भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1059

भविष्यपर्व ]
अष्टनवतितमोऽध्यायः
१०३३


घुटनोंसे घुटनोंपर और हाथोंसे हाथोंपर आघात करते हुए युद्ध करते थे। जैसे वनमें दो निकटवर्ती तालवृक्षोंके टकरानेका शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनोंके युद्धमें बड़ी भारी आवाज हो रही थी॥ १५-१६॥

तावाभौ प्रथितौ वीरावुभौ पौण्ड्रकसात्यकी ॥ १७ ॥
निशि स्तिमितमूकायां शस्त्रं त्यक्त्वा महाबलौ।
युयुधाते महारङ्गे मल्लौ द्वाविव विश्रुतौ ॥ १८ ॥

उस नीरव एवं निस्तब्ध निशामें समराङ्गणमें वे दोनों प्रख्यात वीर महाबली पौण्ड्रक और सात्यकि अपना-अपना शस्त्र त्यागकर विशाल अखाड़ेमे उतरे हुए दो सुप्रसिद्ध पहलवानोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे ॥ १७-१८ ॥

उभे सेने महाराज्ञोः संशयं जग्मतुस्तदा ।
किं नु स्यात् सात्यकिर्वीरो हतस्तेन भविष्यति ॥ १९ ॥
आहोस्वित् वासुदेवस्तु हतस्तेन महात्मना ।

महाराज उग्रसेन और पौण्ड्रक दोनोंकी सेनाएँ उस समय संशयमें पड़ गयी थीं कि 'क्या वीर सात्यकि वासुदेवके द्वारा मारे जायेंगे अथवा वासुदेव ही उस महात्माके द्वारा मार डाला जायगा ॥ १९॥

अद्य वै तौ महावीरौ परस्परवधैषिणौ ॥ २० ॥
युध्यमानौ महावीरौ तदा स्वर्गं गमिष्यतः ।
अन्यथा नोपरम्येतां युद्धाद् वीरौ सुनिश्चितौ ॥ २१ ॥

'आज वे दोनों महावीर एक दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए निश्चय ही स्वर्गलोकको चले जायेंगे; अन्यथा ये दोनों दृढ़ निश्चयवाले वीर युद्धसे विरत नहीं होंगे ॥ २०-२१ ॥

अहो वीर्यमहो धैर्यमेतयोर्बलशालिनोः ।
एतौ महाबलौ लोके एतौ प्रकृतिसत्तमौ ॥ २२ ॥
नैवं युद्धं महाघोरमासीद् देवासुरेष्वपि ।
न श्रुतो न च वा दृष्टः संग्रामोऽयं कदाचन ॥ २३ ॥

'अहो ! इन बलशाली वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों इस जगत्में महाबली हैं और ये ही स्वभावतः श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवताओं और असुरोंमें भी कभी ऐसा महाभयंकर युद्ध नहीं हुआ था। ऐसा संग्राम न तो कभी सुना गया था और न कभी देखनेमें आया था' २२-२३

एते वै सैनिका ब्रूयुः सेनयोरुभयोरपि ।
रात्रौ निशीथे मेघौघे दृष्ट्वा युद्धं सुदारुणम् ॥ २४ ॥

इस प्रकार दोनों सेनाओंके सैनिक मेघोंकी घटासे घिरे हुए रात्रिके निशीथकालमें उस भयंकर युद्धको देखकर उपर्युक्त बाते कहते थे ॥ २४ ॥

अथ तौ बाहुभिर्वीरौ सनिपेततुरञ्जसा ।
दशभिर्मुष्टिभिर्जघ्ने सात्यकिः पौण्ड्रकं तदा ॥ २५ ॥

तदनन्तर वे दोनों वीर अनायास ही परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय सात्यकिने पौण्ड्रकको दस मुक्के मारे ॥ २५ ॥

पञ्चभिः सात्यकिं पौण्ड्रः समाजघ्ने महाबलः ।
तयोश्चटचटाशब्दो ब्रह्माण्डक्षोभणो महान् ।
प्रादुरासीत् तु सर्वत्र सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ २६ ॥

महाबली पौण्ड्रकने सात्यकिको पाँच मुक्के मारे। उन दोनोंके मुक्कोंका महान् चटचट शब्द समूचे ब्रह्माण्डको क्षुब्ध किये देता था। वह शब्द सबको विस्मयमें डालतों हुआ-सा सर्वत्र प्रकट होता (सुनायी पड़ता) था ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक सत्तानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥


अष्टनवतितमोऽध्यायः

बलभद्र और एकलव्यका युद्ध तथा बलभद्रद्वारा निषादोंका संहार

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्ध एकलव्यो निषादपः ।
बलभद्रमभि क्षिप्रं धनुरादाय सत्वरम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें निषादराज एकलव्य कुपित हो तुरंत धनुष लेकर बलभद्रजीके सामने गया ॥ १ ॥

नाराचैर्दशभिर्विद्ध्वा वाणैश्च दशभिः परैः।
विच्छेद धनुर्गुर्वी तत् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २ ॥

उसने दस नाराचोंसे उन्हें घायल करके दूसरे दस बाणोंसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उनके धनुषको बीचसे काट डाला ॥ २ ॥

सूतं दशभिराहत्य रथं त्रिंशद्भिरेव च।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन निषादस्य जगत्पतिः ॥ ३ ॥

तब जगदीश्वर बलरामजीने दस बाणोंसे निषादके सारथिको आहत करके तीस बाणोंसे उसके रथको जगह-जगहसे तोड़ डाला ॥ ३ ॥

ततः परं महच्चापं निषादो वीर्यसम्मतः ।
दृढमौर्व्या समायुक्तं दशतालप्रमाणतः ॥ ४ ॥