भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1074

१०४८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


मुनय ऊचुः

यदि स्यात् तत्र गच्छामो वयं शिष्यैर्नृपोत्तम ।
आस्महे वान्यथा राजन्नित्यूचुः किल तापसाः ॥ १० ॥

मुनि बोले— नृपश्रेष्ठ ! यदि आपका यज्ञ होगा तो हम शिष्योंसहित उसमें अवश्य चलेंगे। राजन् ! अन्यथा (यदि वह यज्ञ नहीं हुआ तो) हम यहीं रहेंगे। ऐसा उन तपस्वी मुनियोंने उत्तर दिया ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो देशान् महाराज गन्तुं निश्चितमानसौ ।
पुष्करस्योत्तरं तीरं दुर्वासा यत्र तिष्ठति ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर उस स्थानसे जानेका निश्चय करके वे दोनों पुष्करके उत्तर तटपर गये, जहाँ दुर्वासा मुनि रहते थे ॥ ११ ॥

यतयो नियता भूत्वा मन्त्रब्रह्मनिषेविणः ।
ब्रह्मसूत्रपदे सक्तास्तदर्थालोकतत्पराः ॥ १२ ॥

वहाँ यतिगण शौच-संतोष आदि नियमोंमें तत्पर रहकर मन्त्रमय ब्रह्म (प्रणव) का जप एवं उसके अर्थका चिन्तन करते थे। ब्रह्मसूत्रके पदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहकर उनके अर्थ (ब्रह्म) के साक्षात्कारके लिये यत्नशील रहते थे ॥ १२ ॥

निर्ममा निरहंकाराः कौपीनाच्छादनव्रताः ।
तमात्मानं जगद्योनिं विष्णुं विश्वेश्वरं विभुम् ॥ १३ ॥
ब्रह्मरूपं शुभं शान्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ।
वेदान्तमूर्तिमव्यक्तमनन्तं शाश्वतं शिवम् ॥ १४ ॥
नित्ययुक्तं विरूपाक्षं भूताधारमनामयम् ।
ध्यायन्तः सर्वदा देवं मनसा सर्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
दुर्वाससा सदोपास्यं वेदान्तैकरसं गुरुम् ।

उनमें ममता और अहंकारका सर्वथा अभाव था। वे नियमपूर्वक कौपीन तथा आच्छादन वस्त्र धारण करते थे। जो सबके आत्मा, जगत्की उत्पत्तिके कारण, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण विश्वके नियन्ता, विभु, ब्रह्मस्वरूप, शुभ, शान्त, अक्षर (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, वेदान्तस्वरूप, अव्यक्त, अनन्त, सनातन, कल्याणमय, नित्ययुक्त, विरूपाक्ष (रुद्ररूप), सम्पूर्ण भूतोंके आधार, अनामय, सर्वतोमुख, दुर्वासाजीके द्वारा सदा उपासनीय, वेदान्तैकरस तथा गुरुस्वरूप हैं, उन परमात्मदेवका वे यतिगण अपने मनसे सदा ही चिन्तन करते थे ॥ १३-१५½ ॥

तर्कनिश्चिततत्त्वार्था ज्ञाननिर्मलचेतसः ॥ १६ ॥
हंसाः परमहंसाश्च शिष्या दुर्वाससः प्रभो ।

प्रभो ! वे हंस और परमहंससंज्ञक संन्यासी मुनिवर दुर्वासाके शिष्य थे। उन्होंने तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा परमार्थका निश्चय कर लिया था और ज्ञानके आलोकसे उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था ॥ १६½ ॥

गत्वा तत्र महात्मानौ तौ दृष्ट्वा तूर्ध्वरेतसम् ॥ १७ ॥
दुर्वाससं महाबुद्धिं विचिन्वानं परं पदम् ।

उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंने वहाँ पहुँचकर ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) परम बुद्धिमान् एवं परमपदके अनुसंधानमें लगे हुए दुर्वासा मुनिका दर्शन किया ॥ १७½॥

क्रुद्धो यदि स दुर्वासा दग्धुं लोकानिमान् क्षमः॥ १८ ॥
देवा अपि च यं द्रष्टुं क्रुद्धं वै न क्षमाः सदा ।
रोषमूर्तिः सदा यस्तु रुद्रात्मा विश्वरूपधृक् ॥ १९ ॥

वे दुर्वासामुनि यदि कुपित हो जायं तो इन सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेमें समर्थ हैं। कुपितावस्थामें देवता भी उनका दर्शन करनेका कभी साहस नहीं कर सकते। वे सदा रोषमूर्ति माने गये हैं। उन्हे विश्वरूपधारी रुद्रात्मा बताया गया है ॥ १८-१९ ॥

रक्तकौपीनवसनो हंसः परम एव च ।
दृष्ट्वैनं च तयोरेवं बुद्धिरासीन्महामते ॥ २० ॥

वे गेरुए रंगका कौपीन वस्त्र धारण किये हुए थे और परमहंसस्वरूपमें स्थित थे। महामते ! उनका दर्शन करके उन दोनों राजकुमारोंके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ— ॥ २० ॥

को नामासौ महाभूतः काषायी वर्णवित्तमः ।
कश्चायमाश्रमो नाम विहाय च गृहाश्रमम् ॥ २१ ॥

'यह कौन महाभूत है, जो काषायवस्त्र पहने हुए है, वर्ण-विभागके विद्वानोंमें यह श्रेष्ठ जान पड़ता है (क्योंकि इसमें किसी भी वर्णके चिह्न नहीं हैं!) तथा गृहस्थाश्रमको छोड़कर यह आश्रम भी कौन-सा है ? ॥ २१ ॥

गृहस्थ एव धर्मात्मा गृहस्थो धर्मवित्तमः ।
गृहस्थो धर्मरूपस्तु गृहस्थो वर्ण एव च ॥ २२ ॥

'गृहस्थ ही धर्मात्मा होता है, गृहस्थ ही धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ है, गृहस्थ ही धर्मस्वरूप है तथा गृहस्थ ही चातुर्वर्ण्यमय है ॥ २२ ॥

गृहस्थश्च सदा माता प्राणिनां जीवनं सदा ।
तं विनान्येन रूपेण वर्तते योऽतिमूर्खवत् ॥ २३ ॥

'गृहस्थ सदा सभी प्राणियोंका माताके समान पालन करनेवाला और सर्वदा उनके जीवनकी रक्षा करनेवाला है। उस आश्रमको छोड़कर जो दूसरे रूपसे बर्ताव करता है, वह अत्यन्त मूर्खके समान है ॥ २३ ॥

उन्मत्तोऽयं विरूपोऽयमथवा मूर्ख एव च ।
ध्यायन्निव सदा चायमास्ते वञ्चयितापि वा ॥ २४ ॥

'यह तो कोई पागल, विचित्र रूपधारी अथवा मूर्ख ही है। यह ध्यान करता हुआ-सा बैठा है; परंतु ठग ही जान पड़ता है ॥ २४ ॥

किमेते प्राकृतज्ञाना ध्यायन्त इति किंचन ।
वयमेतान् दुरारोहानाश्रमान्तरकण्टकान् ॥ २५ ॥