भारतकोश
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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] नवनवतितमोऽध्यायः [ १०३५


तब क्रोधमें भरे हुए हलधर साक्षात् हल उठाकर उसके द्वारा तुरंत ही सबको खींचने और मूसलसे मारने लगे ॥ २१३ ॥

ते हन्यमाना राजेन्द्र निषादाः पर्वताश्रयाः ॥ २२ ॥
निपेतुर्धरणीपृष्ठे शतशोऽथ सहस्रशः ।

राजेन्द्र ! उनके मूसलकी मार खाकर सैकड़ों और हजारों पर्वतवासी निषाद पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २२३ ॥

क्षणेन तन्महाराज हत्वा सर्वान् महाबलान् ॥ २३ ॥
सिंहवद् व्यनदंस्तत्र तस्थौ रामो महाबलः ।

महाराज ! क्षणभरमें उन समस्त महाबली निषादोंका वध करके महापराक्रमी बलराम सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ खड़े हो गये ॥ २३३ ॥

ततो रात्रौ महाघोराः पिशाचाः पिशिताशनाः ॥ २४ ॥
आकृष्य मांसयूथानि भक्षयन्तः समासते ।
पिबन्तः शोणितं कोष्ठात् संछिद्य च शवं बहु ॥ २५ ॥

तदनन्तर रातमें बड़े भयंकर मांसभक्षी पिशाच ढेर-के-ढेर मांस खींचकर खाने लगे । वे मरे हुए वीरोंके कोष्ठसे रक्त पीते और बहुत से मुर्दोंको काट-काटकर खाते थे २४-२५

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि एकलव्यसैन्यवधे अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें एकलव्यकी सेनाका वधविषयक अठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥


नवनवतितमोऽध्यायः

बलभद्र और एकलव्यका तथा पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध

वैशम्पायन उवाच

क्रव्यादाः सर्व एवाशु भक्षयन्तस्तदा शवम् ।
हसन्तो विविधं घोरं नादयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! समस्त मांसभक्षी जीव उस समय शीघ्रतापूर्वक मृतकोंका मांस खाते और नाना प्रकारका घोर अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे ॥ १ ॥

राक्षसाश्च पिशाचाश्च पिबन्तः शोणितं बहु ।
आशिखं भुञ्जते राजञ्छवस्य पिशिताशनाः ॥ २ ॥

राजन् ! कच्चा मांस खानेवाले राक्षस और पिशाच बहुत-सा रक्त पीते और नखसे शिखतक मृतकोंका मांस खाकर तृप्त होते थे ॥ २ ॥

नृत्यन्ति स्म तदा राजन् नगर्यां रणतोषिताः ।
काका बलाका गृध्राश्च श्येना गोमायवस्तथा ॥ ३ ॥
भक्षयन्तः प्रवर्तन्ते राक्षसाश्चैव दारुणाः ।

नरेश्वर ! उस नगरीमें उस युद्धसे संतुष्ट हुए कौए, बक, गृध्र, श्येन और गीदड़ उस समय नृत्य करते थे । भयानक राक्षस भी मृतकोंके मांस-भक्षणमें लगे थे ॥ ३३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरो निषादो लब्धसंज्ञकः ॥ ४ ॥
हतान् सर्वान् समालोक्य निषादान् नगचारिणः ।
गदामादाय कुपितो राममेव जगाम ह ॥ ५ ॥

इसी बीचमें वीर निषाद एकलव्यको चेतना प्राप्त हुई, समस्त पर्वतवासी निषादोंको मारा गया देख, कुपित हो गदा लेकर वह बलरामजीकी ओर चला ॥ ४-५ ॥

जघान गदया राजन्नंसदेशे निषादपः ।
ततो रामो गदी राजन् निषादं बाहुशालिनम् ॥ ६ ॥
आजघ्ने गदया क्रूरं मदमत्तो हलायुधः ।

राजन् ! उस निषादराजने बलरामजीकी हँसलीपर गदासे आघात किया । तब गदाधारी मदमत्त हलधर बलरामने उस बाहुशाली क्रूरकर्मा निषादको गदासे गहरी चोट पहुँचायी ॥

तयोश्च तुमुलं युद्धं गदाभ्यां समवर्तत ॥ ७ ॥
आकाशे शब्द आसीत् तु तयोर्युद्धे महाभुज ।
समुद्राणां यथा घोषः सर्वेषां संनिगच्छताम् ॥ ८ ॥

फिर तो उन दोनोंमें गदाओं द्वारा तुमुल युद्ध होने लगा । महाबाहो ! उन दोनोंके युद्धमें परस्पर मिलते हुए समस्त समुद्रोंके गम्भीर घोषकी भाँति आकाशमें बड़ा भारी शब्द होने लगा ॥ ७८ ॥

कल्पक्षये महाराज शब्दः सुतुमुलॊऽभवत् ।
क्षोभितो नागराजश्च नागाः क्षोभं समाययुः ॥ ९ ॥

महाराज ! प्रलयकालमे समुद्रोंका जो तुमुल घोष होता है, वैसा ही शब्द होने लगा । उससे नागराज शेष भी क्षुब्ध हो उठे और दिग्गजोंको भी महान् क्षोभ प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥

पृथिवी चान्तरिक्षं च सर्वं शब्दमयं बभौ ।
ततः स पौण्ड्रको राजा सात्यकिं वृष्णिनन्दनम् ॥ १० ॥
गदयैव जघानाशु सत्त्वरं रणकोविदः ।
युयुधानो बली राजन् वासुदेवं जघान ह ॥ ११ ॥

पृथिवी और आकाश-ये सब-के-सब शब्दमय ही प्रतीत होने लगे । इसी बीचमें रणकुशल राजा पौण्ड्रकने तुरंत ही वृष्णिनन्दन सात्यकिपर गदासे आघात किया । राजन् ! तब

१०३६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बलवान् सात्यकिने भी मिथ्या वासुदेवपर गदाका प्रहार किया ॥ १०-११ ॥

तयोश्च तुमुलः शब्दः प्रादुरासीन्महोरणे ।
चतुर्णां युध्यतां राजन् परस्परवधैषिणाम् ॥ १२ ॥
ब्रह्माण्डक्षोभणो राजञ्छब्द आसीत् सुदारुणः।
ततो रजः प्रादुरभूत् तस्मिन् संग्राममूर्धनि ॥ १३ ॥
तारका निष्प्रभा राजंस्तमस्येवं क्षयं गते ।
उषसि प्रतिबुद्धायां ततो निःशेषतां ययौ ॥ १४ ॥
उदितो भगवान् सूर्यश्चन्द्रश्च क्षयमाययौ ।
तेषां युद्धं प्रादुरभूत्तूर्णां बाहुशालिनाम् ।
देवासुरसमं राजन्नुदिते भास्करे महत् ॥ १५ ॥

राजन् ! उन दोनोंके महासमरमें बड़ा भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले इन चारों योद्धाओंका अत्यन्त भयानक शब्द समूचे ब्रह्माण्डमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला था । राजन् ! तदनन्तर उस संग्रामके मुहानेपर प्रातःकालकी लाली प्रकट हुई, तारे प्रकाशहीन हो गये । इसी तरह अन्धकार क्षीण होने लगा । उषःकालके जाग्रत् होनेपर अन्धकार पूर्णतः मिट गया । भगवान् सूर्यका उदय हुआ और चन्द्रमा क्षीण हो चले । राजन् ! भगवान् भास्करका उदय होनेपर उन चारों बाहुशाली वीरोंका महान् युद्ध होने लगा, जो देवताओं और असुरोंके संग्राम सा प्रतीत होता था ॥ १२—१५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकयुद्धे नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकयुद्धविषयक निन्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥


शततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका द्वारकामें आगमन और पौण्ड्रकसे उनकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रभाते विमले भगवान् देवकीसुतः ।
गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः पुरं बदरिकाश्रमात् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर देवकीनन्दन भगवान् जगन्नाथने बदरिकाश्रमसे अपनी द्वारकापुरीको जानेकी इच्छा की ॥१॥

नमस्कृत्य मुनीन् सर्वान् ययौ द्वारवतीं नृप ।
आरुह्य गरुडं विष्णुर्वेगेन महता प्रभुः ॥ २ ॥

नरेश्वर ! समस्त मुनियोंको नमस्कार करके भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो बड़े वेगसे द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

सुमहाञ्छुश्रुवे शब्दस्तेषां युद्धं प्रकुर्वताम् ।
गच्छता देवदेवेन पुरीं द्वारवतीं नृप ॥ ३ ॥

राजन् ! द्वारकापुरीकी ओर जाते हुए देवाधिदेव श्रीकृष्णने वहाँ युद्ध करते हुए उन समस्त योद्धाओंका महान् कोलाहल सुना ॥ ३ ॥

अचिन्तयज्जगन्नाथः को न्वयं शब्द उत्थितः ।
संग्रामसम्भवो घोर आर्यशैनैयसंयुतः ॥ ४ ॥

उसे सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण सोचने लगे—'यह कैसा युद्धजनक घोर शब्द प्रकट हो रहा है, जिसमें भैया बलराम और सात्यकिकी भी गर्जना मिली हुई है ॥ ४ ॥

व्यक्तमागतवान् पौण्ड्रो नगरीं द्वारकामनु ।
तेन युद्धं समभवत् पौण्ड्रकेण दुरात्मना ॥ ५ ॥
यदूंनां वृष्णिवीराणां युध्यतामितरेतरम् ।
शब्दोऽयं सुमहान् व्यक्तो नात्र कार्या विचारणा ॥ ६ ॥

'निश्चय ही पौण्ड्रकने द्वारकापुरीपर आक्रमण किया है। उसी दुरात्मा पौण्ड्रकके साथ यादवों एवं वृष्णिवीरोंका युद्ध हो रहा है। परस्पर युद्ध करनेवाले इन्हीं योद्धाओंका यह महान् शब्द प्रकट हो रहा है। इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है' ॥ ५-६ ॥

इत्येवं चिन्तयित्वा तु दध्मौ शङ्खं महारवम् ।
पाञ्चजन्यं हरिः साक्षात् प्रीणयन् वृष्णिपुङ्गवान् ॥ ७ ॥

ऐसा सोचकर साक्षात् श्रीहरिने वृष्णिशिरोमणि वीरोंको प्रसन्न करते हुए महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ ७ ॥

रोदसी पूरयामास तेन शब्देन केशवः ।
यादवा वृष्णयश्चैव श्रुत्वा शङ्खस्य ते रवम् ॥ ८ ॥
व्यक्तमायाति भगवान् पाञ्चजन्यरवो ह्ययम् ।

केशवने उस शङ्खध्वनिसे पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण कर दिया । उस शङ्खनादको सुनकर यादव और वृष्णिवंशी परस्पर कहने लगे—'निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्ण पधार रहे हैं। यह पाञ्चजन्यकी ही ध्वनि सुनायी पड़ती है' ॥ ८ १/२ ॥

इति ते मेनिरे राजन् वृष्णयो यादवास्तथा ॥ ९ ॥
निर्भयाः समपद्यन्त वृष्णयो यादवाश्च ते ।

राजन् ! यादवों और वृष्णिवंशियोंको इस बातका दृढ निश्चय हो गया । वे वृष्णि और यादव निर्भय हो गये ॥ ९ १/२ ॥

तस्मिन्नेव क्षणे दृष्टस्तार्क्ष्यश्च पततां वरः ॥ १० ॥
ततश्च देवकीसूनुर्दृष्टस्तैर्यादवेश्वरः ।
सूताश्च मागधाश्चैव पुरो यान्ति जगत्पतेः ॥ ११ ॥

उसी क्षण पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ दिखायी दिये। तदनन्तर

[ भविष्यपर्व ] \hfill शततमोऽध्यायः \hfill १०३७


यादवेश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। सूत और मागधजन उन जगदीशवरके सामने गये ॥ १०-११ ॥

स्तुत्या स्तुतं हरिं विष्णुमीश्वरं कमलेक्षणम् ।
गताश्च यादवाः सर्वे परिवव्रुर्जनार्दनम् ॥ १२ ॥

जिनकी स्तुति की गयी थी, उन कमलनयन सर्वव्यापी ईश्वर जनार्दन हरिके पास समस्त यादव गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ १२ ॥

कृष्णस्तु गरुडं भूयो गच्छ त्वं नाकमूत्तमम् ।
इत्युक्त्वा गरुडं विष्णुर्विसृज्य यदुनन्दनः ॥ १३ ॥
दारुकं पुनराहेदं रथमानय मे प्रभो।

इसके बाद यदुनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः गरुड़से कहा—'तुम उत्तम स्वर्गलोकको जाओ' ऐसा कहकर उन्होंने गरुड़को तो विदा कर दिया और पुनः दारुकसे कहा—'सामर्थ्यशाली सारथे ! तुम मेरा रथ ले आओ' ॥ १३॥

स तथेति प्रतिज्ञाय रथमादाय सत्वरम् ॥ १४ ॥
रथोऽयं भगवन् देव किमतः कृत्यमस्ति मे।
इत्युक्त्वा रथमादाय प्रणम्याग्रे स्थितो हरेः ॥ १५ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर सारथि तुरंत रथ ले आया और बोला—'भगवन् ! देव ! यह रथ उपस्थित है। इसके अतिरिक्त मेरे लिये क्या आज्ञा है ?' ऐसा कहकर दारुक रथ ले आया और भगवान्‌को प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया ॥ १४-१५ ॥

गतेऽथ गरुडे विष्णू रथमारुह्य सत्वरम् ।
यत्र युद्धं समभवत् तत्र याति स्म केशवः ॥ १६ ॥

गरुड़के चले जानेपर केशव श्रीकृष्ण तुरंत रथपर आरूढ़ हुए और जहाँ युद्ध हो रहा था, वहाँ गये ॥ १६ ॥

तत्र गत्वा महाराज युध्यतां च महात्मनाम् ।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खं दध्मौ यद्वृष्णोत्तमः ॥ १७ ॥

महाराज ! वहाँ जाकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उन जूझते हुए महामनस्वी वीरोंके बीचमे पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्ख बजाया ॥ १७ ॥

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु कृष्णं दृष्ट्वा रणोत्सुकम् ।
सात्यकिं पृष्ठतः कृत्वा वासुदेवमुपागमत् ॥ १८ ॥

पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णको युद्धके लिये उत्सुक देख सात्यकिको पीछे करके उन वसुदेवनन्दनके समीप चला ॥

क्रुद्धोऽथ सात्यकी राजन् वारयामास पौण्ड्रकम् ।
न गन्तव्यमितो राजन्नैष धर्मः सनातनः ॥ १९ ॥

राजन् ! यह देख क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने पौण्ड्रकको रोका और कहा—'राजन् ! तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये। यह सनातन धर्म नहीं है ॥ १९ ॥

जित्वा मां गच्छ राजेन्द्र परं योद्धुं महारणे ।
क्षत्रियोऽसि महावीर स्थिते मयि रणोत्सुके ॥ २० ॥
एष ते गर्वमखिलं नाशयिष्यामि संयुगे।

'राजेन्द्र ! इस महासमरमें मुझे परास्त करके तुम दूसरेसे युद्ध करनेके लिये जाओ । महावीर ! तुम क्षत्रिय हो, जबतक मैं युद्धके लिये उत्सुक हूँ, तबतक तुम्हें अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। मैं अभी युद्धस्थलमें तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ' ॥ २०॥

