विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1055, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | षण्णवतितमोऽध्यायः | १०२९ |
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आकर्ण्य वचनं वीरः सात्यकेस्तस्य धीमतः।
क्व नु कृष्णः क्व गोपालः कुतः सोऽथ प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
स्त्रीहन्ता पशुहन्ता च क्व च स्वामीति सेवितः।
स इदानीं क्व वर्तत गृहीत्वा मम नाम तत् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् वीर सात्यकिका यह वचन सुनकर वीर पौण्ड्रक बोल उठा—'कहाँ है कृष्ण ! कहाँ है वह ग्वाला ? स्त्री और पशुकी हत्या करनेवाला कृष्ण इस समय कहाँ है ? जो यहाँ स्वामी बनकर सेवा लेता है, वह मेरा शत्रु कहाँ है ? मेरा नाम ग्रहण करके वह अब कहाँ छिपा हुआ है ? ॥ ३४-३५ ॥
हन्ता सख्युर्महावीर्यो नरकस्य महात्मनः।
ममैव तात युद्धेऽस्मिन् हते तस्मिन् दुरात्मनि ॥ ३६ ॥
'उसने मेरे ही मित्र महात्मा नरकासुरका वध किया है, इसीलिये वह महापराक्रमी बना फिरता है। तात ! इस युद्धमें उस दुरात्माके मारे जानेपर मेरा क्रोध शान्त होगा ॥
गच्छ त्वं कामतो वीर योद्धुं न क्षमते भवान्।
अथवा तिष्ठ किंचित्तु ततो द्रक्ष्यसि मे बलम् ॥ ३७ ॥
'वीर ! तुम इच्छानुसार लौट जाओ। तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी क्षमता नहीं है। अथवा थोड़ी देर ठहर जाओ, फिर स्वयं ही मेरा बल देख लोगे ॥ ३७ ॥
शिरस्ते पातयिष्यामि शरैर्घोरैर्दुरासदैः।
हतस्य तव वीरेह भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ३८ ॥
'वीर ! मैं भयंकर दुर्जय बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर काट गिराऊँगा ! इस रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे जानेपर यहाँकी भूमि तुम्हारा रक्तपान करेगी ॥ ३८ ॥
श्रोष्यते स तथा गोपो हतः सात्यकिरित्यपि।
यो गर्वस्तस्य गोपस्य सर्वदा वर्तते महान् ॥ ३९ ॥
विनश्यति स तु क्षिप्रं हते त्वयि यदूत्तम ।
'वह ग्वाला भी सुन लेगा कि सात्यकि मारा गया। यदुश्रेष्ठ ! उस गोपको जो सदा महान् गर्व बना रहता है, वह तुम्हारे मारे जानेपर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा ॥ ३९॥
त्वयि रक्षां समादिश्य गोपः कैलासपर्वतम् ॥ ४० ॥
गत इत्येवमस्माभिः श्रुतं पूर्वे महामते।
'महामते ! हमलोगोंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वह गोप तुम्हारे ऊपर नगरकी रक्षाका भार रखकर कैलास-पर्वतपर गया है ॥ ४०॥
शरं गृहाण निशितं यदि शक्तोऽसि सात्यके।
इत्युक्त्वा बाणमादाय ययौ योद्धुं व्यवस्थितः॥ ४१ ॥
'सात्यके ! यदि तुममें शक्ति हो तो कोई तीखा बाण हाथमें लो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण लेकर आगे बढ़ा और युद्धके लिये डट गया ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे सात्यकिपौण्ड्रकभाषणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक-वधके प्रसंगमें रात्रियुद्धके समय सात्यकि और पौण्ड्रकका संवादविषयक पंचानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥
षण्णवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज सात्यकिर्वृष्णिपुङ्गवः।
उवाच वचनं राजन् वासुदेवं स्मरन्निव ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! तदनन्तर वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिने कुपित होकर भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए-से इस प्रकार कहा—॥
अवोचदीदृशं वाक्यं वासुदेवं नृपाधमः।
को नाम जगतां नाथमित्थं ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ २ ॥
'पौण्ड्रक ! तू राजाओंमे अधम है। इसीलिये भगवान् वासुदेवके प्रति तूने ऐसी बात कह डाली है। अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जगन्नाथ श्रीकृष्णके प्रति ऐसी बात कह सकेगा ? ॥ २ ॥
मृत्युस्त्वां सर्वथा याति वदन्तं तादृशं वचः।
जिह्वा ते शतधा दीर्याद् वदतस्तादृशं वचः ॥ ३ ॥
'वैसी कठोर बात कहते हुए तेरे पीछे-पीछे सर्वथा मृत्यु चल रही है। इस तरहकी अनुचित बात कहते समय तेरी जिह्वाके सौ-सौ टुकड़े हो जाने चाहिये ॥ ३ ॥
एष ते पातयिष्यामि शिरः कायाच्च पौण्ड्रक।
यन्नाम वासुदेवेति तव सम्प्रति वर्तते ॥ ४ ॥
यावत् पतति कायात् ते शिरस्तावत् प्रवर्तते।
स एव श्वो न भगवान् वासुदेवो भविष्यसि ॥ ५ ॥
'पौण्ड्रक ! मैं अभी तेरा सिर धड़से काट गिराऊँगा। इस समय जिनका वासुदेव नाम तेरे साथ जुड़ा हुआ है, वह तभीतक है, जबतक कि धड़से तेरा सिर नीचे नहीं गिर जाता। अब कलसे तू भगवान् वासुदेव नहीं रह जायगा (कालका ग्रास बन जायगा) ॥ ४-५ ॥
एक एव जगन्नाथः कर्ता सर्वस्य सर्वगः।
दुरात्मन् सर्वथा देवो भविष्यति न संशयः॥ ६ ॥