विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| १०४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्पर रहकर नित्य-निरन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक, रेशमी पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुकी उपासना करता था ॥ २५ ॥
हंसश्च डिम्भकश्चैव कृतदारौ बभूवतुः ।
जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कृतदारो बभूव ह ॥ २६ ॥
हंस और डिम्भकके विवाह हो गये, फिर धर्मात्मा जनार्दनने भी पत्नीका पाणिग्रहण किया ॥ २६ ॥
सर्वे ते यज्ञनिरताः पञ्चयज्ञपरास्तथा ।
स्वदारनिरताः सर्वे गुरुशुश्रूषणे रताः ।
धर्म एव परं श्रेय इति ते मेनिरे नृप ॥ २७ ॥
वे सब-के-सब यज्ञमें तत्पर, पञ्चयज्ञपरायण और अपनी ही पत्नीमें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते थे । नरेश्वर ! वे यह मानते थे कि 'धर्म ही परम कल्याण करनेवाला है' ॥ २७ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भककी मृगया
वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचित् तौ वीरौ मृगयामादतुः किल ।
जनार्दनेन सहितौ रथैरश्वैर्गजैरपि ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर किसी समय वे दोनों वीर हंस और डिम्भक जनार्दनको साथ ले रथ, हाथी और अश्वोंद्वारा शिकार खेलनेके लिये गये ॥
वनं गत्वा तु तौ वीरौ सिंहव्याघ्रांश्च जघ्नतुः ।
शितैर्वाणैर्महाराज वराहांश्च सर्वशः ॥ २ ॥
महाराज ! वनमें जाकर वे दोनों वीर अपने पैने बाणों द्वारा सिंहों, व्याघ्रों और वराहोंका सब प्रकारसे वध करने लगे ॥ २ ॥
व्यालानन्यान् मृगान् हिंस्राञ्श्वभिश्च सहितौ नृप ।
एष आयाति विपुलौ वराहो दीर्घलोचनः ॥ ३ ॥
एनं बाणेन संछिन्धि याति चायं मृगाधिपः ।
अयमन्योऽथ महिषः शृङ्गप्रोत्सरसीसृपः ॥ ४ ॥
एते खलु मृगाः सार्धं शावैर्बाधन्ति सर्वशः ।
एतद् भ्रमति सर्वत्र भीतं शशकुलं महत् ॥ ५ ॥
शावं स्तनं पिवत्साधु न हन्तव्यमिदं शुभम् ।
ग्रहीतव्यमिदं सर्वे निरुध्य श्वगणैरिह ॥ ६ ॥
इत्यादिशब्दः सुमहान् मृगयां कुर्वतां नृप ।
क्षत्रियाणां नृपश्रेष्ठ व्याधानां चैव धावताम् ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! सर्पों तथा अन्यान्य हिंसक पशुओंका कुत्तोंके साथ रहकर उन दोनों भाइयोंने वध किया । नृपश्रेष्ठ ! उस समय शिकार खेलते हुए इधर-उधर दौड़नेवाले क्षत्रियों और व्याधोंका यह महान् शब्द सब ओर सुनायी देता था, 'यह बड़े-बड़े नेत्रोंवाला विशाल वराह आ रहा है । यह सिंह जा रहा है, इसे बाणद्वारा काट डालो । यह दूसरा भैंसा जा रहा है, इसके सींगमें सर्प गुँथ गया है । ये मृग अपने बच्चोंके साथ बाधाका अनुभव करते हुए भाग रहे हैं। यह खरगोशोंका महान् समुदाय भयभीत होकर सर्वत्र भटक रहा है । यह छोटा बच्चा स्तन पी रहा है, इसे नहीं मारना चाहिये, ऐसा करनेमें ही भलाई है । इन सबको कुत्तोंसे घेरकर जीवित ही पकड़ लेना चाहिये' इत्यादि ॥ ३—७ ॥
हत्वा मृगान् सुबहुशो व्याघ्रान् सिंहान् नृपोत्तमौ ।
श्रमं च जग्मतुर्वीरौ मध्यं याते दिवाकरे ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ वीर हंस और डिम्भक दोपहर होते-होते बहुत से हिंसक पशुओं, व्याघ्रों और सिंहोंको मारकर अधिक श्रमके कारण थक गये ॥ ८ ॥
अलं हि मृगयास्माकं श्रमः समुपजायते ।
इत्यूचतुर्महाराज पुष्करं जग्मतुः सरः ॥ ९ ॥
महाराज ! वे दोनों बोले—'अब शिकार बंद किया जाय, हमें थकावट हो रही है ।' यों कहकर वे पुष्कर सरोवरकी ओर चले गये ॥ ९ ॥
सरःसमीपमागम्य मुनिसिद्धनिषेवितम् ।
वीजन् मारुतसानूपं श्रमात् तत्र सुखस्थितौ ॥ १० ॥
सरोवरके तटपर आकर वे दोनों परिश्रमके कारण वहाँ सुखपूर्वक बैठ गये । वह स्थान मुनियों और सिद्धोंसे सेवित था तथा उस सजल प्रदेशमें मंद-मंद वायु इस प्रकार चल रही थी मानो व्यंजन डुला रही हो ॥ १० ॥
ततो जनाः सरः सर्वे विगाह्य श्रमकर्पिताः ।
बिसान् प्रवालान् पद्मानां भक्षयामासुरातर्वत् ॥ ११ ॥
तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए सब लोग उस सरोवरमें स्नान करके भूखसे पीड़ित हुएकी भाँति भसींड़ और कमलगट्ठा खाने लगे ॥ ११ ॥
जनार्दनेन सहितौ हंसो डिम्भक एव च ।
सरः कचित् समाश्रित्य श्रमं संत्यज्य तिष्ठतः ॥ १२ ॥
जनार्दनसहित हंस और डिम्भक भी उस सरोवरके किसी तटका आश्रय लेकर अपना परिश्रम दूर करके बैठे हुए थे १२
भविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४७
विश्रम्य सरसस्तीरे तदाऽऽसाते सुखं नृपौ।
अशृण्वतां परं ब्रह्म मुनिमुख्यैः समीरिताम् ॥ १३ ॥
सरोवरके तटपर विश्राम लेकर वे दोनों नरेश वहाँ सुख-पूर्वक बैठे ही थे कि उसी समय प्रधान-प्रधान मुनियोंद्वारा उच्चारित उत्तम वेदवाणी उन्हें सुनायी दी ॥ १३ ॥
मध्यन्दिनं तथा सर्वैः सवनं सस्वरं नृपौ।
ततः प्रीतौ नृपौ भूत्वा श्रुत्वा वेदध्वनिं तदा ॥ १४ ॥
ऐच्छेतां तौ तदा द्रष्टुं यज्ञं मुनिकृतं तदा।
उन राजकुमारोंने मध्यंदिन सवनके समय सबके साथ सस्वर वेदपाठ सुना। उस समय उस वेदध्वनिको सुनकर वे दोनों नरेश बड़े प्रसन्न हुए और मुनियोंद्वारा किये गये उस यज्ञको देखनेकी इच्छा करने लगे ॥ १४ १/२ ॥
स्थापयित्वा ततः सेनां सर्वां मृगसमन्विताम्॥ १५॥
आदाय च महाचापे शरान् कतिचिदेव च।
जनार्दनस्तदा वीरौ हंसो डिम्भक एव च ॥ १६ ॥
पदातिनौ महाराज जग्मतुश्चाश्रमं किल।
महर्षेः काश्यपस्याथ सत्रं वैष्णवसंज्ञकम्।
यजतो मुनिभिः सार्धं जपहोमपरायणैः ॥ १७॥
महाराज ! तदनन्तर मृगोंसहित उस सारी सेनाको वहीं ठहराकर स्वयं दो बड़े-बड़े धनुष और कुछ बाण लेकर जनार्दनसहित वे दोनों वीर हंस और डिम्भक पैदल ही उन महर्षि काश्यपके आश्रममें गये, जो जप और होममें तत्पर रहनेवाले मुनियोंके साथ वैष्णव सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे ॥ १५-१७॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने मृगयावर्णने षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें हंस और डिम्भककी मृगयाका वर्णनविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६॥
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
सेनासहित हंस और डिम्भकका पुष्कर-तटपर विश्राम, महर्षि कश्यपके वैष्णवसत्रका दर्शन तथा दुर्वासा आदि यतियोंके समुदायमें जाकर उनके प्रति अपनी अश्रद्धाका प्रदर्शन
वैशम्पायन उवाच
जनार्दनश्च धर्मात्मा हंसो डिम्भक एव च।
सदः प्रविश्य सत्रस्य नमश्चक्रुर्मुनीश्वरान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय धर्मात्मा जनार्दन, हंस और डिम्भकने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके उन मुनीश्वरोंको प्रणाम किया ॥ १ ॥
तानागतान् महात्मानो मुनयः शिष्यसंयुताः।
अर्घ्यपाद्यासनादीनि चक्रुः पूजां प्रयत्नतः ॥ २ ॥
शिष्योंसहित उन महात्मा मुनियोंने अर्घ्य, पाद्य तथा आसन आदि देकर वहाँ पधारे हुए उन अतिथियोंका यत्नपूर्वक सत्कार किया ॥ २ ॥
तौ नृपौ स च विप्रेन्द्रः सपर्यां प्रतिगृह्य च।
प्रीतात्मानो महात्मान आसते ससुखं नृप ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! वे दोनों राजकुमार और वह विप्रवर जनार्दन तीनों महामनस्वी पुरुष वह सत्कार ग्रहण करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर वहाँ सुखपूर्वक बैठे ॥ ३ ॥
ततो हंसो बभाषे तान् मुनीन् संयतवाङ्नृप ।
पिता हि नौ मुनिश्रेष्ठा यष्टुमैच्छत् ससाधनम् ॥ ४ ॥
राजन् ! तत्पश्चात् वाणीको संयममें रखनेवाले हंसने उन मुनियोंसे कहा—'मुनिश्रेष्ठगण ! हम दोनोंके पिता साधनसहित राजसूय यज्ञ करनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ४ ॥
गन्तव्यं तत्र युष्माभिः सत्रान्ते मुनिसत्तमाः।
राजसूयेन यज्ञेन कृत्वा दिग्विजयं वयम् ॥ ५ ॥
याजयिष्यामहे विप्राः पितरं धार्मिकं नृपम्।
आयान्तु तत्र विप्रेन्द्राः सशिष्याः सपरिच्छदाः॥ ६ ॥
'मुनिवरो ! इस सत्रके अन्तमें आपलोगोंको मेरे पिताके उस यज्ञमें पधारना चाहिये । ब्राह्मणो ! हमलोग दिग्विजय करके अपने पिता धर्मात्मा नरेशसे राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करायेंगे। उसमें शिष्यों तथा अग्निहोत्र आदि सामग्रियोंसहित आप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अवश्य पधारें ॥ ५-६॥
वयमह्यैव सहितौ दिशो जेष्यामहे वयम्।
शक्ता वयमिहैवैतत् कर्तुं सैनिकसंचयैः ॥ ७ ॥
आवयोः पुरतः स्थातुं न शक्ता देवदानवाः।
कैलासनिलयाद् देवाद् वरं लब्ध्वाः स्म यत्नतः ॥ ८ ॥
अजय्यौ शत्रुसंघानामस्त्राणि विविधानि च।
इत्युक्त्वा विररामैव हंसो मदबलान्वितः ॥ ९ ॥
'हम दोनों भाई सदा एक साथ रहनेवाले हैं। हमारे साथ जनार्दनजी भी हैं। हम तीनों आज ही दिग्विजय प्रारम्भ कर देंगे। यों तो अपने सैनिकसमूहोंद्वारा हमलोग ही इस यज्ञका अनुष्ठान कर सकते हैं; क्योंकि हमारे सामने युद्धमें दानव और देवता भी नहीं ठहर सकते। हमने कैलासवासी महादेवजीसे यत्नपूर्वक वर प्राप्त किया है। हम शत्रुसमूहोंके लिये अजेय हैं और हमारे पास नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं।' ऐसा कहकर बलके मदसे उन्मत्त हुआ हंस चुप हो गया ॥ ७-९॥
१०४८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
मुनय ऊचुः
यदि स्यात् तत्र गच्छामो वयं शिष्यैर्नृपोत्तम ।
आस्महे वान्यथा राजन्नित्यूचुः किल तापसाः ॥ १० ॥
मुनि बोले— नृपश्रेष्ठ ! यदि आपका यज्ञ होगा तो हम शिष्योंसहित उसमें अवश्य चलेंगे। राजन् ! अन्यथा (यदि वह यज्ञ नहीं हुआ तो) हम यहीं रहेंगे। ऐसा उन तपस्वी मुनियोंने उत्तर दिया ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो देशान् महाराज गन्तुं निश्चितमानसौ ।
पुष्करस्योत्तरं तीरं दुर्वासा यत्र तिष्ठति ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर उस स्थानसे जानेका निश्चय करके वे दोनों पुष्करके उत्तर तटपर गये, जहाँ दुर्वासा मुनि रहते थे ॥ ११ ॥
यतयो नियता भूत्वा मन्त्रब्रह्मनिषेविणः ।
ब्रह्मसूत्रपदे सक्तास्तदर्थालोकतत्पराः ॥ १२ ॥
वहाँ यतिगण शौच-संतोष आदि नियमोंमें तत्पर रहकर मन्त्रमय ब्रह्म (प्रणव) का जप एवं उसके अर्थका चिन्तन करते थे। ब्रह्मसूत्रके पदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहकर उनके अर्थ (ब्रह्म) के साक्षात्कारके लिये यत्नशील रहते थे ॥ १२ ॥
निर्ममा निरहंकाराः कौपीनाच्छादनव्रताः ।
तमात्मानं जगद्योनिं विष्णुं विश्वेश्वरं विभुम् ॥ १३ ॥
ब्रह्मरूपं शुभं शान्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ।
वेदान्तमूर्तिमव्यक्तमनन्तं शाश्वतं शिवम् ॥ १४ ॥
नित्ययुक्तं विरूपाक्षं भूताधारमनामयम् ।
ध्यायन्तः सर्वदा देवं मनसा सर्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
दुर्वाससा सदोपास्यं वेदान्तैकरसं गुरुम् ।
उनमें ममता और अहंकारका सर्वथा अभाव था। वे नियमपूर्वक कौपीन तथा आच्छादन वस्त्र धारण करते थे। जो सबके आत्मा, जगत्की उत्पत्तिके कारण, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण विश्वके नियन्ता, विभु, ब्रह्मस्वरूप, शुभ, शान्त, अक्षर (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, वेदान्तस्वरूप, अव्यक्त, अनन्त, सनातन, कल्याणमय, नित्ययुक्त, विरूपाक्ष (रुद्ररूप), सम्पूर्ण भूतोंके आधार, अनामय, सर्वतोमुख, दुर्वासाजीके द्वारा सदा उपासनीय, वेदान्तैकरस तथा गुरुस्वरूप हैं, उन परमात्मदेवका वे यतिगण अपने मनसे सदा ही चिन्तन करते थे ॥ १३-१५½ ॥
तर्कनिश्चिततत्त्वार्था ज्ञाननिर्मलचेतसः ॥ १६ ॥
हंसाः परमहंसाश्च शिष्या दुर्वाससः प्रभो ।
