भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1071

भविष्यपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः १०४५


गया। वे मौनव्रतका आश्रय लेकर उन दिनों पाँच वर्षोंतक उत्साहपूर्वक तपस्यामें लगे रहे । उन दोनोंके तप और संयमसे भगवान् शंकरको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उन दोनोंको अपने स्वरूपका दर्शन दिया । उस समय उनके श्रीअङ्गोंपर व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पा रहा था। वे पापहारी, त्रिनेत्रधारी और कल्याणकारी उमावल्लभ भगवान् शिव हाथमें त्रिशूल लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९३॥

अग्रतः संस्थितं शर्वं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
तौ दृष्ट्वा प्रीतमनसौ नमश्चक्रतुरञ्जसा ॥ १०॥

चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवको अपने सामने खड़ा देख वे दोनों प्रसन्नचित्त हो उन्हें वारंवार नमस्कार करने लगे ॥

श्रीभगवानुवाच
वरं वरय भद्रं वां यथेच्छा वां तथास्तु वै।
तावूचतुस्तदा राजन् प्रीतस्त्वं भगवन् यदि ॥ ११॥
देवासुरचमूमूख्यैर्यक्षगन्धर्वदानवैः ।
आवामजय्यौ सर्वात्मन्नेष नौ प्रथमो वरः ॥ १२ ॥

तब श्रीभगवान् बोले—राजकुमारो ! तुम दोनोंका कल्याण हो ! तुम कोई वर माँगो ! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वह पूर्ण हो। राजन् ! यह सुनकर वे दोनों बोले—'भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो हम आपकी कृपासे देवताओं और असुरोंके मुख्य-मुख्य सेनापतियों, यक्षों, गन्धर्वों और दानवोंके लिये भी अजेय हो जायें । सर्वात्मन् ! यही हम दोनोंका पहला वर है ॥ ११-१२ ॥

द्वितीयो नौ विरूपाक्ष रौद्रास्त्राणां च संग्रहः ।
माहेश्वरं तथा रौद्रमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत् ॥ १३ ॥

'विरूपाक्ष ! हमारा दूसरा वर यह है कि हमारे पास सभी भयंकर अस्त्रोंका संग्रह हो । माहेश्वरास्त्र, रौद्रास्त्र तथा महान् ब्रह्मशिर नामक अस्त्र हमें उपलब्ध हों ॥ १३ ॥

अभेद्यं कवचं दिव्यमच्छेद्यं चापि कार्मुकम् ।
परशुं च तथा शर्व सदा रक्षार्थमेव च ॥ १४॥

'शर्व ! अभेद्य कवच, दिव्य एवं अच्छेद्य धनुष और परशु—ये सदा हमें रक्षाके लिये सुलभ हों ॥ १४ ॥

सहायौ द्वौ महादेव भूतौ युद्धे हि गच्छताम् ।
एवमस्त्विति देवेश आह भृङ्गिरिटी हरः ॥ १५॥
कुण्डोदरं विरूपाक्षं सर्वप्राणिहिते रतम् ।
युवामथ च भूतेशौ सहायौ सततं रणे ॥ १६ ॥
संग्रामं गच्छतां घोरमेतयोर्बलशालिनोः ।
इत्युक्त्वा भगवाञ्छर्वस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १७ ॥

'महादेव ! युद्धमें आपके दो-दो भूत हमारी सहायताके लिये जाया करें।' तब देवेश्वर हरने 'ऐसा ही होगा', यह कहकर अपने दो पार्षद भृङ्गि और रिटिके तथा कुण्डोदर एवं समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले विरूपाक्षसे कहा—'तुम दोनों दो-दो करके दो भूतैश्वर हो, तुम युद्धके अवसरपर सदा घोर-से-घोर संग्राममें इन दोनों बलशाली वीरोंकी सहायताके लिये अवश्य पहुँच जाना।' ऐसा कहकर भगवान् शर्व वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १५—१७ ॥

ततस्तौ वीर्यसम्पन्नौ हंसो डिम्भक एव च।
कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ चापिनौ वीर्यवत्तरौ ॥ १८॥

तदनन्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न हंस और डिम्भक सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, अस्त्र-शस्त्रोंके सञ्चयसे युक्त, धनुर्धर एवं अत्यन्त बलवान् हो गये ॥ १८ ॥

आमुक्तकवचौ वीरावजय्यौ देवदानवैः ।
अत्यन्तभक्तौ देवेशे शंकरे नीललोहिते ॥ १९॥

कवच बाँधकर वे दोनों वीर जब युद्धमें खड़े होते, उस समय देवता और दानवोंके लिये भी उन्हें जीतना असम्भव हो जाता था । नीललोहित भगवान् शंकरमें उन दोनोंकी बड़ी भक्ति थी ॥ १९ ॥

नित्योत्सवकरौ देवे भस्मोद्धूलनशोभिनौ ।
कृतत्रिपुण्ड्रकौ नित्यं जटायुक्तशिरोधरौ ॥ २० ॥

वे महादेवजीके लिये नित्य उत्सव रचाते, अपने अङ्गोंमें भस्म लगाकर सुशोभित होते, ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते और सदा सिरपर जटाएँ धारण करते थे ॥ २० ॥

रुद्राक्षार्पितसर्वाङ्गौ व्याघ्रचर्माम्बरावृतौ ।
नमः शिवाय शान्ताय महादेवाय धीमते ॥ २१ ॥
इत्यादिभिर्महादेवं स्तुवन्तौ नामभिः शिवम् ।
साक्षादिव महादेवौ रेजतुर्जलधारिणौ ॥ २२ ॥

सारे अङ्गोंमें रुद्राक्ष धारण करते, अपने अङ्गोंको व्याघ्रचर्मसे आच्छादित करते और 'परमबुद्धिमान् शान्तस्वरूप महान् देव शिवको नमस्कार है' इत्यादि नामोंद्वारा महादेव शिवकी स्तुति करते थे । इस प्रकार वे दोनों अपनी भीगी जटाओंमें जल धारण करके साक्षात् गङ्गाधर महादेवके दो विग्रहोंके समान शोभा पाते थे ॥ २१-२२ ॥

ततः स्वभवनं गत्वा पितुः पादावगृह्णताम् ।
पितुश्च सख्युर्बलिनौ मातुश्च चरणौ तदा ॥ २३॥

तदनन्तर उन दोनों बलवान् वीरोंने अपने घर जाकर पिताके चरण पकड़े, पिताके सखा मित्रसहके पैर छुये और माताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २३ ॥

जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कालेन महता नृप ।
विद्यापारं महाबुद्धिर्युक्तेनासादुपेयिवान् ॥ २४॥

नरेश्वर ! परम बुद्धिमान् धर्मात्मा जनार्दनने भी दीर्घकालतक अध्ययन करके योगयुक्त होकर सम्पूर्ण विद्याओंमें पारङ्गत योग्यता प्राप्त की ॥ २४ ॥

स च विष्णुं हृषीकेशं पीतकौशेयवाससम् ।
ब्रह्मतत्त्वपरो नित्यमुपास्ते विजितेन्द्रियः ॥ २५ ॥