विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| १०५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मध्यंदिने महाविष्णुः शैनेयेन सहाय्युतः।
विक्रीड्य सुचिरं कृष्ण उपारंसीत् स यादवः ॥ ८ ॥
उस दिन दोपहरके समय महाविष्णुस्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ देरतक गोलक्रीड़ा करके यादवोंसहित उससे विरत हो गये ॥ ८ ॥
द्वाःस्थेन वारिताः पूर्वं द्वार्यैव च समास्थिताः।
इदमन्तरमित्येव विविशुस्तां सभां नृप ॥ ९ ॥
राजन् ! जिन्हें द्वारपालने पहले भीतर आनेसे रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि 'यह भीतर प्रवेश करनेका अवसर है' ऐसा जानकर उस समय उस सभामें प्रविष्ट हुए ॥ ९ ॥
यतयो दीर्घतपसः पुरस्कृत्य तपोधनम्।
दुर्वाससं सुमनसो ददृशुर्यादवेश्वरम् ॥ १०॥
गोलक्रीडासमासक्तं करसंस्थितगोलकम् ।
पद्मपत्रविशालाक्षं विष्णुं तं सात्यकिं हरिम् ॥ ११ ॥
एकेनाक्ष्णा ह्लादयन्तं परेणान्येन गोलकम् ।
यतयश्च महाराज प्रत्यदृश्यन्त तत्पुरः ॥ १२ ॥
दीर्घकालसे तपस्या करनेवाले उन शुद्धचेता यतियोंने तपोधन दुर्वासाको आगे करके यादवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो पहले गोलक्रीड़ामें आसक्त थे और उस समय भी जिनके हाथमें गोल मौजूद था । वे प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्रसे सात्यकिको आनन्द प्रदान करते थे और दूसरेसे उस गोलकी ओर देख रहे थे । महाराज ! इसी समय वे यति उनके सामने दिखायी दिये ॥ १०—१२ ॥
वृष्णिपः पुण्डरीकाक्षः सात्यकिर्बलभद्रकः ।
वसुदेवोऽथवाक्रूर उग्रसेनस्तथा नृप ॥ १३ ॥
अन्ये च यादवाः सर्वे सम्भ्रमं प्रतिपेदिरे ।
इदं किमिदमित्येवं व्याशङ्कन्मनसोऽभवन् ॥ १४ ॥
वृष्णिपालक कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियोंको देखकर बड़ी घबराहटमें पड़ गये और शङ्कितचित्त होकर एक दूसरेसे पूछने लगे--'यह क्या है ? कैसी बात है ?' ॥
पृष्ठतोऽप्यनुगच्छन्ति दिधक्षन्तं जगत्त्रयम् ।
अर्घकौपीनवसनं स्मरन्तं कमपि द्विजम् ॥ १५ ॥
अन्तस्तापसमायुक्तं छिन्नदण्डधरं यतिम् ।
बड़ा संताप था । उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर रखा था । राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः वे भीतर-ही-भीतर रोषसे जल रहे थे । उनके नेत्रसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हो रही थी । वे यादवेश्वर श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे । इस अवस्थामें संन्यासी दुर्वासाको उन यादवशिरोमणियोंने भयभीत होकर देखा ॥ १५—१७ ॥
किं करिष्यत्यसौ क्रुद्धः किं वा वक्ष्यति नः प्रभुः।
इति प्राञ्जलयः सर्वे यादवाः प्रतिपेदिरे ॥ १८ ॥
इदमासनमित्येवं किंचिदुच्चुक्षु वृष्णयः ।
वे मन-ही-मन सोचने लगे--'पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे ? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इनसे क्या कहेंगे।' ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और वृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वरमें बोले--'भगवन् ! आपके लिये यह आसन है' ॥ १८ ३ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशः किंचिदुत्प्लुत्य तत्पुरः ॥ १९ ॥
इदमासनमित्येवं स्थीयतामिह निर्वृतः ।
अहमद्य स्थितो विप्र किंकरोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ २० ॥
इसी समय इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासाके आगे चले आये और बोले--'विप्रवर ! यह आसन है, इसपर सुखपूर्वक बैठिये । आज मैं आपकी सेवामें खड़ा हूँ, मैं आपका किङ्कर हूँ' ॥ १९-२० ॥
ततः किंचिदिवासीन आसने यतिविग्रहः ।
आसने संस्थिते तस्मिन् यतयो वीतमत्सराः ॥ २१ ॥
आसनानि यथायोगं भेजिरे निर्वृताः किल ।
तब वे संन्यासीरूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये । उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियोंने भी संतोषपूर्वक यथायोग्य आसन स्वीकार किये ॥ २१ ३ ॥
अर्घ्यादिसमुदाचारं चक्रे कृष्णः किरीटभृत् ॥ २२ ॥
आह भूयो हृषीकेशो यतिं दुर्वाससं प्रभुम् ।
किरीटधारी श्रीकृष्णने अर्घ्य आदिके क्रमसे उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया, फिर वे भगवान् हृषीकेश उन प्रभावशाली यति दुर्वासासे इस प्रकार बोले--॥ २२ ३ ॥
किमर्थं ब्रूहि विप्रेन्द्र अस्मिन् प्रत्यागमो हि वः ॥ २३ ॥
दृष्टं वा हाथवा किंचित् कारणं चास्ति वो महत् ।
'विप्रवर ! बताइये, इस नगरमें आपलोगोंका शुभागमन किस लिये हुआ है ? अथवा आपलोगोंको यहाँ आनेमें कोई महान् कारण दिखायी दिया है ? ॥ २३ ३ ॥
संन्यासिनो द्विजश्रेष्ठा यूयं विगतकल्मषाः ॥ २४ ॥
सदा यूयममत्तत्तो द्विजपुङ्गवाः ।
'आपलोग द्विजोंमें श्रेष्ठ एवं निष्पाप संन्यासी हैं;
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५३
तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सब ज्ञानदर्शी संन्यासी हंस और डिम्भकद्वारा छिन्न-भिन्न किये गये छींके, लकड़ीके बने हुए द्विदल (दो दलोंसे युक्त भोजन-पात्र, जो गौके कानकी-सी आकृतिका बना होता है), गेरुए वस्त्र, कौपीन, वल्कल तथा कमण्डलुका आधा टुकड़ा (जो पूरे कमण्डलुको बीचसे चीर डालनेके कारण दो खण्डोंमें विभक्त हो गया था)- इन सबको तथा अन्य सब तोड़ी-फोड़ी गयी वस्तुओंको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये आये ॥११-१३॥
पञ्च चैव सहस्राणि पुरस्कृत्य महामुनिम् । दुर्वाससं तपोनियोनीमीश्वरस्यात्मसम्भवम् ॥ १४ ॥ अहोरात्रेण ते सर्वे द्वारकां कृष्णपालिताम् । ययुर्दान्ता महात्मानो लोमशाः केशवर्जिताः ॥ १५ ॥
उनकी संख्या पाँच हजार थी, वे जितेन्द्रिय महात्मा सिरके केश मुड़ाये रहते थे और उनके शेष शरीर रोमावलियोंसे युक्त थे। वे यतिगण भगवान् शङ्करके अंशसे उत्पन्न हुए तपोयोनि महामुनि दुर्वासाको आगे करके दिनरात चलते हुए श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ १४-१५ ॥
प्रातः प्रविश्य राजेन्द्र वापिकायां यतीश्वराः । स्नात्वोपस्पृश्य ते सर्वे यत्नेन महता तदा ॥ १६ ॥ द्रष्टुमभ्युद्यता विष्णुं कण्टकोद्धृतितत्परम् । एकरूपं समास्थाय सुधर्मायामवस्थितम् ॥ १७ ॥
राजेन्द्र ! प्रातःकाल पुरीमें प्रवेश करके वे यतीश्वरगण वहाँकी एक बावड़ीमें स्नान और आचमन करके बड़े प्रयत्नसे उन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुए, जो एकरूप धारण करके सुधर्मा-सभामें विराजमान हो जगत्के कण्टकोंको उखाड़ फेंकनेके प्रयत्नमें लगे हुए थे ॥ १६-१७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतीनां द्वारकागमने दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें यतियोंका द्वारकागमनविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा-सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना और दुर्वासाका भगवान्की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच अथ सर्वेश्वरो विष्णुः पद्मकिंजलकलोचनः । श्यामः पीताम्बरः श्रीमान् प्रलम्बाम्बरभूषणः ॥ १ ॥ किरीटी श्रीपतिः कृष्णो नीलकुञ्चितमूर्धजः । अव्यक्तः शाश्वतो देवः सकलो निष्कलः शिवः ॥ २ ॥ क्रीडाविहारोपगतः कदाचिद्भवद्वरिः । कुमारैरपरैः सार्धं सात्यकिप्रमुखैर्नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! जो सबके ईश्वर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लंबे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित, मुकुट-मण्डित और लक्ष्मीके अधिपति हैं, जिनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारोंके साथ क्रीडा-विहारमें लगे हुए थे ॥ १—३ ॥
गोलक्रीडां सुधर्माया मध्ये यादवसत्तमः । चकार प्रियकृत् कृष्णो युयुधानेन केशवः ॥ ४ ॥
सुधर्मा-सभाके मध्यभागमें विराजमान हो सबका प्रिय करनेवाले यादवशिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकिके साथ गोल-क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ४ ॥
ममायं प्रथमो गोलस्तव पश्चाद् भविष्यति । इति ब्रुवंस्तदा विष्णुः सात्यकिं कमलेक्षणः ॥ ५ ॥
उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकिसे यह कह रहे थे कि 'यह पहला गोल मेरा है, तुम्हारा पीछे होगा' ॥
पार्श्वस्था यादवास्तस्य वसुदेवपुरोगमाः । उद्धवप्रमुखा राजन्नासेदुः क्वचिदत्र वै ॥ ६ ॥
राजन् ! उनके पार्श्वभागमे वसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थानपर बैठे थे ॥ ६ ॥
अन्यव्यापाररहितो भूतात्मा भूतभावनः । विजहार यथा रामः सुग्रीवेण पुरा नृप ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् श्रीराम अपने सखा सुग्रीवके साथ क्रीड़ा-विहार करते थे, उसी प्रकार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने सुहृदोंके साथ मनोरंजन करते थे ॥ ७ ॥
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५५
विप्रवरो ! आपलोग हम-जैसे गृहस्थोंसे सदा निःस्पृह रहते हैं ॥ २४१/२ ॥
प्रार्थ्यं नाम न चैवास्ति स्पृहा नैवास्ति वो यतः॥ २५ ॥
स्पृहाप्रेरितकर्माणः क्षत्रियान् यान्ति सुव्रताः ।
'आपके लिये कोई प्रार्थनीय वस्तु ही नहीं है; क्योंकि आपलोगोंके हृदयमें किसी वस्तुकी कामना ही नहीं होती है। जो लोग किसी स्पृहासे प्रेरित होकर कर्म करनेवाले हैं वे उत्तम व्रतधारी ब्राह्मण अपनी अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये क्षत्रियोंके पास जाते हैं ॥ २५१/२ ॥
निरूप्यमाणमस्माभिर्किञ्चिन्न दृश्यते ॥ २६ ॥
न जाने कारणं ब्रह्मन् युष्मदागमनं प्रति ।
'किंतु विप्रवर ! हमारे बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसी बात दिखायी नहीं देती, जिसके लिये आपलोगोंका यहाँतक आना सम्भव हो । ब्रह्मन् ! फिर आपके आगमनका क्या कारण है । यह मेरी समझमें नहीं आता ॥ २६१/२ ॥