इत्युक्त्वा चाग्रतस्तस्थौ गच्छतो यादवेश्वरः ॥ २१ ॥
पौण्ड्रस्य शिनिनप्ता तु पश्यतः केशवस्य ह ।
अवज्ञाय शिनेः पौत्रं कृष्णमेव जगाम ह ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर शिनिके पोते यादवेश्वर सात्यकि श्रीकृष्णके देखते-देखते जाते हुए पौण्ड्रकके आगे खड़े हो गये तो भी वह सात्यकिकी अवहेलना करके श्रीकृष्णकी ओर चल दिया ॥

निर्भर्त्स्य सहसा भूयः सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।
गदया प्राहरत् पौण्ड्रं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ २३ ॥

तब क्रोधसे भरे हुए सात्यकिने सहसा उसे डाँटकर भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते पुनः पौण्ड्रकपर गदासे प्रहार किया ॥ २३ ॥

यथाप्राणं यथायोगं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
दृष्ट्वाय भगवानेवं सात्यकिं प्रशशंस ह ॥ २४ ॥

सत्यपराक्रमी सात्यकिने पूरी सावधानी और शक्तिका उपयोग करके पौण्ड्रकपर गदा चलायी थी। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २४ ॥

निवार्य सात्यकिं कृष्णो यथेष्टं क्रियतामसौ ।
उपारमद् यथायोगं सात्यकिः कृष्णवारितः ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् 'वह जैसा चाहे वैसा ही करे' यह कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिको रोक दिया। श्रीकृष्णके रोकनेपर सात्यकि यथावसर युद्धसे विरत हो गये ॥ २५ ॥

स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह ।
भो भो यादव गोपाल इदानीं क्व गतो भवान् ॥ २६ ॥

तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गये थे ? ॥

त्वां द्रष्टुमद्य सम्प्राप्तो वासुदेवोऽस्मि साम्प्रतम् ।
हत्वा त्वां सबलं कृष्ण बलैर्बहुभिरन्वितः ॥ २७ ॥
अहमेको भविष्यामि वासुदेवो महीतले ।

'मैं इस समय तुमसे ही मिलने आया हूँ। आजकल मैं ही वासुदेव नामसे विख्यात हूँ। श्रीकृष्ण ! मैं बहुत-सी सेनाओंके साथ हूँ। इस समय सेनासहित तुम्हारा वध करके मैं अकेला ही इस भूतलपर वासुदेव रहूँगा ॥ २७॥

यच्चक्रं तव गोविन्द प्रथितं सुप्रभं महत् ॥ २८ ॥

१०३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


अनेन मम चक्रेण पीडितोऽस्मि च तद्रणे ।
चक्रमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ॥ २९ ॥
नाशयिष्यामि तत् सर्वं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।

'गोविन्द ! तुम्हारा जो विख्यात, उत्तम प्रभासे युक्त और महान् चक्र है, उसका मेरे इस चक्रसे अभी नाश हो जायगा। इसके लिये मुझे खेद है। माधव ! परंतु रणभूमिमें अब तुम्हें 'मेरे पास चक्र है' ऐसा सोचकर उसके बलका घमंड नहीं होना चाहिये; क्योंकि आज मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारे उस सारे बलका नाश कर डालूँगा ॥ २८-२९ १/२ ॥

शार्ङ्गीति मां विजानीहि न त्वं शार्ङ्गीति शिष्यसे ॥ ३० ॥
शङ्खमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ।
शङ्खी चाहं गदी चाहं चक्री चाहं जनार्दन ॥ ३१ ॥

'जनार्दन ! तुम मुझे शार्ङ्गी भी समझो। 'केवल तुम्हीं शार्ङ्गी नामसे यहाँ शेष हो' ऐसा न समझो। माधव ! मेरे पास शङ्ख है। ऐसा समझकर तुम्हें अब उसके बलका भी घमंड नहीं करना चाहिये; क्योंकि मैं शङ्खी भी हूँ, गदाधर भी हूँ और चक्रपाणि भी हूँ ॥ ३०-३१ ॥

मामेव हि सदा ब्रूयुर्जानन्तो वीर्यशालिनः ।
आदौ त्वं बलवद् वृद्धान् हत्वा स्त्रीबालकान् बहून् ॥ ३२॥
गाश्च हत्वा महागर्वस्तव सम्प्रति वर्तते ।
तत् तेऽहं व्यपनेष्यामि यदि तिष्ठसि मत्पुरः ॥ ३३ ॥

'जगत्में जो पराक्रमशाली और ज्ञानी पुरुष हैं, वे अब सदा मुझे ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला कहेंगे। पहलेकी बात है, तुमने बलवानोंमें बड़े-चढ़े कुछ कंसके अनुचरोंका, स्त्री (पूतना) का तथा बहुत-से बालकोंका (छः गर्मोंका कंसद्वारा) वध करके कुछ गौओं (वत्सासुर, अरिष्टासुर आदि) का भी वध किया था। इसीसे तुम्हें अपनी वीरतापर बड़ा गर्व है। यदि मेरे सामने खड़े रह गये तो तुम्हारे उस गर्वको चूर्ण कर दूँगा ॥ ३२-३३ ॥

शस्त्रं गृहाण गोविन्द यदि योद्धुं व्यवस्थितः ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय तस्थौ पार्श्वे जगत्पतेः ॥ ३४ ॥

'गोविन्द ! यदि तुम युद्धके लिये खड़े हो तो शस्त्र ग्रहण करो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण हाथमें लेकर जगदीश्वर श्रीहरिके पास खड़ा हो गया ॥ ३४ ॥

एतद् वचनमाकर्ण्य वासुदेवेन भाषितम् ।
स्मितं कृत्वा हरिः कृष्णो बभाषे पौण्ड्रकं नृपम् ॥३५॥
कामं वद नृप त्वं हि पातक्ष्यसि सदा नृप ।
गोघाती बालघाती च स्त्रीहन्ता सर्वथा नृप ॥ ३६ ॥

मिथ्या वासुदेवके इस कथनको सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराये और उस पौण्ड्रक नरेशसे इस प्रकार बोले— 'नरेश्वर ! तुम इच्छानुसार जो-जो चाहो कहो। मैं सदा पातकी ही हूँ। मैंने सर्वथा गोहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या की है ॥ ३५-३६ ॥

चक्री भव गदी राजञ्छाङ्गीं च सततं भव ।
नामधेयं वृथा मह्यं वासुदेवेति च प्रभो ॥ ३७ ॥

'राजन् ! तुम सदा चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले बने रहो। प्रभो ! मेरा वासुदेव यह मिथ्या नाम भी लिये रहो ॥ ३७ ॥

शार्ङ्गी चक्री गदी शङ्खीत्येवमादि वृथा मम ।
किं तु वक्ष्यामि किंचित्ते शृणुष्व यदि मन्यसे । ३८।

'शार्ङ्गी, चक्री, गदी और शङ्खी आदि जो मेरे नाम हैं, उनका भी व्यर्थ भार लिये रहो; परंतु मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, यदि ठीक समझो, तो सुनो ॥ ३८ ॥

क्षत्रिया बलिनो ये तु स्थिते मयि जगत्पतौ ।
तथानुब्रुवते त्वां हि जीवत्येव मयि प्रभो ॥ ३९ ॥

'प्रभो ! मुझ जगदीश्वरके जीते-जी ही बलवान् क्षत्रिय तुम्हें वैसे (मेरे-जैसे) नामोंद्वारा पुकारते हैं ॥ ३९ ॥

यन्मे चक्रं महाघोरमसुरान्तकरं महत् ।
तत्तुल्यं तव चक्रं तु वृत्ततो न तु वीर्यतः ।
आयुधेष्वथ सर्वत्र शब्दसादृश्यमस्ति ते ॥ ४० ॥

'मेरा जो असुरोंका अन्त करनेवाला महाघोर एवं महान् चक्र है, तुम्हारा चक्र केवल गोलाईमें उसकी समानता करता है, शक्तिमें नहीं। तुम्हारे सम्पूर्ण आयुधोंमें भी मुझसे नाममात्रकी समता है, शक्तिरतः नहीं ॥ ४० ॥

गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा ।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ॥ ४१ ॥

'राजन् ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात् प्राणियोंका सदा प्राणदान करनेवाला हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका रक्षक तथा सर्वदा दुष्टोंका शासक हूँ ॥ ४१ ॥

कत्थनं सर्वकार्ये हि जित्वा शत्रून् नृपाधम ।
अजित्वा किं भवान् ब्रूते स्थिते मयि च शस्त्रिणि ॥ ४२ ॥

'नृपाधम ! तुम्हें शत्रुओंको जीतकर ही सब प्रकारसे बड़ी-बड़ी बातें बनानी चाहिये। जब मैं शस्त्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तब तुम मुझे पराजित किये बिना ऐसी बातें क्यों कहते हो ? ॥ ४२ ॥

हत्वा मां ब्रूहि राजेन्द्र यदि शक्तोऽसि पौण्ड्रक ।
स्थितोऽहं चक्रमाश्रित्य रथी चापी गदासिमान्॥ ४३॥

'राजेन्द्र पौण्ड्रक ! यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे मारकर अपनी प्रशंसा करो। मैं रथ, धनुष, गदा और खड्गसे युक्त हो चक्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ ॥ ४३ ॥

रथमारुह्य युद्धाय सन्नद्धो भव मानद ।

भविष्यपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः १०३९


इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ ४४ ॥
'मानद ! रथपर आरूढ हो युद्धके लिये तैयार हो जाओ।

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कृष्णपौण्ड्रकयुद्धे शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्ण और पौण्ड्रकका युद्धविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥


एकाधिकशततमोऽध्यायः

पौण्ड्रक और श्रीकृष्णका युद्ध तथा पौण्ड्रकका वध

वैशम्पायन उवाच

ततः शरं समादाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
पौण्ड्रं जघान सहसा निशितेन शरेण ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर प्रतापी भगवान् वासुदेवने बाण लेकर सहसा उस पैने बाणके द्वारा पौण्ड्रकपर प्रहार किया ॥ १ ॥

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु शरैर्दशभिराशुगैः ।
वासुदेवं जघानाशु वार्ष्णेयं वृष्णिनन्दनम् ॥ २ ॥

पौण्ड्रक वासुदेवने भी दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वृष्णिवंशी एवं वृष्णिकुलनन्दन वासुदेवपर शीघ्र ही आघात किया॥

दारुकं पञ्चविंशत्या हयान् दशभिरेव च ।
सप्तत्या वासुदेवं तु यादवं वासुदेवकः ॥ ३ ॥

उस मिथ्या वासुदेवने दारुकको पचीस, घोड़ोंको दस और यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको सत्तर बाण मारे ॥ ३ ॥

ततः प्रहस्य सुचिरं केशवः केशिसूदनः ।
धृष्टोऽसाविति मनसा सम्पूज्य यदुनन्दनः ॥ ४ ॥

तब केशिहन्ता यदुनन्दन केशवने देरतक हँसकर मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'पौण्ड्रक बड़ा ढीठ है' ॥

आकृष्य शार्ङ्गं बलवान् संधाय रिपुसूदनः ।
नाराचेन सुतीक्ष्णेन ध्वजं चिच्छेद केशवः ॥ ५ ॥

उसके बाद शत्रुसूदन बलवान् केशवने शार्ङ्ग धनुषको खींचकर उसपर तीखे नाराचका संधान किया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी ध्वजा काट डाली ॥ ५ ॥

सारथेश्च शिरः कायादाहृत्य यदुनन्दनः ।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ६ ॥
रथं राज्ञः समाहत्य तदोभौ पार्ष्णिसारथी ।
चक्रे च तिलशः कृत्वा हसन् किंचिदिव स्थितः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीहरिने उसके सारथिके सिरको धड़से अलग करके चार उत्तम सायकोंद्वारा चारों घोड़ोंको मारकर उस राजाके रथको भी तोड़-फोड़ डाला तथा दोनों पार्श्वक्षकोंको घायल करके उसके रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला और वे कुछ मुसकराते हुए-से खड़े हो गये ॥

पौण्ड्रको वासुदेवस्तु रथादुत्प्लुत्य सत्वरः ।
आदाय निशितं खड्गं प्राहिणोत् केशवाय सः ॥ ८ ॥

तब पौण्ड्रक वासुदेव तुरंत ही रथसे कूद पड़ा और एक तीखी तलवार लेकर उसने भगवान् केशवपर चला दी ॥

स खड्गं शतधा कृत्वा तूष्णीमासीच्च केशवः ।
ततः परं महाघोरं परिघं कालसन्निभम् ॥ ९ ॥
गृहीत्वा वासुदेवाय वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्राहिणोद् वृष्णिवीराय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ १० ॥

भगवान् केशव उस तलवारके सौ टुकड़े करके चुपचाप रथपर बैठे रहे। तत्पश्चात् प्रतापी पौण्ड्रक वासुदेवने एक कालके समान महाघोर परिघ लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उसे वृष्णिवीर भगवान् वासुदेवपर चला दिया ॥ ९-१०॥

तद् द्विधा जगतां नाथश्चकार यदुनन्दनः ।
ततश्चक्रं महाघोरं सहस्रारं महाप्रभम् ॥ ११ ॥
त्रिंशद्भारसमायुक्तमायसायसममित्रहा ।
आदायाथ महाराज केशवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

तब जगदीश्वर यदुनन्दनने उस परिघके दो टुकड़े कर दिये। महाराज ! तत्पश्चात् शत्रुसूदन पौण्ड्रकने महाघोर परम कान्तिमान् सहस्रों अरोंसे युक्त ठोस भार लोहेके बने हुए क्षेपणीय चक्रको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥

पश्येदं निशितं घोरं तव चक्रविनाशनम् ।
अनेन तव गोविन्द दर्पं दर्पवतां वर ॥ १३ ॥
अपनेष्यामि वार्ष्णेय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।

‘दर्पवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! देखो, यह भयंकर एवं तीखा चक्र तुम्हारे चक्रका विनाश करनेवाला है। वार्ष्णेय ! मैं इसी चक्रसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण कर दूँगा ॥ १३½ ॥

त्वामुद्दिश्य महाघोरं कृतमन्यद् दुरासदम् ॥ १४ ॥
यदि शक्तो हरे कृष्ण दारयेदं महास्पदम् ।

‘अरे ! कृष्ण ! तुम्हारे उद्देश्यसे ही मैंने यह महाभयंकर

१०४०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[हरिवंशे

दूसरा दुर्जय चक्र तैयार कराया है। यदि तुममें शक्ति हो तो इस विशाल चक्रको विदीर्ण करो' ॥ १४ १/२ ॥

इत्युक्त्वा तच्छतगुणं भ्रामयित्वा महाबलः ॥ १५ ॥
चिक्षेपाथ महावीर्यः पौण्ड्रको नृपसत्तमः ।

ऐसा कहकर महाबली महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकने उस चक्रको सौ बार घुमाकर श्रीकृष्णपर चला दिया ॥

अवप्लुत्य ततो देशात् तदुत्सृज्य महाबलः ॥ १६ ॥
सिंहनादं महाघोरं व्यनदद् वीर्यवांस्तदा ।

