विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1058, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०३२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
सप्तनवतितमोऽध्यायः
सात्यकि और पौण्ड्रकका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो गदापाणिः सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
वासुदेवं जघानाशु गदया तीक्ष्णया नृप ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! तदनन्तर वृष्णि-कुलको आनन्दित करनेवाले सात्यकिने कुपित हो गदा हाथमें ले ली और उस दुःसह गदासे शीघ्र ही वासुदेवपर आघात किया ॥ १ ॥
सात्यकिं वासुदेवस्तु गदयाभ्यहनद् बली ।
तावुद्यतगदौ वीरौ शुशुभाते सुदारुणौ ॥ २ ॥
दृप्तौ वने यथा सिंहौ परस्परवधैषिणौ ।
इसी तरह बलवान् वीर वासुदेवने भी सात्यकिपर गदासे प्रहार किया। गदा उठाये वे दोनों अत्यन्त भयंकर वीर वनमें एक दूसरेके वधकी इच्छावाले दो बलाभिमानी सिंहोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥
ततः स सात्यकिः क्रुद्धः सव्यं मण्डलमागमत् ॥ ३ ॥
दक्षिणं वासुदेवस्तु तं जघान स्तनान्तरे ।
युयुधानोऽथ वीरस्तु बाह्वोर्मध्यमताडयत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने बायें पैंतरेका आश्रय लिया और वासुदेवने दाहिने पैंतरेका। उसने सात्यकिकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही वीर सात्यकिने भी उसकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल) में गदासे आघात किया ॥ ३-४ ॥
दृढं स ताडितो वीरो जानुभ्यामपतद् भुवि ।
तत उत्थाय वीरस्तु ललाटेऽभ्यहनद् गदाम् ॥ ५ ॥
विषण्णः किंचिदास्थाय तत उत्थाय सत्वरम् ।
गदयाभ्यहनद् वीरः सात्यकिः पौण्ड्रसत्तमम् ॥ ६ ॥
उस गदाकी गहरी चोट खाकर वीर वासुदेव घुटनोंके बल गिर पड़ा। फिर उठकर उस वीरने सात्यकिके ललाटपर गदा मारी। सात्यकि भी कुछ पीड़ित हो बैठे रह गये, फिर तुरंत उठकर वीर सात्यकिने पौण्ड्रदेशके उस श्रेष्ठ योद्धा वासुदेवपर गदासे चोट की ॥ ५-६ ॥
वासुदेवो बली वीरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ।
जघान गदया वृष्णिं निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ७ ॥
वीर वासुदेव बड़ा बलवान् था। वह साक्षात् दूसरे मृत्युके समान प्रतीत होता था। वह सात्यकिकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे उन्हें दग्ध कर डालेगा। उसने गदासे सात्यकिपर चोट की ॥ ७ ॥
स तया ताडितो धूर्णिर्गदया बाहुमुक्तया ।
आलम्ब्य भूमिं सहसा मृत्योरङ्कगतो यथा ॥ ८ ॥
उसकी भुजाओंद्वारा छोड़ी गयी उस गदासे आहत हो सात्यकिने सहसा धरतीका सहारा ले लिया, मानो वह मृत्युके अङ्कमें पहुँच गये हों ॥ ८ ॥
संज्ञां पुनः समालभ्य पाणिभ्यां दृढमेव च ।
गदां तस्य महाराज गृहीत्वा प्रयहेण ह ॥ ९ ॥
द्विधा कृत्वा महागुर्वी गदां कालायसीं शुभाम् ।
उत्सृज्य सहसा वीरः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ १० ॥
महाराज ! फिर होशमें आकर उन्होंने शत्रु की चलायी हुई गदाको उछलकर दोनों हाथोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और काले लोहेकी बनी हुई उस सुन्दर एवं बड़ी भारी गदाके सहसा दो टुकड़े करके उसे दूर फेंक दिया। इसके बाद वीर सात्यकिने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९-१० ॥
तत उत्सृज्य राजा तु वासुदेवो महाबलः ।
सव्येन सात्यकिं गृह्य दक्षिणेन करेण ह ॥ ११ ॥
मुष्टिं कृत्वा महाघोरां वासुदेवः प्रतापवान् ।
ताडयामास मध्ये तु स्तनयोः सात्यकेर्नृप ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! तब महाबली एवं प्रतापी राजा वासुदेवने उस गदाको त्यागकर सात्यकिको बायें हाथसे पकड़ लिया और दाहिने हाथसे बड़ी भयंकर मुट्ठी बाँधकर सात्यकिके दोनों स्तनोंके बीचमें प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥
शैनेयो वृष्णिवीरस्तु गदामुत्सृज्य सत्वरम् ।
तलेनाभ्यहनद् वीरो वासुदेवं रणाजिरे ॥ १३ ॥
तब वृष्णिवीर सात्यकिने भी तुरंत अपनी गदा नीचे डाल दी और समराङ्गणमें वासुदेवको एक तमाचा जड़ दिया ॥ १३ ॥
तलेन वासुदेवोऽपि सात्यकिं सत्यसंगरम् ।
तयोरेवं महाघोरं तलयुद्धं प्रवर्तत ॥ १४ ॥
फिर वासुदेवने भी सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिको थप्पड़से मारा। इस प्रकार उन दोनोंमें बड़ा भयंकर थप्पड़ोंका युद्ध आरम्भ हो गया ॥ १४ ॥
जानुभ्यां मुष्टिभिश्चैव बाहुभ्यां शिरसा तथा ।
उरसोरः समाहत्य जानुभ्यां जानुनी तथा ॥ १५ ॥
कराभ्यां करमाहत्य तौ युद्धं संप्रचक्रतुः ।
तालयोस्तत्र राजेन्द्र वृक्षयोः संनिकर्षयोः ॥ १६ ॥
वने यथा निरुत्पन्नस्तथैवाभून्महास्वनः ।
राजेन्द्र ! घुटनोंसे, मुक्कोंसे, भुजाओंसे और मस्तकसे भी उस समय उनमें युद्ध होने लगा। वे छातीसे छातीपर,