विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1082, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५७
सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो ! विष्णो ! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७ ॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन ।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताविति केशव ॥ ५८ ॥
'जनार्दन ! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव ! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं ॥
इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम् ।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ धर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९ ॥
'वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं ॥ ५९ ॥
इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते ।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६० ॥
शफ्यं च दारवं पात्रं द्विदलं वेणुकान् बहून् ।
'देव ! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये ! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं ॥ ६० १/२ ॥
इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१ ॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम् ।
'उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है ॥ ६१ १/२ ॥
कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२ ॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः ।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥
'जगदीश्वर ! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव ! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी ॥
किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो ।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४ ॥
'प्रभो ! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते ! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये ॥ ६४ ॥
जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः ।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥
'यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र ॥ ६५ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप ।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६ ॥
'नरेश्वर ! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते ॥ ६६ ॥
न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः ।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७ ॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पितोः ।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८ ॥
'न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण ! हरे ! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता ॥ ६७-६८ ॥
तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो ।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९ ॥
'प्रभो ! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा 'आप रक्षा करते हैं' यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है ॥ ६९ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम् ।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥
'यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये ! रक्षा कीजिये !' ऐसा कहकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