तब महाबली और पराक्रमशाली श्रीकृष्ण उस स्थानसे नीचे उतर गये और उस चक्रको विफल करके महाघोर सिंहनाद करने लगे ॥ १६ १/२ ॥

ततो विस्मयमापन्नो भगवान् देवकीसुतः ॥ १७ ॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमस्य पौण्ड्रस्य दुःसहम् ।

पहले तो भगवान् देवकीनन्दन उसका साहस देखकर विस्मित हो उठे और यह कहने लगे कि 'अहो ! पौण्ड्रकका दुःसह पराक्रम और धैर्य अद्भुत है' ॥ १७ १/२ ॥

इति मत्वा जगन्नाथ उत्थितश्च रथोत्तमात् ॥ १८ ॥
ततः शिलां समादाय प्रेषयामास केशवम् ।
तां शिलां प्रेषयामास तस्मै यदुकुलोद्वहः ॥ १९ ॥

यही सब सोचकर जगन्नाथ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथसे उतर पड़े थे । तदनन्तर पौण्ड्रकने एक शिलाखण्ड लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर चलाया, किंतु यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने वह शिला फिर उसीपर दे मारी ॥ १८-१९ ॥

पौण्ड्रेण सुचिरं कालं विक्रीड्य भगवान् हरिः ।
ततश्चक्रं समादाय निशितं रक्तभोजनम् ॥ २० ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीहरिने पौण्ड्रकके साथ चिरकालतक युद्धका खेल करके अपना तीखा चक्र हाथमें लिया, जो दैत्योंके रक्तका आहार करनेवाला था ॥ २० ॥

दैत्यमांसप्रदिग्धाङ्गं नारीगर्भविमोचनम् ।
शातकुम्भमयं घोरं दैत्यदानवनाशनम् ॥ २१ ॥
सहस्रारं शतारं तदद्भुतं दैत्यभीषणम् ।
ऐश्वर्यवर्म परमं नित्यं सुरगणार्चितम् ॥ २२ ॥

उस चक्रका अङ्ग-प्रत्यङ्ग दैत्योंके मांससे पुष्ट हुआ था । वह दैत्यनारियोंके गर्भ गिरा देनेवाला था । उसका निर्माण सुवर्णसे हुआ था । वह घोर चक्र दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाला था । उसके अरे कभी सहस्रोंकी संख्यामें प्रकट होते थे और कभी सैकड़ोंकी । ऐश्वर्य ही उसका कवच था । वह देवगणोंद्वारा पूजित उत्तम अस्त्र नित्य अद्भुत तथा दैत्योंको भयभीत करनेवाला था ॥ २१-२२ ॥

विष्णुः कृष्णस्तथा शार्ङ्ग नित्ययुक्तः सदा हरिः ।
जघान तेन गोविन्दः पौण्ड्रकं नृपसत्तमम् ॥ २३ ॥

सर्वव्यापी शार्ङ्गधनुर्धर पापहारी श्रीकृष्ण सदा उस अस्त्रसे युक्त रहते हैं । गोविन्दने उसी अस्त्रसे नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको मार डाला ॥ २३ ॥

तस्य देहं विदार्याशु चक्रं पिशितभोजनम् ।
कृष्णस्याथ करं भूयः प्राप सर्वेश्वरस्य ह ॥ २४ ॥

उसके शरीरको विदीर्ण करके वह मांसभोजी चक्र पुनः शीघ्र ही सर्वेश्वर श्रीकृष्णके हाथमें आ गया ॥ २४ ॥

ततः स पौण्ड्रको राजा गतासुः प्रापतद् भुवि ।
निहत्य भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ।
प्रतिपेदे सुधर्मां तु यादवैः पूजितो हरिः ॥ २५ ॥

तदनन्तर वह राजा पौण्ड्रक प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । जिनके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, वे सर्वसमर्थ भगवान् विष्णु हरि पौण्ड्रकका वध करके यादवोंसे पूजित हो सुधर्मा नामक सभा में चले गये ॥ २५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकवासुदेववधे एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रक वासुदेवका वधविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥


द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

एकलव्यका द्वीपान्तरगमन, भगवान् श्रीकृष्णका यादवोंको अपनी यात्राका संक्षिप्त वृत्तान्त बताना तथा अन्तःपुरमें रुक्मिणी और सत्यभामासे मिलकर उन्हें संतोष देना

वैशम्पायन उवाच

निषादेशं ततो रामः शक्त्या वीर्यवतां वरः ।
आजघान स्तनद्वन्द्वे सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने शक्तिसे निषादराज एकलव्यकी छातीमें प्रहार किया और फिर सिंहके समान गर्जना की ॥ १ ॥

ततः क्रुद्धो निषादेशो रामं मत्तं महाबलम् ।
गदया लोकविख्यातो जघान स्तनवक्षसि ॥ २ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए लोकविख्यात निषादराजने महाबली एवं बलके मदसे उन्मत्त हुए बलरामजीकी छातीमें गदासे चोट पहुँचायी ॥ २ ॥

आहतः स तु तेनाशु बलभद्रो महाबलः ।

भविष्यपर्व ]द्व्यधिकशततमोऽध्यायः१०४१

उभाभ्यां चैव रामस्तु कराभ्यां वृष्णिपुङ्गवः ॥ ३ ॥
गदां गृह्य महाघोरामायान्तीं प्राणहारिणीम् ।
दुद्रावाथ निषादेशः समुद्रं मकरालयम् ॥ ४ ॥
उसके द्वारा आहत होकर महाबली वृष्णिपुङ्गव वीर बलभद्र एवं बलरामने दोनों हाथोंसे अपनी ओर आती हुई उस प्राणहारिणी महाभयंकर गदाको पकड़कर एकलव्यपर आक्रमण किया। यह देखकर निषादराज एकलव्य मगर आदि जलजन्तुओंके निवासस्थान समुद्रकी ओर भागा ॥ ३-४ ॥
धावत्येवं तदा राज्ञि एकलव्ये निषादपे ।
धावत्येवं च रामोऽपि यत्र यातो निषादपः ॥ ५ ॥
निषादराज एकलव्यके इस प्रकार भागनेपर बलरामजी भी उसका पीछा करने लगे । वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे भी गये ॥ ५ ॥
सागरं स प्रविश्याशु गत्वा योजनपञ्चकम् ।
भीत एव तदा राजन्नेकलव्यो निषादपः ॥ ६ ॥
राजन् ! समुद्रमें घुसकर निषादराज एकलव्य पाँच योजन दूर चला गया और वहाँ बलभद्रजीसे डरता हुआ ही निवास करने लगा ॥ ६ ॥
कंचिद् द्वीपन्तरं राजन् प्रविश्य न्यवसत् तदा ।
इत्थं रामो निषादेशं जिगाय यदुनन्दनः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! किसी दूसरे द्वीपमें प्रवेश करके वह वहीं रहने लगा; इस प्रकार यदुनन्दन बलरामजीने निषादराजपर विजय पायी ॥ ७ ॥
तां सभां मणिरत्नाढ्यां प्रविवेश हलायुधः ।
सात्यकिर्युद्धसंसक्तस्तां सभां प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
तदनन्तर हलायुध बलरामजीने मणि तथा रत्नोंसे विभूषित उस सुधर्मा-सभामें प्रवेश किया । युद्धमें फँसे हुए सात्यकि भी उससे विरत हो सभामें लौट आये ॥ ८ ॥
अन्ये च यादवा राजन् यथायोगमुपस्थिताः ।
आसीनेषु च सर्वेषु वृष्णिवीरेषु सर्वतः ॥ ९ ॥
अभिवाद्य यथायोगं वृष्णीन् सर्वांश्च केशवः ।
उवाच वचनं काले भगवान् देवकीसुतः ॥ १० ॥
राजन् ! अन्य यादव भी यथावसर वहाँ उपस्थित हुए । जब सभी वृष्णिवंशी वीर वहाँ सब ओर बैठ गये, तब देवकी-नन्दन भगवान् केशवने योग्यताके अनुसार सभी वृष्णि-वंशियोंका अभिवादन करके उस समय यह बात कही—॥
दृष्टं कैलासशिखरं शंकरो नीललोहितः ।
स तु मह्यं यदुवराः प्रीतिमांश्च ददौ वरम् ॥ ११ ॥
'यदुवरो ! मैंने कैलासशिखरका दर्शन किया । वहाँ नीललोहित भगवान् शङ्करने मुझे प्रसन्न होकर वर दिया है॥
तत्र देवाः समायाता मुनयश्च तपोधनाः ।
दृष्ट्वा मां शंकरश्चैव प्रीतः स्तुत्वा समाययौ ॥ १२ ॥
'यहाँ देवता और तपोधन मुनि भी पधारे थे । भगवान् शङ्कर मुझसे मिलकर प्रसन्न हुए और मेरी स्तुति करके लौट गये ॥ १२ ॥
अत्यद्भुतं मया दृष्टं रात्रौ यादवसत्तमाः ।
पिशाचौ द्वौ महाघोरौ वदन्तौ मामिकां कथाम् ॥ १३ ॥
मृगयां चक्रतुस्तौ तु चिन्तयन्तौ तु मां सदा ।
'यादवशिरोमणियो ! इस यात्रामें रातके समय मैंने एक बड़ी अद्भुत बात देखी थी । दो महाभयंकर पिशाच मेरी ही कथा कहते और सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए शिकार खेल रहे थे ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा मां तौ तु राजेन्द्राः प्रीतिमन्तौ तपस्विनौ ॥ १४ ॥
भक्तिनम्रौ महात्मानौ प्रणामं चक्रतुस्तदा ।
'राजेन्द्रगण ! वे दोनों तपस्वी मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए । वे महात्मा थे, उन्होंने भक्तिभावसे नम्र होकर मुझे प्रणाम किया ॥ १४ ॥
ततोऽहं सर्वथा प्रीतस्तौ नीतौ स्वर्गमुत्तमम् ॥ १५ ॥
तोषयित्वा महादेवं मया चाद्य समागतम् ।
'तब मैंने सर्वथा प्रसन्न होकर उन दोनोंको उत्तम स्वर्ग-लोकमें भेज दिया । इसके बाद तपस्याद्वारा महादेवजीको संतुष्ट करके आज मैं यहाँ आया हूँ' ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततस्ते वृष्णयः सर्वे नृदेवदेवं शशंसिरे ॥ १६ ॥
सर्वथा कृतकृत्यास्ते ह्यभवन् केशवाश्रयाः ।
यादवाः सर्व एवैते स्वं स्वं जग्मुर्यथालयम् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब उन सभी वृष्णिवंशियोंने देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की । श्रीकेशवका आश्रय लेकर वे वृष्णिवंशी सर्वथा कृतकृत्य हो गये । तत्पश्चात् वे सभी यादव अपने-अपने घरको चले गये ॥ १६-१७ ॥
अभ्यन्तरे जगन्नाथः प्रविश्य हरिरीश्वरः ।
रुक्मिणीसत्यभामाभ्यामाचचक्षे यथाभवत् ॥ १८ ॥
फिर जगन्नाथ सर्वेश्वर श्रीहरिने भी अन्तःपुरमें प्रवेश करके रुक्मिणी और सत्यभामासे जो जैसे घटित हुई थीं, वे सारी बातें बतायीं ॥ १८ ॥
ते प्रीते प्रीतियुक्तेन केशवेन समन्विते ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं केशवस्य विचेष्टितम् ॥ १९ ॥
वे दोनों प्रीतियुक्त केशवके साथ वह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं । इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ कह सुनायीं ॥ १९ ॥
शशास पृथिवीं कृत्स्नां दुष्टान् हत्वा महाबलान् ।
नरकं घोरकर्माणं पौण्ड्रकं नृपसत्तमम् ॥ २० ॥
हयग्रीवं निशुम्भं च तथा सुन्दोपसुन्दकौ ।
ररक्ष विप्रान् देवेशो मुनीन् मुनिवरार्चितः ॥ २१ ॥

१०४२श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

श्रीकृष्णने महाबली दुर्धर्षका वध करके सारी पृथ्वीका शासन किया। बड़े-बड़े मुनियोंसे पूजित हुए उन देवेश्वरने घोर कर्म करनेवाले नरकासुरको, नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको, हयग्रीव और निशुम्भको तथा सुन्द और उपसुन्दको मारकर मुनियों एवं ब्राह्मणोंकी रक्षा की ॥ २०-२१ ॥

विप्रेभ्यश्च ददौ वित्तं गाश्च दत्त्वा स केशवः।
अग्निहोत्रं प्रयुञ्जानो ब्राह्मणांश्च ह्यतर्पयत् ॥ २२ ॥

भगवान् केशव ब्राह्मणोंको गौएँ देकर उनके लिये धन भी देते थे, अग्निहोत्र करते और ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करते थे ॥ २२ ॥

(मुनींश्च ब्रह्मचर्येण देवान् यज्ञैरनेकधा।
स्वधया च पितॄन् सर्वान् प्रीणन्नेव सर्वदा ॥ २३ ॥

ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेदोंके स्वाध्यायसे मुनियोंको, अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओंको तथा स्वधाकर्म (श्राद्ध-तर्पण) से समस्त पितरोंको सदा तृप्त करते रहते थे ॥ २३ ॥

तस्मिन्छासति देवेशे राज्यं निष्कण्टकं प्रभो।
सुखमेव प्रजाः सर्वा जीवन्ति ब्राह्मणादयः ॥ २४ ॥

प्रभो ! देवेश्वर श्रीकृष्णके निष्कण्टक राज्य शासन करते समय ब्राह्मण आदि सारी प्रजाएँ सुखपूर्वक ही जीवन-निर्वाह करती थीं ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकवधसमाप्तौ द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रकवधकी समाप्तिविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥


त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भकके विषयमें जनमेजयका प्रश्न

जनमेजय उवाच

भूय एव द्विजश्रेष्ठ शङ्खचक्रगदाभृतः।
चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा--द्विजश्रेष्ठ ! तपोधन ! मैं शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रको पुनः विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतः कैशवीं कथाम्।
को नु नाम हरेर्विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः ॥ २ ॥
शृण्वंस्तथा रमन् वापि तृप्तिं याति दिवानिशम्।
पुरुषार्थोऽयमेवैको यत्कथाश्रवणं हरेः ॥ ३ ॥

भगवान् केशवकी कथा सुनते हुए यहाँ मुझे कभी तृप्ति नहीं होती। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो देवाधिदेव चक्रपाणि विष्णु हरिके नाम और यशको दिन-रात सुनता और उसीमें रमण करता हुआ कभी तृप्तिका अनुभव करेगा? (उसे न सुनना चाहेगा !) भगवान् श्रीहरिकी कथाका जो श्रवण है, यही एकमात्र पुरुषार्थ माना गया है ॥ २-३ ॥

कथमासीज्जगद्धेतोर्हंसस्य डिम्भकस्य च।
समितिः सर्वभूतानां सदा विस्मयदायिनी ॥ ४ ॥

जगत्‌के लिये हंस और डिम्भककी कैसी समिति संगठित हुई थी, जो समस्त प्राणियोंको सदा ही विस्मय प्रदान करनेवाली थी ? ॥ ४ ॥

विचक्रस्य कथं युद्धं दानवस्य महात्मनः।
स तयोर्मित्रतां यात इत्येवमनुशुश्रुम ॥ ५ ॥