एतावता चानुमेयं किंचित्कारणमस्ति वै ॥ २७ ॥
तद् ब्रूहि यदि विद्येत त्वत्तो ज्ञास्यामहे वयम्।
'आप यहाँतक पधारे हैं, इतनेसे ही यह अनुमान होता है कि आपके शुभागमनका कोई-न-कोई कारण अवश्य है । यदि है तो आप उसे बताइये । हम आपसे ही उसका ज्ञान प्राप्त करेंगे' ॥ २७१/२ ॥
इत्युक्तवति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ २८ ॥
तस्यापि राजन् विप्रस्य भूयः कोपो महानभूत् ।
राजन् ! देवेश्वर चक्रपाणि जनार्दनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मण दुर्वासाका महान् कोप और भी बढ़ गया ॥ २८१/२ ॥
तस्मादभ्यधिकः पूर्वात् कोपः संजायते महान् ॥२९॥
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीन् भक्षयन्निव पश्यतः ।
पहलेका जो क्रोध था, उससे अधिक और महान् कोप प्रकट होने लगा, मानो वे तीनों लोकोंको जला देना और अपनी ओर देखनेवाले लोगोंको खा जाना चाहते हों ॥२९१/२॥
रोषरक्तेक्षणः क्रुद्धो हसन्निव दहन्निव ॥ ३० ॥
उवाच वचनं विष्णुं दुर्वासा क्रोधमूर्च्छितः ।
क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा रोषसे लाल आँखें करके क्रोधपूर्वक हँसते और जलाते हुए-से उस समय श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले-॥ ३०१/२ ॥
न जाने इति कस्मात् त्वं ब्रूषे नो यादवेश्वर ॥ ३१ ॥
जानामि त्वां महादेवं वञ्चयन्निव भाषसे ।
'यादवेश्वर ! आप हमसे ऐसी बात क्यों कहते हैं कि आपके आगमनका कारण मेरी समझमे नहीं आता ? मैं आपको जानता हूँ । आप महान् देव विष्णु हैं; फिर भी हमें ठगते हुए-से बात करते हैं ॥ ३११/२ ॥
पुरातना वयं विष्णो पूर्ववृत्तान्तवेदिनः ॥ ३२ ॥
यथा हि देवदेवोऽसि मायामानुषदेहवान् ।
निगूहसे प्रभुरतः कस्मान्नो जगतीपते ॥ ३३ ॥
'विष्णो ! हम बहुत पुराने हैं और पूर्वकालके वृत्तान्तों- को जानते हैं, जिसके अनुसार हम कहते हैं कि आप देवताओंके भी देवता हैं और आपने मायासे मानवशरीर धारण किया है । जगदीश्वर ! अतः आप हमारे स्वामी होकर हमसे अपने-आपको क्यों छिपा रहे हैं ? ॥ ३२-३३ ॥
सोऽसि ब्रह्मविदां मूर्तिस्त्वैतत् परमं पदम् ।
यदभ्यर्च्य पुरा ब्रह्मा यच्च ज्ञात्वा वयं पुरा ॥ ३४ ॥
'आप ही ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा हैं। यह परमपद आपका ही स्वरूप है, पूर्वकालमे जिसकी आराधना करके ब्रह्माजी ज्ञानवान् हुए और हम भी जिसकी उपासना करके ज्ञानी हुए हैं ॥ ३४ ॥
यतो विश्वमिदं भूतं तदेतत् परमं पदम् ।
यच्च स्थूलं विजानन्ति पुरा तत्त्वेन चेतसा ॥ ३५ ॥
पुराविदोऽथ विश्वेश यदेतत् परमं वपुः ।
'जिससे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट हुआ है, वही आपका यह परम-पद है । विश्वेश्वर ! जिसे पूर्वकालमें पुराणवेत्ता पुरुष तत्त्वनिष्ठ चित्तसे स्थूल (विराट्) रूपसे जानते थे, यह भी आपका ही सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है ॥ ३५१/२ ॥
कर्मणा प्राप्यते यत् तु यत् स्मृत्वा निर्वृता वयम् ॥ ३६ ॥
प्रत्यक्षमपि यद्रूपं नैव जानन्ति मानुषाः ।
न हि मूढधियो देव न वयं तादृशा हरे ॥ ३७ ॥
न जाने इति यद् ब्रूषे किमतः साहसं वचः ।
'जो भगवदर्थ कर्म (भगवान्के समर्पणपूर्वक किये गये यज्ञ आदिके अनुष्ठान अथवा भजन साधन) से प्राप्त होता है, जिसका स्मरण करके हम वीतराग संन्यासी भी परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं तथा प्रेमी भक्तोंको जिसका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रहको मूढ-बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं । देव ! हरे ! हम वैसे (अज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते हैं) ! अतः आप हमारे सामने जो यह कहते हैं कि 'हम आपके आनेका कारण नहीं जानते हैं,' इससे अधिक साहसपूर्ण बात और क्या हो सकती है ? ॥ ३६-३७१/२ ॥
ये हि मूलं विजानन्ति तेषां तु प्रविवेचनम् ॥ ३८ ॥
कुर्वतः किं फलं देव तव केशिनिसूदन ।
'देव ! केशिनिसूदन ! जो जड-मूलकी बातें जानते हैं, उनके सामने इस प्रकार ऊपर-ऊपरकी बातोंका विवेचन करनेसे आपको क्या लाभ होगा ? ॥ ३८१/२ ॥
वेदान्ते प्रथितं तेजस्तव चेदं विचार्यते ॥ ३९ ॥
ये च विज्ञानतृप्तास्तु योगिनो वीतकल्मषाः ।
पश्यन्ति हृत्सरोजेऽपि तदेवेदं वपुः प्रभो ॥ ४० ॥
'वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद् आदि) में भी आपके इसी विख्यात तेजोमय स्वरूपका ब्रह्म आदि नामोंसे विचार किया
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः १०५७
सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो ! विष्णो ! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७ ॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन ।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताविति केशव ॥ ५८ ॥
'जनार्दन ! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव ! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं ॥
इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम् ।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ धर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९ ॥
'वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं ॥ ५९ ॥
इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते ।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६० ॥
शफ्यं च दारवं पात्रं द्विदलं वेणुकान् बहून् ।
'देव ! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये ! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं ॥ ६० १/२ ॥
इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१ ॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम् ।
'उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है ॥ ६१ १/२ ॥
कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२ ॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः ।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥
'जगदीश्वर ! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव ! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी ॥
किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो ।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४ ॥
'प्रभो ! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते ! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये ॥ ६४ ॥
जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः ।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥
'यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र ॥ ६५ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप ।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६ ॥
'नरेश्वर ! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते ॥ ६६ ॥
न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः ।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७ ॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पितोः ।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८ ॥
'न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण ! हरे ! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता ॥ ६७-६८ ॥
तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो ।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९ ॥
'प्रभो ! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा 'आप रक्षा करते हैं' यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है ॥ ६९ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम् ।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥
'यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये ! रक्षा कीजिये !' ऐसा कहकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
१०५६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जाता है। प्रभो ! जो विज्ञानसे तृप्त निष्पाप योगी जन हैं, वे भी अपने हृदयकमलमें आपके इसी स्वरूपका दर्शन करते हैं ॥ ३९-४० ॥
वेदैर्यद् गीयते तेजो ब्रह्मेति प्रतिपाद्य वै ।
तदेवेदं विजानेऽहं रूपमैश्वरमेव च ॥ ४१ ॥
'वेदोंद्वारा ब्रह्म कहकर जिस तेजोमय परमतत्त्वका गान किया जाता है, आपका यह ऐश्वर्यशाली रूप वही है (उस परब्रह्मसे अभिन्न ही है), ऐसा मैं जानता हूँ ॥ ४१ ॥
वैष्णवं परमं तेज इति वेदेषु पठ्यते ।
अवगच्छाम्यहं विष्णो तदेवेदं वपुस्तव ॥ ४२ ॥
'विष्णो ! वेदोंमें 'तद्विष्णोः परमं पदम्' इत्यादिरूपसे विष्णुके जिस परम तेजोमय तत्त्वका प्रतिपादन किया जाता है, वही आपका यह स्वरूप है—यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ४२ ॥
य ओमित्युच्यते शब्दो यस्य वागिति गीयते ।
स एवासि प्रभो विष्णो न जाने इति मा वद ॥ ४३ ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जिस ॐ शब्दका उच्चारण होता है, वह जिनकी वाणीके रूपमें गाया जाता है, वे ही परमात्मा आप हैं; अतः आप यह न कहिये कि मैं आपके आनेका कारण नहीं जानता ॥ ४३ ॥
परोक्षं यदि किंचित् स्यात् तव वक्तुं प्रयुज्यते ।
न जाने इति गोविन्द मा वादीः साहसं हरे ॥ ४४ ॥
'गोविन्द ! हरे ! यदि आपके लिये कोई भी वस्तु परोक्ष होती तो आपका ऐसा कहना उचित हो सकता था; अतः 'मैं नहीं जानता' यह साहसपूर्ण वचन आप मत कहिये ॥
विश्वं यतः प्रादुरासीद् यस्मिँल्लीनं क्षये सति ।
इदं तदैश्वरं तेजस्त्ववगच्छामि केशव ॥ ४५ ॥
