विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1080, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५३
तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सब ज्ञानदर्शी संन्यासी हंस और डिम्भकद्वारा छिन्न-भिन्न किये गये छींके, लकड़ीके बने हुए द्विदल (दो दलोंसे युक्त भोजन-पात्र, जो गौके कानकी-सी आकृतिका बना होता है), गेरुए वस्त्र, कौपीन, वल्कल तथा कमण्डलुका आधा टुकड़ा (जो पूरे कमण्डलुको बीचसे चीर डालनेके कारण दो खण्डोंमें विभक्त हो गया था)- इन सबको तथा अन्य सब तोड़ी-फोड़ी गयी वस्तुओंको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये आये ॥११-१३॥
पञ्च चैव सहस्राणि पुरस्कृत्य महामुनिम् । दुर्वाससं तपोनियोनीमीश्वरस्यात्मसम्भवम् ॥ १४ ॥ अहोरात्रेण ते सर्वे द्वारकां कृष्णपालिताम् । ययुर्दान्ता महात्मानो लोमशाः केशवर्जिताः ॥ १५ ॥
उनकी संख्या पाँच हजार थी, वे जितेन्द्रिय महात्मा सिरके केश मुड़ाये रहते थे और उनके शेष शरीर रोमावलियोंसे युक्त थे। वे यतिगण भगवान् शङ्करके अंशसे उत्पन्न हुए तपोयोनि महामुनि दुर्वासाको आगे करके दिनरात चलते हुए श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ १४-१५ ॥
प्रातः प्रविश्य राजेन्द्र वापिकायां यतीश्वराः । स्नात्वोपस्पृश्य ते सर्वे यत्नेन महता तदा ॥ १६ ॥ द्रष्टुमभ्युद्यता विष्णुं कण्टकोद्धृतितत्परम् । एकरूपं समास्थाय सुधर्मायामवस्थितम् ॥ १७ ॥
राजेन्द्र ! प्रातःकाल पुरीमें प्रवेश करके वे यतीश्वरगण वहाँकी एक बावड़ीमें स्नान और आचमन करके बड़े प्रयत्नसे उन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुए, जो एकरूप धारण करके सुधर्मा-सभामें विराजमान हो जगत्के कण्टकोंको उखाड़ फेंकनेके प्रयत्नमें लगे हुए थे ॥ १६-१७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतीनां द्वारकागमने दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें यतियोंका द्वारकागमनविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा-सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना और दुर्वासाका भगवान्की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच अथ सर्वेश्वरो विष्णुः पद्मकिंजलकलोचनः । श्यामः पीताम्बरः श्रीमान् प्रलम्बाम्बरभूषणः ॥ १ ॥ किरीटी श्रीपतिः कृष्णो नीलकुञ्चितमूर्धजः । अव्यक्तः शाश्वतो देवः सकलो निष्कलः शिवः ॥ २ ॥ क्रीडाविहारोपगतः कदाचिद्भवद्वरिः । कुमारैरपरैः सार्धं सात्यकिप्रमुखैर्नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! जो सबके ईश्वर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लंबे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित, मुकुट-मण्डित और लक्ष्मीके अधिपति हैं, जिनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारोंके साथ क्रीडा-विहारमें लगे हुए थे ॥ १—३ ॥
गोलक्रीडां सुधर्माया मध्ये यादवसत्तमः । चकार प्रियकृत् कृष्णो युयुधानेन केशवः ॥ ४ ॥
सुधर्मा-सभाके मध्यभागमें विराजमान हो सबका प्रिय करनेवाले यादवशिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकिके साथ गोल-क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ४ ॥
ममायं प्रथमो गोलस्तव पश्चाद् भविष्यति । इति ब्रुवंस्तदा विष्णुः सात्यकिं कमलेक्षणः ॥ ५ ॥
उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकिसे यह कह रहे थे कि 'यह पहला गोल मेरा है, तुम्हारा पीछे होगा' ॥
पार्श्वस्था यादवास्तस्य वसुदेवपुरोगमाः । उद्धवप्रमुखा राजन्नासेदुः क्वचिदत्र वै ॥ ६ ॥
राजन् ! उनके पार्श्वभागमे वसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थानपर बैठे थे ॥ ६ ॥
अन्यव्यापाररहितो भूतात्मा भूतभावनः । विजहार यथा रामः सुग्रीवेण पुरा नृप ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् श्रीराम अपने सखा सुग्रीवके साथ क्रीड़ा-विहार करते थे, उसी प्रकार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने सुहृदोंके साथ मनोरंजन करते थे ॥ ७ ॥