महामनस्वी दानव विचक्रका युद्ध किस प्रकार हुआ था? सुननेमें आया है कि वह उन दोनोंका मित्र हो गया था ॥ ५ ॥

तौ सुतौ वीर्यसम्पन्नौ शिष्यौ भृगुसुतस्य ह।
सर्वास्त्रकुशलौ वीरौ हराल्लब्धवरौ किल ॥ ६ ॥

वे दोनों राजकुमार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा मुनिवर भार्गवके शिष्य थे। कहते हैं कि उन दोनोंने भगवान् शङ्करसे वर प्राप्त किये थे। वे दोनों वीर सम्पूर्ण अस्त्रोंमें कुशल थे ॥ ६ ॥

संग्रामः सुमहानासीदित्युक्तं भवता पुरा।
तयोश्च नृपयोर्विप्र केशवस्य जगत्पतेः ॥ ७ ॥

विप्रवर ! आपने पहले कहा था कि जगदीश्वर श्रीकृष्णका उन दोनों राजाओं (हंस और डिम्भक) के साथ बड़ा भारी संग्राम हुआ था ॥ ७ ॥

कस्य पुत्रौ समुत्पन्नौ यथाभूद् विग्रहो महान्।
अष्टाशीतिसहस्राणि दानवानां तरस्विनाम् ॥ ८ ॥
बलान्यथ विचक्रस्य शितशूलधराणि च।
आसन् युद्धे महाराज दानवस्य जयैषिणः ॥ ९ ॥

वे दोनों किसके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे, जिससे उनके साथ महान् युद्ध हुआ। महाराज ! सुना है कि विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दानव विचक्रके पास युद्धके लिये अठासी हजार वेगशाली दानवोंकी सेनाएँ थीं। वे सब-के-सब दानव तीखे शूल धारण करते थे ॥ ८-९ ॥

यदूनामन्तरं प्रेप्सुर्यदूनां युद्धकाङ्क्षया।
देवासुरे महायुद्धे देवाञ्जयति दुर्धरः।
तद्वधार्थं सदा यत्नमकरोच्चैव केशवः ॥ १० ॥

भविष्यपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः [ १०४३


दानव विचक्र दुर्जय वीर था। वह युद्धकी इच्छासे यादवोंकी त्रुटि या दुर्बलता देखा करता था। देवताओं और असुरोंके महायुद्धमें वह देवताओंपर विजय पाता था और भगवान् श्रीकृष्ण उसके वधके लिये सदा प्रयत्नशील रहते थे॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने जनमेजयवाक्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकके उपाख्यानके प्रसङ्गमें जनमेजयका वाक्यविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥


चतुरधिकशततमोऽध्यायः

राजा ब्रह्मदत्तको भगवान् शङ्करकी आराधनासे हंस और डिम्भक नामक पुत्रोंकी प्राप्ति तथा राजसखा विप्रवर मित्रसहको भगवान् विष्णुकी उपासनासे जनार्दन नामक पुत्रका लाभ

वैशम्पायन उवाच
आसीच्छाल्वेषु राजेन्द्र ब्रह्मदत्तो नृपोत्तमः ।
नाम्ना राजन् स पूतात्मा सर्वभूतदयापरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजेन्द्र ! शाल्वदेशमें ब्रह्मदत्त नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा राज्य करते थे। राजन् ! उनका हृदय बड़ा ही पवित्र था। वे सम्पूर्ण भूतोंपर दयाभाव बनाये रखते थे ॥ १ ॥

पञ्चयज्ञपरो नित्यं जितात्मा विजितेन्द्रियः।
ग्रहविद् वेदविच्चैव सदा यज्ञमयः शिवः ॥ २ ॥
सदा पञ्चयज्ञका अनुष्ठान करते तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते थे। वे ग्रहवेत्ता और वेदवेत्ता थे तथा सदा यज्ञके अनुष्ठानमें लगे रहते थे। राजा ब्रह्मदत्त सबके लिये कल्याणकारी थे ॥ २ ॥

तस्य भार्ये महीपाल रूपौदार्यगुणान्विते ।
बभूवतुः सुसम्पन्ने अनपत्ये नृपोत्तम ॥ ३ ॥
महीपाल ! नृपश्रेष्ठ ! उनके रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न दो पत्नियाँ थीं, उनमें सारे गुण होनेपर भी उन दोनोंके कोई संतान नहीं हुई ॥ ३ ॥

स ताभ्यां मुमुदे राजा शच्या शक्र इवाम्बरे ।
नाम्ना मित्रसहो नाम सखा चासीद् द्विजोत्तमः॥ ४ ॥
तस्य राज्ञो महायोगी वेदवेदान्ततत्परः ।
अनपत्यः स विप्रेन्द्रो यथा राजा बभूव ह ॥ ५ ॥
जैसे स्वर्गमें इन्द्र शचीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं, उसी प्रकार राजा ब्रह्मदत्त उन दोनों पत्नियोंके साथ सदा आनन्दमग्न रहते थे। राजाके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण मित्र थे, जिनका नाम था मित्रसह । वे महान् योगी तथा वेद और वेदान्तके अनुशीलनमें तत्पर रहनेवाले थे। वे ब्राह्मणशिरोमणि भी राजाके ही समान संतानहीन थे ॥ ४-५ ॥

स राजा सहितस्ताभ्यामर्चयामास शंकरम् ।
पुत्रार्थं शूलिनं शर्वं दश वर्षाण्यनन्यधीः ॥ ६ ॥
राजाने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रहकर पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो दस वर्षोंतक शूलधारी भगवान् शंकरकी आराधना की ॥ ६ ॥

स विप्रो वैष्णवं सत्रं पुत्रार्थं समयोजयत् ।
अर्चितस्तेन राजेन्द्र शंकरो नीललोहितः ॥ ७ ॥
आत्मानं दर्शयामास स्वप्ने राजानमब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते वरं वरय सुव्रत ॥ ८ ॥
राजेन्द्र ! ब्राह्मण मित्रसहने पुत्रके लिये वैष्णवयागका अनुष्ठान किया। राजा ब्रह्मदत्तके द्वारा पूजित हुए नीललोहित भगवान् शंकरने स्वप्नमें उन्हें अपने दिव्य रूपका दर्शन कराया और कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम्हारा कल्याण हो ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो' ॥ ७-८ ॥

अथ राजा जगन्नाथमुवाचेदं स्मयन्निव ।
पुत्रौ मम भवेतां हि तथेत्युक्त्वा वृषध्वजः ॥ ९ ॥
अन्तर्धानं गतः शम्भुः प्रतिबुद्धस्ततो नृपः ।
राजाने मुसकराते हुए-से भगवान् विश्वनाथसे यह बात कही—'प्रभो ! मेरे दो पुत्र हों।' तब 'तथास्तु' ( ऐसा ही हो ) यह कहकर वृषभध्वज भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् राजाकी नींद खुल गयी ॥ ९ १/२ ॥

सोऽपि मित्रसहो विद्वान् देवं केशवमव्ययम् ॥ १० ॥
पञ्चवर्षं जगन्नाथमर्चयामास भक्तितः ।
विद्वान् मित्रसहने भी अविनाशी जगदीश्वर भगवान् केशवकी पाँच वर्षोंतक बड़े भक्तिभावसे आराधना की ॥१० १/२॥

अर्चितस्तेन विप्रेण देवदेवो जनार्दनः ॥ ११ ॥
पुत्रमेकं ददौ तस्मै स्वात्मना सदृशं हरिः ।
उन ब्राह्मणसे पूजित हो देवाधिदेव जनार्दन हरिने उन्हें अपने ही-जैसा एक पुत्र प्रदान किया ॥ ११ १/२ ॥

ते भार्ये गर्भमाधत्तां तेजसा शंकरस्य ह ॥ १२ ॥
विप्रभार्या महाराज वैष्णवं तेज आदधत् ।
महाराज ! राजाकी उन दोनों पत्नियोंने भगवान् शंकरके तेजसे गर्भ धारण किया और ब्राह्मणकी पत्नीने वैष्णव तेजको ही गर्भके रूपमें धारण किया ॥ १२ १/२ ॥

महिष्यौ ते महावीर्यौ पुत्रौ शंकरनिर्मितौ ॥ १३ ॥
असूयेतां महीपाल क्रमेणैव नृपस्य ह।
महीपाल ! राजाकी उन दो रानियोंने भगवान् शंकरकी

१०६४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

कृपासे प्राप्त हुए दो महापराक्रमी पुत्रोंको क्रमशः जन्म दिया था ॥ १३३ ॥
स तयोश्च महाराज नामकर्मादिकाः क्रियाः ॥ १४ ॥
चकार विधिवत् सर्वा विप्रेभ्योऽदान्महद्धनम् ।
महाराज जनमेजय ! ब्रह्मदत्तने उन दोनों पुत्रोंके नाम-कर्म आदि सारे संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये और ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया ॥ १४३ ॥
स च विप्रो विनीतात्मा पुत्रमेकं द्विलब्धवान् ॥ १५ ॥
साक्षादिव जगन्नाथं स्थितं पुत्रात्मना नृप ।
नरेश्वर ! विनयशील हृदयवाले ब्राह्मण मित्रसहने भी एक पुत्र प्राप्त किया, जिसके रूपमें मानो साक्षात् जगन्नाथ श्रीहरि ही उनके घरमें आ गये हों ॥ १५३ ॥
जातकर्मोदिकं सर्वं ब्राह्मणः स चकार ह ॥ १६ ॥
ब्राह्मणने भी पुत्रके जातकर्म आदि सभी संस्कार पूर्ण किये ॥ १६ ॥
तौ कुमारावयं चैव त्रयः सवयसोऽभवन् ।
वेदानधीत्य ते सर्वाञ्छुत्वा चान्वीक्षिकीं तथा ॥ १७ ॥
धनुर्वेदे तथाऽस्त्रे च निपुणास्तेऽभवंस्तदा ।
वे दोनों राजकुमार और यह ब्राह्मणपुत्र तीनों ही समवयस्क थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके आन्वीक्षिकी विद्या ( वेदान्त आदि) का नुशीलन करनेके पश्चात् धनुर्वेद तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञान निपुणता प्राप्त की ॥ १७३ ॥
हंसोज्येष्ठो नृपसुतो डिम्भकोऽनन्तरोऽभवत् ॥ १८ ॥
स च विप्रसुतो राजन् जनार्दन इति स्मृतः ।
अन्योन्यं मित्रतां याताः सर्वे चैव कुमारकाः ॥ १९ ॥
ज्येष्ठ राजकुमारका नाम हंस था और उससे छोटा डिम्भक नामसे प्रसिद्ध हुआ । राजन् ! ब्राह्मणपुत्रका नाम जनार्दन रखा गया था । वे सभी कुमार एक दूसरेके प्रति मित्रभाव रखते थे ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भोत्पत्तौ चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भककी उत्पत्तिविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥


पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भककी तपस्या, वरप्राप्ति, जनार्दनसहित उन दोनोंका विवाह तथा तीनों कुमारोंकी धर्मनिष्ठा

वैशम्पायन उवाच
हंसश्च डिम्भकश्चैव तपश्चर्तुं महामती ।
मनश्चक्रतुरात्मांशौ शंकरस्य नृपोत्तम ॥ १ ॥
वैशम्पायनजीने कहा — नृपश्रेष्ठ ! राजकुमार हंस और डिम्भक भगवान् शंकरके अपने अंशसे उत्पन्न और परम बुद्धिमान् थे। उन दोनोंने तपस्या करनेका विचार किया ॥ १ ॥

गत्वा तु हिमवत्पार्श्वं तपश्चक्रतुरञ्जसा ।
उद्दिश्य शंकरं शर्वं नीलग्रीवमुमापतिम् ॥ २ ॥
वीर्यास्त्रे चैव नौ स्यातामित्याधाय तु मानसे ।
एकाग्रौ प्रयतौ भूत्वा वाय्वम्बुप्राशिनौ नृप ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! हिमालयके पास जाकर वायु और जलका आहार करते हुए वे दोनों एकाग्र एवं संयतचित्त हो मनमे यह संकल्प लेकर कि'हमें दिव्य पराक्रम और अस्त्र प्राप्त हो जायें' कल्याणकारी कष्टहारी नीलकण्ठ भगवान् उमापतिकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे सानन्द तपस्या करने लगे ॥ २-३ ॥

नमस्ते देवदेवेति शंकरेति दिवानिशम् ।
हर शर्व शिवानन्द नीलग्रीव उमापते ॥ ४ ॥
वृषध्वज विरूपाक्ष हर्यक्ष जगतां पते ।
भक्तप्रिय गिरीशेश वासुदेव शिवाच्युत ॥ ५ ॥
सद्योजात महादेव देवदेव गुहाशय ।
भूतभावन देवेश प्रणवात्मन् सदाशिव ॥ ६ ॥
इत्यादिनामभिर्नित्यं स्तुवन्तौ शंकरं भवम् ।
हृदि कृत्वा विरूपाक्षं तपस्तेपतुरञ्जसा ॥ ७ ॥
वे दिन-रात देवाधिदेव ! शंकर ! हर ! शर्व ! शिवानन्द ! नीलग्रीव ! उमापते ! वृषभध्वज ! विरूपाक्ष ! हर्यक्ष! जगत्पते ! भक्तप्रिय ! गिरीश ! ईश ! वासुदेव ! शिव ! अच्युत ! सद्योजात ! महादेव ! देवदेव ! अन्तर्यामीरूपसे हृदयगुहामें शयन करनेवाले ! भूतभावन ! देवेश्वर ! ॐकारस्वरूप ! सदाशिव ! आपको नमस्कार है । इत्यादि रूपसे भगवान्‌के नामोंद्वारा नित्य-निरन्तर कल्याणकारी भगवान् भवकी स्तुति करते हुए उन्हीं भगवान् विरूपाक्ष (शिव ) को हृदयमें धारण करके सुखपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ ४–७॥

निर्ममौ निरहंकारौ मौनव्रतसमास्थितौ ।
वर्षाणीह तदा राजन् पञ्च चक्रतुरोजसा ॥ ८ ॥
ततः प्रीतोऽभवच्छर्वस्ताभ्यां संयमनेन च ।
स ददौ दर्शनं नैजं व्याघ्रचर्माम्बरो हरः ॥ ९ ॥
त्र्यक्षः शंकरः शर्वः शूलपाणिरुमापतिः ।
राजन् ! उनमें ममता और अहंकारका अभाव हो

भविष्यपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः १०४५


गया। वे मौनव्रतका आश्रय लेकर उन दिनों पाँच वर्षोंतक उत्साहपूर्वक तपस्यामें लगे रहे । उन दोनोंके तप और संयमसे भगवान् शंकरको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उन दोनोंको अपने स्वरूपका दर्शन दिया । उस समय उनके श्रीअङ्गोंपर व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पा रहा था। वे पापहारी, त्रिनेत्रधारी और कल्याणकारी उमावल्लभ भगवान् शिव हाथमें त्रिशूल लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९३॥

अग्रतः संस्थितं शर्वं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
तौ दृष्ट्वा प्रीतमनसौ नमश्चक्रतुरञ्जसा ॥ १०॥

चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवको अपने सामने खड़ा देख वे दोनों प्रसन्नचित्त हो उन्हें वारंवार नमस्कार करने लगे ॥