'केशव ! पूर्वकालमें यह विश्व जिससे प्रकट हुआ था और संहारकालमें यह फिर जिसमें लीन हो जायगा, वही आपका यह ईश्वरीय तेजोमय विग्रह है, ऐसा मैं जानता हूँ ॥
कर्ता त्वं भूतभव्येश प्रतिभासि सदा हृदि ।
यद् यद् रूपं स्मरे नित्यं तत् तदेवासि मे हृदि ॥ ४६ ॥
'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी हरे ! आप ही सबके कर्ता हैं और सदा मेरे हृदयमें प्रकाशित होते रहते हैं। मैं जिस-जिस रूपका स्मरण करता हूँ, आप सदा उसी-उसी रूपसे मेरे हृदयमें विद्यमान हैं ॥ ४६ ॥
वायुरेव यदा विष्णुरिति मे धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४७ ॥
'विभो ! जब मेरी बुद्धि ऐसा निश्चय करती है कि वायु भी विष्णु हैं, तब आप वायुरूपसे ही मेरे हृदयमें विराजमान होते हैं ॥ ४७ ॥
आकाशो विष्णुरित्येव कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४८ ॥
'प्रभो ! जब मेरी बुद्धि कभी इस निश्चयपर पहुँचती है कि आकाश ही विष्णु है, तब आप उसी रूपसे मेरेमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ४८ ॥
पृथिवी विष्णुरित्येतत् कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा पार्थिवरूपस्त्वं प्रतिभासि सदा मम ॥ ४९ ॥
'जब कभी मेरी बुद्धिका यह निश्चय होता है कि 'पृथिवी ही विष्णु है', तब आप सदा मुझे पार्थिवरूप ही प्रतीत होते हैं ॥ ४९ ॥
रसोऽयं देव इत्येव कदाचिच्चिन्त्यते मया ।
तदा रसात्मना विष्णो हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ५० ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जब कभी मैं यह सोचता हूँ, कि 'यह रस ही नारायणदेव है', तब आप रसरूपसे मेरे हृदयमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ५० ॥
यदा त्वां तेज इत्येवं स्मर्ता स्यां पुरुषोत्तम ।
तदा तद्रूपसम्पन्नः प्रतिभासि सदा हृदि ॥ ५१ ॥
'पुरुषोत्तम ! जब मैं आपका तेजोरूपसे स्मरण करता हूँ, तब आप सदा उसी रूपसे सम्पन्न होकर मेरे हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५१ ॥
चन्द्रमा हरिरित्येवं तदा चान्द्रमसं वपुः ।
निरीक्ष्य चक्षुषा देव ततः प्रीतोऽस्मि केशव ॥ ५२ ॥
'देव ! केशव ! जब मैंने ऐसा निश्चय किया कि 'चन्द्रमा ही श्रीहरि हैं,' तब मैं चन्द्रमाके रूपमें ही आपके स्वरूपका नेत्रोंद्वारा दर्शन करके प्रसन्न होता हूँ ॥ ५२ ॥
यदा सौरं वपुरिति स्मर्ता स्यां जगतीपते ।
तदा तद्भावनावोगात् सूर्य एव विराजसे ॥ ५३ ॥
'पृथ्वीनाथ ! जब मैं ऐसा चिन्तन करता हूँ कि 'यह सूर्यमण्डल ही आपका स्वरूप है,' तब आप मेरी उस भावनाके योगसे सूर्यरूप होकर ही विराजमान होते हैं ॥ ५३ ॥
तस्मात् सर्वं त्वमेवासि निश्चिता मतिरीदृशी ।
अतो न जानेऽहमिति वक्तुं नेशो जनार्दन ॥ ५४ ॥
'अतः सब कुछ आप ही हैं, यह मेरी बुद्धिका निश्चय है; इसलिये जनार्दन ! आप यह नहीं कह सकते कि 'मैं आपलोगोंके आनेका कारण नहीं जानता' ॥ ५४ ॥
इत्यर्थे संस्थितो विष्णो पीडां नो नैव चिन्तयेः ।
अत्यन्तदुःखिता विष्णो वयं त्वामनुसंस्थिताः ॥ ५५ ॥
'विष्णो ! इस सिद्धान्तमें प्रतिष्ठित होकर भी आप हमारी पीड़ाका कुछ विचार नहीं कर रहे हैं। भगवन् ! हम अत्यन्त दुःखित होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ५५ ॥
ईदृशीमवस्था नो नेतां स्मरसि केशव ।
एतत् पुनर्भाग्यमतो नष्टमित्येव चिन्तये ॥ ५६ ॥
मन्दभाग्या वयं विष्णो यतो नो न स्मरेः प्रभो ।
'केशव ! हमारी तो ऐसी दुर्दशा हो रही है और आप इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते हैं; इससे हम बार-बार यही
भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५७
सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो! विष्णो! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं॥ ५६$\frac{१}{२}$॥
कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताचिति केशव ॥ ५८॥
‘जनार्दन! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं॥
इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम्।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ घर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९॥
‘वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं॥ ५९॥
इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६०॥
शक्यं च दारवं पात्रं द्विदलान् वेणुकांन् बहून् ।
‘देव! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं॥ ६०$\frac{१}{२}$॥
इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम्।
‘उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है॥ ६१$\frac{१}{२}$॥
कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥
‘जगदीश्वर! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी॥
किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४॥
‘प्रभो! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये॥ ६४॥
जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥
‘यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र॥ ६५॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६॥
‘नरेश्वर! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते॥ ६६॥
न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पिणोः।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८॥
‘न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण! हरे! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता॥ ६७-६८॥
तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९॥
‘प्रभो! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा ‘आप रक्षा करते हैं’ यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है॥ ६९॥
बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम्।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥
‘यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये! रक्षा कीजिये!’ ऐसा कहकर क्रोधसे मूच्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये॥ ७०॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
१०५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमाप्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना
वैशम्पायन उवाच
यतेर्वचनमाकर्ण्य मन्दमुच्छ्वस्य केशवः।
दुर्वाससं समालोक्य बभाषे यादवेश्वरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यतिका यह वचन सुनकर यादवेश्वर श्रीकृष्णने धीरेसे उच्छ्वास लेकर दुर्वासाकी ओर देखा और इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १ ॥
क्षन्तव्यं भवता सर्वं दोष एव ममैव हि।
शृणु वाक्यं ममैतत् तु श्रुत्वा शान्तिपरो भव ॥ २ ॥
'भगवन् ! अब जो कुछ हो गया, उस सबके लिये आप क्षमा करें; वास्तवमें यह मेरा ही दोष है। आप मेरी यह बात सुनें और सुनकर शान्त हो जायें ॥ २ ॥
जेष्यामि तौ रणे विप्र हंसं डिम्भकमेव च।
गिरीशो वा वरं दद्याच्छक्रो वा धनदोऽपि वा ॥ ३ ॥
यमो वा वरुणो वापि ब्रह्मा वाथ चतुर्मुखः।
सबलो सानुजौ हत्वा पुनर्दास्यामि वो रतिम् ॥ ४ ॥
'विप्रवर ! मैं हंस और डिम्भकको युद्धमें पराजित करूँगा। उन्हें भगवान् शङ्कर, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा कोई भी वर क्यों न दे, मैं सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित उन दोनोंका वध करके पुनः आप-लोगोंको प्रसन्नता प्रदान करूँगा ॥ ३-४ ॥
सत्येनैव शपाम्यद्य मा रोषवशगो भव।
रक्षां वोऽहं करिष्यामि हत्वा तौ च नृपाधमौ ॥ ५ ॥
'आज मैं सत्यकी ही शपथ लेकर कहता हूँ कि आप रोषके वशीभूत न होइये। मैं उन दोनों नीच नरेशोंका वध करके आपलोगोंकी रक्षा करूँगा ॥ ५ ॥
जानामि तौ दुरात्मानौ युष्मद्दोषकरौ हि तौ।
श्रुतं च पूर्वमस्माभिस्तीक्ष्णदण्डधराविति ॥ ६ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ गिरीशवरदर्पितौ।
नाल्पप्रयत्नसंसाध्यौ जरासंधहितैषिणौ ॥ ७ ॥
'मैं उन दोनों दुरात्माओंको जानता हूँ, उन्हीं दोनोंने आपलोगोंका अपराध किया है। मैंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वे दोनों कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान् और मदमत्त हैं। भगवान् शङ्करका वर पानेसे उनका घमंड बढ़ा हुआ है। थोड़े-से प्रयत्नद्वारा उन्हें वशमें नहीं किया जा सकता। वे जरासंधके हितैषी हैं ॥ ६-७ ॥'
प्राणानपि तयो राजा दास्यत्येव न संशयः।
जरासंधो न भूपालो विना तौ जयते महीम् ॥ ८ ॥
'इसमें संदेह नहीं कि राजा जरासंध उन दोनोंके लिये अपने प्राण भी दे डालेगा; क्योंकि उन दोनोंके बिना राजा जरासंध इस पृथ्वीपर विजय नहीं पा सकता ॥ ८ ॥
जये तयोर्विप्रवर्य तत्र श्रेयो भवेत् ततः।
यत्र यत्र तु तौ गत्वा स्थितावित्यनुशुश्रुम ॥ ९ ॥
तत्र तत्र च हन्ताहं नात्र कार्या विचारणा।
'विप्रवर ! उन दोनोंको पराजित करते समय उन्हें वहाँ जरासंधकी ओरसे श्रेष्ठ सहायता प्राप्त हो सकती है, तो भी वे दोनों जहाँ-जहाँ जाकर खड़े होंगे और इसका समाचार हम सुन लेंगे, वहाँ-वहाँ पहुँचकर मैं उन दोनोंका वध करूँगा, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
गच्छध्वं यतयः स्वैरं निजकार्यपरायणाः ॥ १० ॥
अचिरेणैव कालेन जेप्यामि रणपुङ्गवौ।
'संन्यासियो ! आपलोग अपने कर्तव्य-पालनमें तत्पर रहकर जहाँ चाहें इच्छानुसार जायें। मैं थोड़े ही समयमें उन रणकुशल वीरोंको परास्त करूँगा' ॥ १० ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा यादवेश्वरमाह सः ॥ ११ ॥
स्वस्त्यस्तु भवते कृष्ण जगतां स्वस्ति कुर्वते।
किं नु नाम जगन्नाथ दुःसाध्यं तव केशव ॥ १२ ॥
