भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1069, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1069

भविष्यपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः [ १०४३


दानव विचक्र दुर्जय वीर था। वह युद्धकी इच्छासे यादवोंकी त्रुटि या दुर्बलता देखा करता था। देवताओं और असुरोंके महायुद्धमें वह देवताओंपर विजय पाता था और भगवान् श्रीकृष्ण उसके वधके लिये सदा प्रयत्नशील रहते थे॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने जनमेजयवाक्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकके उपाख्यानके प्रसङ्गमें जनमेजयका वाक्यविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥


चतुरधिकशततमोऽध्यायः

राजा ब्रह्मदत्तको भगवान् शङ्करकी आराधनासे हंस और डिम्भक नामक पुत्रोंकी प्राप्ति तथा राजसखा विप्रवर मित्रसहको भगवान् विष्णुकी उपासनासे जनार्दन नामक पुत्रका लाभ

वैशम्पायन उवाच
आसीच्छाल्वेषु राजेन्द्र ब्रह्मदत्तो नृपोत्तमः ।
नाम्ना राजन् स पूतात्मा सर्वभूतदयापरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजेन्द्र ! शाल्वदेशमें ब्रह्मदत्त नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा राज्य करते थे। राजन् ! उनका हृदय बड़ा ही पवित्र था। वे सम्पूर्ण भूतोंपर दयाभाव बनाये रखते थे ॥ १ ॥

पञ्चयज्ञपरो नित्यं जितात्मा विजितेन्द्रियः।
ग्रहविद् वेदविच्चैव सदा यज्ञमयः शिवः ॥ २ ॥
सदा पञ्चयज्ञका अनुष्ठान करते तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते थे। वे ग्रहवेत्ता और वेदवेत्ता थे तथा सदा यज्ञके अनुष्ठानमें लगे रहते थे। राजा ब्रह्मदत्त सबके लिये कल्याणकारी थे ॥ २ ॥

तस्य भार्ये महीपाल रूपौदार्यगुणान्विते ।
बभूवतुः सुसम्पन्ने अनपत्ये नृपोत्तम ॥ ३ ॥
महीपाल ! नृपश्रेष्ठ ! उनके रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न दो पत्नियाँ थीं, उनमें सारे गुण होनेपर भी उन दोनोंके कोई संतान नहीं हुई ॥ ३ ॥

स ताभ्यां मुमुदे राजा शच्या शक्र इवाम्बरे ।
नाम्ना मित्रसहो नाम सखा चासीद् द्विजोत्तमः॥ ४ ॥
तस्य राज्ञो महायोगी वेदवेदान्ततत्परः ।
अनपत्यः स विप्रेन्द्रो यथा राजा बभूव ह ॥ ५ ॥
जैसे स्वर्गमें इन्द्र शचीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं, उसी प्रकार राजा ब्रह्मदत्त उन दोनों पत्नियोंके साथ सदा आनन्दमग्न रहते थे। राजाके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण मित्र थे, जिनका नाम था मित्रसह । वे महान् योगी तथा वेद और वेदान्तके अनुशीलनमें तत्पर रहनेवाले थे। वे ब्राह्मणशिरोमणि भी राजाके ही समान संतानहीन थे ॥ ४-५ ॥

स राजा सहितस्ताभ्यामर्चयामास शंकरम् ।
पुत्रार्थं शूलिनं शर्वं दश वर्षाण्यनन्यधीः ॥ ६ ॥
राजाने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रहकर पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो दस वर्षोंतक शूलधारी भगवान् शंकरकी आराधना की ॥ ६ ॥

स विप्रो वैष्णवं सत्रं पुत्रार्थं समयोजयत् ।
अर्चितस्तेन राजेन्द्र शंकरो नीललोहितः ॥ ७ ॥
आत्मानं दर्शयामास स्वप्ने राजानमब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते वरं वरय सुव्रत ॥ ८ ॥
राजेन्द्र ! ब्राह्मण मित्रसहने पुत्रके लिये वैष्णवयागका अनुष्ठान किया। राजा ब्रह्मदत्तके द्वारा पूजित हुए नीललोहित भगवान् शंकरने स्वप्नमें उन्हें अपने दिव्य रूपका दर्शन कराया और कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम्हारा कल्याण हो ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो' ॥ ७-८ ॥

अथ राजा जगन्नाथमुवाचेदं स्मयन्निव ।
पुत्रौ मम भवेतां हि तथेत्युक्त्वा वृषध्वजः ॥ ९ ॥
अन्तर्धानं गतः शम्भुः प्रतिबुद्धस्ततो नृपः ।
राजाने मुसकराते हुए-से भगवान् विश्वनाथसे यह बात कही—'प्रभो ! मेरे दो पुत्र हों।' तब 'तथास्तु' ( ऐसा ही हो ) यह कहकर वृषभध्वज भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् राजाकी नींद खुल गयी ॥ ९ १/२ ॥

सोऽपि मित्रसहो विद्वान् देवं केशवमव्ययम् ॥ १० ॥
पञ्चवर्षं जगन्नाथमर्चयामास भक्तितः ।
विद्वान् मित्रसहने भी अविनाशी जगदीश्वर भगवान् केशवकी पाँच वर्षोंतक बड़े भक्तिभावसे आराधना की ॥१० १/२॥

अर्चितस्तेन विप्रेण देवदेवो जनार्दनः ॥ ११ ॥
पुत्रमेकं ददौ तस्मै स्वात्मना सदृशं हरिः ।
उन ब्राह्मणसे पूजित हो देवाधिदेव जनार्दन हरिने उन्हें अपने ही-जैसा एक पुत्र प्रदान किया ॥ ११ १/२ ॥

ते भार्ये गर्भमाधत्तां तेजसा शंकरस्य ह ॥ १२ ॥
विप्रभार्या महाराज वैष्णवं तेज आदधत् ।
महाराज ! राजाकी उन दोनों पत्नियोंने भगवान् शंकरके तेजसे गर्भ धारण किया और ब्राह्मणकी पत्नीने वैष्णव तेजको ही गर्भके रूपमें धारण किया ॥ १२ १/२ ॥

महिष्यौ ते महावीर्यौ पुत्रौ शंकरनिर्मितौ ॥ १३ ॥
असूयेतां महीपाल क्रमेणैव नृपस्य ह।
महीपाल ! राजाकी उन दो रानियोंने भगवान् शंकरकी