श्रीभगवानुवाच
वरं वरय भद्रं वां यथेच्छा वां तथास्तु वै।
तावूचतुस्तदा राजन् प्रीतस्त्वं भगवन् यदि ॥ ११॥
देवासुरचमूमूख्यैर्यक्षगन्धर्वदानवैः ।
आवामजय्यौ सर्वात्मन्नेष नौ प्रथमो वरः ॥ १२ ॥

तब श्रीभगवान् बोले—राजकुमारो ! तुम दोनोंका कल्याण हो ! तुम कोई वर माँगो ! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वह पूर्ण हो। राजन् ! यह सुनकर वे दोनों बोले—'भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो हम आपकी कृपासे देवताओं और असुरोंके मुख्य-मुख्य सेनापतियों, यक्षों, गन्धर्वों और दानवोंके लिये भी अजेय हो जायें । सर्वात्मन् ! यही हम दोनोंका पहला वर है ॥ ११-१२ ॥

द्वितीयो नौ विरूपाक्ष रौद्रास्त्राणां च संग्रहः ।
माहेश्वरं तथा रौद्रमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत् ॥ १३ ॥

'विरूपाक्ष ! हमारा दूसरा वर यह है कि हमारे पास सभी भयंकर अस्त्रोंका संग्रह हो । माहेश्वरास्त्र, रौद्रास्त्र तथा महान् ब्रह्मशिर नामक अस्त्र हमें उपलब्ध हों ॥ १३ ॥

अभेद्यं कवचं दिव्यमच्छेद्यं चापि कार्मुकम् ।
परशुं च तथा शर्व सदा रक्षार्थमेव च ॥ १४॥

'शर्व ! अभेद्य कवच, दिव्य एवं अच्छेद्य धनुष और परशु—ये सदा हमें रक्षाके लिये सुलभ हों ॥ १४ ॥

सहायौ द्वौ महादेव भूतौ युद्धे हि गच्छताम् ।
एवमस्त्विति देवेश आह भृङ्गिरिटी हरः ॥ १५॥
कुण्डोदरं विरूपाक्षं सर्वप्राणिहिते रतम् ।
युवामथ च भूतेशौ सहायौ सततं रणे ॥ १६ ॥
संग्रामं गच्छतां घोरमेतयोर्बलशालिनोः ।
इत्युक्त्वा भगवाञ्छर्वस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १७ ॥

'महादेव ! युद्धमें आपके दो-दो भूत हमारी सहायताके लिये जाया करें।' तब देवेश्वर हरने 'ऐसा ही होगा', यह कहकर अपने दो पार्षद भृङ्गि और रिटिके तथा कुण्डोदर एवं समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले विरूपाक्षसे कहा—'तुम दोनों दो-दो करके दो भूतैश्वर हो, तुम युद्धके अवसरपर सदा घोर-से-घोर संग्राममें इन दोनों बलशाली वीरोंकी सहायताके लिये अवश्य पहुँच जाना।' ऐसा कहकर भगवान् शर्व वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १५—१७ ॥

ततस्तौ वीर्यसम्पन्नौ हंसो डिम्भक एव च।
कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ चापिनौ वीर्यवत्तरौ ॥ १८॥

तदनन्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न हंस और डिम्भक सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, अस्त्र-शस्त्रोंके सञ्चयसे युक्त, धनुर्धर एवं अत्यन्त बलवान् हो गये ॥ १८ ॥

आमुक्तकवचौ वीरावजय्यौ देवदानवैः ।
अत्यन्तभक्तौ देवेशे शंकरे नीललोहिते ॥ १९॥

कवच बाँधकर वे दोनों वीर जब युद्धमें खड़े होते, उस समय देवता और दानवोंके लिये भी उन्हें जीतना असम्भव हो जाता था । नीललोहित भगवान् शंकरमें उन दोनोंकी बड़ी भक्ति थी ॥ १९ ॥

नित्योत्सवकरौ देवे भस्मोद्धूलनशोभिनौ ।
कृतत्रिपुण्ड्रकौ नित्यं जटायुक्तशिरोधरौ ॥ २० ॥

वे महादेवजीके लिये नित्य उत्सव रचाते, अपने अङ्गोंमें भस्म लगाकर सुशोभित होते, ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते और सदा सिरपर जटाएँ धारण करते थे ॥ २० ॥

रुद्राक्षार्पितसर्वाङ्गौ व्याघ्रचर्माम्बरावृतौ ।
नमः शिवाय शान्ताय महादेवाय धीमते ॥ २१ ॥
इत्यादिभिर्महादेवं स्तुवन्तौ नामभिः शिवम् ।
साक्षादिव महादेवौ रेजतुर्जलधारिणौ ॥ २२ ॥

सारे अङ्गोंमें रुद्राक्ष धारण करते, अपने अङ्गोंको व्याघ्रचर्मसे आच्छादित करते और 'परमबुद्धिमान् शान्तस्वरूप महान् देव शिवको नमस्कार है' इत्यादि नामोंद्वारा महादेव शिवकी स्तुति करते थे । इस प्रकार वे दोनों अपनी भीगी जटाओंमें जल धारण करके साक्षात् गङ्गाधर महादेवके दो विग्रहोंके समान शोभा पाते थे ॥ २१-२२ ॥

ततः स्वभवनं गत्वा पितुः पादावगृह्णताम् ।
पितुश्च सख्युर्बलिनौ मातुश्च चरणौ तदा ॥ २३॥

तदनन्तर उन दोनों बलवान् वीरोंने अपने घर जाकर पिताके चरण पकड़े, पिताके सखा मित्रसहके पैर छुये और माताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २३ ॥

जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कालेन महता नृप ।
विद्यापारं महाबुद्धिर्युक्तेनासादुपेयिवान् ॥ २४॥

नरेश्वर ! परम बुद्धिमान् धर्मात्मा जनार्दनने भी दीर्घकालतक अध्ययन करके योगयुक्त होकर सम्पूर्ण विद्याओंमें पारङ्गत योग्यता प्राप्त की ॥ २४ ॥

स च विष्णुं हृषीकेशं पीतकौशेयवाससम् ।
ब्रह्मतत्त्वपरो नित्यमुपास्ते विजितेन्द्रियः ॥ २५ ॥

१०४६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्पर रहकर नित्य-निरन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक, रेशमी पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुकी उपासना करता था ॥ २५ ॥
हंसश्च डिम्भकश्चैव कृतदारौ बभूवतुः ।
जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कृतदारो बभूव ह ॥ २६ ॥
हंस और डिम्भकके विवाह हो गये, फिर धर्मात्मा जनार्दनने भी पत्नीका पाणिग्रहण किया ॥ २६ ॥
सर्वे ते यज्ञनिरताः पञ्चयज्ञपरास्तथा ।
स्वदारनिरताः सर्वे गुरुशुश्रूषणे रताः ।
धर्म एव परं श्रेय इति ते मेनिरे नृप ॥ २७ ॥
वे सब-के-सब यज्ञमें तत्पर, पञ्चयज्ञपरायण और अपनी ही पत्नीमें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते थे । नरेश्वर ! वे यह मानते थे कि 'धर्म ही परम कल्याण करनेवाला है' ॥ २७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥


षडधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भककी मृगया

वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचित् तौ वीरौ मृगयामादतुः किल ।
जनार्दनेन सहितौ रथैरश्वैर्गजैरपि ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर किसी समय वे दोनों वीर हंस और डिम्भक जनार्दनको साथ ले रथ, हाथी और अश्वोंद्वारा शिकार खेलनेके लिये गये ॥

वनं गत्वा तु तौ वीरौ सिंहव्याघ्रांश्च जघ्नतुः ।
शितैर्वाणैर्महाराज वराहांश्च सर्वशः ॥ २ ॥
महाराज ! वनमें जाकर वे दोनों वीर अपने पैने बाणों द्वारा सिंहों, व्याघ्रों और वराहोंका सब प्रकारसे वध करने लगे ॥ २ ॥

व्यालानन्यान् मृगान् हिंस्राञ्श्वभिश्च सहितौ नृप ।
एष आयाति विपुलौ वराहो दीर्घलोचनः ॥ ३ ॥
एनं बाणेन संछिन्धि याति चायं मृगाधिपः ।
अयमन्योऽथ महिषः शृङ्गप्रोत्सरसीसृपः ॥ ४ ॥
एते खलु मृगाः सार्धं शावैर्बाधन्ति सर्वशः ।
एतद् भ्रमति सर्वत्र भीतं शशकुलं महत् ॥ ५ ॥
शावं स्तनं पिवत्साधु न हन्तव्यमिदं शुभम् ।
ग्रहीतव्यमिदं सर्वे निरुध्य श्वगणैरिह ॥ ६ ॥
इत्यादिशब्दः सुमहान् मृगयां कुर्वतां नृप ।
क्षत्रियाणां नृपश्रेष्ठ व्याधानां चैव धावताम् ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! सर्पों तथा अन्यान्य हिंसक पशुओंका कुत्तोंके साथ रहकर उन दोनों भाइयोंने वध किया । नृपश्रेष्ठ ! उस समय शिकार खेलते हुए इधर-उधर दौड़नेवाले क्षत्रियों और व्याधोंका यह महान् शब्द सब ओर सुनायी देता था, 'यह बड़े-बड़े नेत्रोंवाला विशाल वराह आ रहा है । यह सिंह जा रहा है, इसे बाणद्वारा काट डालो । यह दूसरा भैंसा जा रहा है, इसके सींगमें सर्प गुँथ गया है । ये मृग अपने बच्चोंके साथ बाधाका अनुभव करते हुए भाग रहे हैं। यह खरगोशोंका महान् समुदाय भयभीत होकर सर्वत्र भटक रहा है । यह छोटा बच्चा स्तन पी रहा है, इसे नहीं मारना चाहिये, ऐसा करनेमें ही भलाई है । इन सबको कुत्तोंसे घेरकर जीवित ही पकड़ लेना चाहिये' इत्यादि ॥ ३—७ ॥

हत्वा मृगान् सुबहुशो व्याघ्रान् सिंहान् नृपोत्तमौ ।
श्रमं च जग्मतुर्वीरौ मध्यं याते दिवाकरे ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ वीर हंस और डिम्भक दोपहर होते-होते बहुत से हिंसक पशुओं, व्याघ्रों और सिंहोंको मारकर अधिक श्रमके कारण थक गये ॥ ८ ॥

अलं हि मृगयास्माकं श्रमः समुपजायते ।
इत्यूचतुर्महाराज पुष्करं जग्मतुः सरः ॥ ९ ॥
महाराज ! वे दोनों बोले—'अब शिकार बंद किया जाय, हमें थकावट हो रही है ।' यों कहकर वे पुष्कर सरोवरकी ओर चले गये ॥ ९ ॥

सरःसमीपमागम्य मुनिसिद्धनिषेवितम् ।
वीजन् मारुतसानूपं श्रमात् तत्र सुखस्थितौ ॥ १० ॥
सरोवरके तटपर आकर वे दोनों परिश्रमके कारण वहाँ सुखपूर्वक बैठ गये । वह स्थान मुनियों और सिद्धोंसे सेवित था तथा उस सजल प्रदेशमें मंद-मंद वायु इस प्रकार चल रही थी मानो व्यंजन डुला रही हो ॥ १० ॥

ततो जनाः सरः सर्वे विगाह्य श्रमकर्पिताः ।
बिसान् प्रवालान् पद्मानां भक्षयामासुरातर्वत् ॥ ११ ॥
तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए सब लोग उस सरोवरमें स्नान करके भूखसे पीड़ित हुएकी भाँति भसींड़ और कमलगट्ठा खाने लगे ॥ ११ ॥

जनार्दनेन सहितौ हंसो डिम्भक एव च ।
सरः कचित् समाश्रित्य श्रमं संत्यज्य तिष्ठतः ॥ १२ ॥
जनार्दनसहित हंस और डिम्भक भी उस सरोवरके किसी तटका आश्रय लेकर अपना परिश्रम दूर करके बैठे हुए थे १२

भविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४७


विश्रम्य सरसस्तीरे तदाऽऽसाते सुखं नृपौ।
अशृण्वतां परं ब्रह्म मुनिमुख्यैः समीरिताम् ॥ १३ ॥
सरोवरके तटपर विश्राम लेकर वे दोनों नरेश वहाँ सुख-पूर्वक बैठे ही थे कि उसी समय प्रधान-प्रधान मुनियोंद्वारा उच्चारित उत्तम वेदवाणी उन्हें सुनायी दी ॥ १३ ॥

मध्यन्दिनं तथा सर्वैः सवनं सस्वरं नृपौ।
ततः प्रीतौ नृपौ भूत्वा श्रुत्वा वेदध्वनिं तदा ॥ १४ ॥
ऐच्छेतां तौ तदा द्रष्टुं यज्ञं मुनिकृतं तदा।
उन राजकुमारोंने मध्यंदिन सवनके समय सबके साथ सस्वर वेदपाठ सुना। उस समय उस वेदध्वनिको सुनकर वे दोनों नरेश बड़े प्रसन्न हुए और मुनियोंद्वारा किये गये उस यज्ञको देखनेकी इच्छा करने लगे ॥ १४ १/२ ॥

स्थापयित्वा ततः सेनां सर्वां मृगसमन्विताम्॥ १५॥
आदाय च महाचापे शरान् कतिचिदेव च।
जनार्दनस्तदा वीरौ हंसो डिम्भक एव च ॥ १६ ॥
पदातिनौ महाराज जग्मतुश्चाश्रमं किल।
महर्षेः काश्यपस्याथ सत्रं वैष्णवसंज्ञकम्।
यजतो मुनिभिः सार्धं जपहोमपरायणैः ॥ १७॥
महाराज ! तदनन्तर मृगोंसहित उस सारी सेनाको वहीं ठहराकर स्वयं दो बड़े-बड़े धनुष और कुछ बाण लेकर जनार्दनसहित वे दोनों वीर हंस और डिम्भक पैदल ही उन महर्षि काश्यपके आश्रममें गये, जो जप और होममें तत्पर रहनेवाले मुनियोंके साथ वैष्णव सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे ॥ १५-१७॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने मृगयावर्णने षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें हंस और डिम्भककी मृगयाका वर्णनविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६॥


सप्ताधिकशततमोऽध्यायः

सेनासहित हंस और डिम्भकका पुष्कर-तटपर विश्राम, महर्षि कश्यपके वैष्णवसत्रका दर्शन तथा दुर्वासा आदि यतियोंके समुदायमें जाकर उनके प्रति अपनी अश्रद्धाका प्रदर्शन

वैशम्पायन उवाच
जनार्दनश्च धर्मात्मा हंसो डिम्भक एव च।
सदः प्रविश्य सत्रस्य नमश्चक्रुर्मुनीश्वरान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय धर्मात्मा जनार्दन, हंस और डिम्भकने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके उन मुनीश्वरोंको प्रणाम किया ॥ १ ॥

तानागतान् महात्मानो मुनयः शिष्यसंयुताः।
अर्घ्यपाद्यासनादीनि चक्रुः पूजां प्रयत्नतः ॥ २ ॥
शिष्योंसहित उन महात्मा मुनियोंने अर्घ्य, पाद्य तथा आसन आदि देकर वहाँ पधारे हुए उन अतिथियोंका यत्नपूर्वक सत्कार किया ॥ २ ॥