तब प्रेमपूर्वक प्रसन्नचित्त हो दुर्वासाने यादवेश्वर श्रीकृष्णसे कहा—'श्रीकृष्ण ! तीनों लोकोंका कल्याण करने-वाले आपका मङ्गल हो। जगन्नाथ ! केशव ! कौन-सा ऐसा कार्य है, जो आपके लिये दुष्कर हो ॥ ११-१२ ॥
त्रिलोकेश त्रिधामासि सर्वसंहारकारकः।
देवानार्माप देवेशः सर्वत्र समदर्शनः ॥ १३ ॥
'त्रिलोकीनाथ ! आप त्रिधामा हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले हैं, देवताओंके भी देवेश्वर हैं। आपकी सर्वत्र समान दृष्टि है ॥ १३ ॥
विष्णो देव हरे कृष्ण नमस्ते चक्रपाणये।
नमः स्वभावशुद्धाय शुद्धाय नियताय च ॥ १४ ॥
'विष्णो ! देव ! हरे ! कृष्ण ! हाथमें चक्र धारण करने-वाले ! आपको नमस्कार है। आप स्वभावसे शुद्ध हैं, शुद्ध-स्वरूप हैं तथा शौच, संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न एवं सर्वव्यापी हैं ॥ १४ ॥
शब्दगोचर देवेश नमस्ते भक्तवत्सल।
अज्ञानादथवा ज्ञानाद् यन्मयोक्तं क्षमस्व तत् ॥ १५ ॥
'देवेश्वर ! आप ही वैदिक शब्दोंके चरम तात्पर्य हैं। भक्तवत्सल ! आपको मेरा नमस्कार है। मैंने जानकर अथवा
भविष्यपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५९
अनजानमें जो अनुचित बात कह दी हो, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ॥ १५ ॥
त्वमेवाहं जगन्नाथ नावयोरन्तरं पृथक्।
अतः क्षमस्व भगवन् क्षमासारा हि साधवः ॥ १६ ॥
'जगन्नाथ ! मैं आपका ही स्वरूप हूँ। हम दोनोंमें कोई भेद या पार्थक्य नहीं है। अतः भगवन्! आप मुझे क्षमा करें; क्योंकि साधुपुरुषोंका सारतत्त्व क्षमा ही है' ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुवाच
क्षन्तव्यं भवता विप्र क्षमासारा वयं सदा।
संन्यासिनः क्षमासाराः क्षमा तेषां परं बलम् ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् बोले—विप्रवर ! क्षमा तो आपको करनी चाहिये। हमलोग तो सदा आप महापुरुषोंकी ही क्षमाका आश्रय लेनेवाले हैं। संन्यासियोंका सारतत्त्व क्षमा ही है। क्षमा ही उनका उत्तम बल है ॥ १७ ॥
क्षमा मोक्षकरी नित्यं तत्त्वज्ञानमिव द्विज।
क्षमा धर्मः क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा यशः ॥ १८ ॥
क्षमा स्वर्गस्य सोपानमिति वेदविदो विदुः।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन क्षमां पालयत स्वकाम् ॥ १९ ॥
ब्रह्मन् ! क्षमा तत्त्वज्ञानकी भाँति सदा ही मोक्ष प्रदान करनेवाली है। क्षमा धर्म, क्षमा सत्य, क्षमा दान और क्षमा यश है। वेदज्ञ पुरुष ऐसा मानते हैं कि क्षमा ही स्वर्गकी सीढ़ी है। अतः आपलोग पूरा प्रयत्न करके अपने क्षमा-धर्मका पालन करें ॥ १८-१९ ॥
प्रत्यक्षज्ञानसंयुक्ता यूयं सर्वे यतीश्वराः।
य एते यतयो विप्राः पूजनीया मयाद्य वै ॥ २० ॥
भोक्तव्या यतयो विप्रा भिक्षुकाः सर्व एव हि।
यतीश्वरो ! आप सब लोग प्रत्यक्ष ज्ञानसे संयुक्त हैं। यहाँ जो यति-ब्राह्मण पधारे हैं, उन सबका आज मुझे पूजन करना है। यतिधर्ममें तत्पर रहनेवाले इन सभी भिक्षु ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना है ॥ २०½ ॥
तथेति ते प्रतिज्ञाय भोक्तुमैच्छन् हरेर्गृहे ॥ २१ ॥
ततः स्वभवनं विष्णुः प्रविश्य हरिरीश्वरः।
चतुर्विधं तथाऽऽहारं कारयित्वा यथाविधि ॥ २२ ॥
भोजयामास तान् सर्वान् यतीन् यतिवरार्चितः।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन सबने भगवान्के भवनमें भिक्षा ग्रहण करनेका विचार किया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु हरिने अपने भवनके भीतर प्रवेश करके विधिपूर्वक चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार करायी और उन समस्त यतियोंको भोजन कराया। उस समय यतिश्रेष्ठ दुर्वासाने श्रीकृष्णका सम्मान किया ॥ २१-२२½ ॥
छित्त्वा छित्त्वा च देवेशो दुकूलानि मृदूनि सः ॥ २३ ॥
ददौ तेभ्यस्तदा विष्णुः सर्वेभ्यो जनमेजय।
ते च प्रीता यथायोगं यथापूर्वं ततो गताः ॥ २४ ॥
जनमेजय ! देवेश्वर श्रीकृष्णने उस समय कोमल वस्त्र फाड़-फाड़कर उन सब संन्यासियोंके लिये कौपीन आदि बनानेके लिये दिया वे उन्हें पूर्ववत् यथायोग्य पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सब लोग वहाँसे चले गये ॥ २३-२४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतिभोजने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें यतियोंका भोजनविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना
वैशम्पायन उवाच
दुर्वासास्त्वथ तत्रैव नारदेन महात्मना।
चिन्तयन् ब्रह्मतत्त्वं च विजहार यथासुखम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दुर्वासा मुनि वहाँ महात्मा नारदजीके साथ ब्रह्मतत्त्वका चिन्तन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करने लगे ॥ १ ॥
भगवानपि गोविन्दस्तयोर्वासममन्यत।
ततस्तौ हंसडिम्भकौ तस्मिन् काले महीपतिम् ॥ २ ॥
ब्रह्मदत्तं महीपालं पितरं वीर्यशालिनम्।
प्रावोचतामिदं वाक्यं समन्ताज्जनसंसदि ॥ ३ ॥
भगवान् गोविन्दने भी वहाँ उन दोनोंको रहनेकी अनुमति दे दी। तदनन्तर दोनों भाई हंस और डिम्भक उस समय अपने पराक्रमशाली पिता महाराज ब्रह्मदत्तके पास जाकर सब ओरसे भरे हुए दरबारमें उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥
राजसूयं महायज्ञं पितः कुरु सुयत्नतः।
१. खाने, पीने, चाटने और चूसनेके भेदसे चार प्रकारकी भोजन-सामग्री होती है।
१०६० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्मिन् मासि नृपश्रेष्ठ यतावो यज्ञसिद्धये ॥ ४ ॥ 'पिताजी ! आप यत्नपूर्वक राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान कीजिये। नृपश्रेष्ठ ! हम दोनों इसी मासमें आपके इस यज्ञकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करेंगे ॥ ४ ॥' आवां तेऽद्य महाराज दिशां विजयतत्परौ । यतिष्यावो बलैः सार्धं गजैराश्वै रथैरपि ॥ ५ ॥ सम्भारा यज्ञसिद्धयर्थमानेतव्या नृपोत्तम । 'महाराज ! हम दोनों भाई आपके लिये दिग्विजय करनेके लिये तत्पर हैं। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरंगिणी सेनाएँ साथ लेकर हम सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पानेका प्रयत्न करेंगे। नृपश्रेष्ठ ! आपको यज्ञकी सिद्धिके लिये सामग्रियोंका संग्रह कराना चाहिये' ॥ ५ ॥ तथेति स महाबाहो ब्रह्मदत्तोऽब्रवीत् तदा ॥ ६ ॥ जनार्दनस्तु विप्रेन्द्रो दृष्ट्वा साहसत्तत्परौ । अशक्यमिति मन्वानो वयस्यं हंसमब्रवीत् ॥ ७ ॥ शृणु हंस वचो मह्यं श्रुत्वा निश्चित्य वीर्यवान् । महाबाहु जनमेजय ! तब राजा ब्रह्मदत्तने 'तथास्तु' कहकर उन दोनोंकी बात मान ली। उन दोनोंको दुःसाहसमें तत्पर होते देख, उनके प्रयासको असम्भव मानकर विप्रवर जनार्दनने अपने मित्र हंससे कहा—'हंस ! पहले मेरी बात सुनो । सुनकर उसपर भलीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचो और उसके अनुसार पराक्रमपूर्वक कार्य करो ॥ ६-७॥ आयुष्मन् साहसं कर्तुमुद्यतोऽसि नृपोत्तम ॥ ८ ॥ स्थिते भीष्मे जरासंधे बाह्लीके च नृपोत्तमे । किं च वीरेषु सर्वेषु यादवेषु नृपोत्तम ॥ ९ ॥ 'आयुष्मन् ! नृपश्रेष्ठ ! भीष्म, जरासंध, नृपशिरोमणि बाह्लीक तथा समस्त यादव वीरोंके रहते हुए तुम दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेके लिये उद्यत हुए हो ॥ ८-९ ॥ भीष्मो हि बलवान् वृद्धः सत्यसंधो जितेन्द्रियः॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं यो जिगाय भृगूत्तमः ॥ १० ॥ तं युद्धे जितवान् भीष्मः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । 'भीष्मजी बलवान्, वृद्ध, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। जिन भृगुकुलतिलक परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीपर विजय पायी है, उन्हें भीष्मने सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते युद्धमें जीत लिया था ॥१०॥ जरासंधस्य यद् वीर्यं तद् भवान् वेत्ति संयुगे ॥ ११ ॥ वृष्णीवीरास्तु ते सर्वे कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । तत्र कृष्णो हृषीकेशो जितशत्रुः कृती सदा ॥ १२ ॥ 'जरासंधका युद्धमें जो पराक्रम है, उसे तुम अच्छी तरह जानते हो। समस्त वृष्णिवंशी वीर भी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं। उनमें जो भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे सबकी इन्द्रियोंके नियन्ता, शत्रुविजयी तथा सदा ही रणकुशल हैं ॥ ११-१२ ॥ जरासंधेन सहितः सदा युद्धे जितश्रमः । प्रमुखे तस्य न स्थातुं शक्तो जीवन् नृपोत्तमः ॥ १३ ॥ 'जरासंधके साथ सदा युद्ध करके उन्होंने परिश्रमको जीत लिया है। कोई भी श्रेष्ठ नरेश उनके सामने जीते-जी नहीं ठहर सकता ॥ १३ ॥' बलभद्रस्तथा मत्तः क्रुद्धो यदि भवेद् बली ॥ लोकानिमान् समाहर्तुं शक्नोतीति मतिर्मम ॥ १४ ॥ 'बलवान् बलभद्रजी बलके मदसे उन्मत्त रहते हैं, वे यदि कुपित हो जायें तो अकेले ही इन तीनों लोकोंका संहार कर सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १४ ॥ तथा च सात्यकिर्वीरः शक्तो जेतुं रणे रिपून् । तथान्ये यादवाः सर्वे कृष्णमाश्रित्य दंशिताः ॥ १५ ॥ 'इसी तरह वीर सात्यकि भी रणभूमिमें शत्रुओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं। अन्य सब यादव भी श्रीकृष्णका आश्रय लेकर सदा युद्धके लिये कवच बाँधे रहते हैं ॥ १५ ॥ अस्माभिश्च कृतः पूर्वं विरोधो यतिभिः सह । दुर्वासा यतिभिः सार्धं गतो द्रष्टुंस केशवम् ॥ १६ ॥ 'हमलोगोंने पहले यतियोंके साथ विरोध किया था। उन सब यतियोंके साथ दुर्वासा मुनि भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये गये हैं ॥ १६ ॥ इति श्रुतं नृपश्रेष्ठ ब्राह्मणाद् भोक्तुमागतात् । तथा सति यथा सिद्ध्येत् तथा चिन्त्यं चमन्त्रिभिः॥१७॥ ततः पश्चाद् विधास्यामो राजसूयं महाक्रतुम् । 'नृपश्रेष्ठ ! यह बात मैंने अपने घर भोजन करनेके लिये आये हुए एक ब्राह्मणसे सुनी है। ऐसी अवस्थामें जिस प्रकार अपना कार्य सिद्ध हो, उस उपायका मन्त्रियोंके साथ विचार करना चाहिये। इसके बाद हम राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे' ॥ १७॥