प्रभो ! वे हंस और परमहंससंज्ञक संन्यासी मुनिवर दुर्वासाके शिष्य थे। उन्होंने तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा परमार्थका निश्चय कर लिया था और ज्ञानके आलोकसे उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था ॥ १६½ ॥
गत्वा तत्र महात्मानौ तौ दृष्ट्वा तूर्ध्वरेतसम् ॥ १७ ॥
दुर्वाससं महाबुद्धिं विचिन्वानं परं पदम् ।
उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंने वहाँ पहुँचकर ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) परम बुद्धिमान् एवं परमपदके अनुसंधानमें लगे हुए दुर्वासा मुनिका दर्शन किया ॥ १७½॥
क्रुद्धो यदि स दुर्वासा दग्धुं लोकानिमान् क्षमः॥ १८ ॥
देवा अपि च यं द्रष्टुं क्रुद्धं वै न क्षमाः सदा ।
रोषमूर्तिः सदा यस्तु रुद्रात्मा विश्वरूपधृक् ॥ १९ ॥
वे दुर्वासामुनि यदि कुपित हो जायं तो इन सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेमें समर्थ हैं। कुपितावस्थामें देवता भी उनका दर्शन करनेका कभी साहस नहीं कर सकते। वे सदा रोषमूर्ति माने गये हैं। उन्हे विश्वरूपधारी रुद्रात्मा बताया गया है ॥ १८-१९ ॥
रक्तकौपीनवसनो हंसः परम एव च ।
दृष्ट्वैनं च तयोरेवं बुद्धिरासीन्महामते ॥ २० ॥
वे गेरुए रंगका कौपीन वस्त्र धारण किये हुए थे और परमहंसस्वरूपमें स्थित थे। महामते ! उनका दर्शन करके उन दोनों राजकुमारोंके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ— ॥ २० ॥
को नामासौ महाभूतः काषायी वर्णवित्तमः ।
कश्चायमाश्रमो नाम विहाय च गृहाश्रमम् ॥ २१ ॥
'यह कौन महाभूत है, जो काषायवस्त्र पहने हुए है, वर्ण-विभागके विद्वानोंमें यह श्रेष्ठ जान पड़ता है (क्योंकि इसमें किसी भी वर्णके चिह्न नहीं हैं!) तथा गृहस्थाश्रमको छोड़कर यह आश्रम भी कौन-सा है ? ॥ २१ ॥
गृहस्थ एव धर्मात्मा गृहस्थो धर्मवित्तमः ।
गृहस्थो धर्मरूपस्तु गृहस्थो वर्ण एव च ॥ २२ ॥
'गृहस्थ ही धर्मात्मा होता है, गृहस्थ ही धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ है, गृहस्थ ही धर्मस्वरूप है तथा गृहस्थ ही चातुर्वर्ण्यमय है ॥ २२ ॥
गृहस्थश्च सदा माता प्राणिनां जीवनं सदा ।
तं विनान्येन रूपेण वर्तते योऽतिमूर्खवत् ॥ २३ ॥
'गृहस्थ सदा सभी प्राणियोंका माताके समान पालन करनेवाला और सर्वदा उनके जीवनकी रक्षा करनेवाला है। उस आश्रमको छोड़कर जो दूसरे रूपसे बर्ताव करता है, वह अत्यन्त मूर्खके समान है ॥ २३ ॥
उन्मत्तोऽयं विरूपोऽयमथवा मूर्ख एव च ।
ध्यायन्निव सदा चायमास्ते वञ्चयितापि वा ॥ २४ ॥
'यह तो कोई पागल, विचित्र रूपधारी अथवा मूर्ख ही है। यह ध्यान करता हुआ-सा बैठा है; परंतु ठग ही जान पड़ता है ॥ २४ ॥
किमेते प्राकृतज्ञाना ध्यायन्त इति किंचन ।
वयमेतान् दुरारोहानाश्रमान्तरकण्टकान् ॥ २५ ॥
[ भविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४९
स्थापयिष्यामहे सर्वान् मन्दबुद्धीनिमान् गृहे।
बलादेव द्विजानेतान् मूढविज्ञानतत्परान् ॥ २६ ॥
'ये प्राकृत ज्ञानवाले मनुष्य क्यों कुछ ध्यान-सा कर रहे हैं, इनके लिये उन्नतिके पथपर आरूढ़ होना सर्वथा कठिन है। ये दूसरे आश्रमोंकी कल्पना करनेवाले हैं। हम इन समस्त मन्दबुद्धि द्विजोंको, जो मूढ ज्ञानमें तत्पर हैं, बलपूर्वक गृहस्थाश्रमके भीतर स्थापित करेंगे ॥ २५-२६ ॥
असम्राहगृहीतांश्च बालिशान् दुर्मतीनिमान्।
एषां शास्ता च को मूढो न विप्रो वयमत्र ह ॥ २७ ॥
धर्म्ये वर्त्मनि संस्थाप्य पुनर्यास्याव निर्वृतौ।
'क्योंकि ये मूर्ख लोग दुराग्रहसे गृहीत हैं और इनकी बुद्धि खोटी है। इन सबको उपदेश देनेवाला यह कौन मूर्ख बैठा है? यह ब्राह्मण तो नहीं है! अब हमलोग यहाँ आ गये हैं तो पहले इनके इस गुरुको ही धर्मके मार्गपर स्थापित करके फिर संतोषपूर्वक यहाँसे घरको जायेंगे' ॥२७॥
इति संचिन्त्य तौ वीरौ विप्रेण सहितौ नृप ॥ २८ ॥
जनार्दनेन राजानौ मोहाद् भाग्यक्षयान्नृप ।
समीपं तस्य राजेन्द्र यतेः संयतचेतसः ॥ २९ ॥
गत्वा च प्रोचतुरभौ दुर्वाससमतीन्द्रियम्।
यतींश्च नियतान् क्रुद्धौ राजानौ राजसत्तम ॥ ३० ॥
नरेश्वर ! ऐसा निश्चय करके ब्राह्मण जनार्दनके साथ वे दोनों वीर राजा मोह अथवा भाग्यक्षयके कारण उन संयतचित्त यतिके पास गये। राजेन्द्र ! नृपशिरोमणे ! वहाँ जाकर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राजाओंने इन्द्रियातीत दुर्वासा तथा नियमपरायण यतियोंसे इस प्रकार कहा २८-३०
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भकद्वारा संन्यासकी निन्दा तथा जनार्दनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन
हंसडिम्भकावूचतुः
ज्ञानलेशाद् विहीनात्मन् किं ते व्यवसितं द्विज ।
कश्चायमाश्रमो विप्र भवता यः समाश्रितः ॥ १ ॥
हंस और डिम्भक बोले-ओ द्विज ! यह तूने क्या करनेका निश्चय किया है ? तेरा अन्तःकरण तो लेशमात्र ज्ञानसे भी शून्य जान पड़ता है। विप्र ! तूने जिसका आश्रय लिया है, यह कौन-सा आश्रम है ? ॥ १ ॥
गृहमेधं परित्यज्य किं त्वया साधितं पदम्।
दम्भ एव भवान् व्यक्तं शङ्के नास्त्यत्र कारणम् ॥ २ ॥
गृहस्थाश्रमको त्यागकर तूने किस अभिलषित वस्तुकी सिद्धि प्राप्त कर ली है; मुझे संदेह है कि 'तू स्पष्ट ही मूर्तिमन् दम्भ है', इसके सिवा इस त्यागमें दूसरा कोई कारण नहीं है ॥ २ ॥
लोकांश्चेमान् सदा मूढ नाशयिष्यसि निर्वृतः।
एतान् सर्वान् विनेतासि नरके पातयिष्यसि ॥ ३ ॥
मूढ ! तू सदा इन सब लोगोंका नाश करेगा और इसीमें सुख मानेगा। इन सबका शिक्षक बना हुआ है, अतः अपने साथ इन्हें भी नरकमें गिरायेगा ॥ ३ ॥
स्वयं नष्टः परान् मूर्ख नाशयिष्यसि यत्नतः।
अहो शास्ता कथं नास्ति तव मन्दमतेर्द्विज ॥ ४ ॥
सर्वथा त्वद्विनेता च पापो नास्त्यत्र संशयः ।
मूढ ब्राह्मण ! तू स्वयं तो नष्ट हो ही गया है, दूसरोंका भी यत्नपूर्वक नाश करेगा। अहो ! तुझ मन्दबुद्धि द्विजका कोई शासन क्यो नहीं करता है ? जिसने तुझे ऐसी शिक्षा दी है, वह भी सर्वथा पापी है; इसमें संशय नहीं है ॥४॥
त्यक्त्वेममाश्रमं विप्र गृही भव यतात्मवान् ॥ ५ ॥
पञ्च यज्ञान् सदा विप्र कुरु यत्नपरो भव ।
ततः स्वर्गं परं गत्वा स्वर्गे हि सुमहत् सुखम् ॥ ६ ॥
एष श्रेयःपथो विप्र जीविते चेत् स्पृहा तव।
विप्र ! इस आश्रमको छोड़कर गृहस्थ हो जा और मनको संयममे रख । ब्रह्मन् ! पाँच महायज्ञोंका अनुष्ठान कर और इसीके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रह। तदनन्तर उत्तम स्वर्गलोकमे जाकर सुखी हो जा; क्योंकि स्वर्गलोकमें महान् सुख प्राप्त होता है। बाबाजी ! यही कल्याणका मार्ग है; यदि तुझे जीनेकी इच्छा हो तो यही कर ॥ ५-६॥
इत्युक्तवन्तौ धर्मात्मा श्रुत्वा विप्रो जनार्दनः ॥ ७ ॥
उवाच च यतिं दृष्ट्वा प्रणम्यासौ सुनीतवत् ।
धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दनने उन दोनोंकी कही हुई ऐसी बात सुनकर यति दुर्वासाकी ओर देखा और अत्यन्त विनीतकी भाँति उनके चरणोंमें प्रणाम करके अपने मित्रोंसे कहा-॥
मा ब्रूतामीदृशं वाक्यं राजानौ मन्दतेजसौ ॥ ८ ॥
अश्राव्यमीदृशं घोरं लोकयोरुभयोरपि ।
को वक्तुमीशो मन्दात्मा यदि जीवेत् सबान्धवः ॥ ९ ॥
'राजाओ ! तुम दोनोंकी बुद्धि और तेज दोनों मन्द हो गये हैं। मित्रो ! ऐसी बात मुँहसे न निकालो। ऐसा घोर अमङ्गलकारी वचन इहलोक और परलोकमें भी सुनने योग्य नहीं
| १०५० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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है; कौन मन्दबुद्धि मानव यदि वह बन्धु बान्धवोंसहित जीवित रहना चाहता हो तो ऐसी बात कह सकता है? ॥ ८-९ ॥
सर्वथा काल एवायं युवयोर्मन्दचेतसोः।
समाप्त मायुरः शेषो ब्रह्मदण्डहतौ युवाम् ॥ १०॥
'ये महात्मा तुम दोनों मन्दबुद्धि राजाओंके लिये सर्वथा कालरूप ही हैं ! जान पड़ता है तुम्हारी शेष आयु भी आज समाप्त हो गयी । तुम दोनों ब्रह्मदण्डद्वारा मारे गये ॥ १० ॥
एते हि यतयः शुद्धा ज्ञानदीपितचेतसः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ॥ ११ ॥
'ये सब-के-सब शुद्ध हृदयवाले यति (संन्यासी) हैं। इनका अन्तःकरण ज्ञानके तेजसे प्रकाशित है। इन्होंने ज्ञानाग्निके द्वारा अपनी सारी संचित कर्मराशि दग्ध कर डाली है और ये अब अपने प्राणोंका ही प्राणस्वरूप अग्नियोंमें होम करते हैं ॥ ११ ॥
श्रुते वामीदृशं वाक्यं कः समर्थो ह्यनुब्रुवन्।
सर्वथा ज्ञातमस्माभिः समाप्तमिह जीवितम् ॥ १२ ॥
'ऐसे महात्माओंके प्रति तुम दोनोंको छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य बारंबार ऐसी अनुचित बात कहनेमें समर्थ है ? हमने सर्वथा समझ लिया, तुम दोनोंकी जीवनलीला यहीं समाप्त हो गयी ॥ १२ ॥
चत्वार आश्रमाः पूर्वमृषिभिर्विहिता नृपौ।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः ॥ १३ ॥
'नरेश्वरो ! मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंने पूर्वकालसे ही चार आश्रमोंका विधान किया है। उनके नाम इस प्रकार हैं— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक (संन्यासी) ॥ १३॥
तेषामग्र्यश्चतुर्थोऽयमाश्रमो भिक्षुकः स्मृतः।
आस्ते तस्मिन् महाबुद्धिः स हि पुण्यतरः स्मृतः॥ १४॥
'इनमें सबसे श्रेष्ठ यह चौथा आश्रम, जिसका नाम भिक्षु या संन्यास है, माना गया है। उस आश्रममें जिसकी महत्त्वपूर्ण बुद्धि है, वह महान् पुण्यात्मा बताया गया है ॥ १४ ॥
नोपासिता भवद्भ्यां च वृद्धाः सम्यग् विनीतवत्।
ज्ञानं नाप्तं तपस्विभ्यस्तथा चैवं वदेत कः ॥ १५॥
'तुम दोनोंने भलीभाँति विनीत पुरुषके समान कभी वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सेवा नहीं की है तथा तपस्वी मुनियोंसे ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, यह बात स्पष्ट हो गयी; अन्यथा उस प्रकार सत्सङ्ग एवं ज्ञान प्राप्त करनेवाला कौन पुरुष ऐसी बात कह सकता है ? ॥ १५ ॥
अश्राव्यमीदृशं घोरं मया प्राणभृता नृप।
किंकरिष्यामि मन्दात्मन् मित्रत्वाद् भवतो नृप॥ १६ ॥
'राजा हंस ! मैं प्राण रहते ऐसा घोर अनुचित शब्द नहीं सुन सकता; किंतु क्या करूँ ? मन्दात्मन् ! तू मेरा मित्र है, इसलिये कुछ करते नहीं बनता ॥ १६ ॥
ज्ञानं यदाप्तं भवता गुरुभ्य-
स्तदत्र दुःखाय हि केवलं नृप।
ज्ञानं हि धर्मप्रभवं यथेष्टं
बलाद्धि पापस्य विधातुरूपम् ॥ १७ ॥
'नरेश्वर ! तूने गुरुजनोंसे जो ज्ञान प्राप्त किया था, वह तो यहाँ केवल दुःखका ही जनक हुआ। जो ज्ञान धर्माचरणसे प्राप्त होता है, वही यथेष्ट फलकी प्राप्ति करानेवाला है । बल अथवा हठसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान तो पापका ही विधायक होता है ॥ १७ ॥
युवां विहाय यास्ये वा पतेयं वा शिलातलम्।
पिबेयं वा विषं घोरं पतेयं वा महोर्मिषु ॥ १८ ॥
'मैं तुम दोनोंको छोड़कर चला जाऊँ, या ऊँचेसे पत्थरपर कूद पहूँ अथवा घोर विष पी लूँ किंवा महासागरकी तरङ्गोंमें गिर जाऊँ ॥ १८ ॥
आत्मानं वात्र संत्यक्ष्ये पश्यतां शृण्वतां पुनः।
इत्युक्त्वा विललापैवं मा ब्रूतमिति तौ वदन् ॥ १९ ॥
'अथवा तुम सबके देखते-सुनते आत्महत्या कर लूँ।' ऐसा कहकर जनार्दन उन दोनों राजाओंसे 'ऐसी बात न कहो, न कहो' यह कहता हुआ इस प्रकार विलाप करने लगा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
नवाधिकशततमोऽध्यायः
दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्वासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
|---|---|
| ततः क्रुद्धोऽथ दुर्वासा धक्ष्यन्निव तयोस्तनू ।<br>एकेनाक्ष्णाथ दुर्वासा रौद्रेणाग्नियुजा सदा ॥ १ ॥ | जनमेजय ! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए दुर्वासाने सदा रौद्र अग्निसे युक्त एक नेत्रद्वारा इस प्रकार उन राजकुमारोंकी ओर देखा, |
भविष्यपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५१
