भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1070
१०६४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

कृपासे प्राप्त हुए दो महापराक्रमी पुत्रोंको क्रमशः जन्म दिया था ॥ १३३ ॥
स तयोश्च महाराज नामकर्मादिकाः क्रियाः ॥ १४ ॥
चकार विधिवत् सर्वा विप्रेभ्योऽदान्महद्धनम् ।
महाराज जनमेजय ! ब्रह्मदत्तने उन दोनों पुत्रोंके नाम-कर्म आदि सारे संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये और ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया ॥ १४३ ॥
स च विप्रो विनीतात्मा पुत्रमेकं द्विलब्धवान् ॥ १५ ॥
साक्षादिव जगन्नाथं स्थितं पुत्रात्मना नृप ।
नरेश्वर ! विनयशील हृदयवाले ब्राह्मण मित्रसहने भी एक पुत्र प्राप्त किया, जिसके रूपमें मानो साक्षात् जगन्नाथ श्रीहरि ही उनके घरमें आ गये हों ॥ १५३ ॥
जातकर्मोदिकं सर्वं ब्राह्मणः स चकार ह ॥ १६ ॥
ब्राह्मणने भी पुत्रके जातकर्म आदि सभी संस्कार पूर्ण किये ॥ १६ ॥
तौ कुमारावयं चैव त्रयः सवयसोऽभवन् ।
वेदानधीत्य ते सर्वाञ्छुत्वा चान्वीक्षिकीं तथा ॥ १७ ॥
धनुर्वेदे तथाऽस्त्रे च निपुणास्तेऽभवंस्तदा ।
वे दोनों राजकुमार और यह ब्राह्मणपुत्र तीनों ही समवयस्क थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके आन्वीक्षिकी विद्या ( वेदान्त आदि) का नुशीलन करनेके पश्चात् धनुर्वेद तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञान निपुणता प्राप्त की ॥ १७३ ॥
हंसोज्येष्ठो नृपसुतो डिम्भकोऽनन्तरोऽभवत् ॥ १८ ॥
स च विप्रसुतो राजन् जनार्दन इति स्मृतः ।
अन्योन्यं मित्रतां याताः सर्वे चैव कुमारकाः ॥ १९ ॥
ज्येष्ठ राजकुमारका नाम हंस था और उससे छोटा डिम्भक नामसे प्रसिद्ध हुआ । राजन् ! ब्राह्मणपुत्रका नाम जनार्दन रखा गया था । वे सभी कुमार एक दूसरेके प्रति मित्रभाव रखते थे ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भोत्पत्तौ चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भककी उत्पत्तिविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥


पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भककी तपस्या, वरप्राप्ति, जनार्दनसहित उन दोनोंका विवाह तथा तीनों कुमारोंकी धर्मनिष्ठा

वैशम्पायन उवाच
हंसश्च डिम्भकश्चैव तपश्चर्तुं महामती ।
मनश्चक्रतुरात्मांशौ शंकरस्य नृपोत्तम ॥ १ ॥
वैशम्पायनजीने कहा — नृपश्रेष्ठ ! राजकुमार हंस और डिम्भक भगवान् शंकरके अपने अंशसे उत्पन्न और परम बुद्धिमान् थे। उन दोनोंने तपस्या करनेका विचार किया ॥ १ ॥

गत्वा तु हिमवत्पार्श्वं तपश्चक्रतुरञ्जसा ।
उद्दिश्य शंकरं शर्वं नीलग्रीवमुमापतिम् ॥ २ ॥
वीर्यास्त्रे चैव नौ स्यातामित्याधाय तु मानसे ।
एकाग्रौ प्रयतौ भूत्वा वाय्वम्बुप्राशिनौ नृप ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! हिमालयके पास जाकर वायु और जलका आहार करते हुए वे दोनों एकाग्र एवं संयतचित्त हो मनमे यह संकल्प लेकर कि'हमें दिव्य पराक्रम और अस्त्र प्राप्त हो जायें' कल्याणकारी कष्टहारी नीलकण्ठ भगवान् उमापतिकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे सानन्द तपस्या करने लगे ॥ २-३ ॥

नमस्ते देवदेवेति शंकरेति दिवानिशम् ।
हर शर्व शिवानन्द नीलग्रीव उमापते ॥ ४ ॥
वृषध्वज विरूपाक्ष हर्यक्ष जगतां पते ।
भक्तप्रिय गिरीशेश वासुदेव शिवाच्युत ॥ ५ ॥
सद्योजात महादेव देवदेव गुहाशय ।
भूतभावन देवेश प्रणवात्मन् सदाशिव ॥ ६ ॥
इत्यादिनामभिर्नित्यं स्तुवन्तौ शंकरं भवम् ।
हृदि कृत्वा विरूपाक्षं तपस्तेपतुरञ्जसा ॥ ७ ॥
वे दिन-रात देवाधिदेव ! शंकर ! हर ! शर्व ! शिवानन्द ! नीलग्रीव ! उमापते ! वृषभध्वज ! विरूपाक्ष ! हर्यक्ष! जगत्पते ! भक्तप्रिय ! गिरीश ! ईश ! वासुदेव ! शिव ! अच्युत ! सद्योजात ! महादेव ! देवदेव ! अन्तर्यामीरूपसे हृदयगुहामें शयन करनेवाले ! भूतभावन ! देवेश्वर ! ॐकारस्वरूप ! सदाशिव ! आपको नमस्कार है । इत्यादि रूपसे भगवान्‌के नामोंद्वारा नित्य-निरन्तर कल्याणकारी भगवान् भवकी स्तुति करते हुए उन्हीं भगवान् विरूपाक्ष (शिव ) को हृदयमें धारण करके सुखपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ ४–७॥

निर्ममौ निरहंकारौ मौनव्रतसमास्थितौ ।
वर्षाणीह तदा राजन् पञ्च चक्रतुरोजसा ॥ ८ ॥
ततः प्रीतोऽभवच्छर्वस्ताभ्यां संयमनेन च ।
स ददौ दर्शनं नैजं व्याघ्रचर्माम्बरो हरः ॥ ९ ॥
त्र्यक्षः शंकरः शर्वः शूलपाणिरुमापतिः ।
राजन् ! उनमें ममता और अहंकारका अभाव हो