हंस उवाच को नाम भीष्मो मन्दात्मा वृद्धो हीनबलः सदा ॥ १८ ॥ आवयोः पुरतः स्थातुं शक्तः स किल वृद्धकः । हंस बोला—मन्दबुद्धि बूढ़ा और सदाका बलहीन भीष्म कौन-सा वीर है ? क्या वह बूढ़ा हम दोनोंके सामने ठहर सकता है ॥ १८॥ यादवा इति चित्रं नः शक्ताः स्थातुं रणे द्विज ॥ १९ ॥ कश्च कृष्णः पुरः स्थातुं बलदेवश्च मत्तकः । शैनेयश्चापि विप्रेन्द्र स्थातुं न इति चिन्तय ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! युद्धमे यादव हमारे सामने ठहर सकते हैं, यह तुम्हारी बात भी विचित्र ही है। वह कृष्ण और मतवाला बलभद्र भी कौन ऐसे वीर हैं, जो हमारे सामने ठहर सकें। विप्रवर ! तुम यह निश्चय समझो कि सात्यकि भी हम दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता ॥ १९-२० ॥
भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६१
जरासंधस्तु धर्मात्मा बन्धुरेव सदा मम । गच्छ प्रियं यदुश्रेष्ठं ब्रूहि मद्रचनात्त्वरन् ॥ २१ ॥ धर्मात्मा जरासंध तो सदा हमलोगोंका हितैषी बन्धु ही है । विप्रवर ! तुम यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णके पास जाओ और मेरी आज्ञासे तुरंत यह बात उनसे कहो—॥ २१ ॥
दीयतां करसर्वस्वं यज्ञार्थं सुन्दरं बहु । लवणानि बहून्यद्य गृह्य केशव मा चिरम् ॥ २२ ॥ आगच्छ त्वरितं कृष्ण न ते कार्यं विलम्बनम् । ‘केशव ! तुम यज्ञके लिये बहुत सुन्दर सामग्री तथा करके रूपमें अपना सारा धन दे दो, साथ ही बहुत-से नमकका संग्रह करके शीघ्र आओ । श्रीकृष्ण ! तुम्हें इस कार्यमें विलम्ब नहीं करना चाहिये’ ॥ २२३ ॥
इति ब्रूहि यदुश्रेष्ठं याहि त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥ न ब्रूयाश्चोत्तरं विप्र शपेयं त्वां प्रियोऽसि मे । मित्रभावादिदं ब्रूहि पश्यामि त्वां पुनः पुनः ॥ २४ ॥ ब्रह्मन् ! तुम शीघ्रतापूर्वक जाओ और यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे मेरा यह संदेश सुना दो । विप्र ! मैं शपथ दिलाता हूँ, तुम मेरी बातका कोई उत्तर न देना । तुम मेरे प्रिय मित्र हो, मित्रभावसे ही यह बात जाकर कहो । मैं बार बार तुम्हारी ओर देखता हूँ ॥ २३-२४ ॥
इति संचोदितो विप्रो नोत्तरं प्रत्यभाषत । मित्रभावात् तथा राजन् स्नेहाच्च जनमेजय ॥ २५ ॥ राजन् ! जनमेजय ! हंससे इस प्रकार प्रेरित होकर ब्राह्मणने मित्रभाव तथा स्नेहके कारण उसे कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २५ ॥
जनार्दनस्तु धर्मात्मा नित्यं गन्तुं समुद्यतः । अद्य श्वो वा परश्वो वा गच्छामीति यतेत सः ॥ २६॥ सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले जनार्दन श्रीकृष्णके पास जानेके लिये उद्यत हो गये । ‘आज, कल या परसों मैं अवश्य जाऊँगा’ ऐसा कहकर वे जानेकी तैयारी करने लगे ॥ २६ ॥
देवं द्रष्टुं जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम् । एक एव च धर्मात्मा हयमारुह्य सत्वरम् ॥ २७ ॥ प्रातरेव जगामाशु द्रष्टुं द्वारवतीं द्विजः । हरिं कृष्णं हृषीकेशं मनसा संस्मरन् द्विजः ॥ २८ ॥ धर्मात्मा जनार्दन शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगत्कारण श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये अकेले ही तीव्रगामी अश्वपर आरूढ हो प्रातःकाल ही द्वारकाके लिये शीघ्रतापूर्वक चल दिये। उनकी यात्राका एक ही उद्देश्य था—इन्द्रियोंके प्रेरक सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका दर्शन । ब्राह्मण जनार्दन उन्हींका मन-ही-मन स्मरण करते हुए चले ॥ २७-२८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यान-विषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनकी भगवद्-दर्शनविषयक उत्कण्ठा
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रायाद्धरिं विष्णुं ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः । हयेनैकेन राजेन्द्र त्वरितं स ययौ नृप ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र ! नरेश्वर ! तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण जनार्दन एक अश्वपर सवार हो तुरंत भगवान् विष्णु हरिके पास चल दिये ॥ १ ॥
यथा निदाघसमये सूर्यांशुपरिपीडितः । पान्थो याति जलं दृष्ट्वा त्वरितं तत्पिपासया ॥ २ ॥ धावत्येव तथा विप्रो हरिं द्रष्टुं जनार्दनः । गच्छन् स चिन्तयामास चोदयन् हयमुत्तमम् ॥ ३ ॥ जैसे ग्रीष्म ऋतुमे सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे पीड़ित हुआ पथिक कहीं दूर जल देखकर उसे पीनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक उसके पास जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मण जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये दौड़ते हुए ही चले । वे अपने उत्तम अश्वको हाँकते हुए मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे—॥ २-३ ॥
हंस एव प्रियो मह्यं कुर्यात् प्रियहितं मम । तथा हि प्रेषितस्तेन हरिं पश्यामह्यहं प्रभुम् ॥ ४ ॥ ‘वास्तवमें हंस ही मेरा प्रिय मित्र है। वही मेरा प्रिय और हित कर सकता है; क्योंकि उसीने मुझे द्वारका भेजा है, जहाँ मैं भगवान् श्रीहरिका दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥
अहमेव सदा धन्यो मत्तो ह्यभ्यधिको न हि । यतो द्रक्ष्याम्यहं विष्णुं वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ५ ॥ ‘मैं ही सदा धन्य हूँ, मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि मैं द्वारकापुरीमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥
सा हि मे जननी धन्या हरिं दृष्ट्वा पुनर्गतम् । कृतार्थं सर्वदा देवी द्रक्ष्यत्येषा मनस्विनी ॥ ६ ॥ ‘मेरी वह माता धन्य है, जो मनस्विनीदेवी भगवान्का दर्शन करके सदाके लिये कृतार्थ होकर लौटे हुए मुझ अपने पुत्रको पुनः देखेगी ॥ ६ ॥
मुखमुन्निद्रहेमाब्जकिञ्जल्कसदृशप्रभम् ।
१०६२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
द्रक्ष्यामि देवदेवस्य चक्रिणः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ७ ॥ 'मैं शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके उस मुखका दर्शन करूँगा, जो विकसित सुवर्णमय कमलके केसरकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ७ ॥
वपुर्द्रक्ष्याम्यहं विष्णोर्नीलोत्पलदलच्छवि । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ॥ ८ ॥ 'मैं श्रीकृष्णके नीलकमलदलकी-सी कान्तिवाले उस श्यामसुन्दर शरीरका दर्शन करूँगा, जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित है ॥ ८ ॥
नेत्रे ते देवदेवस्य पद्माकिञ्जल्कसप्रभे । पश्याम्यहमदीनात्मा नष्टदुःखोऽस्मि निर्वृतः ॥ ९ ॥ 'मैं देवाधिदेव श्रीकृष्णके उन दोनों नेत्रोंका दर्शन करूँगा, जो विकसित कमलदलके समान कान्तिमान् हैं। उस समय मेरे हृदयका सारा दैन्य दूर हो जायगा, दुःख मिट जायेंगे और मैं परमानन्दमें निमग्न हो जाऊँगा ॥ ९ ॥
अपि द्रक्ष्यति योगात्मा सौम्येनैव स्वचक्षुषा । अपि वा मत्प्रियं ब्रूयात् स्वस्ति चेति च वा वदेत् ॥ १०॥ 'क्या योगात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सौम्यदृष्टिसे ही मेरी ओर देखेंगे, अथवा मुझे प्रिय लगनेवाली बातें कहेंगे, या 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसी वाणीका प्रयोग करेंगे ॥ १० ॥
द्रक्ष्यामि चक्रिणो वर्ष्म ततस्त्रैलोक्यसंनिभम् । पादाब्जं चक्रिणो द्रष्टुं त्वरत्येव च मे मनः ॥ ११ ॥ 'वहाँ चलकर मैं चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णके उस विग्रहका दर्शन करूँगा, जो तीनों लोकोंको अपने भीतर रखनेके कारण त्रिलोकीके समान है। मेरा मन उन चक्रपाणि-के चरणारविन्दोंका दर्शन करनेके लिये उतावला हो उठा है ॥ ११ ॥
वक्षःस्थलं सदा विष्णोः स्फुरद्रत्नप्रभायुतम् । पश्यन्निव च गच्छामि स्मरन्नानिशमीश्वरम् ॥ १२ ॥ 'मैं भगवान् विष्णुके उस वक्षःस्थलको देखता हुआ-सा चलता हूँ, जो सदा उद्दीप्त कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित होता है तथा उन्हीं परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करता हुआ उनकी सेवामें चल रहा हूँ ॥ १२ ॥
पीतकौशेयवसनं लम्बहारविभूषितम् । ईषत्स्मिताधरं विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः ॥ १३ ॥ 'जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, नीचेतक लटकी हुई विशाल वनमालासे विभूषित हैं तथा जिनके अधरोंपर मन्द मुसकानकी छटा छायी रहती है, उन भगवान् श्रीकृष्णका आज मैं वारंवार दर्शन करूँगा ॥ १३ ॥
स्मरतश्च हरे रूपं रोमहर्षोऽयमीदृशः । गच्छतश्च पुरो भाति शङ्खचक्रगदासिमान् ॥ १४ ॥ 'श्रीहरिके उस रूपका स्मरण करते ही मेरे शरीरमें यह इस तरह रोमाञ्च हो रहा है। चलते समय मेरे सामने शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये भगवान् खड़े जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥
यातीव च पुरो भाति महां देवो जगद्गुरुः । एषोऽयमिति मे वक्तुं जिह्वा प्रस्फुरतीव तम् ॥ १५॥ 'देव जगद्गुरु श्रीकृष्ण मेरे आगे-आगे जाते हुए-से प्रतीत होते हैं। मेरी जिह्वा बार-बार यह कहनेके लिये उद्यत-सी होती है कि 'ये रहे मेरे भगवान्' ॥ १५ ॥
इदं दुःखतरं मन्ये करं देहीति मद्द्वचः । इदं तत्साहसं मन्ये तद्वचस्तस्य भूपतेः ॥ १६ ॥ 'मैं जो उनके सामने यह कहनेके लिये जा रहा हूँ कि 'मुझे कर दीजिये', अपनी इस बातको मैं अत्यन्त दुःखजनक मानता हूँ तथा मैं इसे राजा हंसका अत्यन्त दुःसाहसपूर्ण वचन समझता हूँ ॥ १६ ॥
