विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1073, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४७
विश्रम्य सरसस्तीरे तदाऽऽसाते सुखं नृपौ।
अशृण्वतां परं ब्रह्म मुनिमुख्यैः समीरिताम् ॥ १३ ॥
सरोवरके तटपर विश्राम लेकर वे दोनों नरेश वहाँ सुख-पूर्वक बैठे ही थे कि उसी समय प्रधान-प्रधान मुनियोंद्वारा उच्चारित उत्तम वेदवाणी उन्हें सुनायी दी ॥ १३ ॥
मध्यन्दिनं तथा सर्वैः सवनं सस्वरं नृपौ।
ततः प्रीतौ नृपौ भूत्वा श्रुत्वा वेदध्वनिं तदा ॥ १४ ॥
ऐच्छेतां तौ तदा द्रष्टुं यज्ञं मुनिकृतं तदा।
उन राजकुमारोंने मध्यंदिन सवनके समय सबके साथ सस्वर वेदपाठ सुना। उस समय उस वेदध्वनिको सुनकर वे दोनों नरेश बड़े प्रसन्न हुए और मुनियोंद्वारा किये गये उस यज्ञको देखनेकी इच्छा करने लगे ॥ १४ १/२ ॥
स्थापयित्वा ततः सेनां सर्वां मृगसमन्विताम्॥ १५॥
आदाय च महाचापे शरान् कतिचिदेव च।
जनार्दनस्तदा वीरौ हंसो डिम्भक एव च ॥ १६ ॥
पदातिनौ महाराज जग्मतुश्चाश्रमं किल।
महर्षेः काश्यपस्याथ सत्रं वैष्णवसंज्ञकम्।
यजतो मुनिभिः सार्धं जपहोमपरायणैः ॥ १७॥
महाराज ! तदनन्तर मृगोंसहित उस सारी सेनाको वहीं ठहराकर स्वयं दो बड़े-बड़े धनुष और कुछ बाण लेकर जनार्दनसहित वे दोनों वीर हंस और डिम्भक पैदल ही उन महर्षि काश्यपके आश्रममें गये, जो जप और होममें तत्पर रहनेवाले मुनियोंके साथ वैष्णव सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे ॥ १५-१७॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने मृगयावर्णने षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें हंस और डिम्भककी मृगयाका वर्णनविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६॥
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
सेनासहित हंस और डिम्भकका पुष्कर-तटपर विश्राम, महर्षि कश्यपके वैष्णवसत्रका दर्शन तथा दुर्वासा आदि यतियोंके समुदायमें जाकर उनके प्रति अपनी अश्रद्धाका प्रदर्शन
वैशम्पायन उवाच
जनार्दनश्च धर्मात्मा हंसो डिम्भक एव च।
सदः प्रविश्य सत्रस्य नमश्चक्रुर्मुनीश्वरान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय धर्मात्मा जनार्दन, हंस और डिम्भकने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके उन मुनीश्वरोंको प्रणाम किया ॥ १ ॥
तानागतान् महात्मानो मुनयः शिष्यसंयुताः।
अर्घ्यपाद्यासनादीनि चक्रुः पूजां प्रयत्नतः ॥ २ ॥
शिष्योंसहित उन महात्मा मुनियोंने अर्घ्य, पाद्य तथा आसन आदि देकर वहाँ पधारे हुए उन अतिथियोंका यत्नपूर्वक सत्कार किया ॥ २ ॥
तौ नृपौ स च विप्रेन्द्रः सपर्यां प्रतिगृह्य च।
प्रीतात्मानो महात्मान आसते ससुखं नृप ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! वे दोनों राजकुमार और वह विप्रवर जनार्दन तीनों महामनस्वी पुरुष वह सत्कार ग्रहण करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर वहाँ सुखपूर्वक बैठे ॥ ३ ॥
ततो हंसो बभाषे तान् मुनीन् संयतवाङ्नृप ।
पिता हि नौ मुनिश्रेष्ठा यष्टुमैच्छत् ससाधनम् ॥ ४ ॥
राजन् ! तत्पश्चात् वाणीको संयममें रखनेवाले हंसने उन मुनियोंसे कहा—'मुनिश्रेष्ठगण ! हम दोनोंके पिता साधनसहित राजसूय यज्ञ करनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ४ ॥
गन्तव्यं तत्र युष्माभिः सत्रान्ते मुनिसत्तमाः।
राजसूयेन यज्ञेन कृत्वा दिग्विजयं वयम् ॥ ५ ॥
याजयिष्यामहे विप्राः पितरं धार्मिकं नृपम्।
आयान्तु तत्र विप्रेन्द्राः सशिष्याः सपरिच्छदाः॥ ६ ॥
'मुनिवरो ! इस सत्रके अन्तमें आपलोगोंको मेरे पिताके उस यज्ञमें पधारना चाहिये । ब्राह्मणो ! हमलोग दिग्विजय करके अपने पिता धर्मात्मा नरेशसे राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करायेंगे। उसमें शिष्यों तथा अग्निहोत्र आदि सामग्रियोंसहित आप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अवश्य पधारें ॥ ५-६॥
वयमह्यैव सहितौ दिशो जेष्यामहे वयम्।
शक्ता वयमिहैवैतत् कर्तुं सैनिकसंचयैः ॥ ७ ॥
आवयोः पुरतः स्थातुं न शक्ता देवदानवाः।
कैलासनिलयाद् देवाद् वरं लब्ध्वाः स्म यत्नतः ॥ ८ ॥
अजय्यौ शत्रुसंघानामस्त्राणि विविधानि च।
इत्युक्त्वा विररामैव हंसो मदबलान्वितः ॥ ९ ॥
'हम दोनों भाई सदा एक साथ रहनेवाले हैं। हमारे साथ जनार्दनजी भी हैं। हम तीनों आज ही दिग्विजय प्रारम्भ कर देंगे। यों तो अपने सैनिकसमूहोंद्वारा हमलोग ही इस यज्ञका अनुष्ठान कर सकते हैं; क्योंकि हमारे सामने युद्धमें दानव और देवता भी नहीं ठहर सकते। हमने कैलासवासी महादेवजीसे यत्नपूर्वक वर प्राप्त किया है। हम शत्रुसमूहोंके लिये अजेय हैं और हमारे पास नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं।' ऐसा कहकर बलके मदसे उन्मत्त हुआ हंस चुप हो गया ॥ ७-९॥