विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1081, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५५
विप्रवरो ! आपलोग हम-जैसे गृहस्थोंसे सदा निःस्पृह रहते हैं ॥ २४१/२ ॥
प्रार्थ्यं नाम न चैवास्ति स्पृहा नैवास्ति वो यतः॥ २५ ॥
स्पृहाप्रेरितकर्माणः क्षत्रियान् यान्ति सुव्रताः ।
'आपके लिये कोई प्रार्थनीय वस्तु ही नहीं है; क्योंकि आपलोगोंके हृदयमें किसी वस्तुकी कामना ही नहीं होती है। जो लोग किसी स्पृहासे प्रेरित होकर कर्म करनेवाले हैं वे उत्तम व्रतधारी ब्राह्मण अपनी अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये क्षत्रियोंके पास जाते हैं ॥ २५१/२ ॥
निरूप्यमाणमस्माभिर्किञ्चिन्न दृश्यते ॥ २६ ॥
न जाने कारणं ब्रह्मन् युष्मदागमनं प्रति ।
'किंतु विप्रवर ! हमारे बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसी बात दिखायी नहीं देती, जिसके लिये आपलोगोंका यहाँतक आना सम्भव हो । ब्रह्मन् ! फिर आपके आगमनका क्या कारण है । यह मेरी समझमें नहीं आता ॥ २६१/२ ॥
एतावता चानुमेयं किंचित्कारणमस्ति वै ॥ २७ ॥
तद् ब्रूहि यदि विद्येत त्वत्तो ज्ञास्यामहे वयम्।
'आप यहाँतक पधारे हैं, इतनेसे ही यह अनुमान होता है कि आपके शुभागमनका कोई-न-कोई कारण अवश्य है । यदि है तो आप उसे बताइये । हम आपसे ही उसका ज्ञान प्राप्त करेंगे' ॥ २७१/२ ॥
इत्युक्तवति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ २८ ॥
तस्यापि राजन् विप्रस्य भूयः कोपो महानभूत् ।
राजन् ! देवेश्वर चक्रपाणि जनार्दनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मण दुर्वासाका महान् कोप और भी बढ़ गया ॥ २८१/२ ॥
तस्मादभ्यधिकः पूर्वात् कोपः संजायते महान् ॥२९॥
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीन् भक्षयन्निव पश्यतः ।
पहलेका जो क्रोध था, उससे अधिक और महान् कोप प्रकट होने लगा, मानो वे तीनों लोकोंको जला देना और अपनी ओर देखनेवाले लोगोंको खा जाना चाहते हों ॥२९१/२॥
रोषरक्तेक्षणः क्रुद्धो हसन्निव दहन्निव ॥ ३० ॥
उवाच वचनं विष्णुं दुर्वासा क्रोधमूर्च्छितः ।
क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा रोषसे लाल आँखें करके क्रोधपूर्वक हँसते और जलाते हुए-से उस समय श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले-॥ ३०१/२ ॥
न जाने इति कस्मात् त्वं ब्रूषे नो यादवेश्वर ॥ ३१ ॥
जानामि त्वां महादेवं वञ्चयन्निव भाषसे ।
'यादवेश्वर ! आप हमसे ऐसी बात क्यों कहते हैं कि आपके आगमनका कारण मेरी समझमे नहीं आता ? मैं आपको जानता हूँ । आप महान् देव विष्णु हैं; फिर भी हमें ठगते हुए-से बात करते हैं ॥ ३११/२ ॥
पुरातना वयं विष्णो पूर्ववृत्तान्तवेदिनः ॥ ३२ ॥
यथा हि देवदेवोऽसि मायामानुषदेहवान् ।
निगूहसे प्रभुरतः कस्मान्नो जगतीपते ॥ ३३ ॥
'विष्णो ! हम बहुत पुराने हैं और पूर्वकालके वृत्तान्तों- को जानते हैं, जिसके अनुसार हम कहते हैं कि आप देवताओंके भी देवता हैं और आपने मायासे मानवशरीर धारण किया है । जगदीश्वर ! अतः आप हमारे स्वामी होकर हमसे अपने-आपको क्यों छिपा रहे हैं ? ॥ ३२-३३ ॥
सोऽसि ब्रह्मविदां मूर्तिस्त्वैतत् परमं पदम् ।
यदभ्यर्च्य पुरा ब्रह्मा यच्च ज्ञात्वा वयं पुरा ॥ ३४ ॥
'आप ही ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा हैं। यह परमपद आपका ही स्वरूप है, पूर्वकालमे जिसकी आराधना करके ब्रह्माजी ज्ञानवान् हुए और हम भी जिसकी उपासना करके ज्ञानी हुए हैं ॥ ३४ ॥
यतो विश्वमिदं भूतं तदेतत् परमं पदम् ।
यच्च स्थूलं विजानन्ति पुरा तत्त्वेन चेतसा ॥ ३५ ॥
पुराविदोऽथ विश्वेश यदेतत् परमं वपुः ।
'जिससे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट हुआ है, वही आपका यह परम-पद है । विश्वेश्वर ! जिसे पूर्वकालमें पुराणवेत्ता पुरुष तत्त्वनिष्ठ चित्तसे स्थूल (विराट्) रूपसे जानते थे, यह भी आपका ही सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है ॥ ३५१/२ ॥
कर्मणा प्राप्यते यत् तु यत् स्मृत्वा निर्वृता वयम् ॥ ३६ ॥
प्रत्यक्षमपि यद्रूपं नैव जानन्ति मानुषाः ।
न हि मूढधियो देव न वयं तादृशा हरे ॥ ३७ ॥
न जाने इति यद् ब्रूषे किमतः साहसं वचः ।
'जो भगवदर्थ कर्म (भगवान्के समर्पणपूर्वक किये गये यज्ञ आदिके अनुष्ठान अथवा भजन साधन) से प्राप्त होता है, जिसका स्मरण करके हम वीतराग संन्यासी भी परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं तथा प्रेमी भक्तोंको जिसका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रहको मूढ-बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं । देव ! हरे ! हम वैसे (अज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते हैं) ! अतः आप हमारे सामने जो यह कहते हैं कि 'हम आपके आनेका कारण नहीं जानते हैं,' इससे अधिक साहसपूर्ण बात और क्या हो सकती है ? ॥ ३६-३७१/२ ॥
ये हि मूलं विजानन्ति तेषां तु प्रविवेचनम् ॥ ३८ ॥
कुर्वतः किं फलं देव तव केशिनिसूदन ।
'देव ! केशिनिसूदन ! जो जड-मूलकी बातें जानते हैं, उनके सामने इस प्रकार ऊपर-ऊपरकी बातोंका विवेचन करनेसे आपको क्या लाभ होगा ? ॥ ३८१/२ ॥
वेदान्ते प्रथितं तेजस्तव चेदं विचार्यते ॥ ३९ ॥
ये च विज्ञानतृप्तास्तु योगिनो वीतकल्मषाः ।
पश्यन्ति हृत्सरोजेऽपि तदेवेदं वपुः प्रभो ॥ ४० ॥
'वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद् आदि) में भी आपके इसी विख्यात तेजोमय स्वरूपका ब्रह्म आदि नामोंसे विचार किया