हंसस्य करदो विष्णुस्तदाज्ञापरिचारकः । तस्य सर्वं पुरो गत्वा वक्तव्यं किल निर्दयः ॥ १७ ॥ 'भगवान् विष्णु हंसको कर दें, उसकी आज्ञाका पालन और सेवा करें, ये सारी बातें मुझे उनके सामने जाकर कहनी पड़ेंगी। निश्चय ही मैं बड़ा निर्दय हूँ ॥ १७ ॥
मूढानामग्रणीरस्मि निर्लज्जश्च तथा वदन् । करं देहि हरे विष्णो हंसस्य यदुपुङ्गव ॥ १८ ॥ 'हरे ! विष्णो ! यदुपुङ्गव ! आप हंसको कर दीजिये' ऐसी बात कहता हुआ मैं मूर्खोंका अगुआ और निर्लज्ज समझा जाऊँगा ॥ १८ ॥
लवणानि बहून्यद्य दातव्यानि करात्मना । इति वक्तुं न मे युक्तं पुरतस्तस्य शार्ङ्गिणः ॥ १९ ॥ 'आपको कररूपमें शीघ्र ही बहुत-सा नमक देना होगा' शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके सामने ऐसी बात कहना मेरे लिये कदापि उचित न होगा ॥ १९ ॥
तथापि मित्रभावात्तु वक्तव्यं घोरमीदृशम् । कष्टो ह्ययं मित्रभावो मनुष्याणां कृतात्मनाम् ॥ २० ॥ 'तथापि मित्रताके कारण मुझे ऐसा घोर वचन कहना होगा। पवित्रात्मा पुरुषोंके लिये यह मित्रभाव भी कष्टप्रद ही होता है ॥ २० ॥
अथवा सर्वविद् विष्णुः सर्वस्य हृदि संस्थितम् । जानात्येव सदा भावं प्राणिनां शोभने रतः ॥ २१ ॥ 'अथवा भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं। वे सबके हार्दिक भावको सदा जानते हैं और प्राणियोंके कल्याणमें तत्पर रहते हैं ॥ २१ ॥
तथा सति न मे दोषो मित्रभावो यतो ह्ययम् । सर्वथा रक्षतां विष्णुर्घोरं वक्तुं यतस्य मे ॥ २२ ॥
भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६३
'ऐसी दशामें मेरा कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह मित्रता ही मुझसे ऐसा कार्य कराती है। मैं जो घोर बात कहनेके लिये उद्यत हुआ हूँ, उसके लिये भगवान् विष्णु सर्वथा मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥
द्रक्ष्याम्यहं जगन्नाथं नीलकुञ्चितमूर्धजम्।
कम्बुग्रीवधरं विष्णुं श्रीवत्साच्छादितोरसम्॥ २३॥
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और रक्षक हैं, जिनके सिर-पर काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो शङ्खके समान ग्रीवा धारण करते हैं तथा जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स-चिह्नसे आच्छादित है, उन भगवान् विष्णुका मैं दर्शन करूँगा ॥
स्फुरत्पद्ममहाबाहुं रत्नच्छायाविराजितम्।
द्रक्ष्यामि केशवं विष्णुं चक्रिणं यादवेश्वरम् ॥ २४॥
'जिनकी विशाल भुजाओंमें पद्मरागमणिके आभूषण शोभा पाते हैं तथा जो कौस्तुभ आदि रत्नोंकी कान्तिसे प्रकाशित होते हैं, उन सर्वव्यापी, चक्रधारी, यादवेश्वर श्रीकृष्णका मैं दर्शन करूँगा ॥ २४॥
अचिन्त्यविभवं देवं भूतभव्यभवत्प्रभुम्।
आत्मेच्छया जगद्रक्षं द्रक्ष्यामि जलशायिनम्॥ २५॥
'जिनका वैभव अचिन्त्य है, जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, जो अपनी ही इच्छासे जगत्की रक्षामें तत्पर रहते हैं, उन एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीनारायण-देवका मैं दर्शन करूँगा ॥ २५ ॥
कृतार्थः सर्वथा चाहं भवामि विगतज्वरः।
अद्य मे सफलं जन्म साक्षाद् दृष्टवतो हरिम् ॥ २६॥
'उनका दर्शन करके मैं सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा। मेरी सारी चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ दूर हो जायँगी। आज श्रीहरिका साक्षात् दर्शन कर लेनेपर मेरा जन्म सफल हो जायगा ॥२६॥
अद्य मे सफला यज्ञाः साक्षात्कृतवतो हरिम्।
नेत्रे मे सफले विष्णुं पश्यतश्च जगन्मयम् ॥ २७॥
'आज श्रीहरिका साक्षात्कार करनेपर मेरे यज्ञ सफल हो जायेंगे। जगन्मय विष्णुका दर्शन करनेसे मेरे दोनों नेत्र भी सफल हो जायेंगे ॥ २७ ॥
प्रीतिमानस्तु मे विष्णुर्वक्तुर्घोरस्य कर्मणः।
उन्मिषन्नेत्रयुग्मेन द्रक्ष्यामि सकृदीश्वरम् ॥ २८॥
'मैं भयंकर कर्मके लिये प्रस्ताव करनेवाला हूँ। उस समय भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न रहें। क्या मैं अपनी खुली हुई दोनों आँखोंसे एक बार उन जगदीश्वरका दर्शन करूँगा ॥ २८ ॥
आमूलमसकृद् विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः।
पिवामि नेत्रयुग्मेन वपुः कृष्णस्य केवलम् ॥ २९॥
'मैं नीचेसे ऊपरतक बारंबार भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा, दोनों नेत्रोंसे केवल श्रीकृष्णके शरीरकी रूपमाधुरीका पान करूँगा ॥ २९ ॥
धारयिष्याम्यहं पांसुं तत्पादप्रभवं शिवम्।
ततः कृतार्थतां यास्ये स्वर्गमार्गो हि तद्रजः ॥ ३० ॥
'तदनन्तर उनके चरणोंसे प्रकट हुई कल्याणमयी धूल-को सिरपर धारण करूँगा। ऐसा करके कृतार्थ हो जाऊँगा, क्योंकि उनकी चरणरज स्वर्गका सोपान है ॥ ३० ॥
मेघगम्भीरनिर्घोषं श्रोष्यामि च हरेः स्वरम्।
पादाब्जं चक्रिणो विष्णोः पश्यामि च जगत्पतेः ॥ ३१ ॥
'मैं श्रीहरिके मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान स्वरको सुनूँगा और चक्रधारी जगदीश्वर विष्णुके चरणारविन्दका दर्शन करूँगा ॥
पश्यामि च हरेर्वक्त्रं पूर्णेन्दुसदृशप्रभम्।
हरेरिदं जगद् रूपं पश्यामीव च सर्वतः ॥ ३२ ॥
प्रसीदतु सदा विष्णुरयुक्तं वक्तुमिच्छतः।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान जो श्रीकृष्णका मनोहर मुख है, उसका अवलोकन करूँगा। यह सारा जगत् श्रीहरिका ही रूप है, इस रूपमें मैं सब ओर उन्हींका दर्शन-सा कर रहा हूँ। अनुचित बात कहनेकी इच्छावाले मुझ सेवकके ऊपर भगवान् विष्णु सदा प्रसन्न रहें ॥ ३२३ ॥
आलोलकुण्डलयुतं हरिचन्दनचर्चितम् ॥ ३३॥
स्फुरत्केयूररत्नार्चिर्बाहुद्वयविराजितम् ।
सव्ये द्योतन्महाशङ्खं रश्मिजालविराजितम् ॥ ३४॥
प्रोग्रभास्करवर्णाभं चक्रज्वालाविराजितम्।
प्रोज्ज्वलत्कङ्कणयुतं तप्तजाम्बूनदाङ्गदम् ॥ ३५॥
पीतकौशेयवसनं विस्तीर्णोरस्कमच्युतम्।
कदा द्रक्ष्यामि देवेशमिदानीमथवान्यदा ॥ ३६॥
'जिनके कानोंमें हिलते हुए कुण्डल जगमगा रहे हैं, जो हरिचन्दनसे चर्चित हैं, चमकीले बाजूबंदोंमें जड़े गये रत्नोंकी प्रभासे उद्भासित दोनों भुजाओंसे जिनकी विशेष शोभा होती है, जिनके बायें हाथमें महान् पाञ्चजन्य शङ्ख देदीप्यमान है, जो किरणजालसे प्रकाशित हैं, उदयकालके सूर्यके समान जिनकी सुनहरी कान्ति शोभा पाती है, जो सुदर्शनचक्रकी ज्वालामालाओंसे उद्भासित है, जिनके हाथोंमें जगमगाते हुए कङ्कण तथा तपे हुए सुवर्णके बने बाजूबंद शोभा पाते हैं, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं तथा जिनकी छाती चौड़ी है, उन देवेश्वर अच्युतका मैं इस समय अथवा दूसरे समयमें कब दर्शन करूँगा ॥ ३३-३६॥
सर्वथा कृतकृत्योऽहं यद्वपुर्द्रष्टुमुद्यतः।
नमो मह्यं नमो मह्यं यतो द्रष्टुमहं हरिम् ॥ ३७॥
'मैं सर्वथा कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आज मैं श्रीहरिके साक्षात् शरीरका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। मैं श्रीहरिका दर्शन करनेको कटिबद्ध हूँ, इसलिये मुझे नमस्कार है ! मुझे नमस्कार है ! ॥ ३७ ॥
उद्यतोऽस्मि जगन्नाथं बलभद्रकृतास्पदम्।
द्रक्ष्याम्यवद्यमद्यैव जिष्णुं विष्णुं जगद्गुरुम् ॥ ३८॥
| १०६४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [हरिवंशे |
|---|
‘शेषस्वरूप बलभद्रपर शयन करनेवाले जगदीश्वर श्रीकृष्णके दर्शनके लिये आज मैं उद्यत हूँ। उन विजयशील सर्वव्यापी जगद्गुरु श्रीकृष्णका अवश्य आज ही मैं दर्शन करूँगा ॥ ३८ ॥’
श्रीकौस्तुभोज्ज्वलरुचि स्फुरितोरुवक्षः पीताम्बरं मकरकुण्डलपङ्कजाक्षम् । कृष्णं किरीटवरचक्रगदोर्ध्वहस्तं तेजोमयं मम हरेर्वपुरस्तु भूत्यै ॥ ३९ ॥
‘जो श्रीकौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित है, जिसका विशाल वक्षःस्थल उसी कौस्तुभ एवं श्रीवत्सकी शोभासे उदीप्त हो रहा है, जिसने पीताम्बर धारण कर रखा है, जो मकराकार कुण्डल तथा कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित है, जिसके मस्तकपर उत्तम किरीट और ऊपर उठे हुए हाथोंमें चक्र एवं गदा विराजमान हैं, श्रीहरिका वह श्यामवर्णमय तेजस्वी विग्रह मेरा कल्याण करनेवाला हो ॥ ३९ ॥
वेदोदधौ विशदशास्त्रमहाहियोगे निष्णातशुद्धमतिमन्दरमथ्यमाने । उद्योतमानममरैरनिशं निषेव्यं नारायणाख्यममृतं प्रपिवामि चाद्य ॥ ४० ॥
‘विशद शास्त्ररूपी महान् सर्प (वासुकि) से जुड़े हुए निष्णात शुद्धबुद्धिरूपी मन्दराचलद्वारा मथे जानेवाले वेदरूपी समुद्रसे जिसका प्राकट्य हुआ है तथा अमरगण निरन्तर जिसका सेवन करते हैं, उस नारायण नामक' अमृतका आज मैं अपने नेत्रोंद्वारा पान करूँगा ॥ ४० ॥’
ध्येयं मुमुक्षुभिरमेयमनाद्यनन्तं स्थूलं सुसूक्ष्मतरमेकमनेकमाद्यम् । ज्योतिस्त्रिलोकजनकं त्रिदशैकवन्द्य- मक्ष्णोर्ममास्तु सततं हृदयेऽच्युताख्यम् ॥ ४१ ॥
‘जो मुमुक्षुओंके द्वारा चिन्तन करनेके योग्य, अप्रमेय, अनादि, अनन्त, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, एक, अनेक, आद्य, त्रिभुवनका जनक तथा देवताओंद्वारा एकमात्र वन्दनीय है, वह अच्युत नामक तेज सदा मेरे नेत्रोंके समक्ष और हृदयमें प्रकाशित होता रहे' ॥ ४१ ॥
चिन्तयन्निति विप्रेन्द्रो ययौ द्वारवतीं पुरीम् । मत्वा कृतार्थमात्मानं वाहयन् हयमुत्तमम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सोचते हुए विप्रवर जनार्दन अपनेको कृतार्थ मानकर उस उत्तम अश्वको हाँकते हुए द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने विप्रस्य द्वारवतीगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणका द्वारकागमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका सुधर्मा सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवन-पूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना
वैशम्पायन उवाच