तौ नृपौ स च विप्रेन्द्रः सपर्यां प्रतिगृह्य च।
प्रीतात्मानो महात्मान आसते ससुखं नृप ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! वे दोनों राजकुमार और वह विप्रवर जनार्दन तीनों महामनस्वी पुरुष वह सत्कार ग्रहण करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर वहाँ सुखपूर्वक बैठे ॥ ३ ॥

ततो हंसो बभाषे तान् मुनीन् संयतवाङ्नृप ।
पिता हि नौ मुनिश्रेष्ठा यष्टुमैच्छत् ससाधनम् ॥ ४ ॥
राजन् ! तत्पश्चात् वाणीको संयममें रखनेवाले हंसने उन मुनियोंसे कहा—'मुनिश्रेष्ठगण ! हम दोनोंके पिता साधनसहित राजसूय यज्ञ करनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ४ ॥

गन्तव्यं तत्र युष्माभिः सत्रान्ते मुनिसत्तमाः।
राजसूयेन यज्ञेन कृत्वा दिग्विजयं वयम् ॥ ५ ॥
याजयिष्यामहे विप्राः पितरं धार्मिकं नृपम्।
आयान्तु तत्र विप्रेन्द्राः सशिष्याः सपरिच्छदाः॥ ६ ॥
'मुनिवरो ! इस सत्रके अन्तमें आपलोगोंको मेरे पिताके उस यज्ञमें पधारना चाहिये । ब्राह्मणो ! हमलोग दिग्विजय करके अपने पिता धर्मात्मा नरेशसे राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करायेंगे। उसमें शिष्यों तथा अग्निहोत्र आदि सामग्रियोंसहित आप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अवश्य पधारें ॥ ५-६॥

वयमह्यैव सहितौ दिशो जेष्यामहे वयम्।
शक्ता वयमिहैवैतत् कर्तुं सैनिकसंचयैः ॥ ७ ॥
आवयोः पुरतः स्थातुं न शक्ता देवदानवाः।
कैलासनिलयाद् देवाद् वरं लब्ध्वाः स्म यत्नतः ॥ ८ ॥
अजय्यौ शत्रुसंघानामस्त्राणि विविधानि च।
इत्युक्त्वा विररामैव हंसो मदबलान्वितः ॥ ९ ॥
'हम दोनों भाई सदा एक साथ रहनेवाले हैं। हमारे साथ जनार्दनजी भी हैं। हम तीनों आज ही दिग्विजय प्रारम्भ कर देंगे। यों तो अपने सैनिकसमूहोंद्वारा हमलोग ही इस यज्ञका अनुष्ठान कर सकते हैं; क्योंकि हमारे सामने युद्धमें दानव और देवता भी नहीं ठहर सकते। हमने कैलासवासी महादेवजीसे यत्नपूर्वक वर प्राप्त किया है। हम शत्रुसमूहोंके लिये अजेय हैं और हमारे पास नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं।' ऐसा कहकर बलके मदसे उन्मत्त हुआ हंस चुप हो गया ॥ ७-९॥

१०४८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


मुनय ऊचुः

यदि स्यात् तत्र गच्छामो वयं शिष्यैर्नृपोत्तम ।
आस्महे वान्यथा राजन्नित्यूचुः किल तापसाः ॥ १० ॥

मुनि बोले— नृपश्रेष्ठ ! यदि आपका यज्ञ होगा तो हम शिष्योंसहित उसमें अवश्य चलेंगे। राजन् ! अन्यथा (यदि वह यज्ञ नहीं हुआ तो) हम यहीं रहेंगे। ऐसा उन तपस्वी मुनियोंने उत्तर दिया ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो देशान् महाराज गन्तुं निश्चितमानसौ ।
पुष्करस्योत्तरं तीरं दुर्वासा यत्र तिष्ठति ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर उस स्थानसे जानेका निश्चय करके वे दोनों पुष्करके उत्तर तटपर गये, जहाँ दुर्वासा मुनि रहते थे ॥ ११ ॥

यतयो नियता भूत्वा मन्त्रब्रह्मनिषेविणः ।
ब्रह्मसूत्रपदे सक्तास्तदर्थालोकतत्पराः ॥ १२ ॥

वहाँ यतिगण शौच-संतोष आदि नियमोंमें तत्पर रहकर मन्त्रमय ब्रह्म (प्रणव) का जप एवं उसके अर्थका चिन्तन करते थे। ब्रह्मसूत्रके पदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहकर उनके अर्थ (ब्रह्म) के साक्षात्कारके लिये यत्नशील रहते थे ॥ १२ ॥

निर्ममा निरहंकाराः कौपीनाच्छादनव्रताः ।
तमात्मानं जगद्योनिं विष्णुं विश्वेश्वरं विभुम् ॥ १३ ॥
ब्रह्मरूपं शुभं शान्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ।
वेदान्तमूर्तिमव्यक्तमनन्तं शाश्वतं शिवम् ॥ १४ ॥
नित्ययुक्तं विरूपाक्षं भूताधारमनामयम् ।
ध्यायन्तः सर्वदा देवं मनसा सर्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
दुर्वाससा सदोपास्यं वेदान्तैकरसं गुरुम् ।

उनमें ममता और अहंकारका सर्वथा अभाव था। वे नियमपूर्वक कौपीन तथा आच्छादन वस्त्र धारण करते थे। जो सबके आत्मा, जगत्की उत्पत्तिके कारण, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण विश्वके नियन्ता, विभु, ब्रह्मस्वरूप, शुभ, शान्त, अक्षर (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, वेदान्तस्वरूप, अव्यक्त, अनन्त, सनातन, कल्याणमय, नित्ययुक्त, विरूपाक्ष (रुद्ररूप), सम्पूर्ण भूतोंके आधार, अनामय, सर्वतोमुख, दुर्वासाजीके द्वारा सदा उपासनीय, वेदान्तैकरस तथा गुरुस्वरूप हैं, उन परमात्मदेवका वे यतिगण अपने मनसे सदा ही चिन्तन करते थे ॥ १३-१५½ ॥

तर्कनिश्चिततत्त्वार्था ज्ञाननिर्मलचेतसः ॥ १६ ॥
हंसाः परमहंसाश्च शिष्या दुर्वाससः प्रभो ।

प्रभो ! वे हंस और परमहंससंज्ञक संन्यासी मुनिवर दुर्वासाके शिष्य थे। उन्होंने तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा परमार्थका निश्चय कर लिया था और ज्ञानके आलोकसे उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था ॥ १६½ ॥

गत्वा तत्र महात्मानौ तौ दृष्ट्वा तूर्ध्वरेतसम् ॥ १७ ॥
दुर्वाससं महाबुद्धिं विचिन्वानं परं पदम् ।

उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंने वहाँ पहुँचकर ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) परम बुद्धिमान् एवं परमपदके अनुसंधानमें लगे हुए दुर्वासा मुनिका दर्शन किया ॥ १७½॥

क्रुद्धो यदि स दुर्वासा दग्धुं लोकानिमान् क्षमः॥ १८ ॥
देवा अपि च यं द्रष्टुं क्रुद्धं वै न क्षमाः सदा ।
रोषमूर्तिः सदा यस्तु रुद्रात्मा विश्वरूपधृक् ॥ १९ ॥

वे दुर्वासामुनि यदि कुपित हो जायं तो इन सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेमें समर्थ हैं। कुपितावस्थामें देवता भी उनका दर्शन करनेका कभी साहस नहीं कर सकते। वे सदा रोषमूर्ति माने गये हैं। उन्हे विश्वरूपधारी रुद्रात्मा बताया गया है ॥ १८-१९ ॥

रक्तकौपीनवसनो हंसः परम एव च ।
दृष्ट्वैनं च तयोरेवं बुद्धिरासीन्महामते ॥ २० ॥

वे गेरुए रंगका कौपीन वस्त्र धारण किये हुए थे और परमहंसस्वरूपमें स्थित थे। महामते ! उनका दर्शन करके उन दोनों राजकुमारोंके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ— ॥ २० ॥

को नामासौ महाभूतः काषायी वर्णवित्तमः ।
कश्चायमाश्रमो नाम विहाय च गृहाश्रमम् ॥ २१ ॥

'यह कौन महाभूत है, जो काषायवस्त्र पहने हुए है, वर्ण-विभागके विद्वानोंमें यह श्रेष्ठ जान पड़ता है (क्योंकि इसमें किसी भी वर्णके चिह्न नहीं हैं!) तथा गृहस्थाश्रमको छोड़कर यह आश्रम भी कौन-सा है ? ॥ २१ ॥

गृहस्थ एव धर्मात्मा गृहस्थो धर्मवित्तमः ।
गृहस्थो धर्मरूपस्तु गृहस्थो वर्ण एव च ॥ २२ ॥

'गृहस्थ ही धर्मात्मा होता है, गृहस्थ ही धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ है, गृहस्थ ही धर्मस्वरूप है तथा गृहस्थ ही चातुर्वर्ण्यमय है ॥ २२ ॥

गृहस्थश्च सदा माता प्राणिनां जीवनं सदा ।
तं विनान्येन रूपेण वर्तते योऽतिमूर्खवत् ॥ २३ ॥

'गृहस्थ सदा सभी प्राणियोंका माताके समान पालन करनेवाला और सर्वदा उनके जीवनकी रक्षा करनेवाला है। उस आश्रमको छोड़कर जो दूसरे रूपसे बर्ताव करता है, वह अत्यन्त मूर्खके समान है ॥ २३ ॥

उन्मत्तोऽयं विरूपोऽयमथवा मूर्ख एव च ।
ध्यायन्निव सदा चायमास्ते वञ्चयितापि वा ॥ २४ ॥

'यह तो कोई पागल, विचित्र रूपधारी अथवा मूर्ख ही है। यह ध्यान करता हुआ-सा बैठा है; परंतु ठग ही जान पड़ता है ॥ २४ ॥

किमेते प्राकृतज्ञाना ध्यायन्त इति किंचन ।
वयमेतान् दुरारोहानाश्रमान्तरकण्टकान् ॥ २५ ॥

[ भविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४९


स्थापयिष्यामहे सर्वान् मन्दबुद्धीनिमान् गृहे।
बलादेव द्विजानेतान् मूढविज्ञानतत्परान् ॥ २६ ॥

'ये प्राकृत ज्ञानवाले मनुष्य क्यों कुछ ध्यान-सा कर रहे हैं, इनके लिये उन्नतिके पथपर आरूढ़ होना सर्वथा कठिन है। ये दूसरे आश्रमोंकी कल्पना करनेवाले हैं। हम इन समस्त मन्दबुद्धि द्विजोंको, जो मूढ ज्ञानमें तत्पर हैं, बलपूर्वक गृहस्थाश्रमके भीतर स्थापित करेंगे ॥ २५-२६ ॥

असम्राहगृहीतांश्च बालिशान् दुर्मतीनिमान्।
एषां शास्ता च को मूढो न विप्रो वयमत्र ह ॥ २७ ॥
धर्म्ये वर्त्मनि संस्थाप्य पुनर्यास्याव निर्वृतौ।

'क्योंकि ये मूर्ख लोग दुराग्रहसे गृहीत हैं और इनकी बुद्धि खोटी है। इन सबको उपदेश देनेवाला यह कौन मूर्ख बैठा है? यह ब्राह्मण तो नहीं है! अब हमलोग यहाँ आ गये हैं तो पहले इनके इस गुरुको ही धर्मके मार्गपर स्थापित करके फिर संतोषपूर्वक यहाँसे घरको जायेंगे' ॥२७॥
इति संचिन्त्य तौ वीरौ विप्रेण सहितौ नृप ॥ २८ ॥
जनार्दनेन राजानौ मोहाद् भाग्यक्षयान्नृप ।
समीपं तस्य राजेन्द्र यतेः संयतचेतसः ॥ २९ ॥
गत्वा च प्रोचतुरभौ दुर्वाससमतीन्द्रियम्।
यतींश्च नियतान् क्रुद्धौ राजानौ राजसत्तम ॥ ३० ॥

नरेश्वर ! ऐसा निश्चय करके ब्राह्मण जनार्दनके साथ वे दोनों वीर राजा मोह अथवा भाग्यक्षयके कारण उन संयतचित्त यतिके पास गये। राजेन्द्र ! नृपशिरोमणे ! वहाँ जाकर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राजाओंने इन्द्रियातीत दुर्वासा तथा नियमपरायण यतियोंसे इस प्रकार कहा २८-३०

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥


अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भकद्वारा संन्यासकी निन्दा तथा जनार्दनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन

हंसडिम्भकावूचतुः
ज्ञानलेशाद् विहीनात्मन् किं ते व्यवसितं द्विज ।
कश्चायमाश्रमो विप्र भवता यः समाश्रितः ॥ १ ॥

हंस और डिम्भक बोले-ओ द्विज ! यह तूने क्या करनेका निश्चय किया है ? तेरा अन्तःकरण तो लेशमात्र ज्ञानसे भी शून्य जान पड़ता है। विप्र ! तूने जिसका आश्रय लिया है, यह कौन-सा आश्रम है ? ॥ १ ॥

गृहमेधं परित्यज्य किं त्वया साधितं पदम्।
दम्भ एव भवान् व्यक्तं शङ्के नास्त्यत्र कारणम् ॥ २ ॥

गृहस्थाश्रमको त्यागकर तूने किस अभिलषित वस्तुकी सिद्धि प्राप्त कर ली है; मुझे संदेह है कि 'तू स्पष्ट ही मूर्तिमन् दम्भ है', इसके सिवा इस त्यागमें दूसरा कोई कारण नहीं है ॥ २ ॥

लोकांश्चेमान् सदा मूढ नाशयिष्यसि निर्वृतः।
एतान् सर्वान् विनेतासि नरके पातयिष्यसि ॥ ३ ॥

मूढ ! तू सदा इन सब लोगोंका नाश करेगा और इसीमें सुख मानेगा। इन सबका शिक्षक बना हुआ है, अतः अपने साथ इन्हें भी नरकमें गिरायेगा ॥ ३ ॥

स्वयं नष्टः परान् मूर्ख नाशयिष्यसि यत्नतः।
अहो शास्ता कथं नास्ति तव मन्दमतेर्द्विज ॥ ४ ॥
सर्वथा त्वद्विनेता च पापो नास्त्यत्र संशयः ।

मूढ ब्राह्मण ! तू स्वयं तो नष्ट हो ही गया है, दूसरोंका भी यत्नपूर्वक नाश करेगा। अहो ! तुझ मन्दबुद्धि द्विजका कोई शासन क्यो नहीं करता है ? जिसने तुझे ऐसी शिक्षा दी है, वह भी सर्वथा पापी है; इसमें संशय नहीं है ॥४॥

त्यक्त्वेममाश्रमं विप्र गृही भव यतात्मवान् ॥ ५ ॥
पञ्च यज्ञान् सदा विप्र कुरु यत्नपरो भव ।
ततः स्वर्गं परं गत्वा स्वर्गे हि सुमहत् सुखम् ॥ ६ ॥
एष श्रेयःपथो विप्र जीविते चेत् स्पृहा तव।