मानो उन दोनोंके प्राणोंको दग्ध कर डालेंगे ॥ १ ॥
पश्यंस्तौ च दुरात्मानौ रोषव्याकुलेतेन्द्रियः।
कुर्वन्निव तदा लोकान् भस्मभूतानिमान् नृप ॥ २ ॥
नरेश्वर ! उनकी इन्द्रियाँ रोषसे व्याकुल हो रही थीं। वे उस समय उन दुरात्मा राजकुमारोंकी ओर इस तरह देख रहे थे मानो इन सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ २ ॥
ब्राह्मणं चक्षुषा पश्यन् सौम्येनान्येन केवलम् ।
उवाच वचनं राजन् ध्वंसत ध्वंसतेतरान् ॥ ३ ॥
साथ ही वे उस ब्राह्मण जनार्दनकी ओर दूसरे नेत्रसे, जो केवल सौम्यभावसे युक्त था, देख रहे थे। राजन् ! इस तरह देखते हुए वे उन राजाओंसे बोले—'अरे ! अपने स्वजनोंके पास भाग जाओ ! भाग जाओ !!' ॥ ३ ॥
इतो गच्छत राजानौ किं विलम्बत मा चिरम् ।
न वां वचनसम्भूतं रोषं धारयितुं क्षमे ॥ ४ ॥
'यहाँसे जाओ ! क्यों विलम्ब करते हो ! शीघ्र भाग जाओ ! राजाओ ! तुम दोनोंकी बातोंसे जो रोष प्रकट हुआ है, उसे मैं अपने भीतर रोक रखनेमें असमर्थ हूँ ॥ ४ ॥
अन्यथा वो महीपालान् सर्वान् दग्धुमहं क्षमः।
किमतः साहसं वक्तुं कश्च शक्नोति मत्परः ॥ ५ ॥
'चले जाओ ! नहीं तो मैं तुम सभी भूपालोंको जलाकर भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। इससे बढ़कर दुःसाहसकी बात और क्या होगी ? कौन मेरे सामने ऐसी बात कह सकता है ? ॥ ५ ॥
दर्पं वां लोकविख्यातः शङ्खचक्रगदाधरः।
व्यपनेष्यति मन्दबुद्धी किंवां वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ ६ ॥
'मन्दबुद्धि राजकुमारो ! इस समय तुम दोनोंसे क्या कहूँ ? तुम्हारे बढ़े हुए घमंडको शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लोकविख्यात भगवान् श्रीकृष्ण चूर्ण कर देंगे' ॥ ६ ॥
तत उत्थाय धर्मात्मा गन्तुमैच्छद् यतीश्वरः।
ततो निषेद्धुं हंसस्तं यतते स्म यतीश्वरम् ॥ ७ ॥
यह कहकर धर्मात्मा यतिराज दुर्वासा वहाँसे उठकर अन्यत्र जानेकी इच्छा करने लगे। तब हंस उन यतीश्वरको रोकनेका प्रयत्न करने लगा ॥ ७ ॥
तस्य बाहुं समादाय हंसो नृपवरोत्तम ।
कौपीनं चिच्छिदे क्रूरः कृतान्त इव सत्तम ॥ ८ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! साधुशिरोमणे ! कृतान्तके समान क्रूर हंसने दुर्वासाकी बाँह पकड़कर उनका कौपीन फाड़ डाला ॥ ८ ॥
यतयोऽन्ये पलायन्ति दिशो दश विचेतसः।
कष्टं हेति वदन् विप्रो मित्रभावाज्जनार्दनः ॥ ९ ॥
न्यवारयद् यथाशक्ति किमिदं साहसं त्विति ।
यह देख दूसरे यति होश-हवास खोकर दसों दिशाओंमें भागने लगे। ब्राह्मण जनार्दन मित्रताके कारण 'हाय ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहता हुआ विलाप करने लगा । उसने यथाशक्ति रोका और कहा—'यह क्या दुःसाहस कर रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
दुर्वासाः सत्यधर्मस्तु हन्तुमीशोऽपि तं ततः ॥ १० ॥
मन्दं मन्दमुवाचेदं हंसं डिम्भकमेव च।
सत्यधर्मपरायण दुर्वासा उसे मार डालनेमें समर्थ होते हुए भी उस समय हंस और डिम्भकसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले—॥ १०½ ॥
शापेनाहं समर्थोऽपि हन्तुं राजकुलाधमौ ॥ ११ ॥
तथापि न करोम्यन्तं यतयो ह्यत्र ते वयम्।
'राजवंशके नीच पुरुषो ! मैं शापद्वारा तुम दोनोंको मार डालनेमें समर्थ हूँ, तो भी तुम्हारा विनाश नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि यहाँ हमलोग यतिधर्ममें प्रतिष्ठित हैं ॥ ११½ ॥
यो हि देवो जगन्नाथः केशवो यादवेश्वरः ॥ १२ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिर्गर्वं वां व्यपनेष्यति।
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, यदुकुलके नायक तथा हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही तुम दोनोंके दर्पका दलन करेंगे ॥ १२½ ॥
लोके तस्मिन् यदुश्रेष्ठे रक्षत्येवं जगत्पतौ ॥ १३ ॥
युवयोः सर्वथा जीवः सञ्जीव इति मे मतिः।
'वे यदुश्रेष्ठ जगदीश्वर जब जगत्में इस प्रकार संरक्षण-कार्य कर रहे हैं, तब तुम दोनोंका पृथक्-पृथक् जीव सर्वथा श्रेष्ठ जीव है; ऐसा मेरा विश्वास है (क्योंकि उनके हाथसे मारे जानेपर तुम दोनोंकी सद्गति होगी) ॥ १३½ ॥
जरासंधोऽपि वां बन्धुः स च वक्तुं न चेच्छति ॥ १४ ॥
ईदृशं लोकविद्विष्टं स हि धर्मपथे सदा।
'तुम दोनोंका सहायक बन्धु जरासंध भी कभी ऐसी लोकनिन्दित बात मुँहसे नहीं निकालना चाहता है। वह सदा धर्मके मार्गपर स्थित रहता है ॥ १४½ ॥
एतावता स वां बन्धुर्न हि भूयो भविष्यति ॥ १५ ॥
विद्वेषो ह्यस्तु वां तस्य मागधस्य महीपतेः।
'तुम्हारे इस अपराधके कारण जरासंध अब फिर तुम्हारा बन्धु नहीं रह जायगा। उस मगधनरेशके साथ तुम्हारा विद्वेष हो जायगा ॥ १५½ ॥
श्रुत्वेदं घोररूपं तु स हि बन्धुः सहेत चेत् ॥ १६ ॥
धर्मनाशो भवेत् तस्य नात्र कार्या विचारणा।
'यदि तुम्हारे इस भयंकर अपराधको सुनकर भी वह बन्धुभावसे चुपचाप सह लेगा तो उसके भी धर्मका नाश हो जायगा। इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १६½ ॥
| १०५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
इत्युक्त्वा गच्छ गच्छेति हंसं प्राह पुनः पुनः॥ १७॥
जनार्दनमुवाचेदं दुर्वासा यतिसत्तमः।
स्वस्त्यस्तु तव विप्रेन्द्र भक्तिरस्तु जनार्दने ॥ १८॥
संस्तुतिस्तच तस्यास्तु शङ्खचक्रगदाभृतः।
अद्य श्वो वा परश्वो वा साधुरेव सदा भवान् ॥ १९॥
ऐसा कहकर दुर्वासाने पुनः हंससे बारंबार कहा—'चले जाओ! चले जाओ!' तदनन्तर यतिश्रेष्ठ दुर्वासा जनार्दनसे इस प्रकार बोले—'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो! भगवान् जनार्दनमें तुम्हारी भक्ति बनी रहे। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान्के साथ आज, कल या परसोंतक तुम्हारा समागम होगा। तुम सदा साधुस्वभावके ही बने रहोगे॥ १७-१९॥
न हि साधोर्विनाशोऽस्ति लोकयोरुभयोरपि।
गच्छ सर्वं पितुर्ब्रूहि ज्ञात्वा वृत्तं यथाखिलम् ॥ २०॥
'साधु पुरुषका दोनों लोकोंमें कभी विनाश नहीं होता। जाओ, सारी बातें जानकर अपने पिताको बताओ' ॥ २०॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासोभाषणे नवाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें दुर्वासाका भाषणविषयक एक सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०९॥
दशाधिकशततमोऽध्यायः
दुर्वासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन
वैशम्पायन उवाच
ततस्तौ हंसडिम्भकौ क्रुद्धौ कालेन चोदितौ।
शिक्यं कमण्डलुं चैव द्विदलं दारुमेव च ॥ १ ॥
दण्डान् पात्रविशेषांश्च छित्त्वा भित्त्वा च सर्वशः।
तस्मिन् देशे महाराज व्याधैर्मांसान्यदीदहन् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! तदनन्तर कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरे हुए हंस और डिम्भकने उन यतियोंके छींके, कमण्डलु, दो दलोंसे युक्त काष्ठमय भोजनपात्र, दण्ड और दूसरे-दूसरे विभिन्न पात्रोंको तोड़-फोड़कर उसी स्थानमें व्याधोंद्वारा मांस पकवाये॥ १-२॥
भक्षयित्वा ततो देशात् स्वपुरीं तौ प्रजग्मतुः।
जनार्दनश्च धर्मात्मा स्नेहादनुययौ तयोः ॥ ३ ॥
उन्हें खाकर वे दोनों उस स्थानसे अपने नगरको गये। धर्मात्मा जनार्दन भी स्नेहवश उन दोनोंका अनुसरण करता रहा॥ ३॥
नष्टाविमाविति तदा स मेने दुःखितः परम्।
उसने अत्यन्त दुःखित होकर यह विश्वास कर लिया कि अब इन दोनोंके नष्ट होनेमें कोई संदेह नहीं है॥ ३½॥
गतेषु तेषु सर्वेषु दुर्वासा यतिसत्तमः ॥ ४ ॥
पलायनपरान् सर्वानिदं प्राह यतीश्वरान्।
उन सबके चले जानेपर यतियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासाने यहाँसे पलायन करनेवाले समस्त यतीश्वरोंसे इस प्रकार कहा—॥४½॥
इतो देशाद् विनिर्गत्य पुष्करात् पुण्यसंयुतात् ॥ ५ ॥
मन्दं मन्दं समाश्वस्य विश्रम्य च ततस्ततः।
प्रविश्य द्वारकां देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा च तस्मै प्रभवे वक्ष्यामो यतिसत्तमाः।
'यतिवरो! इस पुण्ययुक्त देश पुष्करसे निकलकर धीरे-धीरे सुस्ताते और यत्र-तत्र विश्राम करते हुए द्वारकापुरीमें प्रवेश करके हमलोग शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे मिलेंगे और उनसे अपनी सारी कष्ट-कथा कहेंगे॥ ५-६½॥
स हि रक्षन्नगदिदं धर्मवर्त्मनि संस्थितः ॥ ७ ॥
आद्यो लोकगुरुर्विष्णुर्यतात्मा तत्त्ववित्प्रियः।
उद्धृत्य कण्टकान् सर्वाञ्छशास पृथिवीमिमाम् ॥ ८ ॥
'वे इस सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हुए धर्मके मार्गपर स्थित हैं। वे ही आदिपुरुष, लोकगुरु, सर्वव्यापी, मनको वशमें रखनेवाले और तत्त्ववेत्ताओंके प्रिय हैं। उन्होंने सारे कण्टकोंका उन्मूलन करके इस पृथिवीका शासन किया है॥७-८॥
स च पापान् महागोरान् सर्वान् पापकृतान् प्रभुः।
रक्षेन्नः शुक्लकान् सर्वाञ्ज्ञानेषु नियतात्मनः ॥ ९ ॥
'वे ही प्रभु समस्त महाभयंकर, पापजन्मा पापियोंका उच्छेद करके अमानित्व और अदम्भित्व आदि ज्ञानसाधनोंमें नियतरूपसे मन लगानेवाले हम सम्पूर्ण यतियोंकी रक्षा करेंगे॥ ९॥
इदमद्य क्षमं विप्रा यानमद्य विधीयताम्।
साहसं यत्कृतं ताभ्यां पात्रभेदादि सत्तमाः ॥ १०॥
एतत् सर्वमशेषेण दर्शयाम जनार्दनम्।
'ब्राह्मणो! इस समय यही हमारे योग्य है; अतः अब द्वारकाकी यात्रा करो। साधुशिरोमणियो! हंस और डिम्भकने जो हमारे पात्रोंके तोड़ने-फोड़ने आदिका दुःसाहस किया है, ये सारी वस्तुएँ हमलोग भगवान् जनार्दनको दिखायें'॥१०½॥
तथेति ते प्रतिज्ञाय यतयो ज्ञानचक्षुषः ॥ ११ ॥
छिन्नं ताभ्यां समादाय शिक्यं दारुमयं तथा।
द्विदलं कर्पटं चैव कौपीनमथ वल्कलम् ॥ १२ ॥
कमण्डलुं तथा राजन्नर्घप्रोतकपालकम्।
एतानन्यान समादाय द्रष्टुं केशवमाययुः ॥ १३ ॥
| १०५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
मध्यंदिने महाविष्णुः शैनेयेन सहाय्युतः।
विक्रीड्य सुचिरं कृष्ण उपारंसीत् स यादवः ॥ ८ ॥
उस दिन दोपहरके समय महाविष्णुस्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ देरतक गोलक्रीड़ा करके यादवोंसहित उससे विरत हो गये ॥ ८ ॥
द्वाःस्थेन वारिताः पूर्वं द्वार्यैव च समास्थिताः।
इदमन्तरमित्येव विविशुस्तां सभां नृप ॥ ९ ॥
राजन् ! जिन्हें द्वारपालने पहले भीतर आनेसे रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि 'यह भीतर प्रवेश करनेका अवसर है' ऐसा जानकर उस समय उस सभामें प्रविष्ट हुए ॥ ९ ॥
यतयो दीर्घतपसः पुरस्कृत्य तपोधनम्।
दुर्वाससं सुमनसो ददृशुर्यादवेश्वरम् ॥ १०॥
गोलक्रीडासमासक्तं करसंस्थितगोलकम् ।
पद्मपत्रविशालाक्षं विष्णुं तं सात्यकिं हरिम् ॥ ११ ॥
एकेनाक्ष्णा ह्लादयन्तं परेणान्येन गोलकम् ।
यतयश्च महाराज प्रत्यदृश्यन्त तत्पुरः ॥ १२ ॥
दीर्घकालसे तपस्या करनेवाले उन शुद्धचेता यतियोंने तपोधन दुर्वासाको आगे करके यादवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो पहले गोलक्रीड़ामें आसक्त थे और उस समय भी जिनके हाथमें गोल मौजूद था । वे प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्रसे सात्यकिको आनन्द प्रदान करते थे और दूसरेसे उस गोलकी ओर देख रहे थे । महाराज ! इसी समय वे यति उनके सामने दिखायी दिये ॥ १०—१२ ॥
वृष्णिपः पुण्डरीकाक्षः सात्यकिर्बलभद्रकः ।
वसुदेवोऽथवाक्रूर उग्रसेनस्तथा नृप ॥ १३ ॥
अन्ये च यादवाः सर्वे सम्भ्रमं प्रतिपेदिरे ।
इदं किमिदमित्येवं व्याशङ्कन्मनसोऽभवन् ॥ १४ ॥
वृष्णिपालक कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियोंको देखकर बड़ी घबराहटमें पड़ गये और शङ्कितचित्त होकर एक दूसरेसे पूछने लगे--'यह क्या है ? कैसी बात है ?' ॥
पृष्ठतोऽप्यनुगच्छन्ति दिधक्षन्तं जगत्त्रयम् ।
अर्घकौपीनवसनं स्मरन्तं कमपि द्विजम् ॥ १५ ॥
अन्तस्तापसमायुक्तं छिन्नदण्डधरं यतिम् ।