स निवेदितसर्वस्वो द्वाःस्थेन हि जनार्दनः । अथ प्रविश्य धर्मात्मा सुधर्मां वै द्विजोत्तमः ॥ १ ॥ अपश्यद् देवदेवेशं सुधर्माकृतिसंस्थितम् । बलभद्रेण संयुक्तमध्यासितमहासनम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उन द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा जनार्दनने द्वारपालकी सहायतासे सुधर्मा-सभामें प्रवेश करके देवदेवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो वहाँ उत्तम धर्ममय स्वरूपसे विराजमान थे और बलभद्रजीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे ॥ १-२ ॥
अग्रतः स्थितशैनेयं पार्श्वतः स्थितनारदम् । दुर्वाससा कृतकथमुग्रसेनपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥
उनके सामने सात्यकि खड़े थे तथा उनके पार्श्वभागमें नारदजी विराजमान थे। भगवान् श्रीकृष्ण दुर्वासा मुनिसे बातचीत कर रहे थे। राजा उग्रसेन उनके सामने थे ॥ ३ ॥
गायद्गन्धर्वमुख्यैश्च नृत्यदप्सरसां गणैः । सेव्यमानं महाराज सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४ ॥
महाराज ! गाते हुए मुख्य-मुख्य गन्धर्व, नाचती हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ तथा सूत, मागध एवं वन्दीजन योग्यतानुसार उनकी सेवा कर रहे थे ॥ ४ ॥
उद्गीयमानयशसं माधवं मधुसूदनम् । उद्गीयमानं विप्रैश्च सामभिः सामगैर्हरिम् ॥ ५ ॥
वहाँ माधव मधुसूदनके यशका उच्चस्वरसे गान हो रहा था तथा सामगान करनेवाले ब्राह्मण भी साममन्त्रोंद्वारा श्रीहरिका गुणगान करते थे ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा प्रीतमना विष्णुं प्रोद्भूतपुलकच्छविः । नाम्ना जनार्दनोऽस्मीति ननाम चरणौ हरेः ॥ ६ ॥ बलभद्रं ततो देवं ववन्दे शिरसा द्विजः । दूतोऽस्मि देवदेवेश हंसस्य डिम्भकस्य च ।
भविष्यपर्व ] पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः १०६५
भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर जनार्दनका मन प्रसन्न हो गया। अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। 'मैं जनार्दन हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण जनार्दनने भगवान् बलभद्रको मस्तक झुकाया और श्रीकृष्णसे कहा— 'देवदेवेश्वर ! मैं हंस और डिम्भकका दूत हूँ' ॥ ६३ ॥
इति ब्रुवाणं विप्रेन्द्रमिदमाह स माधवः ॥ ७ ॥
आस्स्वेदं विष्टरं पूर्वं पश्चाद् ब्रूहि प्रयोजनम् ।
तथेति चाब्रवीद् विप्रो महदासनमास्थितः ॥ ८ ॥
इस तरह कहते हुए विप्रवर जनार्दनसे भगवान् श्रीकृष्ण बोले— 'ब्रह्मन् ! पहले आप इस आसनपर बैठिये, इसके बाद अपने आगमनका प्रयोजन बताइये।' तब ब्राह्मणने 'बहुत अच्छा' कहा और वे एक महान् आसनपर विराजमान हुए ॥ ७-८ ॥
वाचा सम्पूज्य विप्रेन्द्रमपृच्छत् कुशलं हरिः।
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ९ ॥
राजेन्द्र ! भगवान् श्रीकृष्णने वाणीद्वारा विप्रवर जनार्दनका स्वागत-सत्कार करके फिर उनसे ब्रह्मदत्त, हंस और डिम्भकका कुशल-समाचार पूछा ॥ ९ ॥
श्रुतं चापि तयोर्वीर्यं प्रयोजनमतो द्विज ।
अपि वा कुशलं विप्र पितुस्तव जनार्दन ॥ १० ॥
वे बोले— 'विप्र जनार्दन ! मैंने हंस और डिम्भकका पराक्रम और प्रयोजन पहलेसे सुन रखा है। तुम्हारे पिताजी तो कुशलपूर्वक हैं न ?' ॥ १० ॥
जनार्दन उवाच
कुशलं ब्रह्मदत्तस्य पितुश्च मम केशव ।
तयोरेव जगन्नाथ हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ११ ॥
जनार्दनने कहा— केशव ! राजा ब्रह्मदत्त और मेरे पिताजी सकुशल हैं। जगन्नाथ ! दोनों भाई हंस और डिम्भक भी कुशलसे ही हैं ॥ ११ ॥
श्रीभगवानुवाच
किमाहतुर्महीपालौ तौ हंसडिम्भकौ नृपौ ।
ब्रूहि सर्वमशेषेण नात्र शङ्का द्विजोत्तम ॥ १२ ॥
श्रीभगवान् बोले— द्विजश्रेष्ठ ! राजा हंस और डिम्भकने क्या संदेश दिया है ? आप सारी बातें विस्तारपूर्वक बतावें। इसके लिये आपके मनमें कोई शङ्का नहीं होनी चाहिये ॥ १२ ॥
वाच्यं वाप्यथवावाच्यं कर्तव्यमथ चेतरत् ।
श्रुत्वा तस्य विधास्यामो युक्तरूपं द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
विप्रवर ! उन्होंने जो कुछ कहा हो, वह कहने योग्य हो या न कहने योग्य हो, करने योग्य हो या न करने योग्य हो, उसे पूरा-पूरा सुनकर हमलोग उसका उचित उत्तर देंगे ॥
दूतोऽसि सर्वथा विप्र न वाच्यावाच्यकल्पना ।
यत् कर्मकारनिर्दिष्टं तद् वाच्यं दूतजन्मना ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् ! आप दूत हैं। आपके लिये वाच्य और अवाच्यका विचार सर्वथा अनावश्यक है। भेजनेवालेने जो कुछ जैसे कहा हो, दूतको वह सब उसी प्रकार कहना चाहिये ॥ १४॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या वक्तव्यस्येतरस्य च ।
अतो वद यथा प्रोक्तं ताभ्यामिह जनार्दन ॥ १५ ॥
जनार्दनजी ! आपको वाच्य और अवाच्यकी शङ्का नहीं करनी चाहिये। अतः हंस और डिम्भकने जैसा कहा है, वैसा ही यहाँ कहिये ॥ १५ ॥
केशवेनैवमुक्तस्तु प्रोवाच स जनार्दनः ।
अजानन्निव किं ब्रूषे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ १६ ॥
भगवान् केशवके ऐसा कहनेपर जनार्दन बोले— 'भगवन् ! आप अनजानकी भाँति क्यों बात कर रहे हैं ? आप तो सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं ॥ १६॥
न चास्ति ते परोक्षं तु जगद्वृत्तान्तमच्युत ।
सर्वं हि मनसा पश्यन् किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ १७ ॥
'अच्युत ! जगत्का कोई भी वृत्तान्त आपकी आँखोंसे ओझल नहीं है। आप अपने मनसे सब कुछ देखते हुए भी मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ १७ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे विष्णुस्त्वमेव जगतीपते ।
इच्छया सर्वमाप्नोषि दृष्टादृष्टविवेचनम् ॥ १८ ॥
'पृथ्वीनाथ ! विद्वान् पुरुष आपको ही विष्णु कहते हैं। आप इच्छा करते ही दृष्ट और अदृष्ट वस्तुका पूर्ण विवेक प्राप्त कर लेते हैं ॥ १८ ॥
त्वमेवेदं जगत् सर्वं जगच्च त्वयि तिष्ठति ।
न त्वया रहितो ह्येकः पदार्थः सचराचरः ॥ १९ ॥
'आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं, आपमें ही इस जगत्की स्थिति है। एक भी ऐसा कोई चर या अचर पदार्थ नहीं है, जो आपसे रहित हो ॥ १९ ॥
नास्ति किंचिदवेद्यं ते सर्वगोऽसि जगत्पते ।
त्वमिन्द्रः सर्वभूतानां रुद्रः संहारकर्मकृत् ॥ २० ॥
'जगदीश्वर ! आप सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापी हैं, आपके लिये कुछ भी अज्ञेय नहीं है। आप ही समस्त भूतोंके इन्द्र हैं और आप ही संहार कर्म करनेवाले रुद्र हैं ॥ २० ॥
रक्षितासि सदा विष्णुः सर्वलोकस्य माधव ।
संसारस्य भवान् स्रष्टा किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २१ ॥
'माधव ! सदा सम्पूर्ण लोककी रक्षा करनेवाले विष्णु आप ही हैं। आप ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हैं। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ २१ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे नित्यं ज्ञानात्मेति च माधव ।
प्राणं प्राणविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥
'माधव ! विद्वान् पुरुष सदा आपको ही ज्ञानात्मा कहते
१०६६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [हरिवंशे
हैं। पुरुषोत्तम ! प्राणवेत्ता पुरुष आपको ही प्राण कहते हैं ॥
शब्दं शब्दविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ।
तथा सति हृषीकेश किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २३ ॥
'पुरुषोत्तम ! शब्दशास्त्रके ज्ञाता वैयाकरण आपको ही शब्द कहते हैं । हृषीकेश ! ऐसी दशामें आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम अपने राजाका संदेश कहो' ॥ २३ ॥
तथापि शृणु देवेश चोदितोऽस्मि यतस्त्वया ।
वदेत्यसकृदेवैतत् तस्माद् वक्ष्यामि माधव ॥ २४ ॥
'देवेश्वर माधव ! तथापि सुनिये । आपने मुझे बारंबार कहनेके लिये प्रेरित किया है । इसलिये मैं कहूँगा ॥ २४ ॥
राजसूयेन यज्ञेन ब्रह्मदत्तोऽद्य यक्ष्यते ।
तदर्थं प्रेषितस्ताभ्यां हंसेन डिम्भकेन च ॥ २५ ॥
'भगवन् ! राजा ब्रह्मदत्त अब राजसूय यज्ञ करेंगे । उसीके लिये हंस और डिम्भकने मुझे आपके पास भेजा है ॥
करार्थं यदुमुख्येभ्यस्त्व चामन्त्रणाय हि ।
लवणं बहु देयं ते यज्ञार्थं तस्य केशव ॥ २६ ॥
'उसने मुख्य-मुख्य यादवोंसे कर लेने और आपको आमन्त्रित करनेके लिये मुझे यहाँतक आनेके लिये विवश किया है । केशव ! आपको उसके यज्ञके लिये बहुत-सा नमक देना है ॥ २६ ॥
इत्यर्थं प्रेषितस्ताभ्यां करं देहि तदाज्ञया ।
इदं त्वमपरं ताभ्यामुक्तं शृणु जगत्पते ॥ २७ ॥
'जगत्पते ! उन दोनोंने इसीलिये मुझे यहाँ भेजा है कि आप उनकी आज्ञासे उनके लिये कर दीजिये । उन दोनोंने जो यह दूसरी बात कही है, उसे भी सुन लीजिये ॥ २७ ॥
लवणानि वहन्न्याशु प्रगृह्य त्वरितं भवान् ।
आगच्छतु तयो राज्ञोः सेयं केशव वाग् विभो ॥ २८ ॥
'आप शीघ्र ही बहुत-सा नमक लेकर मेरे यहाँ आइये ।' प्रभो ! केशव ! यही उन दोनों राजाओंका आपके लिये संदेश है' ॥
इत्युक्तवति विप्रेन्द्रे दूते तत्र तयोर्नृप ।
प्रहस्य सुचिरं कृष्णो बभाषे दूतमेश्वरः ॥ २९ ॥
नरेश्वर ! उन दोनोंके दूत विप्रवर जनार्दन जब इस प्रकार कह चुके, तब भगवान् श्रीकृष्णने बहुत देरतक जोर-जोरसे हँसकर उस दूतसे कहा—॥ २९ ॥
शृणु दूत वचो मह्यं युक्तमुक्तं द्विजोत्तम ।
करं दद्यामि ताभ्यां तु करदोऽस्मि यतो नृपः ॥ ३० ॥
'दूत ! द्विजश्रेष्ठ ! तुम मेरी कही हुई यह युक्तियुक्त बात सुनो । मैं उन दोनोंको कर दूंगा; क्योंकि मैं उन्हें कर देने-वाला नरेश हूँ ॥ ३० ॥
धार्ष्ट्यमेतत् तयोर्विप्र मत्तो यस्तु करग्रहः ।
अहो धार्ष्ट्यमहो धार्ष्ट्यं तयोः क्षत्रियबीजयोः ॥ ३१ ॥