विप्र ! इस आश्रमको छोड़कर गृहस्थ हो जा और मनको संयममे रख । ब्रह्मन् ! पाँच महायज्ञोंका अनुष्ठान कर और इसीके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रह। तदनन्तर उत्तम स्वर्गलोकमे जाकर सुखी हो जा; क्योंकि स्वर्गलोकमें महान् सुख प्राप्त होता है। बाबाजी ! यही कल्याणका मार्ग है; यदि तुझे जीनेकी इच्छा हो तो यही कर ॥ ५-६॥

इत्युक्तवन्तौ धर्मात्मा श्रुत्वा विप्रो जनार्दनः ॥ ७ ॥
उवाच च यतिं दृष्ट्वा प्रणम्यासौ सुनीतवत् ।

धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दनने उन दोनोंकी कही हुई ऐसी बात सुनकर यति दुर्वासाकी ओर देखा और अत्यन्त विनीतकी भाँति उनके चरणोंमें प्रणाम करके अपने मित्रोंसे कहा-॥

मा ब्रूतामीदृशं वाक्यं राजानौ मन्दतेजसौ ॥ ८ ॥
अश्राव्यमीदृशं घोरं लोकयोरुभयोरपि ।
को वक्तुमीशो मन्दात्मा यदि जीवेत् सबान्धवः ॥ ९ ॥

'राजाओ ! तुम दोनोंकी बुद्धि और तेज दोनों मन्द हो गये हैं। मित्रो ! ऐसी बात मुँहसे न निकालो। ऐसा घोर अमङ्गलकारी वचन इहलोक और परलोकमें भी सुनने योग्य नहीं

१०५०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

है; कौन मन्दबुद्धि मानव यदि वह बन्धु बान्धवोंसहित जीवित रहना चाहता हो तो ऐसी बात कह सकता है? ॥ ८-९ ॥

सर्वथा काल एवायं युवयोर्मन्दचेतसोः।
समाप्त मायुरः शेषो ब्रह्मदण्डहतौ युवाम् ॥ १०॥
'ये महात्मा तुम दोनों मन्दबुद्धि राजाओंके लिये सर्वथा कालरूप ही हैं ! जान पड़ता है तुम्हारी शेष आयु भी आज समाप्त हो गयी । तुम दोनों ब्रह्मदण्डद्वारा मारे गये ॥ १० ॥

एते हि यतयः शुद्धा ज्ञानदीपितचेतसः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ॥ ११ ॥
'ये सब-के-सब शुद्ध हृदयवाले यति (संन्यासी) हैं। इनका अन्तःकरण ज्ञानके तेजसे प्रकाशित है। इन्होंने ज्ञानाग्निके द्वारा अपनी सारी संचित कर्मराशि दग्ध कर डाली है और ये अब अपने प्राणोंका ही प्राणस्वरूप अग्नियोंमें होम करते हैं ॥ ११ ॥

श्रुते वामीदृशं वाक्यं कः समर्थो ह्यनुब्रुवन्।
सर्वथा ज्ञातमस्माभिः समाप्तमिह जीवितम् ॥ १२ ॥
'ऐसे महात्माओंके प्रति तुम दोनोंको छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य बारंबार ऐसी अनुचित बात कहनेमें समर्थ है ? हमने सर्वथा समझ लिया, तुम दोनोंकी जीवनलीला यहीं समाप्त हो गयी ॥ १२ ॥

चत्वार आश्रमाः पूर्वमृषिभिर्विहिता नृपौ।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः ॥ १३ ॥
'नरेश्वरो ! मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंने पूर्वकालसे ही चार आश्रमोंका विधान किया है। उनके नाम इस प्रकार हैं— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक (संन्यासी) ॥ १३॥

तेषामग्र्यश्चतुर्थोऽयमाश्रमो भिक्षुकः स्मृतः।
आस्ते तस्मिन् महाबुद्धिः स हि पुण्यतरः स्मृतः॥ १४॥
'इनमें सबसे श्रेष्ठ यह चौथा आश्रम, जिसका नाम भिक्षु या संन्यास है, माना गया है। उस आश्रममें जिसकी महत्त्वपूर्ण बुद्धि है, वह महान् पुण्यात्मा बताया गया है ॥ १४ ॥

नोपासिता भवद्भ्यां च वृद्धाः सम्यग् विनीतवत्।
ज्ञानं नाप्तं तपस्विभ्यस्तथा चैवं वदेत कः ॥ १५॥
'तुम दोनोंने भलीभाँति विनीत पुरुषके समान कभी वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सेवा नहीं की है तथा तपस्वी मुनियोंसे ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, यह बात स्पष्ट हो गयी; अन्यथा उस प्रकार सत्सङ्ग एवं ज्ञान प्राप्त करनेवाला कौन पुरुष ऐसी बात कह सकता है ? ॥ १५ ॥

अश्राव्यमीदृशं घोरं मया प्राणभृता नृप।
किंकरिष्यामि मन्दात्मन् मित्रत्वाद् भवतो नृप॥ १६ ॥
'राजा हंस ! मैं प्राण रहते ऐसा घोर अनुचित शब्द नहीं सुन सकता; किंतु क्या करूँ ? मन्दात्मन् ! तू मेरा मित्र है, इसलिये कुछ करते नहीं बनता ॥ १६ ॥

ज्ञानं यदाप्तं भवता गुरुभ्य-
स्तदत्र दुःखाय हि केवलं नृप।
ज्ञानं हि धर्मप्रभवं यथेष्टं
बलाद्धि पापस्य विधातुरूपम् ॥ १७ ॥
'नरेश्वर ! तूने गुरुजनोंसे जो ज्ञान प्राप्त किया था, वह तो यहाँ केवल दुःखका ही जनक हुआ। जो ज्ञान धर्माचरणसे प्राप्त होता है, वही यथेष्ट फलकी प्राप्ति करानेवाला है । बल अथवा हठसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान तो पापका ही विधायक होता है ॥ १७ ॥

युवां विहाय यास्ये वा पतेयं वा शिलातलम्।
पिबेयं वा विषं घोरं पतेयं वा महोर्मिषु ॥ १८ ॥
'मैं तुम दोनोंको छोड़कर चला जाऊँ, या ऊँचेसे पत्थरपर कूद पहूँ अथवा घोर विष पी लूँ किंवा महासागरकी तरङ्गोंमें गिर जाऊँ ॥ १८ ॥

आत्मानं वात्र संत्यक्ष्ये पश्यतां शृण्वतां पुनः।
इत्युक्त्वा विललापैवं मा ब्रूतमिति तौ वदन् ॥ १९ ॥
'अथवा तुम सबके देखते-सुनते आत्महत्या कर लूँ।' ऐसा कहकर जनार्दन उन दोनों राजाओंसे 'ऐसी बात न कहो, न कहो' यह कहता हुआ इस प्रकार विलाप करने लगा ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥


नवाधिकशततमोऽध्यायः

दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्वासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
ततः क्रुद्धोऽथ दुर्वासा धक्ष्यन्निव तयोस्तनू ।<br>एकेनाक्ष्णाथ दुर्वासा रौद्रेणाग्नियुजा सदा ॥ १ ॥जनमेजय ! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए दुर्वासाने सदा रौद्र अग्निसे युक्त एक नेत्रद्वारा इस प्रकार उन राजकुमारोंकी ओर देखा,

भविष्यपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५१


मानो उन दोनोंके प्राणोंको दग्ध कर डालेंगे ॥ १ ॥
पश्यंस्तौ च दुरात्मानौ रोषव्याकुलेतेन्द्रियः।
कुर्वन्निव तदा लोकान् भस्मभूतानिमान् नृप ॥ २ ॥
नरेश्वर ! उनकी इन्द्रियाँ रोषसे व्याकुल हो रही थीं। वे उस समय उन दुरात्मा राजकुमारोंकी ओर इस तरह देख रहे थे मानो इन सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ २ ॥
ब्राह्मणं चक्षुषा पश्यन् सौम्येनान्येन केवलम् ।
उवाच वचनं राजन् ध्वंसत ध्वंसतेतरान् ॥ ३ ॥
साथ ही वे उस ब्राह्मण जनार्दनकी ओर दूसरे नेत्रसे, जो केवल सौम्यभावसे युक्त था, देख रहे थे। राजन् ! इस तरह देखते हुए वे उन राजाओंसे बोले—'अरे ! अपने स्वजनोंके पास भाग जाओ ! भाग जाओ !!' ॥ ३ ॥
इतो गच्छत राजानौ किं विलम्बत मा चिरम् ।
न वां वचनसम्भूतं रोषं धारयितुं क्षमे ॥ ४ ॥
'यहाँसे जाओ ! क्यों विलम्ब करते हो ! शीघ्र भाग जाओ ! राजाओ ! तुम दोनोंकी बातोंसे जो रोष प्रकट हुआ है, उसे मैं अपने भीतर रोक रखनेमें असमर्थ हूँ ॥ ४ ॥
अन्यथा वो महीपालान् सर्वान् दग्धुमहं क्षमः।
किमतः साहसं वक्तुं कश्च शक्नोति मत्परः ॥ ५ ॥
'चले जाओ ! नहीं तो मैं तुम सभी भूपालोंको जलाकर भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। इससे बढ़कर दुःसाहसकी बात और क्या होगी ? कौन मेरे सामने ऐसी बात कह सकता है ? ॥ ५ ॥
दर्पं वां लोकविख्यातः शङ्खचक्रगदाधरः।
व्यपनेष्यति मन्दबुद्धी किंवां वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ ६ ॥
'मन्दबुद्धि राजकुमारो ! इस समय तुम दोनोंसे क्या कहूँ ? तुम्हारे बढ़े हुए घमंडको शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लोकविख्यात भगवान् श्रीकृष्ण चूर्ण कर देंगे' ॥ ६ ॥
तत उत्थाय धर्मात्मा गन्तुमैच्छद् यतीश्वरः।
ततो निषेद्धुं हंसस्तं यतते स्म यतीश्वरम् ॥ ७ ॥
यह कहकर धर्मात्मा यतिराज दुर्वासा वहाँसे उठकर अन्यत्र जानेकी इच्छा करने लगे। तब हंस उन यतीश्वरको रोकनेका प्रयत्न करने लगा ॥ ७ ॥
तस्य बाहुं समादाय हंसो नृपवरोत्तम ।
कौपीनं चिच्छिदे क्रूरः कृतान्त इव सत्तम ॥ ८ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! साधुशिरोमणे ! कृतान्तके समान क्रूर हंसने दुर्वासाकी बाँह पकड़कर उनका कौपीन फाड़ डाला ॥ ८ ॥
यतयोऽन्ये पलायन्ति दिशो दश विचेतसः।
कष्टं हेति वदन् विप्रो मित्रभावाज्जनार्दनः ॥ ९ ॥
न्यवारयद् यथाशक्ति किमिदं साहसं त्विति ।
यह देख दूसरे यति होश-हवास खोकर दसों दिशाओंमें भागने लगे। ब्राह्मण जनार्दन मित्रताके कारण 'हाय ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहता हुआ विलाप करने लगा । उसने यथाशक्ति रोका और कहा—'यह क्या दुःसाहस कर रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
दुर्वासाः सत्यधर्मस्तु हन्तुमीशोऽपि तं ततः ॥ १० ॥
मन्दं मन्दमुवाचेदं हंसं डिम्भकमेव च।
सत्यधर्मपरायण दुर्वासा उसे मार डालनेमें समर्थ होते हुए भी उस समय हंस और डिम्भकसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले—॥ १०½ ॥
शापेनाहं समर्थोऽपि हन्तुं राजकुलाधमौ ॥ ११ ॥
तथापि न करोम्यन्तं यतयो ह्यत्र ते वयम्।
'राजवंशके नीच पुरुषो ! मैं शापद्वारा तुम दोनोंको मार डालनेमें समर्थ हूँ, तो भी तुम्हारा विनाश नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि यहाँ हमलोग यतिधर्ममें प्रतिष्ठित हैं ॥ ११½ ॥
यो हि देवो जगन्नाथः केशवो यादवेश्वरः ॥ १२ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिर्गर्वं वां व्यपनेष्यति।
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, यदुकुलके नायक तथा हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही तुम दोनोंके दर्पका दलन करेंगे ॥ १२½ ॥
लोके तस्मिन् यदुश्रेष्ठे रक्षत्येवं जगत्पतौ ॥ १३ ॥
युवयोः सर्वथा जीवः सञ्जीव इति मे मतिः।
'वे यदुश्रेष्ठ जगदीश्वर जब जगत्में इस प्रकार संरक्षण-कार्य कर रहे हैं, तब तुम दोनोंका पृथक्-पृथक् जीव सर्वथा श्रेष्ठ जीव है; ऐसा मेरा विश्वास है (क्योंकि उनके हाथसे मारे जानेपर तुम दोनोंकी सद्गति होगी) ॥ १३½ ॥
जरासंधोऽपि वां बन्धुः स च वक्तुं न चेच्छति ॥ १४ ॥
ईदृशं लोकविद्विष्टं स हि धर्मपथे सदा।
'तुम दोनोंका सहायक बन्धु जरासंध भी कभी ऐसी लोकनिन्दित बात मुँहसे नहीं निकालना चाहता है। वह सदा धर्मके मार्गपर स्थित रहता है ॥ १४½ ॥
एतावता स वां बन्धुर्न हि भूयो भविष्यति ॥ १५ ॥
विद्वेषो ह्यस्तु वां तस्य मागधस्य महीपतेः।
'तुम्हारे इस अपराधके कारण जरासंध अब फिर तुम्हारा बन्धु नहीं रह जायगा। उस मगधनरेशके साथ तुम्हारा विद्वेष हो जायगा ॥ १५½ ॥
श्रुत्वेदं घोररूपं तु स हि बन्धुः सहेत चेत् ॥ १६ ॥
धर्मनाशो भवेत् तस्य नात्र कार्या विचारणा।
'यदि तुम्हारे इस भयंकर अपराधको सुनकर भी वह बन्धुभावसे चुपचाप सह लेगा तो उसके भी धर्मका नाश हो जायगा। इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १६½ ॥

१०५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इत्युक्त्वा गच्छ गच्छेति हंसं प्राह पुनः पुनः॥ १७॥
जनार्दनमुवाचेदं दुर्वासा यतिसत्तमः।
स्वस्त्यस्तु तव विप्रेन्द्र भक्तिरस्तु जनार्दने ॥ १८॥
संस्तुतिस्तच तस्यास्तु शङ्खचक्रगदाभृतः।
अद्य श्वो वा परश्वो वा साधुरेव सदा भवान् ॥ १९॥

ऐसा कहकर दुर्वासाने पुनः हंससे बारंबार कहा—'चले जाओ! चले जाओ!' तदनन्तर यतिश्रेष्ठ दुर्वासा जनार्दनसे इस प्रकार बोले—'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो! भगवान् जनार्दनमें तुम्हारी भक्ति बनी रहे। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान्‌के साथ आज, कल या परसोंतक तुम्हारा समागम होगा। तुम सदा साधुस्वभावके ही बने रहोगे॥ १७-१९॥

न हि साधोर्विनाशोऽस्ति लोकयोरुभयोरपि।
गच्छ सर्वं पितुर्ब्रूहि ज्ञात्वा वृत्तं यथाखिलम् ॥ २०॥

'साधु पुरुषका दोनों लोकोंमें कभी विनाश नहीं होता। जाओ, सारी बातें जानकर अपने पिताको बताओ' ॥ २०॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासोभाषणे नवाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें दुर्वासाका भाषणविषयक एक सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०९॥