बड़ा संताप था । उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर रखा था । राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः वे भीतर-ही-भीतर रोषसे जल रहे थे । उनके नेत्रसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हो रही थी । वे यादवेश्वर श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे । इस अवस्थामें संन्यासी दुर्वासाको उन यादवशिरोमणियोंने भयभीत होकर देखा ॥ १५—१७ ॥
किं करिष्यत्यसौ क्रुद्धः किं वा वक्ष्यति नः प्रभुः।
इति प्राञ्जलयः सर्वे यादवाः प्रतिपेदिरे ॥ १८ ॥
इदमासनमित्येवं किंचिदुच्चुक्षु वृष्णयः ।
वे मन-ही-मन सोचने लगे--'पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे ? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इनसे क्या कहेंगे।' ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और वृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वरमें बोले--'भगवन् ! आपके लिये यह आसन है' ॥ १८ ३ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशः किंचिदुत्प्लुत्य तत्पुरः ॥ १९ ॥
इदमासनमित्येवं स्थीयतामिह निर्वृतः ।
अहमद्य स्थितो विप्र किंकरोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ २० ॥
इसी समय इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासाके आगे चले आये और बोले--'विप्रवर ! यह आसन है, इसपर सुखपूर्वक बैठिये । आज मैं आपकी सेवामें खड़ा हूँ, मैं आपका किङ्कर हूँ' ॥ १९-२० ॥
ततः किंचिदिवासीन आसने यतिविग्रहः ।
आसने संस्थिते तस्मिन् यतयो वीतमत्सराः ॥ २१ ॥
आसनानि यथायोगं भेजिरे निर्वृताः किल ।
तब वे संन्यासीरूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये । उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियोंने भी संतोषपूर्वक यथायोग्य आसन स्वीकार किये ॥ २१ ३ ॥
अर्घ्यादिसमुदाचारं चक्रे कृष्णः किरीटभृत् ॥ २२ ॥
आह भूयो हृषीकेशो यतिं दुर्वाससं प्रभुम् ।
किरीटधारी श्रीकृष्णने अर्घ्य आदिके क्रमसे उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया, फिर वे भगवान् हृषीकेश उन प्रभावशाली यति दुर्वासासे इस प्रकार बोले--॥ २२ ३ ॥
किमर्थं ब्रूहि विप्रेन्द्र अस्मिन् प्रत्यागमो हि वः ॥ २३ ॥
दृष्टं वा हाथवा किंचित् कारणं चास्ति वो महत् ।
'विप्रवर ! बताइये, इस नगरमें आपलोगोंका शुभागमन किस लिये हुआ है ? अथवा आपलोगोंको यहाँ आनेमें कोई महान् कारण दिखायी दिया है ? ॥ २३ ३ ॥
संन्यासिनो द्विजश्रेष्ठा यूयं विगतकल्मषाः ॥ २४ ॥
सदा यूयममत्तत्तो द्विजपुङ्गवाः ।
'आपलोग द्विजोंमें श्रेष्ठ एवं निष्पाप संन्यासी हैं;
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५३
तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सब ज्ञानदर्शी संन्यासी हंस और डिम्भकद्वारा छिन्न-भिन्न किये गये छींके, लकड़ीके बने हुए द्विदल (दो दलोंसे युक्त भोजन-पात्र, जो गौके कानकी-सी आकृतिका बना होता है), गेरुए वस्त्र, कौपीन, वल्कल तथा कमण्डलुका आधा टुकड़ा (जो पूरे कमण्डलुको बीचसे चीर डालनेके कारण दो खण्डोंमें विभक्त हो गया था)- इन सबको तथा अन्य सब तोड़ी-फोड़ी गयी वस्तुओंको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये आये ॥११-१३॥
पञ्च चैव सहस्राणि पुरस्कृत्य महामुनिम् । दुर्वाससं तपोनियोनीमीश्वरस्यात्मसम्भवम् ॥ १४ ॥ अहोरात्रेण ते सर्वे द्वारकां कृष्णपालिताम् । ययुर्दान्ता महात्मानो लोमशाः केशवर्जिताः ॥ १५ ॥
उनकी संख्या पाँच हजार थी, वे जितेन्द्रिय महात्मा सिरके केश मुड़ाये रहते थे और उनके शेष शरीर रोमावलियोंसे युक्त थे। वे यतिगण भगवान् शङ्करके अंशसे उत्पन्न हुए तपोयोनि महामुनि दुर्वासाको आगे करके दिनरात चलते हुए श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ १४-१५ ॥
प्रातः प्रविश्य राजेन्द्र वापिकायां यतीश्वराः । स्नात्वोपस्पृश्य ते सर्वे यत्नेन महता तदा ॥ १६ ॥ द्रष्टुमभ्युद्यता विष्णुं कण्टकोद्धृतितत्परम् । एकरूपं समास्थाय सुधर्मायामवस्थितम् ॥ १७ ॥
राजेन्द्र ! प्रातःकाल पुरीमें प्रवेश करके वे यतीश्वरगण वहाँकी एक बावड़ीमें स्नान और आचमन करके बड़े प्रयत्नसे उन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुए, जो एकरूप धारण करके सुधर्मा-सभामें विराजमान हो जगत्के कण्टकोंको उखाड़ फेंकनेके प्रयत्नमें लगे हुए थे ॥ १६-१७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतीनां द्वारकागमने दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें यतियोंका द्वारकागमनविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा-सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना और दुर्वासाका भगवान्की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच अथ सर्वेश्वरो विष्णुः पद्मकिंजलकलोचनः । श्यामः पीताम्बरः श्रीमान् प्रलम्बाम्बरभूषणः ॥ १ ॥ किरीटी श्रीपतिः कृष्णो नीलकुञ्चितमूर्धजः । अव्यक्तः शाश्वतो देवः सकलो निष्कलः शिवः ॥ २ ॥ क्रीडाविहारोपगतः कदाचिद्भवद्वरिः । कुमारैरपरैः सार्धं सात्यकिप्रमुखैर्नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! जो सबके ईश्वर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लंबे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित, मुकुट-मण्डित और लक्ष्मीके अधिपति हैं, जिनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारोंके साथ क्रीडा-विहारमें लगे हुए थे ॥ १—३ ॥
गोलक्रीडां सुधर्माया मध्ये यादवसत्तमः । चकार प्रियकृत् कृष्णो युयुधानेन केशवः ॥ ४ ॥
सुधर्मा-सभाके मध्यभागमें विराजमान हो सबका प्रिय करनेवाले यादवशिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकिके साथ गोल-क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ४ ॥
ममायं प्रथमो गोलस्तव पश्चाद् भविष्यति । इति ब्रुवंस्तदा विष्णुः सात्यकिं कमलेक्षणः ॥ ५ ॥
उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकिसे यह कह रहे थे कि 'यह पहला गोल मेरा है, तुम्हारा पीछे होगा' ॥
पार्श्वस्था यादवास्तस्य वसुदेवपुरोगमाः । उद्धवप्रमुखा राजन्नासेदुः क्वचिदत्र वै ॥ ६ ॥
राजन् ! उनके पार्श्वभागमे वसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थानपर बैठे थे ॥ ६ ॥
अन्यव्यापाररहितो भूतात्मा भूतभावनः । विजहार यथा रामः सुग्रीवेण पुरा नृप ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् श्रीराम अपने सखा सुग्रीवके साथ क्रीड़ा-विहार करते थे, उसी प्रकार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने सुहृदोंके साथ मनोरंजन करते थे ॥ ७ ॥
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५५
विप्रवरो ! आपलोग हम-जैसे गृहस्थोंसे सदा निःस्पृह रहते हैं ॥ २४१/२ ॥
प्रार्थ्यं नाम न चैवास्ति स्पृहा नैवास्ति वो यतः॥ २५ ॥
स्पृहाप्रेरितकर्माणः क्षत्रियान् यान्ति सुव्रताः ।
'आपके लिये कोई प्रार्थनीय वस्तु ही नहीं है; क्योंकि आपलोगोंके हृदयमें किसी वस्तुकी कामना ही नहीं होती है। जो लोग किसी स्पृहासे प्रेरित होकर कर्म करनेवाले हैं वे उत्तम व्रतधारी ब्राह्मण अपनी अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये क्षत्रियोंके पास जाते हैं ॥ २५१/२ ॥
निरूप्यमाणमस्माभिर्किञ्चिन्न दृश्यते ॥ २६ ॥
न जाने कारणं ब्रह्मन् युष्मदागमनं प्रति ।
'किंतु विप्रवर ! हमारे बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसी बात दिखायी नहीं देती, जिसके लिये आपलोगोंका यहाँतक आना सम्भव हो । ब्रह्मन् ! फिर आपके आगमनका क्या कारण है । यह मेरी समझमें नहीं आता ॥ २६१/२ ॥
एतावता चानुमेयं किंचित्कारणमस्ति वै ॥ २७ ॥
तद् ब्रूहि यदि विद्येत त्वत्तो ज्ञास्यामहे वयम्।
'आप यहाँतक पधारे हैं, इतनेसे ही यह अनुमान होता है कि आपके शुभागमनका कोई-न-कोई कारण अवश्य है । यदि है तो आप उसे बताइये । हम आपसे ही उसका ज्ञान प्राप्त करेंगे' ॥ २७१/२ ॥
इत्युक्तवति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ २८ ॥
तस्यापि राजन् विप्रस्य भूयः कोपो महानभूत् ।
राजन् ! देवेश्वर चक्रपाणि जनार्दनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मण दुर्वासाका महान् कोप और भी बढ़ गया ॥ २८१/२ ॥
तस्मादभ्यधिकः पूर्वात् कोपः संजायते महान् ॥२९॥
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीन् भक्षयन्निव पश्यतः ।
पहलेका जो क्रोध था, उससे अधिक और महान् कोप प्रकट होने लगा, मानो वे तीनों लोकोंको जला देना और अपनी ओर देखनेवाले लोगोंको खा जाना चाहते हों ॥२९१/२॥
रोषरक्तेक्षणः क्रुद्धो हसन्निव दहन्निव ॥ ३० ॥
उवाच वचनं विष्णुं दुर्वासा क्रोधमूर्च्छितः ।
क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा रोषसे लाल आँखें करके क्रोधपूर्वक हँसते और जलाते हुए-से उस समय श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले-॥ ३०१/२ ॥
न जाने इति कस्मात् त्वं ब्रूषे नो यादवेश्वर ॥ ३१ ॥
जानामि त्वां महादेवं वञ्चयन्निव भाषसे ।
'यादवेश्वर ! आप हमसे ऐसी बात क्यों कहते हैं कि आपके आगमनका कारण मेरी समझमे नहीं आता ? मैं आपको जानता हूँ । आप महान् देव विष्णु हैं; फिर भी हमें ठगते हुए-से बात करते हैं ॥ ३११/२ ॥
पुरातना वयं विष्णो पूर्ववृत्तान्तवेदिनः ॥ ३२ ॥
यथा हि देवदेवोऽसि मायामानुषदेहवान् ।
निगूहसे प्रभुरतः कस्मान्नो जगतीपते ॥ ३३ ॥
'विष्णो ! हम बहुत पुराने हैं और पूर्वकालके वृत्तान्तों- को जानते हैं, जिसके अनुसार हम कहते हैं कि आप देवताओंके भी देवता हैं और आपने मायासे मानवशरीर धारण किया है । जगदीश्वर ! अतः आप हमारे स्वामी होकर हमसे अपने-आपको क्यों छिपा रहे हैं ? ॥ ३२-३३ ॥
सोऽसि ब्रह्मविदां मूर्तिस्त्वैतत् परमं पदम् ।
यदभ्यर्च्य पुरा ब्रह्मा यच्च ज्ञात्वा वयं पुरा ॥ ३४ ॥
'आप ही ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा हैं। यह परमपद आपका ही स्वरूप है, पूर्वकालमे जिसकी आराधना करके ब्रह्माजी ज्ञानवान् हुए और हम भी जिसकी उपासना करके ज्ञानी हुए हैं ॥ ३४ ॥
यतो विश्वमिदं भूतं तदेतत् परमं पदम् ।
यच्च स्थूलं विजानन्ति पुरा तत्त्वेन चेतसा ॥ ३५ ॥
पुराविदोऽथ विश्वेश यदेतत् परमं वपुः ।
'जिससे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट हुआ है, वही आपका यह परम-पद है । विश्वेश्वर ! जिसे पूर्वकालमें पुराणवेत्ता पुरुष तत्त्वनिष्ठ चित्तसे स्थूल (विराट्) रूपसे जानते थे, यह भी आपका ही सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है ॥ ३५१/२ ॥
कर्मणा प्राप्यते यत् तु यत् स्मृत्वा निर्वृता वयम् ॥ ३६ ॥
प्रत्यक्षमपि यद्रूपं नैव जानन्ति मानुषाः ।
न हि मूढधियो देव न वयं तादृशा हरे ॥ ३७ ॥
न जाने इति यद् ब्रूषे किमतः साहसं वचः ।
'जो भगवदर्थ कर्म (भगवान्के समर्पणपूर्वक किये गये यज्ञ आदिके अनुष्ठान अथवा भजन साधन) से प्राप्त होता है, जिसका स्मरण करके हम वीतराग संन्यासी भी परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं तथा प्रेमी भक्तोंको जिसका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रहको मूढ-बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं । देव ! हरे ! हम वैसे (अज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते हैं) ! अतः आप हमारे सामने जो यह कहते हैं कि 'हम आपके आनेका कारण नहीं जानते हैं,' इससे अधिक साहसपूर्ण बात और क्या हो सकती है ? ॥ ३६-३७१/२ ॥
ये हि मूलं विजानन्ति तेषां तु प्रविवेचनम् ॥ ३८ ॥
