विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1079, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मध्यंदिने महाविष्णुः शैनेयेन सहाय्युतः।
विक्रीड्य सुचिरं कृष्ण उपारंसीत् स यादवः ॥ ८ ॥
उस दिन दोपहरके समय महाविष्णुस्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ देरतक गोलक्रीड़ा करके यादवोंसहित उससे विरत हो गये ॥ ८ ॥
द्वाःस्थेन वारिताः पूर्वं द्वार्यैव च समास्थिताः।
इदमन्तरमित्येव विविशुस्तां सभां नृप ॥ ९ ॥
राजन् ! जिन्हें द्वारपालने पहले भीतर आनेसे रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि 'यह भीतर प्रवेश करनेका अवसर है' ऐसा जानकर उस समय उस सभामें प्रविष्ट हुए ॥ ९ ॥
यतयो दीर्घतपसः पुरस्कृत्य तपोधनम्।
दुर्वाससं सुमनसो ददृशुर्यादवेश्वरम् ॥ १०॥
गोलक्रीडासमासक्तं करसंस्थितगोलकम् ।
पद्मपत्रविशालाक्षं विष्णुं तं सात्यकिं हरिम् ॥ ११ ॥
एकेनाक्ष्णा ह्लादयन्तं परेणान्येन गोलकम् ।
यतयश्च महाराज प्रत्यदृश्यन्त तत्पुरः ॥ १२ ॥
दीर्घकालसे तपस्या करनेवाले उन शुद्धचेता यतियोंने तपोधन दुर्वासाको आगे करके यादवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो पहले गोलक्रीड़ामें आसक्त थे और उस समय भी जिनके हाथमें गोल मौजूद था । वे प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्रसे सात्यकिको आनन्द प्रदान करते थे और दूसरेसे उस गोलकी ओर देख रहे थे । महाराज ! इसी समय वे यति उनके सामने दिखायी दिये ॥ १०—१२ ॥
वृष्णिपः पुण्डरीकाक्षः सात्यकिर्बलभद्रकः ।
वसुदेवोऽथवाक्रूर उग्रसेनस्तथा नृप ॥ १३ ॥
अन्ये च यादवाः सर्वे सम्भ्रमं प्रतिपेदिरे ।
इदं किमिदमित्येवं व्याशङ्कन्मनसोऽभवन् ॥ १४ ॥
वृष्णिपालक कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियोंको देखकर बड़ी घबराहटमें पड़ गये और शङ्कितचित्त होकर एक दूसरेसे पूछने लगे--'यह क्या है ? कैसी बात है ?' ॥
पृष्ठतोऽप्यनुगच्छन्ति दिधक्षन्तं जगत्त्रयम् ।
अर्घकौपीनवसनं स्मरन्तं कमपि द्विजम् ॥ १५ ॥
अन्तस्तापसमायुक्तं छिन्नदण्डधरं यतिम् ।
बड़ा संताप था । उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर रखा था । राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः वे भीतर-ही-भीतर रोषसे जल रहे थे । उनके नेत्रसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हो रही थी । वे यादवेश्वर श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे । इस अवस्थामें संन्यासी दुर्वासाको उन यादवशिरोमणियोंने भयभीत होकर देखा ॥ १५—१७ ॥
किं करिष्यत्यसौ क्रुद्धः किं वा वक्ष्यति नः प्रभुः।
इति प्राञ्जलयः सर्वे यादवाः प्रतिपेदिरे ॥ १८ ॥
इदमासनमित्येवं किंचिदुच्चुक्षु वृष्णयः ।
वे मन-ही-मन सोचने लगे--'पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे ? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इनसे क्या कहेंगे।' ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और वृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वरमें बोले--'भगवन् ! आपके लिये यह आसन है' ॥ १८ ३ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशः किंचिदुत्प्लुत्य तत्पुरः ॥ १९ ॥
इदमासनमित्येवं स्थीयतामिह निर्वृतः ।
अहमद्य स्थितो विप्र किंकरोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ २० ॥
इसी समय इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासाके आगे चले आये और बोले--'विप्रवर ! यह आसन है, इसपर सुखपूर्वक बैठिये । आज मैं आपकी सेवामें खड़ा हूँ, मैं आपका किङ्कर हूँ' ॥ १९-२० ॥
ततः किंचिदिवासीन आसने यतिविग्रहः ।
आसने संस्थिते तस्मिन् यतयो वीतमत्सराः ॥ २१ ॥
आसनानि यथायोगं भेजिरे निर्वृताः किल ।
तब वे संन्यासीरूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये । उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियोंने भी संतोषपूर्वक यथायोग्य आसन स्वीकार किये ॥ २१ ३ ॥
अर्घ्यादिसमुदाचारं चक्रे कृष्णः किरीटभृत् ॥ २२ ॥
आह भूयो हृषीकेशो यतिं दुर्वाससं प्रभुम् ।
किरीटधारी श्रीकृष्णने अर्घ्य आदिके क्रमसे उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया, फिर वे भगवान् हृषीकेश उन प्रभावशाली यति दुर्वासासे इस प्रकार बोले--॥ २२ ३ ॥
किमर्थं ब्रूहि विप्रेन्द्र अस्मिन् प्रत्यागमो हि वः ॥ २३ ॥
दृष्टं वा हाथवा किंचित् कारणं चास्ति वो महत् ।
'विप्रवर ! बताइये, इस नगरमें आपलोगोंका शुभागमन किस लिये हुआ है ? अथवा आपलोगोंको यहाँ आनेमें कोई महान् कारण दिखायी दिया है ? ॥ २३ ३ ॥
संन्यासिनो द्विजश्रेष्ठा यूयं विगतकल्मषाः ॥ २४ ॥
सदा यूयममत्तत्तो द्विजपुङ्गवाः ।
'आपलोग द्विजोंमें श्रेष्ठ एवं निष्पाप संन्यासी हैं;