विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1056, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दुरात्मन् ! जो सबके कर्ता और सर्वव्यापी हैं, वे एकमात्र जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही सर्वथा वासुदेव बने रहेंगे- इसमें संशय नहीं है ॥ ६॥
एष तेऽहं शिरः कायात् पातयिष्यामि राजक ।
यदसौ भगवान् विष्णुर्नागमिष्यति साम्प्रतम् ॥ ७॥
अस्त्रवीर्यं बलं चैव सर्वं दर्शय साम्प्रतम् ।
नातः परतरं राजन् वीर्यं च तव वर्तते ॥ ८ ॥
'तुच्छ नरेश ! मैं अभी तेरे मस्तकको शरीरसे काट गिराता हूँ । इस समय वे भगवान् श्रीकृष्ण जबतक लौटकर नहीं आ जाते, तबतक ही तू अपना सारा अस्त्रबल और पराक्रम दिखा ले । राजन् ! इससे बढ़कर तुझे अपने बल-पराक्रमको प्रकट करनेका अवसर नहीं मिलेगा ॥ ७-८ ॥
सर्वं दर्शय यत्नेन स्थितोऽस्मि व्यवसायवान् ।
शरी चापी गदी खड्गी सर्वथाहमुपस्थितः ॥ ९ ॥
'मैं युद्धका निश्चय लेकर खड़ा हूँ । तू यत्नपूर्वक अपनी सारी शक्ति दिखा । मैं धनुष, बाण, गदा और खड्गसे युक्त हो सर्वदा तेरा सामना करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ ९ ॥
नैतन्नगरमायासीः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ।
सर्वथा कृतकृत्योऽस्मि दृष्ट्वा त्वां वासुदेवकम् ॥ १० ॥
'मैं सच कहता हूँ, तू आजसे पहले इस नगरमें नहीं आया था । तुझ-जैसे वासुदेवके पुतलेको देखकर मैं कृतकृत्य हो गया हूँ ॥ १० ॥
तवाहं तिलशः कृत्वा श्वभ्यो दास्यामि राजक ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय वासुदेवं महाबलः ॥ ११ ॥
आकर्णपूर्णमाकृष्य विव्याध निशितं शरम् ।
'अधम नरेश ! तेरे शरीरके तिलके बराबर टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तोंको बाँट दूँगा । वासुदेव नामधारी पौण्ड्रकसे ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने एक तीखा बाण लेकर उसे कान-तक खींचकर छोड़ा और पौण्ड्रकको घायल कर दिया ॥
स तेन विद्धो यदुना वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
वमञ्छोणितमत्युष्णमङ्गानेत्रान्नृपोत्तम ।
नृपश्रेष्ठ ! यदुवंशी वीर सात्यकिके द्वारा बाणसे घायल किये जानेपर प्रतापी वीर वासुदेव अपने अङ्गों और नेत्रोंसे अत्यन्त गरम-गरम रक्त बहाने लगा ॥ १२३ ॥
ततश्चुक्रोध नृपतिर्वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १३ ॥
नवभिर्दशभिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः ।
विव्याध सात्यकिं राजा नदंश्च बहुधा किल ॥ १४ ॥
तब प्रतापी राजा वासुदेव भी कुपित हो उठा । उसने बारंबार सिंहनाद करते हुए झुकी हुई गाँठवाले नौ-दस बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १३-१४ ॥
ततो नाराचमादाय निशितं यमसंनिभम् ।
धनुराकृष्य भगवान् वासुदेवो नृपोत्तम ॥ १५ ॥
विव्याध सात्यकिं भूयो निशि प्रह्लादयन् स्वकान् ।
नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् तथाकथित भगवान् वासुदेव पौण्ड्रकने धनुष खींचकर उसपर यमराजके समान भयंकर तीखे नाराचका संधान किया और उस रातमें अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १५३ ॥
नाराचेन समाविद्धः सात्यकिः सत्यसङ्गरः ॥ १६ ॥
ललाटे सुदृढं वीरो वृष्णीनामग्रणीस्तदा ।
निपसाद रथोपस्थे निश्चेष्ट इव सत्तमः ॥ १७ ॥
ललाटमें उस नाराचकी गहरी चोट खाकर वृष्णिवंशके अग्रगण्य वीर सत्यप्रतिज्ञ सात्यकि, जो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे, अपने रथके पिछले भागमें निश्चेष्टकी भाँति बैठ गये ॥
ततः स पौण्ड्रको राजा विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।
सारथिं पञ्चविंशत्या हयांश्च चतुरो नृप ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारथिको और पचीस बाणोंसे सात्यकिके चारों घोड़ोंको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १८ ॥
ते हया रुधिराक्ताङ्गाः सारथिश्च समन्ततः ।
विह्वलाः समपद्यन्त वासुदेवस्य पश्यतः ॥ १९ ॥
वे घोड़े और सारथि सब ओरसे घायल हो खूनसे लथ-पथ हो गये और वासुदेवके सामने ही अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ १९ ॥
वासुदेवो रथे चापि सिंहनादं समाददे ।
तेन नादेन तत्राभूद् विबुद्धः सात्यकिर्नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! वासुदेव अपने रथपर बैठा हुआ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा । उसकी उस गर्जनासे सात्यकि मूर्च्छासे जग उठे ॥ २० ॥
विद्धान् हयांस्तथा दृष्ट्वा सारथिं च तथागतम् ।
शैनेयोऽथ महावीर्यो रुषितो नृपसत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अपने घोड़ों और सारथिको इस प्रकार घायल हुआ देख महापराक्रमी सात्यकि रोषसे भर गये ॥ २१ ॥
अलं द्रक्ष्यामि ते वीर्यमित्युक्त्वा बाणमाददे ।
विव्याध तेन बाणेन वक्षस्येनं महाबलः ॥ २२ ॥
वे बोले—'अब देखूँगा कि तुझमें कितना बल है ।' ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने बाण हाथमें लिया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
ततश्चचाल तेनाऽसौ वासुदेवः शरेण ह ।
सुस्राव रुधिरं घोरमत्युष्णं वक्षसो नृप ॥ २३ ॥
रथोपस्थे पपाताशु निःश्वसन्नुरगो यथा ।
कृत्यं चापि न जानाति केवलं निपसाद ह ॥ २४ ॥
राजन् ! उस बाणसे घायल होकर वासुदेव युद्धस्थलमें