कुर्वतः किं फलं देव तव केशिनिसूदन ।
'देव ! केशिनिसूदन ! जो जड-मूलकी बातें जानते हैं, उनके सामने इस प्रकार ऊपर-ऊपरकी बातोंका विवेचन करनेसे आपको क्या लाभ होगा ? ॥ ३८१/२ ॥
वेदान्ते प्रथितं तेजस्तव चेदं विचार्यते ॥ ३९ ॥
ये च विज्ञानतृप्तास्तु योगिनो वीतकल्मषाः ।
पश्यन्ति हृत्सरोजेऽपि तदेवेदं वपुः प्रभो ॥ ४० ॥
'वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद् आदि) में भी आपके इसी विख्यात तेजोमय स्वरूपका ब्रह्म आदि नामोंसे विचार किया
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५७
सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो ! विष्णो ! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७ ॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन ।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताविति केशव ॥ ५८ ॥
'जनार्दन ! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव ! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं ॥
इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम् ।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ धर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९ ॥
'वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं ॥ ५९ ॥
इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते ।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६० ॥
शफ्यं च दारवं पात्रं द्विदलं वेणुकान् बहून् ।
'देव ! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये ! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं ॥ ६० १/२ ॥
इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१ ॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम् ।
'उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है ॥ ६१ १/२ ॥
कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२ ॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः ।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥
'जगदीश्वर ! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव ! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी ॥
किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो ।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४ ॥
'प्रभो ! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते ! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये ॥ ६४ ॥
जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः ।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥
'यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र ॥ ६५ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप ।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६ ॥
'नरेश्वर ! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते ॥ ६६ ॥
न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः ।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७ ॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पितोः ।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८ ॥
'न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण ! हरे ! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता ॥ ६७-६८ ॥
तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो ।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९ ॥
'प्रभो ! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा 'आप रक्षा करते हैं' यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है ॥ ६९ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम् ।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥
'यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये ! रक्षा कीजिये !' ऐसा कहकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
१०५६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जाता है। प्रभो ! जो विज्ञानसे तृप्त निष्पाप योगी जन हैं, वे भी अपने हृदयकमलमें आपके इसी स्वरूपका दर्शन करते हैं ॥ ३९-४० ॥
वेदैर्यद् गीयते तेजो ब्रह्मेति प्रतिपाद्य वै ।
तदेवेदं विजानेऽहं रूपमैश्वरमेव च ॥ ४१ ॥
'वेदोंद्वारा ब्रह्म कहकर जिस तेजोमय परमतत्त्वका गान किया जाता है, आपका यह ऐश्वर्यशाली रूप वही है (उस परब्रह्मसे अभिन्न ही है), ऐसा मैं जानता हूँ ॥ ४१ ॥
वैष्णवं परमं तेज इति वेदेषु पठ्यते ।
अवगच्छाम्यहं विष्णो तदेवेदं वपुस्तव ॥ ४२ ॥
'विष्णो ! वेदोंमें 'तद्विष्णोः परमं पदम्' इत्यादिरूपसे विष्णुके जिस परम तेजोमय तत्त्वका प्रतिपादन किया जाता है, वही आपका यह स्वरूप है—यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ४२ ॥
य ओमित्युच्यते शब्दो यस्य वागिति गीयते ।
स एवासि प्रभो विष्णो न जाने इति मा वद ॥ ४३ ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जिस ॐ शब्दका उच्चारण होता है, वह जिनकी वाणीके रूपमें गाया जाता है, वे ही परमात्मा आप हैं; अतः आप यह न कहिये कि मैं आपके आनेका कारण नहीं जानता ॥ ४३ ॥
परोक्षं यदि किंचित् स्यात् तव वक्तुं प्रयुज्यते ।
न जाने इति गोविन्द मा वादीः साहसं हरे ॥ ४४ ॥
'गोविन्द ! हरे ! यदि आपके लिये कोई भी वस्तु परोक्ष होती तो आपका ऐसा कहना उचित हो सकता था; अतः 'मैं नहीं जानता' यह साहसपूर्ण वचन आप मत कहिये ॥
विश्वं यतः प्रादुरासीद् यस्मिँल्लीनं क्षये सति ।
इदं तदैश्वरं तेजस्त्ववगच्छामि केशव ॥ ४५ ॥
'केशव ! पूर्वकालमें यह विश्व जिससे प्रकट हुआ था और संहारकालमें यह फिर जिसमें लीन हो जायगा, वही आपका यह ईश्वरीय तेजोमय विग्रह है, ऐसा मैं जानता हूँ ॥
कर्ता त्वं भूतभव्येश प्रतिभासि सदा हृदि ।
यद् यद् रूपं स्मरे नित्यं तत् तदेवासि मे हृदि ॥ ४६ ॥
'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी हरे ! आप ही सबके कर्ता हैं और सदा मेरे हृदयमें प्रकाशित होते रहते हैं। मैं जिस-जिस रूपका स्मरण करता हूँ, आप सदा उसी-उसी रूपसे मेरे हृदयमें विद्यमान हैं ॥ ४६ ॥
वायुरेव यदा विष्णुरिति मे धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४७ ॥
'विभो ! जब मेरी बुद्धि ऐसा निश्चय करती है कि वायु भी विष्णु हैं, तब आप वायुरूपसे ही मेरे हृदयमें विराजमान होते हैं ॥ ४७ ॥
आकाशो विष्णुरित्येव कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४८ ॥
'प्रभो ! जब मेरी बुद्धि कभी इस निश्चयपर पहुँचती है कि आकाश ही विष्णु है, तब आप उसी रूपसे मेरेमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ४८ ॥
पृथिवी विष्णुरित्येतत् कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा पार्थिवरूपस्त्वं प्रतिभासि सदा मम ॥ ४९ ॥
'जब कभी मेरी बुद्धिका यह निश्चय होता है कि 'पृथिवी ही विष्णु है', तब आप सदा मुझे पार्थिवरूप ही प्रतीत होते हैं ॥ ४९ ॥
रसोऽयं देव इत्येव कदाचिच्चिन्त्यते मया ।
तदा रसात्मना विष्णो हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ५० ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जब कभी मैं यह सोचता हूँ, कि 'यह रस ही नारायणदेव है', तब आप रसरूपसे मेरे हृदयमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ५० ॥
यदा त्वां तेज इत्येवं स्मर्ता स्यां पुरुषोत्तम ।
तदा तद्रूपसम्पन्नः प्रतिभासि सदा हृदि ॥ ५१ ॥
'पुरुषोत्तम ! जब मैं आपका तेजोरूपसे स्मरण करता हूँ, तब आप सदा उसी रूपसे सम्पन्न होकर मेरे हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५१ ॥
चन्द्रमा हरिरित्येवं तदा चान्द्रमसं वपुः ।
निरीक्ष्य चक्षुषा देव ततः प्रीतोऽस्मि केशव ॥ ५२ ॥
'देव ! केशव ! जब मैंने ऐसा निश्चय किया कि 'चन्द्रमा ही श्रीहरि हैं,' तब मैं चन्द्रमाके रूपमें ही आपके स्वरूपका नेत्रोंद्वारा दर्शन करके प्रसन्न होता हूँ ॥ ५२ ॥
यदा सौरं वपुरिति स्मर्ता स्यां जगतीपते ।
तदा तद्भावनावोगात् सूर्य एव विराजसे ॥ ५३ ॥
'पृथ्वीनाथ ! जब मैं ऐसा चिन्तन करता हूँ कि 'यह सूर्यमण्डल ही आपका स्वरूप है,' तब आप मेरी उस भावनाके योगसे सूर्यरूप होकर ही विराजमान होते हैं ॥ ५३ ॥
तस्मात् सर्वं त्वमेवासि निश्चिता मतिरीदृशी ।
अतो न जानेऽहमिति वक्तुं नेशो जनार्दन ॥ ५४ ॥
'अतः सब कुछ आप ही हैं, यह मेरी बुद्धिका निश्चय है; इसलिये जनार्दन ! आप यह नहीं कह सकते कि 'मैं आपलोगोंके आनेका कारण नहीं जानता' ॥ ५४ ॥
इत्यर्थे संस्थितो विष्णो पीडां नो नैव चिन्तयेः ।
अत्यन्तदुःखिता विष्णो वयं त्वामनुसंस्थिताः ॥ ५५ ॥
'विष्णो ! इस सिद्धान्तमें प्रतिष्ठित होकर भी आप हमारी पीड़ाका कुछ विचार नहीं कर रहे हैं। भगवन् ! हम अत्यन्त दुःखित होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ५५ ॥
ईदृशीमवस्था नो नेतां स्मरसि केशव ।
एतत् पुनर्भाग्यमतो नष्टमित्येव चिन्तये ॥ ५६ ॥
मन्दभाग्या वयं विष्णो यतो नो न स्मरेः प्रभो ।
'केशव ! हमारी तो ऐसी दुर्दशा हो रही है और आप इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते हैं; इससे हम बार-बार यही
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५७
सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो! विष्णो! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं॥ ५६$\frac{१}{२}$॥
कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताचिति केशव ॥ ५८॥
‘जनार्दन! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं॥
इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम्।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ घर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९॥
‘वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं॥ ५९॥
इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६०॥
शक्यं च दारवं पात्रं द्विदलान् वेणुकांन् बहून् ।
‘देव! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं॥ ६०$\frac{१}{२}$॥
इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम्।
‘उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है॥ ६१$\frac{१}{२}$॥
कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥
‘जगदीश्वर! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी॥
किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४॥
‘प्रभो! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये॥ ६४॥
जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥
‘यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र॥ ६५॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६॥
‘नरेश्वर! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते॥ ६६॥
न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पिणोः।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८॥
‘न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण! हरे! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता॥ ६७-६८॥
तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९॥
‘प्रभो! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा ‘आप रक्षा करते हैं’ यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है॥ ६९॥
बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम्।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥
‘यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये! रक्षा कीजिये!’ ऐसा कहकर क्रोधसे मूच्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये॥ ७०॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
१०५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमाप्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना
वैशम्पायन उवाच
यतेर्वचनमाकर्ण्य मन्दमुच्छ्वस्य केशवः।
दुर्वाससं समालोक्य बभाषे यादवेश्वरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यतिका यह वचन सुनकर यादवेश्वर श्रीकृष्णने धीरेसे उच्छ्वास लेकर दुर्वासाकी ओर देखा और इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १ ॥
क्षन्तव्यं भवता सर्वं दोष एव ममैव हि।
शृणु वाक्यं ममैतत् तु श्रुत्वा शान्तिपरो भव ॥ २ ॥
'भगवन् ! अब जो कुछ हो गया, उस सबके लिये आप क्षमा करें; वास्तवमें यह मेरा ही दोष है। आप मेरी यह बात सुनें और सुनकर शान्त हो जायें ॥ २ ॥
जेष्यामि तौ रणे विप्र हंसं डिम्भकमेव च।
गिरीशो वा वरं दद्याच्छक्रो वा धनदोऽपि वा ॥ ३ ॥
यमो वा वरुणो वापि ब्रह्मा वाथ चतुर्मुखः।
सबलो सानुजौ हत्वा पुनर्दास्यामि वो रतिम् ॥ ४ ॥
'विप्रवर ! मैं हंस और डिम्भकको युद्धमें पराजित करूँगा। उन्हें भगवान् शङ्कर, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा कोई भी वर क्यों न दे, मैं सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित उन दोनोंका वध करके पुनः आप-लोगोंको प्रसन्नता प्रदान करूँगा ॥ ३-४ ॥
सत्येनैव शपाम्यद्य मा रोषवशगो भव।
रक्षां वोऽहं करिष्यामि हत्वा तौ च नृपाधमौ ॥ ५ ॥
'आज मैं सत्यकी ही शपथ लेकर कहता हूँ कि आप रोषके वशीभूत न होइये। मैं उन दोनों नीच नरेशोंका वध करके आपलोगोंकी रक्षा करूँगा ॥ ५ ॥
जानामि तौ दुरात्मानौ युष्मद्दोषकरौ हि तौ।
श्रुतं च पूर्वमस्माभिस्तीक्ष्णदण्डधराविति ॥ ६ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ गिरीशवरदर्पितौ।
नाल्पप्रयत्नसंसाध्यौ जरासंधहितैषिणौ ॥ ७ ॥
'मैं उन दोनों दुरात्माओंको जानता हूँ, उन्हीं दोनोंने आपलोगोंका अपराध किया है। मैंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वे दोनों कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान् और मदमत्त हैं। भगवान् शङ्करका वर पानेसे उनका घमंड बढ़ा हुआ है। थोड़े-से प्रयत्नद्वारा उन्हें वशमें नहीं किया जा सकता। वे जरासंधके हितैषी हैं ॥ ६-७ ॥'
प्राणानपि तयो राजा दास्यत्येव न संशयः।
जरासंधो न भूपालो विना तौ जयते महीम् ॥ ८ ॥
'इसमें संदेह नहीं कि राजा जरासंध उन दोनोंके लिये अपने प्राण भी दे डालेगा; क्योंकि उन दोनोंके बिना राजा जरासंध इस पृथ्वीपर विजय नहीं पा सकता ॥ ८ ॥
जये तयोर्विप्रवर्य तत्र श्रेयो भवेत् ततः।
यत्र यत्र तु तौ गत्वा स्थितावित्यनुशुश्रुम ॥ ९ ॥
तत्र तत्र च हन्ताहं नात्र कार्या विचारणा।
'विप्रवर ! उन दोनोंको पराजित करते समय उन्हें वहाँ जरासंधकी ओरसे श्रेष्ठ सहायता प्राप्त हो सकती है, तो भी वे दोनों जहाँ-जहाँ जाकर खड़े होंगे और इसका समाचार हम सुन लेंगे, वहाँ-वहाँ पहुँचकर मैं उन दोनोंका वध करूँगा, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
गच्छध्वं यतयः स्वैरं निजकार्यपरायणाः ॥ १० ॥
अचिरेणैव कालेन जेप्यामि रणपुङ्गवौ।
'संन्यासियो ! आपलोग अपने कर्तव्य-पालनमें तत्पर रहकर जहाँ चाहें इच्छानुसार जायें। मैं थोड़े ही समयमें उन रणकुशल वीरोंको परास्त करूँगा' ॥ १० ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा यादवेश्वरमाह सः ॥ ११ ॥
स्वस्त्यस्तु भवते कृष्ण जगतां स्वस्ति कुर्वते।
किं नु नाम जगन्नाथ दुःसाध्यं तव केशव ॥ १२ ॥
तब प्रेमपूर्वक प्रसन्नचित्त हो दुर्वासाने यादवेश्वर श्रीकृष्णसे कहा—'श्रीकृष्ण ! तीनों लोकोंका कल्याण करने-वाले आपका मङ्गल हो। जगन्नाथ ! केशव ! कौन-सा ऐसा कार्य है, जो आपके लिये दुष्कर हो ॥ ११-१२ ॥
त्रिलोकेश त्रिधामासि सर्वसंहारकारकः।
देवानार्माप देवेशः सर्वत्र समदर्शनः ॥ १३ ॥
'त्रिलोकीनाथ ! आप त्रिधामा हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले हैं, देवताओंके भी देवेश्वर हैं। आपकी सर्वत्र समान दृष्टि है ॥ १३ ॥
विष्णो देव हरे कृष्ण नमस्ते चक्रपाणये।
नमः स्वभावशुद्धाय शुद्धाय नियताय च ॥ १४ ॥
'विष्णो ! देव ! हरे ! कृष्ण ! हाथमें चक्र धारण करने-वाले ! आपको नमस्कार है। आप स्वभावसे शुद्ध हैं, शुद्ध-स्वरूप हैं तथा शौच, संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न एवं सर्वव्यापी हैं ॥ १४ ॥
शब्दगोचर देवेश नमस्ते भक्तवत्सल।
अज्ञानादथवा ज्ञानाद् यन्मयोक्तं क्षमस्व तत् ॥ १५ ॥
'देवेश्वर ! आप ही वैदिक शब्दोंके चरम तात्पर्य हैं। भक्तवत्सल ! आपको मेरा नमस्कार है। मैंने जानकर अथवा
भविष्यपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५९
अनजानमें जो अनुचित बात कह दी हो, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ॥ १५ ॥
त्वमेवाहं जगन्नाथ नावयोरन्तरं पृथक्।
अतः क्षमस्व भगवन् क्षमासारा हि साधवः ॥ १६ ॥
'जगन्नाथ ! मैं आपका ही स्वरूप हूँ। हम दोनोंमें कोई भेद या पार्थक्य नहीं है। अतः भगवन्! आप मुझे क्षमा करें; क्योंकि साधुपुरुषोंका सारतत्त्व क्षमा ही है' ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुवाच
क्षन्तव्यं भवता विप्र क्षमासारा वयं सदा।
संन्यासिनः क्षमासाराः क्षमा तेषां परं बलम् ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् बोले—विप्रवर ! क्षमा तो आपको करनी चाहिये। हमलोग तो सदा आप महापुरुषोंकी ही क्षमाका आश्रय लेनेवाले हैं। संन्यासियोंका सारतत्त्व क्षमा ही है। क्षमा ही उनका उत्तम बल है ॥ १७ ॥
क्षमा मोक्षकरी नित्यं तत्त्वज्ञानमिव द्विज।
क्षमा धर्मः क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा यशः ॥ १८ ॥
क्षमा स्वर्गस्य सोपानमिति वेदविदो विदुः।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन क्षमां पालयत स्वकाम् ॥ १९ ॥
ब्रह्मन् ! क्षमा तत्त्वज्ञानकी भाँति सदा ही मोक्ष प्रदान करनेवाली है। क्षमा धर्म, क्षमा सत्य, क्षमा दान और क्षमा यश है। वेदज्ञ पुरुष ऐसा मानते हैं कि क्षमा ही स्वर्गकी सीढ़ी है। अतः आपलोग पूरा प्रयत्न करके अपने क्षमा-धर्मका पालन करें ॥ १८-१९ ॥
प्रत्यक्षज्ञानसंयुक्ता यूयं सर्वे यतीश्वराः।
य एते यतयो विप्राः पूजनीया मयाद्य वै ॥ २० ॥
भोक्तव्या यतयो विप्रा भिक्षुकाः सर्व एव हि।
यतीश्वरो ! आप सब लोग प्रत्यक्ष ज्ञानसे संयुक्त हैं। यहाँ जो यति-ब्राह्मण पधारे हैं, उन सबका आज मुझे पूजन करना है। यतिधर्ममें तत्पर रहनेवाले इन सभी भिक्षु ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना है ॥ २०½ ॥
तथेति ते प्रतिज्ञाय भोक्तुमैच्छन् हरेर्गृहे ॥ २१ ॥
ततः स्वभवनं विष्णुः प्रविश्य हरिरीश्वरः।
चतुर्विधं तथाऽऽहारं कारयित्वा यथाविधि ॥ २२ ॥
भोजयामास तान् सर्वान् यतीन् यतिवरार्चितः।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन सबने भगवान्के भवनमें भिक्षा ग्रहण करनेका विचार किया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु हरिने अपने भवनके भीतर प्रवेश करके विधिपूर्वक चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार करायी और उन समस्त यतियोंको भोजन कराया। उस समय यतिश्रेष्ठ दुर्वासाने श्रीकृष्णका सम्मान किया ॥ २१-२२½ ॥
छित्त्वा छित्त्वा च देवेशो दुकूलानि मृदूनि सः ॥ २३ ॥
ददौ तेभ्यस्तदा विष्णुः सर्वेभ्यो जनमेजय।
ते च प्रीता यथायोगं यथापूर्वं ततो गताः ॥ २४ ॥
जनमेजय ! देवेश्वर श्रीकृष्णने उस समय कोमल वस्त्र फाड़-फाड़कर उन सब संन्यासियोंके लिये कौपीन आदि बनानेके लिये दिया वे उन्हें पूर्ववत् यथायोग्य पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सब लोग वहाँसे चले गये ॥ २३-२४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतिभोजने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें यतियोंका भोजनविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना
वैशम्पायन उवाच
दुर्वासास्त्वथ तत्रैव नारदेन महात्मना।
चिन्तयन् ब्रह्मतत्त्वं च विजहार यथासुखम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दुर्वासा मुनि वहाँ महात्मा नारदजीके साथ ब्रह्मतत्त्वका चिन्तन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करने लगे ॥ १ ॥
भगवानपि गोविन्दस्तयोर्वासममन्यत।
ततस्तौ हंसडिम्भकौ तस्मिन् काले महीपतिम् ॥ २ ॥
ब्रह्मदत्तं महीपालं पितरं वीर्यशालिनम्।
प्रावोचतामिदं वाक्यं समन्ताज्जनसंसदि ॥ ३ ॥
भगवान् गोविन्दने भी वहाँ उन दोनोंको रहनेकी अनुमति दे दी। तदनन्तर दोनों भाई हंस और डिम्भक उस समय अपने पराक्रमशाली पिता महाराज ब्रह्मदत्तके पास जाकर सब ओरसे भरे हुए दरबारमें उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥
राजसूयं महायज्ञं पितः कुरु सुयत्नतः।
१. खाने, पीने, चाटने और चूसनेके भेदसे चार प्रकारकी भोजन-सामग्री होती है।
१०६० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्मिन् मासि नृपश्रेष्ठ यतावो यज्ञसिद्धये ॥ ४ ॥ 'पिताजी ! आप यत्नपूर्वक राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान कीजिये। नृपश्रेष्ठ ! हम दोनों इसी मासमें आपके इस यज्ञकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करेंगे ॥ ४ ॥' आवां तेऽद्य महाराज दिशां विजयतत्परौ । यतिष्यावो बलैः सार्धं गजैराश्वै रथैरपि ॥ ५ ॥ सम्भारा यज्ञसिद्धयर्थमानेतव्या नृपोत्तम । 'महाराज ! हम दोनों भाई आपके लिये दिग्विजय करनेके लिये तत्पर हैं। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरंगिणी सेनाएँ साथ लेकर हम सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पानेका प्रयत्न करेंगे। नृपश्रेष्ठ ! आपको यज्ञकी सिद्धिके लिये सामग्रियोंका संग्रह कराना चाहिये' ॥ ५ ॥ तथेति स महाबाहो ब्रह्मदत्तोऽब्रवीत् तदा ॥ ६ ॥ जनार्दनस्तु विप्रेन्द्रो दृष्ट्वा साहसत्तत्परौ । अशक्यमिति मन्वानो वयस्यं हंसमब्रवीत् ॥ ७ ॥ शृणु हंस वचो मह्यं श्रुत्वा निश्चित्य वीर्यवान् । महाबाहु जनमेजय ! तब राजा ब्रह्मदत्तने 'तथास्तु' कहकर उन दोनोंकी बात मान ली। उन दोनोंको दुःसाहसमें तत्पर होते देख, उनके प्रयासको असम्भव मानकर विप्रवर जनार्दनने अपने मित्र हंससे कहा—'हंस ! पहले मेरी बात सुनो । सुनकर उसपर भलीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचो और उसके अनुसार पराक्रमपूर्वक कार्य करो ॥ ६-७॥ आयुष्मन् साहसं कर्तुमुद्यतोऽसि नृपोत्तम ॥ ८ ॥ स्थिते भीष्मे जरासंधे बाह्लीके च नृपोत्तमे । किं च वीरेषु सर्वेषु यादवेषु नृपोत्तम ॥ ९ ॥ 'आयुष्मन् ! नृपश्रेष्ठ ! भीष्म, जरासंध, नृपशिरोमणि बाह्लीक तथा समस्त यादव वीरोंके रहते हुए तुम दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेके लिये उद्यत हुए हो ॥ ८-९ ॥ भीष्मो हि बलवान् वृद्धः सत्यसंधो जितेन्द्रियः॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं यो जिगाय भृगूत्तमः ॥ १० ॥ तं युद्धे जितवान् भीष्मः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । 'भीष्मजी बलवान्, वृद्ध, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। जिन भृगुकुलतिलक परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीपर विजय पायी है, उन्हें भीष्मने सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते युद्धमें जीत लिया था ॥१०॥ जरासंधस्य यद् वीर्यं तद् भवान् वेत्ति संयुगे ॥ ११ ॥ वृष्णीवीरास्तु ते सर्वे कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । तत्र कृष्णो हृषीकेशो जितशत्रुः कृती सदा ॥ १२ ॥ 'जरासंधका युद्धमें जो पराक्रम है, उसे तुम अच्छी तरह जानते हो। समस्त वृष्णिवंशी वीर भी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं। उनमें जो भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे सबकी इन्द्रियोंके नियन्ता, शत्रुविजयी तथा सदा ही रणकुशल हैं ॥ ११-१२ ॥ जरासंधेन सहितः सदा युद्धे जितश्रमः । प्रमुखे तस्य न स्थातुं शक्तो जीवन् नृपोत्तमः ॥ १३ ॥ 'जरासंधके साथ सदा युद्ध करके उन्होंने परिश्रमको जीत लिया है। कोई भी श्रेष्ठ नरेश उनके सामने जीते-जी नहीं ठहर सकता ॥ १३ ॥' बलभद्रस्तथा मत्तः क्रुद्धो यदि भवेद् बली ॥ लोकानिमान् समाहर्तुं शक्नोतीति मतिर्मम ॥ १४ ॥ 'बलवान् बलभद्रजी बलके मदसे उन्मत्त रहते हैं, वे यदि कुपित हो जायें तो अकेले ही इन तीनों लोकोंका संहार कर सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १४ ॥ तथा च सात्यकिर्वीरः शक्तो जेतुं रणे रिपून् । तथान्ये यादवाः सर्वे कृष्णमाश्रित्य दंशिताः ॥ १५ ॥ 'इसी तरह वीर सात्यकि भी रणभूमिमें शत्रुओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं। अन्य सब यादव भी श्रीकृष्णका आश्रय लेकर सदा युद्धके लिये कवच बाँधे रहते हैं ॥ १५ ॥ अस्माभिश्च कृतः पूर्वं विरोधो यतिभिः सह । दुर्वासा यतिभिः सार्धं गतो द्रष्टुंस केशवम् ॥ १६ ॥ 'हमलोगोंने पहले यतियोंके साथ विरोध किया था। उन सब यतियोंके साथ दुर्वासा मुनि भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये गये हैं ॥ १६ ॥ इति श्रुतं नृपश्रेष्ठ ब्राह्मणाद् भोक्तुमागतात् । तथा सति यथा सिद्ध्येत् तथा चिन्त्यं चमन्त्रिभिः॥१७॥ ततः पश्चाद् विधास्यामो राजसूयं महाक्रतुम् । 'नृपश्रेष्ठ ! यह बात मैंने अपने घर भोजन करनेके लिये आये हुए एक ब्राह्मणसे सुनी है। ऐसी अवस्थामें जिस प्रकार अपना कार्य सिद्ध हो, उस उपायका मन्त्रियोंके साथ विचार करना चाहिये। इसके बाद हम राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे' ॥ १७॥
हंस उवाच को नाम भीष्मो मन्दात्मा वृद्धो हीनबलः सदा ॥ १८ ॥ आवयोः पुरतः स्थातुं शक्तः स किल वृद्धकः । हंस बोला—मन्दबुद्धि बूढ़ा और सदाका बलहीन भीष्म कौन-सा वीर है ? क्या वह बूढ़ा हम दोनोंके सामने ठहर सकता है ॥ १८॥ यादवा इति चित्रं नः शक्ताः स्थातुं रणे द्विज ॥ १९ ॥ कश्च कृष्णः पुरः स्थातुं बलदेवश्च मत्तकः । शैनेयश्चापि विप्रेन्द्र स्थातुं न इति चिन्तय ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! युद्धमे यादव हमारे सामने ठहर सकते हैं, यह तुम्हारी बात भी विचित्र ही है। वह कृष्ण और मतवाला बलभद्र भी कौन ऐसे वीर हैं, जो हमारे सामने ठहर सकें। विप्रवर ! तुम यह निश्चय समझो कि सात्यकि भी हम दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता ॥ १९-२० ॥
भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६१
जरासंधस्तु धर्मात्मा बन्धुरेव सदा मम । गच्छ प्रियं यदुश्रेष्ठं ब्रूहि मद्रचनात्त्वरन् ॥ २१ ॥ धर्मात्मा जरासंध तो सदा हमलोगोंका हितैषी बन्धु ही है । विप्रवर ! तुम यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णके पास जाओ और मेरी आज्ञासे तुरंत यह बात उनसे कहो—॥ २१ ॥
दीयतां करसर्वस्वं यज्ञार्थं सुन्दरं बहु । लवणानि बहून्यद्य गृह्य केशव मा चिरम् ॥ २२ ॥ आगच्छ त्वरितं कृष्ण न ते कार्यं विलम्बनम् । ‘केशव ! तुम यज्ञके लिये बहुत सुन्दर सामग्री तथा करके रूपमें अपना सारा धन दे दो, साथ ही बहुत-से नमकका संग्रह करके शीघ्र आओ । श्रीकृष्ण ! तुम्हें इस कार्यमें विलम्ब नहीं करना चाहिये’ ॥ २२३ ॥
इति ब्रूहि यदुश्रेष्ठं याहि त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥ न ब्रूयाश्चोत्तरं विप्र शपेयं त्वां प्रियोऽसि मे । मित्रभावादिदं ब्रूहि पश्यामि त्वां पुनः पुनः ॥ २४ ॥ ब्रह्मन् ! तुम शीघ्रतापूर्वक जाओ और यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे मेरा यह संदेश सुना दो । विप्र ! मैं शपथ दिलाता हूँ, तुम मेरी बातका कोई उत्तर न देना । तुम मेरे प्रिय मित्र हो, मित्रभावसे ही यह बात जाकर कहो । मैं बार बार तुम्हारी ओर देखता हूँ ॥ २३-२४ ॥
इति संचोदितो विप्रो नोत्तरं प्रत्यभाषत । मित्रभावात् तथा राजन् स्नेहाच्च जनमेजय ॥ २५ ॥ राजन् ! जनमेजय ! हंससे इस प्रकार प्रेरित होकर ब्राह्मणने मित्रभाव तथा स्नेहके कारण उसे कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २५ ॥
जनार्दनस्तु धर्मात्मा नित्यं गन्तुं समुद्यतः । अद्य श्वो वा परश्वो वा गच्छामीति यतेत सः ॥ २६॥ सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले जनार्दन श्रीकृष्णके पास जानेके लिये उद्यत हो गये । ‘आज, कल या परसों मैं अवश्य जाऊँगा’ ऐसा कहकर वे जानेकी तैयारी करने लगे ॥ २६ ॥
देवं द्रष्टुं जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम् । एक एव च धर्मात्मा हयमारुह्य सत्वरम् ॥ २७ ॥ प्रातरेव जगामाशु द्रष्टुं द्वारवतीं द्विजः । हरिं कृष्णं हृषीकेशं मनसा संस्मरन् द्विजः ॥ २८ ॥ धर्मात्मा जनार्दन शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगत्कारण श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये अकेले ही तीव्रगामी अश्वपर आरूढ हो प्रातःकाल ही द्वारकाके लिये शीघ्रतापूर्वक चल दिये। उनकी यात्राका एक ही उद्देश्य था—इन्द्रियोंके प्रेरक सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका दर्शन । ब्राह्मण जनार्दन उन्हींका मन-ही-मन स्मरण करते हुए चले ॥ २७-२८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यान-विषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनकी भगवद्-दर्शनविषयक उत्कण्ठा
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रायाद्धरिं विष्णुं ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः । हयेनैकेन राजेन्द्र त्वरितं स ययौ नृप ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र ! नरेश्वर ! तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण जनार्दन एक अश्वपर सवार हो तुरंत भगवान् विष्णु हरिके पास चल दिये ॥ १ ॥
यथा निदाघसमये सूर्यांशुपरिपीडितः । पान्थो याति जलं दृष्ट्वा त्वरितं तत्पिपासया ॥ २ ॥ धावत्येव तथा विप्रो हरिं द्रष्टुं जनार्दनः । गच्छन् स चिन्तयामास चोदयन् हयमुत्तमम् ॥ ३ ॥ जैसे ग्रीष्म ऋतुमे सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे पीड़ित हुआ पथिक कहीं दूर जल देखकर उसे पीनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक उसके पास जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मण जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये दौड़ते हुए ही चले । वे अपने उत्तम अश्वको हाँकते हुए मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे—॥ २-३ ॥
हंस एव प्रियो मह्यं कुर्यात् प्रियहितं मम । तथा हि प्रेषितस्तेन हरिं पश्यामह्यहं प्रभुम् ॥ ४ ॥ ‘वास्तवमें हंस ही मेरा प्रिय मित्र है। वही मेरा प्रिय और हित कर सकता है; क्योंकि उसीने मुझे द्वारका भेजा है, जहाँ मैं भगवान् श्रीहरिका दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥
अहमेव सदा धन्यो मत्तो ह्यभ्यधिको न हि । यतो द्रक्ष्याम्यहं विष्णुं वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ५ ॥ ‘मैं ही सदा धन्य हूँ, मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि मैं द्वारकापुरीमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥
सा हि मे जननी धन्या हरिं दृष्ट्वा पुनर्गतम् । कृतार्थं सर्वदा देवी द्रक्ष्यत्येषा मनस्विनी ॥ ६ ॥ ‘मेरी वह माता धन्य है, जो मनस्विनीदेवी भगवान्का दर्शन करके सदाके लिये कृतार्थ होकर लौटे हुए मुझ अपने पुत्रको पुनः देखेगी ॥ ६ ॥
मुखमुन्निद्रहेमाब्जकिञ्जल्कसदृशप्रभम् ।
१०६२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
द्रक्ष्यामि देवदेवस्य चक्रिणः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ७ ॥ 'मैं शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके उस मुखका दर्शन करूँगा, जो विकसित सुवर्णमय कमलके केसरकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ७ ॥
वपुर्द्रक्ष्याम्यहं विष्णोर्नीलोत्पलदलच्छवि । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ॥ ८ ॥ 'मैं श्रीकृष्णके नीलकमलदलकी-सी कान्तिवाले उस श्यामसुन्दर शरीरका दर्शन करूँगा, जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित है ॥ ८ ॥
नेत्रे ते देवदेवस्य पद्माकिञ्जल्कसप्रभे । पश्याम्यहमदीनात्मा नष्टदुःखोऽस्मि निर्वृतः ॥ ९ ॥ 'मैं देवाधिदेव श्रीकृष्णके उन दोनों नेत्रोंका दर्शन करूँगा, जो विकसित कमलदलके समान कान्तिमान् हैं। उस समय मेरे हृदयका सारा दैन्य दूर हो जायगा, दुःख मिट जायेंगे और मैं परमानन्दमें निमग्न हो जाऊँगा ॥ ९ ॥
अपि द्रक्ष्यति योगात्मा सौम्येनैव स्वचक्षुषा । अपि वा मत्प्रियं ब्रूयात् स्वस्ति चेति च वा वदेत् ॥ १०॥ 'क्या योगात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सौम्यदृष्टिसे ही मेरी ओर देखेंगे, अथवा मुझे प्रिय लगनेवाली बातें कहेंगे, या 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसी वाणीका प्रयोग करेंगे ॥ १० ॥
द्रक्ष्यामि चक्रिणो वर्ष्म ततस्त्रैलोक्यसंनिभम् । पादाब्जं चक्रिणो द्रष्टुं त्वरत्येव च मे मनः ॥ ११ ॥ 'वहाँ चलकर मैं चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णके उस विग्रहका दर्शन करूँगा, जो तीनों लोकोंको अपने भीतर रखनेके कारण त्रिलोकीके समान है। मेरा मन उन चक्रपाणि-के चरणारविन्दोंका दर्शन करनेके लिये उतावला हो उठा है ॥ ११ ॥
वक्षःस्थलं सदा विष्णोः स्फुरद्रत्नप्रभायुतम् । पश्यन्निव च गच्छामि स्मरन्नानिशमीश्वरम् ॥ १२ ॥ 'मैं भगवान् विष्णुके उस वक्षःस्थलको देखता हुआ-सा चलता हूँ, जो सदा उद्दीप्त कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित होता है तथा उन्हीं परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करता हुआ उनकी सेवामें चल रहा हूँ ॥ १२ ॥
पीतकौशेयवसनं लम्बहारविभूषितम् । ईषत्स्मिताधरं विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः ॥ १३ ॥ 'जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, नीचेतक लटकी हुई विशाल वनमालासे विभूषित हैं तथा जिनके अधरोंपर मन्द मुसकानकी छटा छायी रहती है, उन भगवान् श्रीकृष्णका आज मैं वारंवार दर्शन करूँगा ॥ १३ ॥
स्मरतश्च हरे रूपं रोमहर्षोऽयमीदृशः । गच्छतश्च पुरो भाति शङ्खचक्रगदासिमान् ॥ १४ ॥ 'श्रीहरिके उस रूपका स्मरण करते ही मेरे शरीरमें यह इस तरह रोमाञ्च हो रहा है। चलते समय मेरे सामने शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये भगवान् खड़े जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥
यातीव च पुरो भाति महां देवो जगद्गुरुः । एषोऽयमिति मे वक्तुं जिह्वा प्रस्फुरतीव तम् ॥ १५॥ 'देव जगद्गुरु श्रीकृष्ण मेरे आगे-आगे जाते हुए-से प्रतीत होते हैं। मेरी जिह्वा बार-बार यह कहनेके लिये उद्यत-सी होती है कि 'ये रहे मेरे भगवान्' ॥ १५ ॥
इदं दुःखतरं मन्ये करं देहीति मद्द्वचः । इदं तत्साहसं मन्ये तद्वचस्तस्य भूपतेः ॥ १६ ॥ 'मैं जो उनके सामने यह कहनेके लिये जा रहा हूँ कि 'मुझे कर दीजिये', अपनी इस बातको मैं अत्यन्त दुःखजनक मानता हूँ तथा मैं इसे राजा हंसका अत्यन्त दुःसाहसपूर्ण वचन समझता हूँ ॥ १६ ॥