दशाधिकशततमोऽध्यायः

दुर्वासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन

वैशम्पायन उवाच

ततस्तौ हंसडिम्भकौ क्रुद्धौ कालेन चोदितौ।
शिक्यं कमण्डलुं चैव द्विदलं दारुमेव च ॥ १ ॥
दण्डान् पात्रविशेषांश्च छित्त्वा भित्त्वा च सर्वशः।
तस्मिन् देशे महाराज व्याधैर्मांसान्यदीदहन् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! तदनन्तर कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरे हुए हंस और डिम्भकने उन यतियोंके छींके, कमण्डलु, दो दलोंसे युक्त काष्ठमय भोजनपात्र, दण्ड और दूसरे-दूसरे विभिन्न पात्रोंको तोड़-फोड़कर उसी स्थानमें व्याधोंद्वारा मांस पकवाये॥ १-२॥

भक्षयित्वा ततो देशात् स्वपुरीं तौ प्रजग्मतुः।
जनार्दनश्च धर्मात्मा स्नेहादनुययौ तयोः ॥ ३ ॥

उन्हें खाकर वे दोनों उस स्थानसे अपने नगरको गये। धर्मात्मा जनार्दन भी स्नेहवश उन दोनोंका अनुसरण करता रहा॥ ३॥

नष्टाविमाविति तदा स मेने दुःखितः परम्।

उसने अत्यन्त दुःखित होकर यह विश्वास कर लिया कि अब इन दोनोंके नष्ट होनेमें कोई संदेह नहीं है॥ ३½॥

गतेषु तेषु सर्वेषु दुर्वासा यतिसत्तमः ॥ ४ ॥
पलायनपरान् सर्वानिदं प्राह यतीश्वरान्।

उन सबके चले जानेपर यतियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासाने यहाँसे पलायन करनेवाले समस्त यतीश्वरोंसे इस प्रकार कहा—॥४½॥

इतो देशाद् विनिर्गत्य पुष्करात् पुण्यसंयुतात् ॥ ५ ॥
मन्दं मन्दं समाश्वस्य विश्रम्य च ततस्ततः।
प्रविश्य द्वारकां देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा च तस्मै प्रभवे वक्ष्यामो यतिसत्तमाः।

'यतिवरो! इस पुण्ययुक्त देश पुष्करसे निकलकर धीरे-धीरे सुस्ताते और यत्र-तत्र विश्राम करते हुए द्वारकापुरीमें प्रवेश करके हमलोग शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे मिलेंगे और उनसे अपनी सारी कष्ट-कथा कहेंगे॥ ५-६½॥

स हि रक्षन्नगदिदं धर्मवर्त्मनि संस्थितः ॥ ७ ॥
आद्यो लोकगुरुर्विष्णुर्यतात्मा तत्त्ववित्प्रियः।
उद्धृत्य कण्टकान् सर्वाञ्छशास पृथिवीमिमाम् ॥ ८ ॥

'वे इस सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करते हुए धर्मके मार्गपर स्थित हैं। वे ही आदिपुरुष, लोकगुरु, सर्वव्यापी, मनको वशमें रखनेवाले और तत्त्ववेत्ताओंके प्रिय हैं। उन्होंने सारे कण्टकोंका उन्मूलन करके इस पृथिवीका शासन किया है॥७-८॥

स च पापान् महागोरान् सर्वान् पापकृतान् प्रभुः।
रक्षेन्नः शुक्लकान् सर्वाञ्ज्ञानेषु नियतात्मनः ॥ ९ ॥

'वे ही प्रभु समस्त महाभयंकर, पापजन्मा पापियोंका उच्छेद करके अमानित्व और अदम्भित्व आदि ज्ञानसाधनोंमें नियतरूपसे मन लगानेवाले हम सम्पूर्ण यतियोंकी रक्षा करेंगे॥ ९॥

इदमद्य क्षमं विप्रा यानमद्य विधीयताम्।
साहसं यत्कृतं ताभ्यां पात्रभेदादि सत्तमाः ॥ १०॥
एतत् सर्वमशेषेण दर्शयाम जनार्दनम्।

'ब्राह्मणो! इस समय यही हमारे योग्य है; अतः अब द्वारकाकी यात्रा करो। साधुशिरोमणियो! हंस और डिम्भकने जो हमारे पात्रोंके तोड़ने-फोड़ने आदिका दुःसाहस किया है, ये सारी वस्तुएँ हमलोग भगवान् जनार्दनको दिखायें'॥१०½॥

तथेति ते प्रतिज्ञाय यतयो ज्ञानचक्षुषः ॥ ११ ॥
छिन्नं ताभ्यां समादाय शिक्यं दारुमयं तथा।
द्विदलं कर्पटं चैव कौपीनमथ वल्कलम् ॥ १२ ॥
कमण्डलुं तथा राजन्नर्घप्रोतकपालकम्।
एतानन्यान समादाय द्रष्टुं केशवमाययुः ॥ १३ ॥

१०५४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मध्यंदिने महाविष्णुः शैनेयेन सहाय्युतः।
विक्रीड्य सुचिरं कृष्ण उपारंसीत् स यादवः ॥ ८ ॥
उस दिन दोपहरके समय महाविष्णुस्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ देरतक गोलक्रीड़ा करके यादवोंसहित उससे विरत हो गये ॥ ८ ॥

द्वाःस्थेन वारिताः पूर्वं द्वार्यैव च समास्थिताः।
इदमन्तरमित्येव विविशुस्तां सभां नृप ॥ ९ ॥
राजन् ! जिन्हें द्वारपालने पहले भीतर आनेसे रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि 'यह भीतर प्रवेश करनेका अवसर है' ऐसा जानकर उस समय उस सभामें प्रविष्ट हुए ॥ ९ ॥

यतयो दीर्घतपसः पुरस्कृत्य तपोधनम्।
दुर्वाससं सुमनसो ददृशुर्यादवेश्वरम् ॥ १०॥
गोलक्रीडासमासक्तं करसंस्थितगोलकम् ।
पद्मपत्रविशालाक्षं विष्णुं तं सात्यकिं हरिम् ॥ ११ ॥
एकेनाक्ष्णा ह्लादयन्तं परेणान्येन गोलकम् ।
यतयश्च महाराज प्रत्यदृश्यन्त तत्पुरः ॥ १२ ॥
दीर्घकालसे तपस्या करनेवाले उन शुद्धचेता यतियोंने तपोधन दुर्वासाको आगे करके यादवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो पहले गोलक्रीड़ामें आसक्त थे और उस समय भी जिनके हाथमें गोल मौजूद था । वे प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्रसे सात्यकिको आनन्द प्रदान करते थे और दूसरेसे उस गोलकी ओर देख रहे थे । महाराज ! इसी समय वे यति उनके सामने दिखायी दिये ॥ १०—१२ ॥

वृष्णिपः पुण्डरीकाक्षः सात्यकिर्बलभद्रकः ।
वसुदेवोऽथवाक्रूर उग्रसेनस्तथा नृप ॥ १३ ॥
अन्ये च यादवाः सर्वे सम्भ्रमं प्रतिपेदिरे ।
इदं किमिदमित्येवं व्याशङ्कन्मनसोऽभवन् ॥ १४ ॥
वृष्णिपालक कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियोंको देखकर बड़ी घबराहटमें पड़ गये और शङ्कितचित्त होकर एक दूसरेसे पूछने लगे--'यह क्या है ? कैसी बात है ?' ॥

पृष्ठतोऽप्यनुगच्छन्ति दिधक्षन्तं जगत्त्रयम् ।
अर्घकौपीनवसनं स्मरन्तं कमपि द्विजम् ॥ १५ ॥
अन्तस्तापसमायुक्तं छिन्नदण्डधरं यतिम् ।
बड़ा संताप था । उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर रखा था । राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः वे भीतर-ही-भीतर रोषसे जल रहे थे । उनके नेत्रसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हो रही थी । वे यादवेश्वर श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे । इस अवस्थामें संन्यासी दुर्वासाको उन यादवशिरोमणियोंने भयभीत होकर देखा ॥ १५—१७ ॥

किं करिष्यत्यसौ क्रुद्धः किं वा वक्ष्यति नः प्रभुः।
इति प्राञ्जलयः सर्वे यादवाः प्रतिपेदिरे ॥ १८ ॥
इदमासनमित्येवं किंचिदुच्चुक्षु वृष्णयः ।
वे मन-ही-मन सोचने लगे--'पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे ? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इनसे क्या कहेंगे।' ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और वृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वरमें बोले--'भगवन् ! आपके लिये यह आसन है' ॥ १८ ३ ॥

ततः कृष्णो हृषीकेशः किंचिदुत्प्लुत्य तत्पुरः ॥ १९ ॥
इदमासनमित्येवं स्थीयतामिह निर्वृतः ।
अहमद्य स्थितो विप्र किंकरोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ २० ॥
इसी समय इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासाके आगे चले आये और बोले--'विप्रवर ! यह आसन है, इसपर सुखपूर्वक बैठिये । आज मैं आपकी सेवामें खड़ा हूँ, मैं आपका किङ्कर हूँ' ॥ १९-२० ॥

ततः किंचिदिवासीन आसने यतिविग्रहः ।
आसने संस्थिते तस्मिन् यतयो वीतमत्सराः ॥ २१ ॥
आसनानि यथायोगं भेजिरे निर्वृताः किल ।
तब वे संन्यासीरूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये । उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियोंने भी संतोषपूर्वक यथायोग्य आसन स्वीकार किये ॥ २१ ३ ॥

अर्घ्यादिसमुदाचारं चक्रे कृष्णः किरीटभृत् ॥ २२ ॥
आह भूयो हृषीकेशो यतिं दुर्वाससं प्रभुम् ।
किरीटधारी श्रीकृष्णने अर्घ्य आदिके क्रमसे उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया, फिर वे भगवान् हृषीकेश उन प्रभावशाली यति दुर्वासासे इस प्रकार बोले--॥ २२ ३ ॥

किमर्थं ब्रूहि विप्रेन्द्र अस्मिन् प्रत्यागमो हि वः ॥ २३ ॥
दृष्टं वा हाथवा किंचित् कारणं चास्ति वो महत् ।
'विप्रवर ! बताइये, इस नगरमें आपलोगोंका शुभागमन किस लिये हुआ है ? अथवा आपलोगोंको यहाँ आनेमें कोई महान् कारण दिखायी दिया है ? ॥ २३ ३ ॥

संन्यासिनो द्विजश्रेष्ठा यूयं विगतकल्मषाः ॥ २४ ॥
सदा यूयममत्तत्तो द्विजपुङ्गवाः ।
'आपलोग द्विजोंमें श्रेष्ठ एवं निष्पाप संन्यासी हैं;

एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५३

तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सब ज्ञानदर्शी संन्यासी हंस और डिम्भकद्वारा छिन्न-भिन्न किये गये छींके, लकड़ीके बने हुए द्विदल (दो दलोंसे युक्त भोजन-पात्र, जो गौके कानकी-सी आकृतिका बना होता है), गेरुए वस्त्र, कौपीन, वल्कल तथा कमण्डलुका आधा टुकड़ा (जो पूरे कमण्डलुको बीचसे चीर डालनेके कारण दो खण्डोंमें विभक्त हो गया था)- इन सबको तथा अन्य सब तोड़ी-फोड़ी गयी वस्तुओंको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये आये ॥११-१३॥

पञ्च चैव सहस्राणि पुरस्कृत्य महामुनिम् । दुर्वाससं तपोनियोनीमीश्वरस्यात्मसम्भवम् ॥ १४ ॥ अहोरात्रेण ते सर्वे द्वारकां कृष्णपालिताम् । ययुर्दान्ता महात्मानो लोमशाः केशवर्जिताः ॥ १५ ॥

उनकी संख्या पाँच हजार थी, वे जितेन्द्रिय महात्मा सिरके केश मुड़ाये रहते थे और उनके शेष शरीर रोमावलियोंसे युक्त थे। वे यतिगण भगवान् शङ्करके अंशसे उत्पन्न हुए तपोयोनि महामुनि दुर्वासाको आगे करके दिनरात चलते हुए श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ १४-१५ ॥

प्रातः प्रविश्य राजेन्द्र वापिकायां यतीश्वराः । स्नात्वोपस्पृश्य ते सर्वे यत्नेन महता तदा ॥ १६ ॥ द्रष्टुमभ्युद्यता विष्णुं कण्टकोद्धृतितत्परम् । एकरूपं समास्थाय सुधर्मायामवस्थितम् ॥ १७ ॥

राजेन्द्र ! प्रातःकाल पुरीमें प्रवेश करके वे यतीश्वरगण वहाँकी एक बावड़ीमें स्नान और आचमन करके बड़े प्रयत्नसे उन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुए, जो एकरूप धारण करके सुधर्मा-सभामें विराजमान हो जगत्के कण्टकोंको उखाड़ फेंकनेके प्रयत्नमें लगे हुए थे ॥ १६-१७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतीनां द्वारकागमने दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें यतियोंका द्वारकागमनविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥


एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा-सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना और दुर्वासाका भगवान्‌की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना

वैशम्पायन उवाच अथ सर्वेश्वरो विष्णुः पद्मकिंजलकलोचनः । श्यामः पीताम्बरः श्रीमान् प्रलम्बाम्बरभूषणः ॥ १ ॥ किरीटी श्रीपतिः कृष्णो नीलकुञ्चितमूर्धजः । अव्यक्तः शाश्वतो देवः सकलो निष्कलः शिवः ॥ २ ॥ क्रीडाविहारोपगतः कदाचिद्भवद्वरिः । कुमारैरपरैः सार्धं सात्यकिप्रमुखैर्नृप ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! जो सबके ईश्वर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लंबे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित, मुकुट-मण्डित और लक्ष्मीके अधिपति हैं, जिनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारोंके साथ क्रीडा-विहारमें लगे हुए थे ॥ १—३ ॥

गोलक्रीडां सुधर्माया मध्ये यादवसत्तमः । चकार प्रियकृत् कृष्णो युयुधानेन केशवः ॥ ४ ॥

सुधर्मा-सभाके मध्यभागमें विराजमान हो सबका प्रिय करनेवाले यादवशिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकिके साथ गोल-क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ४ ॥

ममायं प्रथमो गोलस्तव पश्चाद् भविष्यति । इति ब्रुवंस्तदा विष्णुः सात्यकिं कमलेक्षणः ॥ ५ ॥

उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकिसे यह कह रहे थे कि 'यह पहला गोल मेरा है, तुम्हारा पीछे होगा' ॥

पार्श्वस्था यादवास्तस्य वसुदेवपुरोगमाः । उद्धवप्रमुखा राजन्नासेदुः क्वचिदत्र वै ॥ ६ ॥

राजन् ! उनके पार्श्वभागमे वसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थानपर बैठे थे ॥ ६ ॥

अन्यव्यापाररहितो भूतात्मा भूतभावनः । विजहार यथा रामः सुग्रीवेण पुरा नृप ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् श्रीराम अपने सखा सुग्रीवके साथ क्रीड़ा-विहार करते थे, उसी प्रकार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने सुहृदोंके साथ मनोरंजन करते थे ॥ ७ ॥