भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1054

१०२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सात्यकि गये। उसी प्रकार महापराक्रमी बलदेव भी युद्ध करनेकी इच्छासे गदा और धनुष-बाण ले तेजस्वी रथपर आरूढ हो वहाँ तीव्र गतिसे गये। उनके साथके सभी सैनिक भयंकर सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ १५-१६॥

उद्धवोऽपि बली साक्षाद्गजमारुह्य सत्वरम्।
मत्तं महारवं घोरं संग्रामे नीतिमत्तरः॥ १७॥
ययौ नीतिं विचिन्वानः परां प्रीतिं महाबलः।
अन्ये च वृष्णयः सर्वे ययुः संग्रामलालसाः॥ १८॥

नीतिमानोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी बलवान् उद्धव भी उत्तम नीति और प्रीतिका अनुसंधान करते हुए महान् गर्जन करनेवाले भयंकर मतवाले हाथीपर आरूढ़ हो तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिये। अन्य सब वृष्णिवंशी योद्धा भी संग्रामकी लालसा लेकर वहाँ गये॥ १७-१८॥

रथान् गजान् समारुह्य हार्दिक्यप्रमुखस्तथा।
दीपिकाभिश्च सर्वत्र पुरोवृत्ताभिरीश्वराः॥ १९॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः स्मरन्तः केशवं वचः।

कृतवर्मा आदि प्रधान-प्रधान सामर्थ्यशाली योद्धा भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंका स्मरण करके रथों और हाथियोंपर आरूढ़ हो सर्वत्र अपने आगे मशालोंको जलवाकर सिंहनाद करते हुए चले॥ १९ १/२॥

पूर्वद्वारं समागम्य वृष्णयो युद्धलालसाः॥ २०॥
ते समेत्य यथायोगं स्थितास्तत्र महाबलाः।

पूर्वद्वारपर आकर युद्धकी इच्छावाले महाबली वृष्णिवंशी योद्धा यथायोग्य एक दूसरेसे मिलकर युद्धकी लालसासे वहाँ डट गये॥ २० १/२॥

स्थिते सैन्ये महाघोरे दीपिकादीपिते पथि॥ २१॥
शिनिर्वीरः शरी चापी गदी तूणीरवान् विभो।
वायव्यास्त्रं समादाय योजयित्वा महाशरम्॥ २२॥
आकर्णं तूर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमुत्तमम्।
मुमोच परसैन्येषु शिनिर्वीरः प्रतापवान्॥ २३॥

राजन्! मशालोंसे प्रकाशित हुए पथपर जब वह महाभयंकर सेना खड़ी हो गयी, तब धनुष, बाण, तरकस और गदासे युक्त हो वीरवर प्रतापी सात्यकिने वायव्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने महान् बाणको संयुक्त करके उस उत्तम एवं श्रेष्ठ धनुषको पूरे कानतक खींचकर वह अस्त्र शत्रुओंकी सेनापर छोड़ दिया॥ २१—२३॥

वायव्यास्त्रेण ते सर्वे तत्रस्था नरसत्तमाः।
विजिता ह्यस्त्रवीर्येण यत्र तिष्ठति पौण्ड्रकः॥ २४॥

वहाँ खड़े हुए शत्रुपक्षके सभी श्रेष्ठ योद्धा वायव्यास्त्रसे पीड़ित हो उस अस्त्रकी शक्तिसे पराजित हो वहीं जा पहुँचे, जहाँ पौण्ड्रक खड़ा था॥ २४॥

तत्र गत्वा स्थिताः सर्वे निर्धूता वातरंहसा।
यत्र पूर्वे स्थिताः सर्वे विद्रुता राजसत्तमाः॥ २५॥

वायुके वेगसे कम्पित हो वे सभी श्रेष्ठ नरेश भागकर उसी स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ पहले खड़े थे॥ २५॥

तत्र स्थित्वा च शैनेयः शरमादाय सत्वरम्।
निशितं सर्पभोगाभं चभाषे सात्यकिस्तदा॥ २६॥

पूर्वद्वारपर खड़े हुए शिनिवंशी सात्यकि तुरंत ही एक सर्पाकार तीखा बाण ले बोले—॥२६॥

क्क इदानीं महाबुद्धिः पौण्ड्रको राजसत्तमः।
स्थितोऽस्मि व्यवसायेन शरी चापी महाबलः॥ २७॥
यदि द्रष्टा दुरात्मानं ततो हन्ता नृपाधमम्।
भृत्योऽस्मि केशवस्याहं जिघांसुः पौण्ड्रकं स्थितः॥२८॥

'राजाओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् पौण्ड्रक इस समय कहाँ है? मैं महाबली सात्यकि धनुष-बाण लेकर उसके साथ युद्धके निश्चयसे यहाँ खड़ा हूँ। यदि उस दुरात्मा नीच नरेशको मैं देख लूँगा तो बिना मारे नहीं रहूँगा। मैं भगवान् श्रीकृष्णका सेवक हूँ और पौण्ड्रकका वध करनेके लिये यहाँ खड़ा हूँ॥ २७-२८॥

छित्त्वा शिरस्तु तस्यास्य सर्वक्षत्रस्य पश्यतः।
बलिं दास्यामि गृध्रेभ्यः श्वभ्यश्चैव दुरात्मनः॥ २९॥

'मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उस दुरात्माका सिर काटकर गीधों और कुत्तोंको उसकी बलि दे दूँगा॥ २९॥

को नाम ईदृशं कर्म चौरवच्च समाचरेत्।
सुप्तेषु निशि सर्वत्र यादवेषु महात्मसु॥ ३०॥
चौरोऽयं सर्वथा राजा न हि राजा बलान्वितः।
यदि शक्तो न कुर्याच्च चौर्यमेवं नृपाधमः॥ ३१॥

'रातमें जब सर्वत्र महात्मा यादव सो रहे हों, कौन श्रेष्ठ पुरुष इस तरह चोरकी भाँति जघन्य कर्म कर सकता है? यह बलवान् राजा नहीं, सर्वथा चोर है। यदि इस नीच नरेशमें शक्ति होती तो यह इस तरह चोरी न करता॥३०-३१॥

अहोऽस्य बलिनो राज्ञश्चौरकार्यं प्रकुर्वतः।
सर्वथाऽऽगमनं तस्य न हि पश्यामि साम्प्रतम्॥ ३२॥

'अहो! चोरका काम करनेवाले इस बलवान् राजाका मेरे सामने किसी तरह आगमन नहीं हो रहा है। मैं उस चोरको इस समय देख नहीं पा रहा हूँ'॥ ३२॥

इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरः प्रजहास महाबलः।
विस्फार्य सुदृढं चापं संदधे कार्मुके शरम्॥ ३३॥

ऐसा कहकर महाबली वीर सात्यकि जोर-जोरसे हँसने लगे। उन्होंने अपने सुदृढ़ धनुषको कानतक खींचकर उसपर बाणका संधान किया॥ ३३॥