विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1057, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | षण्णवतितमोऽध्यायः | १०३१ |
|---|
काँप उठा और उसकी छातीसे अत्यन्त गरम-गरम भयंकर रक्तकी धारा बहने लगी। वह फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचता हुआ तुरंत रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उसे कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। वह केवल रथपर बैठा रहा॥
सात्यकिस्तु रथं विद्ध्वा दशभिः सायकैस्तथा ।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन वासुदेवस्य वृष्णिपः ॥ २५ ॥
इधर वृष्णिवंशके पालक वीर सात्यकिने दस बाणोंसे रथको छिन्न-भिन्न करके एक भल्लसे वासुदेवकी ध्वजा काट डाली ॥ २५ ॥
हयांश्च चतुरो हत्वा बाणैः सारथिमेव च ।
युयुधानोऽथ राजेन्द्र पौण्ड्रकस्य च पश्यतः ॥ २६ ॥
सारथेश्च शिरः कायादहरत् स रथात् तदा ।
रथग्रन्थिश्च चिच्छेद हयाश्च व्यसवोऽभवन् ॥ २७ ॥
राजेन्द्र ! इसके बाद सात्यकिने पौण्ड्रकके देखते-देखते बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ों और सारथिको घायल करके सारथिके सिरको धड़से अलग करके रथसे नीचे गिरा दिया। रथकी ग्रन्थियोंको काट डाला, पौण्ड्रकके घोड़े भी प्राणहीन हो गये ॥ २६-२७ ॥
चक्रं च तिलशः कृत्वा बाणैर्दशभिरञ्जसा ।
जहास विपुलं राजन् वासुदेवं महाबलः ॥ २८ ॥
तदनन्तर दस बाणोंसे अनायास ही रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला। राजन् ! यह सब करके महाबली सात्यकि वासुदेवपर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ २८ ॥
ततः परं महत्प्रायं सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
शब्दं कृत्वा बली साक्षात् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २९ ॥
शरैः सप्ततिसंख्याकैरर्दयामास सत्वरम् ।
इसके बाद वृष्णिनन्दन बलवान् वीर सात्यकिने जोर-जोरसे सिंहनाद करके सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते सत्तर बाण मारकर मिथ्या वासुदेवको तुरंत पीड़ित कर दिया ॥
ते शराः शलभाकारा निपेतुः सर्वशस्तदा ॥ ३० ॥
शिरस्तः पार्श्वतश्चैव पृष्ठतः पुरतस्तथा ।
केवलं धैर्यनिश्चयस्तृषार्तः शरवान् यथा ॥ ३१ ॥
यथा मनस्वी रिक्तश्च तथा तिष्ठति पौण्ड्रकः ।
वे बाण टिड्डियोंके समान सब ओरसे उसपर पड़ने लगे। सिरपर, अगल-बगलमें, पीठपर और सामनेसे उन बाणोंकी चोट खाता हुआ वह केवल धैर्यके सहारे प्याससे पीड़ित पुरुषकी भाँति बाणोंसे बिंधा हुआ खड़ा रहा । जैसे उदार पुरुष निर्धन हो जाय और किसीको कुछ दे न सके, इसी प्रकार पौण्ड्रक प्रतीकारशून्य होकर वहाँ चुपचाप खड़ा रहा ॥ ३०-३१ १/२ ॥
ततश्चुक्रोध बलवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
अर्धचन्द्रं समादाय विव्याध युधि सात्यकिम् ।
इसके बाद बलवान् एवं प्रतापी वीर वासुदेवने कुपित हो अर्धचन्द्र लेकर युद्धस्थलमें सात्यकिको घायल कर दिया !
विद्ध्वा सप्तभिरायान्तं क्रोधेन प्रस्फुरन्निव ॥ ३३ ॥
विद्धोऽथ सात्यकिस्तेन शरैः पञ्चभिराशुगैः ।
चापं चिच्छेद पौण्ड्रस्य सिंहनादं व्यनिनदत् ॥ ३४ ॥
उस समय वासुदेव क्रोधसे उद्दीप्त-सा हो रहा था । उसने अपने सामने आते हुए सात्यकिको सात बाणोंसे बींध डाला। उसके द्वारा घायल किये गये सात्यकिने पाँच शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौण्ड्रकके धनुषको काट डाला और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३३-३४ ॥
वासुदेवो गदां गृह्य भ्रामयित्वा पदात्पदम् ।
त्वरितं पातयामास सात्यकेर्वक्षसि प्रभो ॥ ३५ ॥
प्रभो ! तब वासुदेवने गदा हाथमें लेकर उसे पग-पगपर घुमाते हुए तुरंत सात्यकिकी छातीपर दे मारा ॥ ३५ ॥
सव्येन तां समाकृष्य करेण यदुनन्दनः ।
शरं प्रगृह्य विव्याध सात्यकिर्युधि पौण्ड्रकम् ॥ ३६ ॥
यदुनन्दन सात्यकिने उस गदाको बायें हाथसे खींचकर एक बाण हाथमें ले उसके द्वारा पौण्ड्रकको युद्धमें घायल कर दिया ॥ ३६ ॥
तमन्तरे गृहीत्वाशु वासुदेवः प्रतापवान् ।
शक्तिभिर्दशभिश्चैव सात्यकिं निजघान ह ॥ ३७ ॥
इसी बीचमें प्रतापी वासुदेवने सात्यकिको लक्ष्य करके शीघ्र ही दस शक्तियोंद्वारा प्रहार किया ॥ ३७ ॥
ताभिर्विद्धो रणे वीरः सात्यकिः सत्यसंगरः ।
अपास्य धनुरन्यत् तद् धनुरदाय सत्वरम् ।
आजघान तदा वीरो वृष्णीनामग्रणीर्नृप ॥ ३८ ॥
राजन् ! उन शक्तियोंसे बिंधे हुए सत्यप्रतिज्ञ वीर सात्यकिने उस धनुषको फेंककर तुरंत दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा वृष्णिवंशके उस अग्रणी वीरने उस समय शत्रुओंको घायल करना आरम्भ किया ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक छियानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