नंसदेशे निषादपः ।
ततो रामो गदी राजन् निषादं बाहुशालिनम् ॥ ६ ॥
आजघ्ने गदया क्रूरं मदमत्तो हलायुधः ।
राजन् ! उस निषादराजने बलरामजीकी हँसलीपर गदासे आघात किया । तब गदाधारी मदमत्त हलधर बलरामने उस बाहुशाली क्रूरकर्मा निषादको गदासे गहरी चोट पहुँचायी ॥
तयोश्च तुमुलं युद्धं गदाभ्यां समवर्तत ॥ ७ ॥
आकाशे शब्द आसीत् तु तयोर्युद्धे महाभुज ।
समुद्राणां यथा घोषः सर्वेषां संनिगच्छताम् ॥ ८ ॥
फिर तो उन दोनोंमें गदाओं द्वारा तुमुल युद्ध होने लगा । महाबाहो ! उन दोनोंके युद्धमें परस्पर मिलते हुए समस्त समुद्रोंके गम्भीर घोषकी भाँति आकाशमें बड़ा भारी शब्द होने लगा ॥ ७८ ॥
कल्पक्षये महाराज शब्दः सुतुमुलॊऽभवत् ।
क्षोभितो नागराजश्च नागाः क्षोभं समाययुः ॥ ९ ॥
महाराज ! प्रलयकालमे समुद्रोंका जो तुमुल घोष होता है, वैसा ही शब्द होने लगा । उससे नागराज शेष भी क्षुब्ध हो उठे और दिग्गजोंको भी महान् क्षोभ प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥
पृथिवी चान्तरिक्षं च सर्वं शब्दमयं बभौ ।
ततः स पौण्ड्रको राजा सात्यकिं वृष्णिनन्दनम् ॥ १० ॥
गदयैव जघानाशु सत्त्वरं रणकोविदः ।
युयुधानो बली राजन् वासुदेवं जघान ह ॥ ११ ॥
पृथिवी और आकाश-ये सब-के-सब शब्दमय ही प्रतीत होने लगे । इसी बीचमें रणकुशल राजा पौण्ड्रकने तुरंत ही वृष्णिनन्दन सात्यकिपर गदासे आघात किया । राजन् ! तब