भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1072
१०४६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्पर रहकर नित्य-निरन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक, रेशमी पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुकी उपासना करता था ॥ २५ ॥
हंसश्च डिम्भकश्चैव कृतदारौ बभूवतुः ।
जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कृतदारो बभूव ह ॥ २६ ॥
हंस और डिम्भकके विवाह हो गये, फिर धर्मात्मा जनार्दनने भी पत्नीका पाणिग्रहण किया ॥ २६ ॥
सर्वे ते यज्ञनिरताः पञ्चयज्ञपरास्तथा ।
स्वदारनिरताः सर्वे गुरुशुश्रूषणे रताः ।
धर्म एव परं श्रेय इति ते मेनिरे नृप ॥ २७ ॥
वे सब-के-सब यज्ञमें तत्पर, पञ्चयज्ञपरायण और अपनी ही पत्नीमें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते थे । नरेश्वर ! वे यह मानते थे कि 'धर्म ही परम कल्याण करनेवाला है' ॥ २७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥


षडधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भककी मृगया

वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचित् तौ वीरौ मृगयामादतुः किल ।
जनार्दनेन सहितौ रथैरश्वैर्गजैरपि ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर किसी समय वे दोनों वीर हंस और डिम्भक जनार्दनको साथ ले रथ, हाथी और अश्वोंद्वारा शिकार खेलनेके लिये गये ॥

वनं गत्वा तु तौ वीरौ सिंहव्याघ्रांश्च जघ्नतुः ।
शितैर्वाणैर्महाराज वराहांश्च सर्वशः ॥ २ ॥
महाराज ! वनमें जाकर वे दोनों वीर अपने पैने बाणों द्वारा सिंहों, व्याघ्रों और वराहोंका सब प्रकारसे वध करने लगे ॥ २ ॥

व्यालानन्यान् मृगान् हिंस्राञ्श्वभिश्च सहितौ नृप ।
एष आयाति विपुलौ वराहो दीर्घलोचनः ॥ ३ ॥
एनं बाणेन संछिन्धि याति चायं मृगाधिपः ।
अयमन्योऽथ महिषः शृङ्गप्रोत्सरसीसृपः ॥ ४ ॥
एते खलु मृगाः सार्धं शावैर्बाधन्ति सर्वशः ।
एतद् भ्रमति सर्वत्र भीतं शशकुलं महत् ॥ ५ ॥
शावं स्तनं पिवत्साधु न हन्तव्यमिदं शुभम् ।
ग्रहीतव्यमिदं सर्वे निरुध्य श्वगणैरिह ॥ ६ ॥
इत्यादिशब्दः सुमहान् मृगयां कुर्वतां नृप ।
क्षत्रियाणां नृपश्रेष्ठ व्याधानां चैव धावताम् ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! सर्पों तथा अन्यान्य हिंसक पशुओंका कुत्तोंके साथ रहकर उन दोनों भाइयोंने वध किया । नृपश्रेष्ठ ! उस समय शिकार खेलते हुए इधर-उधर दौड़नेवाले क्षत्रियों और व्याधोंका यह महान् शब्द सब ओर सुनायी देता था, 'यह बड़े-बड़े नेत्रोंवाला विशाल वराह आ रहा है । यह सिंह जा रहा है, इसे बाणद्वारा काट डालो । यह दूसरा भैंसा जा रहा है, इसके सींगमें सर्प गुँथ गया है । ये मृग अपने बच्चोंके साथ बाधाका अनुभव करते हुए भाग रहे हैं। यह खरगोशोंका महान् समुदाय भयभीत होकर सर्वत्र भटक रहा है । यह छोटा बच्चा स्तन पी रहा है, इसे नहीं मारना चाहिये, ऐसा करनेमें ही भलाई है । इन सबको कुत्तोंसे घेरकर जीवित ही पकड़ लेना चाहिये' इत्यादि ॥ ३—७ ॥

हत्वा मृगान् सुबहुशो व्याघ्रान् सिंहान् नृपोत्तमौ ।
श्रमं च जग्मतुर्वीरौ मध्यं याते दिवाकरे ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ वीर हंस और डिम्भक दोपहर होते-होते बहुत से हिंसक पशुओं, व्याघ्रों और सिंहोंको मारकर अधिक श्रमके कारण थक गये ॥ ८ ॥

अलं हि मृगयास्माकं श्रमः समुपजायते ।
इत्यूचतुर्महाराज पुष्करं जग्मतुः सरः ॥ ९ ॥
महाराज ! वे दोनों बोले—'अब शिकार बंद किया जाय, हमें थकावट हो रही है ।' यों कहकर वे पुष्कर सरोवरकी ओर चले गये ॥ ९ ॥

सरःसमीपमागम्य मुनिसिद्धनिषेवितम् ।
वीजन् मारुतसानूपं श्रमात् तत्र सुखस्थितौ ॥ १० ॥
सरोवरके तटपर आकर वे दोनों परिश्रमके कारण वहाँ सुखपूर्वक बैठ गये । वह स्थान मुनियों और सिद्धोंसे सेवित था तथा उस सजल प्रदेशमें मंद-मंद वायु इस प्रकार चल रही थी मानो व्यंजन डुला रही हो ॥ १० ॥

ततो जनाः सरः सर्वे विगाह्य श्रमकर्पिताः ।
बिसान् प्रवालान् पद्मानां भक्षयामासुरातर्वत् ॥ ११ ॥
तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए सब लोग उस सरोवरमें स्नान करके भूखसे पीड़ित हुएकी भाँति भसींड़ और कमलगट्ठा खाने लगे ॥ ११ ॥

जनार्दनेन सहितौ हंसो डिम्भक एव च ।
सरः कचित् समाश्रित्य श्रमं संत्यज्य तिष्ठतः ॥ १२ ॥
जनार्दनसहित हंस और डिम्भक भी उस सरोवरके किसी तटका आश्रय लेकर अपना परिश्रम दूर करके बैठे हुए थे १२