हंसस्य करदो विष्णुस्तदाज्ञापरिचारकः । तस्य सर्वं पुरो गत्वा वक्तव्यं किल निर्दयः ॥ १७ ॥ 'भगवान् विष्णु हंसको कर दें, उसकी आज्ञाका पालन और सेवा करें, ये सारी बातें मुझे उनके सामने जाकर कहनी पड़ेंगी। निश्चय ही मैं बड़ा निर्दय हूँ ॥ १७ ॥
मूढानामग्रणीरस्मि निर्लज्जश्च तथा वदन् । करं देहि हरे विष्णो हंसस्य यदुपुङ्गव ॥ १८ ॥ 'हरे ! विष्णो ! यदुपुङ्गव ! आप हंसको कर दीजिये' ऐसी बात कहता हुआ मैं मूर्खोंका अगुआ और निर्लज्ज समझा जाऊँगा ॥ १८ ॥
लवणानि बहून्यद्य दातव्यानि करात्मना । इति वक्तुं न मे युक्तं पुरतस्तस्य शार्ङ्गिणः ॥ १९ ॥ 'आपको कररूपमें शीघ्र ही बहुत-सा नमक देना होगा' शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके सामने ऐसी बात कहना मेरे लिये कदापि उचित न होगा ॥ १९ ॥
तथापि मित्रभावात्तु वक्तव्यं घोरमीदृशम् । कष्टो ह्ययं मित्रभावो मनुष्याणां कृतात्मनाम् ॥ २० ॥ 'तथापि मित्रताके कारण मुझे ऐसा घोर वचन कहना होगा। पवित्रात्मा पुरुषोंके लिये यह मित्रभाव भी कष्टप्रद ही होता है ॥ २० ॥
अथवा सर्वविद् विष्णुः सर्वस्य हृदि संस्थितम् । जानात्येव सदा भावं प्राणिनां शोभने रतः ॥ २१ ॥ 'अथवा भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं। वे सबके हार्दिक भावको सदा जानते हैं और प्राणियोंके कल्याणमें तत्पर रहते हैं ॥ २१ ॥
तथा सति न मे दोषो मित्रभावो यतो ह्ययम् । सर्वथा रक्षतां विष्णुर्घोरं वक्तुं यतस्य मे ॥ २२ ॥
भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६३
'ऐसी दशामें मेरा कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह मित्रता ही मुझसे ऐसा कार्य कराती है। मैं जो घोर बात कहनेके लिये उद्यत हुआ हूँ, उसके लिये भगवान् विष्णु सर्वथा मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥
द्रक्ष्याम्यहं जगन्नाथं नीलकुञ्चितमूर्धजम्।
कम्बुग्रीवधरं विष्णुं श्रीवत्साच्छादितोरसम्॥ २३॥
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और रक्षक हैं, जिनके सिर-पर काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो शङ्खके समान ग्रीवा धारण करते हैं तथा जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स-चिह्नसे आच्छादित है, उन भगवान् विष्णुका मैं दर्शन करूँगा ॥
स्फुरत्पद्ममहाबाहुं रत्नच्छायाविराजितम्।
द्रक्ष्यामि केशवं विष्णुं चक्रिणं यादवेश्वरम् ॥ २४॥
'जिनकी विशाल भुजाओंमें पद्मरागमणिके आभूषण शोभा पाते हैं तथा जो कौस्तुभ आदि रत्नोंकी कान्तिसे प्रकाशित होते हैं, उन सर्वव्यापी, चक्रधारी, यादवेश्वर श्रीकृष्णका मैं दर्शन करूँगा ॥ २४॥
अचिन्त्यविभवं देवं भूतभव्यभवत्प्रभुम्।
आत्मेच्छया जगद्रक्षं द्रक्ष्यामि जलशायिनम्॥ २५॥
'जिनका वैभव अचिन्त्य है, जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, जो अपनी ही इच्छासे जगत्की रक्षामें तत्पर रहते हैं, उन एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीनारायण-देवका मैं दर्शन करूँगा ॥ २५ ॥
कृतार्थः सर्वथा चाहं भवामि विगतज्वरः।
अद्य मे सफलं जन्म साक्षाद् दृष्टवतो हरिम् ॥ २६॥
'उनका दर्शन करके मैं सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा। मेरी सारी चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ दूर हो जायँगी। आज श्रीहरिका साक्षात् दर्शन कर लेनेपर मेरा जन्म सफल हो जायगा ॥२६॥
अद्य मे सफला यज्ञाः साक्षात्कृतवतो हरिम्।
नेत्रे मे सफले विष्णुं पश्यतश्च जगन्मयम् ॥ २७॥
'आज श्रीहरिका साक्षात्कार करनेपर मेरे यज्ञ सफल हो जायेंगे। जगन्मय विष्णुका दर्शन करनेसे मेरे दोनों नेत्र भी सफल हो जायेंगे ॥ २७ ॥
प्रीतिमानस्तु मे विष्णुर्वक्तुर्घोरस्य कर्मणः।
उन्मिषन्नेत्रयुग्मेन द्रक्ष्यामि सकृदीश्वरम् ॥ २८॥
'मैं भयंकर कर्मके लिये प्रस्ताव करनेवाला हूँ। उस समय भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न रहें। क्या मैं अपनी खुली हुई दोनों आँखोंसे एक बार उन जगदीश्वरका दर्शन करूँगा ॥ २८ ॥
आमूलमसकृद् विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः।
पिवामि नेत्रयुग्मेन वपुः कृष्णस्य केवलम् ॥ २९॥
'मैं नीचेसे ऊपरतक बारंबार भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा, दोनों नेत्रोंसे केवल श्रीकृष्णके शरीरकी रूपमाधुरीका पान करूँगा ॥ २९ ॥
धारयिष्याम्यहं पांसुं तत्पादप्रभवं शिवम्।
ततः कृतार्थतां यास्ये स्वर्गमार्गो हि तद्रजः ॥ ३० ॥
'तदनन्तर उनके चरणोंसे प्रकट हुई कल्याणमयी धूल-को सिरपर धारण करूँगा। ऐसा करके कृतार्थ हो जाऊँगा, क्योंकि उनकी चरणरज स्वर्गका सोपान है ॥ ३० ॥
मेघगम्भीरनिर्घोषं श्रोष्यामि च हरेः स्वरम्।
पादाब्जं चक्रिणो विष्णोः पश्यामि च जगत्पतेः ॥ ३१ ॥
'मैं श्रीहरिके मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान स्वरको सुनूँगा और चक्रधारी जगदीश्वर विष्णुके चरणारविन्दका दर्शन करूँगा ॥
पश्यामि च हरेर्वक्त्रं पूर्णेन्दुसदृशप्रभम्।
हरेरिदं जगद् रूपं पश्यामीव च सर्वतः ॥ ३२ ॥
प्रसीदतु सदा विष्णुरयुक्तं वक्तुमिच्छतः।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान जो श्रीकृष्णका मनोहर मुख है, उसका अवलोकन करूँगा। यह सारा जगत् श्रीहरिका ही रूप है, इस रूपमें मैं सब ओर उन्हींका दर्शन-सा कर रहा हूँ। अनुचित बात कहनेकी इच्छावाले मुझ सेवकके ऊपर भगवान् विष्णु सदा प्रसन्न रहें ॥ ३२३ ॥
आलोलकुण्डलयुतं हरिचन्दनचर्चितम् ॥ ३३॥
स्फुरत्केयूररत्नार्चिर्बाहुद्वयविराजितम् ।
सव्ये द्योतन्महाशङ्खं रश्मिजालविराजितम् ॥ ३४॥
प्रोग्रभास्करवर्णाभं चक्रज्वालाविराजितम्।
प्रोज्ज्वलत्कङ्कणयुतं तप्तजाम्बूनदाङ्गदम् ॥ ३५॥
पीतकौशेयवसनं विस्तीर्णोरस्कमच्युतम्।
कदा द्रक्ष्यामि देवेशमिदानीमथवान्यदा ॥ ३६॥
'जिनके कानोंमें हिलते हुए कुण्डल जगमगा रहे हैं, जो हरिचन्दनसे चर्चित हैं, चमकीले बाजूबंदोंमें जड़े गये रत्नोंकी प्रभासे उद्भासित दोनों भुजाओंसे जिनकी विशेष शोभा होती है, जिनके बायें हाथमें महान् पाञ्चजन्य शङ्ख देदीप्यमान है, जो किरणजालसे प्रकाशित हैं, उदयकालके सूर्यके समान जिनकी सुनहरी कान्ति शोभा पाती है, जो सुदर्शनचक्रकी ज्वालामालाओंसे उद्भासित है, जिनके हाथोंमें जगमगाते हुए कङ्कण तथा तपे हुए सुवर्णके बने बाजूबंद शोभा पाते हैं, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं तथा जिनकी छाती चौड़ी है, उन देवेश्वर अच्युतका मैं इस समय अथवा दूसरे समयमें कब दर्शन करूँगा ॥ ३३-३६॥
सर्वथा कृतकृत्योऽहं यद्वपुर्द्रष्टुमुद्यतः।
नमो मह्यं नमो मह्यं यतो द्रष्टुमहं हरिम् ॥ ३७॥
'मैं सर्वथा कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आज मैं श्रीहरिके साक्षात् शरीरका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। मैं श्रीहरिका दर्शन करनेको कटिबद्ध हूँ, इसलिये मुझे नमस्कार है ! मुझे नमस्कार है ! ॥ ३७ ॥
उद्यतोऽस्मि जगन्नाथं बलभद्रकृतास्पदम्।
द्रक्ष्याम्यवद्यमद्यैव जिष्णुं विष्णुं जगद्गुरुम् ॥ ३८॥
| १०६४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [हरिवंशे |
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‘शेषस्वरूप बलभद्रपर शयन करनेवाले जगदीश्वर श्रीकृष्णके दर्शनके लिये आज मैं उद्यत हूँ। उन विजयशील सर्वव्यापी जगद्गुरु श्रीकृष्णका अवश्य आज ही मैं दर्शन करूँगा ॥ ३८ ॥’
श्रीकौस्तुभोज्ज्वलरुचि स्फुरितोरुवक्षः पीताम्बरं मकरकुण्डलपङ्कजाक्षम् । कृष्णं किरीटवरचक्रगदोर्ध्वहस्तं तेजोमयं मम हरेर्वपुरस्तु भूत्यै ॥ ३९ ॥
‘जो श्रीकौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित है, जिसका विशाल वक्षःस्थल उसी कौस्तुभ एवं श्रीवत्सकी शोभासे उदीप्त हो रहा है, जिसने पीताम्बर धारण कर रखा है, जो मकराकार कुण्डल तथा कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित है, जिसके मस्तकपर उत्तम किरीट और ऊपर उठे हुए हाथोंमें चक्र एवं गदा विराजमान हैं, श्रीहरिका वह श्यामवर्णमय तेजस्वी विग्रह मेरा कल्याण करनेवाला हो ॥ ३९ ॥
वेदोदधौ विशदशास्त्रमहाहियोगे निष्णातशुद्धमतिमन्दरमथ्यमाने । उद्योतमानममरैरनिशं निषेव्यं नारायणाख्यममृतं प्रपिवामि चाद्य ॥ ४० ॥
‘विशद शास्त्ररूपी महान् सर्प (वासुकि) से जुड़े हुए निष्णात शुद्धबुद्धिरूपी मन्दराचलद्वारा मथे जानेवाले वेदरूपी समुद्रसे जिसका प्राकट्य हुआ है तथा अमरगण निरन्तर जिसका सेवन करते हैं, उस नारायण नामक' अमृतका आज मैं अपने नेत्रोंद्वारा पान करूँगा ॥ ४० ॥’
ध्येयं मुमुक्षुभिरमेयमनाद्यनन्तं स्थूलं सुसूक्ष्मतरमेकमनेकमाद्यम् । ज्योतिस्त्रिलोकजनकं त्रिदशैकवन्द्य- मक्ष्णोर्ममास्तु सततं हृदयेऽच्युताख्यम् ॥ ४१ ॥
‘जो मुमुक्षुओंके द्वारा चिन्तन करनेके योग्य, अप्रमेय, अनादि, अनन्त, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, एक, अनेक, आद्य, त्रिभुवनका जनक तथा देवताओंद्वारा एकमात्र वन्दनीय है, वह अच्युत नामक तेज सदा मेरे नेत्रोंके समक्ष और हृदयमें प्रकाशित होता रहे' ॥ ४१ ॥
चिन्तयन्निति विप्रेन्द्रो ययौ द्वारवतीं पुरीम् । मत्वा कृतार्थमात्मानं वाहयन् हयमुत्तमम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सोचते हुए विप्रवर जनार्दन अपनेको कृतार्थ मानकर उस उत्तम अश्वको हाँकते हुए द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने विप्रस्य द्वारवतीगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणका द्वारकागमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका सुधर्मा सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवन-पूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना
वैशम्पायन उवाच
स निवेदितसर्वस्वो द्वाःस्थेन हि जनार्दनः । अथ प्रविश्य धर्मात्मा सुधर्मां वै द्विजोत्तमः ॥ १ ॥ अपश्यद् देवदेवेशं सुधर्माकृतिसंस्थितम् । बलभद्रेण संयुक्तमध्यासितमहासनम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उन द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा जनार्दनने द्वारपालकी सहायतासे सुधर्मा-सभामें प्रवेश करके देवदेवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो वहाँ उत्तम धर्ममय स्वरूपसे विराजमान थे और बलभद्रजीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे ॥ १-२ ॥
अग्रतः स्थितशैनेयं पार्श्वतः स्थितनारदम् । दुर्वाससा कृतकथमुग्रसेनपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥
उनके सामने सात्यकि खड़े थे तथा उनके पार्श्वभागमें नारदजी विराजमान थे। भगवान् श्रीकृष्ण दुर्वासा मुनिसे बातचीत कर रहे थे। राजा उग्रसेन उनके सामने थे ॥ ३ ॥
गायद्गन्धर्वमुख्यैश्च नृत्यदप्सरसां गणैः । सेव्यमानं महाराज सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४ ॥
महाराज ! गाते हुए मुख्य-मुख्य गन्धर्व, नाचती हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ तथा सूत, मागध एवं वन्दीजन योग्यतानुसार उनकी सेवा कर रहे थे ॥ ४ ॥
उद्गीयमानयशसं माधवं मधुसूदनम् । उद्गीयमानं विप्रैश्च सामभिः सामगैर्हरिम् ॥ ५ ॥
वहाँ माधव मधुसूदनके यशका उच्चस्वरसे गान हो रहा था तथा सामगान करनेवाले ब्राह्मण भी साममन्त्रोंद्वारा श्रीहरिका गुणगान करते थे ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा प्रीतमना विष्णुं प्रोद्भूतपुलकच्छविः । नाम्ना जनार्दनोऽस्मीति ननाम चरणौ हरेः ॥ ६ ॥ बलभद्रं ततो देवं ववन्दे शिरसा द्विजः । दूतोऽस्मि देवदेवेश हंसस्य डिम्भकस्य च ।