विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1060, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
कामपालं शरेणाशु जघान जनमध्यतः।
तत्पश्चात् पराक्रमी निषादने एक विशाल धनुष, जिसकी लंबाई लगभग साढे चार हाथकी थी तथा जो सुदृढ प्रत्यङ्गा-से युक्त था, लेकर तुरंत ही एक बाणद्वारा उस जन-समुदायके मध्यभागमें बलभद्रजीको घायल कर दिया ॥४॥
बलदेवो महावीर्यः सर्पः शेष इव श्वसन् ॥ ५ ॥
दशभिस्तद्धनुर्दिव्यं शरैः सर्पसमैर्बलः।
चिच्छेद मुष्टिदेशे तु माधवो माधवाग्रजः ॥ ६ ॥
तब श्रीकृष्णके बड़े भाई मधुवंशी महापराक्रमी बलदेवजीने फुफकारते हुए शेषनागके समान लंबी साँस खींचकर दस सर्पाकार बाणोंद्वारा एकलव्यके दिव्य धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ ५-६ ॥
एकलव्यो निषादेशः खड्गमादाय सत्वरः।
प्राहिणोद् बलमादाय निशितं घोरविग्रहम् ॥ ७ ॥
यह देख निषादराज एकलव्यने बड़ी उतावलीके साथ एक तेज धारवाली भयंकर तलवार लेकर उसे बलदेवजीपर दे मारा ॥ ७ ॥
तमन्तरे पटुर्वीरो वृष्णिवीरः प्रतापवान्।
तिलशः पञ्चभिर्बाणैश्चकार यदुनन्दनः ॥ ८ ॥
युद्ध करनेमें कुशल प्रतापी वृष्णिवीर शौर्यसम्पन्न यदुनन्दन बलरामने पाँच बाणोंद्वारा बीचमें ही उस तलवारको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
ततोऽपरं महत् खड्गं सर्वकालायसं शुभम्।
प्राहिणोत् सारथेः कायमालोक्यथ निषादजः ॥ ९ ॥
तदनन्तर निषादपुत्रने बलभद्रजीके सारथिके शरीरको लक्ष्य करके एक दूसरा विशाल खड्ग चलाया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ और सुन्दर था ॥ ९ ॥
तं चापि दशभिर्वीरो माधवो यदुनन्दनः।
बाह्वोरन्तरयोश्चैव निर्विभेद महारणे ॥ १० ॥
परंतु यदुनन्दन वीर माधवने उस महासमरमें उसकी दोनों भुजाओंके बीचमें ही दस बाण मारकर उस खड्गके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १० ॥
ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः ॥ ११ ॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
तब महाबली निषादराजने घण्टा-मालाओंसे सुशोभित एक शक्ति हाथमें लेकर उसे बलदेवजीपर चलाया और बड़ा भयंकर सिंहनाद किया ॥ ११॥
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत् ॥ १२ ॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ १३ ॥
तथैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
वह सर्वकल्याणी शक्ति जब बलदेवजीके पास आयी, तब प्रतापी बलभद्रजीने ऊपरको उठती हुई उस महाघोर शक्तिको हाथसे पकड़ लिया। फिर सबको विस्मयमें डालते हुए-से माधवने उसी शक्तिसे निषादराजकी छातीमें तत्काल गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२-१३॥
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः ॥ १४ ॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः ॥ १५ ॥
अपनी ही शक्तिसे ताड़ित होकर वीर निषादराजका सारा शरीर व्याकुल हो उठा और वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। बलरामद्वारा आहत हुआ निषाद एकलव्य प्राणसंशयकी स्थितिमें पहुँच गया था ॥ १४-१५॥
निषादास्तस्य राजेन्द्र शतशोऽथ सहस्रशः।
अष्टाशीतिसहस्राणि निषादास्तस्य योधिनः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र ! उस निषादके सैकड़ों और हजारों निषाद सहायक थे। उसकी सेनामें अठासी हजार निषाद योद्धा मौजूद थे ॥ १६ ॥
गदिनः खड्गिनश्चैव महेष्वासा महाबलाः।
शरैरनेकसाहस्रैः शक्तिभिश्च परश्वधैः ॥ १७ ॥
गदाभिः पट्टिशैः शूलैः परिघैः प्रासतोमरैः।
कुन्तैश्च कुठारैश्च यादवानां महौजसाम् ॥ १८ ॥
शलभा इव राजेन्द्र दीप्यमानं हुताशनम्।
ते शरैः पातयांचक्रू रामं राममिवापरम् ॥ १९ ॥
राजाधिराज ! वे जैसे पतंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे महाबली महाधनुर्धर निषाद गदा और खड्गसे युक्त हो अनेक सहस्र बाणों, शक्तियों, फरसों, गदाओं, पट्टिशों, शूलों, परिघों, प्रासों, तोमरों, कुन्तों और कुठारोंद्वारा महाबली यादवोंके बीचमें खड़े हुए दूसरे श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी बलरामपर प्रहार करने लगे। उन्होंने उनपर बहुत-से बाण मारे ॥ १७–१९ ॥
केचित् कुठारैराघ्नन्तः केचित् कुन्तैः परश्वधैः।
गदाभिः केचिदाघ्नन्ति शक्तिभिश्च तथा परे ॥ २० ॥
निजघ्नुः सहसा रामं स्फुरन्तं पावकं यथा।
प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले बलरामपर कुछ निषादोंने कुठारोंसे प्रहार किया, कुछ निषादोंने कुन्तों और फरसोंद्वारा आघात किया। कोई गदासे चोट करते थे तो कोई शक्तियोंसे। इस प्रकार उन्होंने सहसा प्रहार आरम्भ कर दिया ॥ २०॥
ततः क्रुद्धो हली साक्षाद्वलमुद्यम्य सत्वरम् ॥ २१ ॥
सर्वानार्कषयामास मुसलेन हि पीडयन्।