'विप्रवर ! मुझसे जो कर लेनेका संकल्प है, यह उन दोनों भाई हंस और डिम्भककी बहुत बड़ी धृष्टता है । अहो ! क्षत्रियके बीजसे उत्पन्न हुए उन दोनोंकी यह कैसी अद्भुत धृष्टता है ! यह कैसी आश्चर्यजनक ढिठाई है ॥ ३१ ॥
इदमश्रुतपूर्वं मे मत्तो यस्तु करग्रहः ।
इत्युक्त्वा केशवो दूतमिदमाह स्म यादवान् ॥ ३२ ॥
'मुझसे कर लेनेकी बात पहले-पहल सुननेमें आयी । इससे पूर्व कभी ऐसी बात नहीं सुनी गयी थी ।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान् केशवने यादवोंसे कहा—॥ ३२ ॥
हास्यमेतद् यदुश्रेष्ठा मत्तो यस्तु करग्रहः ।
यष्टासौ राजसूयस्य ब्रह्मदत्तो महीपतिः ॥ ३३ ॥
तौ तु याजयितारौ हि हंसो डिम्भक एव च ।
वोढा किल यदुश्रेष्ठो लवणस्य दुरात्मनः ॥ ३४ ॥
'यदुवरो ! मुझसे जो कर-ग्रहणकी माँग है, यह कैसी उपहासास्पद बात है ! राजा ब्रह्मदत्त राजसूय यज्ञ करेंगे और इस यज्ञके करानेवाले हैं उन्हींके बेटे हंस और डिम्भक । यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण उस दुरात्माके यहाँ नमक ढोकर ले जायेंगे॥
करदो वासुदेवो हि जितोऽस्मि यदुसत्तमाः ।
हास्यं हास्यमिदं भूयः शृणुध्वं यादवा वचः ॥ ३५ ॥
'यदुश्रेष्ठ वीरो ! मुझ वासुदेवको उसने कर देनेवाला कह दिया, मानो उसने मुझे युद्धमें पराजित कर दिया । यादवो ! यह कितनी हँसीकी बात है, इसे तुमलोग फिर सुनो'॥
इत्युक्तवति देवेशे बलभद्रपुरोगमाः ।
यादवाः सर्व एवैते हासाय समवस्थिताः ॥ ३६ ॥
देवेश्वर श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर बलभद्र आदि समस्त यादव हंस-डिम्भकके उस कथनकी हँसी उड़ानेके लिये खड़े हो गये ॥ ३६ ॥
करदः कृष्ण इत्येवं ब्रुवन्तः सर्वसात्वताः ।
हासं मुमुचुरत्यर्थं तलं दत्त्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
'श्रीकृष्ण कर देनेवाले हैं' ऐसा कहते हुए समस्त यादव परस्पर ताली बजाकर या एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ३७ ॥
तलशब्दो हासशब्दो रोदसी पर्यपूरयत् ।
स च विप्रो नृपश्रेष्ठ निन्दयन् मित्रमात्मनः ॥ ३८ ॥
अहो कष्टमहो कष्टं दौत्यं यत् कृतवानहम् ।
इति लज्जासमाविष्टस्तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ॥ ३९ ॥
ताली बजाने और हँसनेकी गम्भीर ध्वनि पृथ्वी और आकाशमें गूँज उठी । नृपश्रेष्ठ ! ब्राह्मण जनार्दन अपने मित्र हंसकी निन्दा करते हुए मन-ही-मन कहने लगे— 'अहो ! मैंने जो दूतका कार्य किया, यह बड़े कष्टकी बात है ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहकर लज्जित हो वे नीचे मुख करके चुपचाप बैठे रहे ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने वासुदेववाक्ये पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
| भविष्यपर्व ] | सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः | १०६७ |
|---|
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना
वैशम्पायन उवाच
हासं कुर्वत्सु तेष्वेवं केशवः केशिसूदनः।
उवाच वचनं दूतं गच्छ मद्द्वचनाद् द्विज ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब यादव इस प्रकार उपहास कर रहे थे, उस समय केशिसन्ता भगवान् केशवने दूतसे इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन् ! आप मेरा संदेश लेकर जाइये ॥ १ ॥
तावित्थं हंसडिम्भकौ ब्रूहि त्वरितविक्रमः।
बाणैर्दास्यामि निशितैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ २ ॥
'शीघ्रगतिसे वहाँ जाकर उन हंस और डिम्भकसे इस प्रकार कहिये—मैं शार्ङ्ग धनुषद्वारा छोड़े गये और शिलापर तेज किये गये पैने बाणोंद्वारा तुम दोनोंको कर दूँगा ॥ २ ॥
असिना वाथ दास्यामि निशितेन महात्मनोः।
शिरो वा छेत्स्यते चक्रं मत्करप्रहितं वलिम् ॥ ३ ॥
'अथवा उन महामनस्वी राजाओंको अपनी तीखी तलवारसे कर समर्पित करूँगा। अथवा मेरे हाथसे छोड़ा गया चक्र उनका सिर काट लेगा और उसीको करके रूपमें समर्पित करेगा ॥ ३ ॥
यो वरं दत्तवान् रुद्रो युवयोर्धाष्टर्यकारणम्।
स एव रक्षिता वां स्यात् तं जित्वा वां निहन्म्यहम् ॥ ४ ॥
'भगवान् रुद्रने तुम दोनोंको जो वर दिया है, वही तुम दोनोंकी ढिठाईका कारण है। यदि वे रुद्रदेव ही तुम दोनोंके रक्षक हो जायें तो मैं उनको भी जीतकर तुम दोनोंको मार डालूँगा ॥ ४ ॥
देशोऽयं संविधातव्यो यत्र नः संगतिर्भवेत्।
तत्र गन्ता तथा चास्मि सबलः सहवाहनः ॥ ५ ॥
'राजाओ ! कोई ऐसा स्थान निश्चित कर लेना चाहिये, जहाँ हमलोगोंका समागम हो। मैं सेना और सवारियोंसहित वहाँ उस स्थानमें आ जाऊँगा ॥ ५ ॥
भवन्तौ निर्भयौ भूत्वा गच्छेतां सबलौ नृपौ।
पुष्करे वा प्रयागे वा मथुरायामथापि वा ॥ ६ ॥
तत्राहं सबलो याता नात्र कार्या विचारणा।
'नरेश्वरो ! तुम दोनों वीर भी निर्भय होकर सेनासहित वहाँ आ जाना। पुष्करमें या प्रयागमें अथवा मथुरामें जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं मैं सेनासहित आ जाऊँगा, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ६½ ॥
अथवा मित्रभावाच्च वक्तुमेवं न ते क्षमम् ॥ ७ ॥
न शक्यं यत् त्वया वक्तुं तच्च वक्ष्यति सात्यकिः।
त्वया सह ततो गत्वा साक्षिभूतो भव द्विज ॥ ८ ॥
'अथवा मित्रताके नाते आपसे ऐसी बात कहलाना उचित न होगा। आप जिसे नहीं कह सकेंगे, उसे आपके साथ जाकर यह सात्यकि कहेंगे। ब्रह्मन् ! आप केवल साक्षी बने रहें ॥ ७-८ ॥
इदं च जाने विप्रेन्द्र स्नेहो मयि सदा तव।
तेन त्वं विजयी भूत्वा संसारे दुःखसंकुले।
मत्कथापरमो नित्यं सदा भव जनार्दन ॥ ९ ॥
'विप्रेन्द्र ! मैं यह भी जानता हूँ कि आपका सदा मेरे ऊपर स्नेह बना रहता है। अतः जनार्दनजी ! आप दुःखोंसे भरे हुए इस संसारमें विजयी होकर सदा नित्य-निरन्तर मेरी कथा-वार्तामें लगे रहिये' ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना तथा हंसका जनार्दनसे कार्यसिद्धिके विषयमें पूछना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं कृष्णः सात्यकिं पुनराह सः।
गत्वा शैनेय विप्रेण ब्रूहि मद्द्वचनात् तयोः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिसे फिर कहा—'शिनिनन्दन ! तुम इन ब्राह्मण देवता जनार्दनके साथ जाकर मेरे कथनानुसार उन दोनों भाई हंस और डिम्भकसे कहो ॥ १ ॥
यन्मयोक्तमशेषेण वद गत्वा तयोः पुरः।
यथा नः संगतिर्युद्धे तथा वद बलात् तदा ॥ २ ॥
'मैंने जो कुछ कहा है, वह सब उन दोनोंके सामने जाकर कहो, जिससे हमलोगोंका युद्ध-स्थलमें शीघ्र समागम
१०६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
हो। उक्त उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तुम बलपूर्वक भी बात कर सकते हो ॥ २ ॥
धनुरादाय गच्छ त्वं बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
एकेनाश्वेन गच्छ त्वमसहायो यदूत्तम ॥ ३ ॥
'यदुकुलतिलक सात्यके ! तुम धनुष लेकर जाओ; हाथमें गोहके चमड़ेके बने दस्तानेको भी बाँध लेना, एकमात्र अश्वके साथ जाना, दूसरे किसी सहायकको साथ न लेना' ॥ ३ ॥
सात्यकिस्तं तथेत्युक्त्वा हयमारुह्य शीघ्रगम् ।
गन्तुमैच्छत् ततो राजन्नसहायः स सात्यकिः ॥ ४ ॥
सात्यकिने 'बहुत अच्छा' कहकर एक शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ हो वहाँसे जानेका विचार किया। राजन् ! उन्होंने कोई दूसरा सहायक साथ नहीं लिया था ॥ ४ ॥
जनार्दनं विसृज्याशु दूतं तं यादवेश्वरः ।
अहो धाष्टर्यमहो धाष्टर्यमित्युवाच जनार्दनः ॥ ५ ॥
जनार्दन नामक दूतको शीघ्र ही विदा करके यादवेश्वर जनार्दन बोले—'अहो ! हंस और डिम्भककी धृष्टता अद्भुत है, उनकी ढिठाई आश्चर्यजनक है' ॥ ५ ॥
नमस्कृत्य तदा दूतो माधवं माधवेश्वरम् ।
स ययौ शाल्वनगरं शैनेयेन समन्वितः ॥ ६ ॥
उस समय माधवेश्वर माधवको नमस्कार करके दूत जनार्दन सात्यकिके साथ शाल्वनगरको गये ॥ ६ ॥
ततः प्रविश्य धर्मात्मा ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ।
आसनं महदास्थाय विसृज्य यादवे पुनः ॥ ७ ॥
आस्ते सुखं यदा विप्रः शैनेयेन समन्वितः ।
अथ तं हंसडिम्भयोर्दर्शयामास सात्यकिम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दन वहाँ राजसभामें प्रवेश करके सात्यकिको एक महान् आसन देकर जब स्वयं भी उस श्रेष्ठ आसनपर उनके साथ सुखपूर्वक बैठ गये, तब उन्होंने हंस और डिम्भकसे सात्यकिको मिलाया ॥ ७-८ ॥
दूतोऽयं सात्यकिः प्राप्तः सव्यो बाहुरयं हरेः।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हंसः प्राह वचस्तदा ॥ ९ ॥
उस समय वे बोले—'राजन् ! यह सात्यकि द्वारकासे दूत होकर आये हैं। ये भगवान् श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजाके समान हैं।<sup>१</sup> जनार्दनकी यह बात सुनकर हंस बोला—॥ ९ ॥
श्रुतः समागमः पूर्वमद्य दृष्टो मया त्वसौ ।
धनुर्वेदे च वेदे च शास्त्रे शस्त्रे तथैव च ॥ १० ॥
निपुणोऽयं सदा धीर इत्येवमनुशुश्रुम ।
अथो दृष्टिपथं प्राप्तः प्रीतिं नौ विदधात्यसौ ॥ ११ ॥
'पहले इसके समागम होनेकी बात सुननेमें आयी थी, आज मुझे इसका दर्शन हो गया। हमने सुना है कि यह वीर सात्यकि वेद, धनुर्वेद, शास्त्र-विद्या और शस्त्र-विद्यामें सदा निपुण एवं धीर है। अब हमारी दृष्टिपथमें आकर यह हम दोनों भाइयोंको प्रीति प्रदान कर रहा है ॥ १०-११ ॥
कुशलं वासुदेवस्य वलभद्रस्य वा पुनः ।
कुशलाः सात्वताः सर्वे उग्रसेनपुरोगमाः ॥ १२ ॥
'सात्यके ! वासुदेव श्रीकृष्ण और बलभद्र कुशलसे तो हैं न ? उग्रसेन आदि सभी यादव सकुशल हैं न ?'॥ १२ ॥
तथेति सात्यकिः प्राह मन्दमुन्मथिताननः ।
ततो जनार्दनं प्राह हंसो वाक्यविशारदः ॥ १३ ॥
तब सात्यकिने मन्दस्वरमें कहा—'जी हाँ ! सब लोग कुशल हैं। उस समय उनका मुख रोषसे तमतमा उठा था। तदनन्तर बातचीत करनेमें कुशल हंसने जनार्दनसे कहा—॥ १३ ॥
अपि दृष्टस्त्वया चक्री सिद्धं नः कार्यमीहितम् ।
वद सर्वमशेषेण मा वृथा कालमत्यागाः ॥ १४ ॥
'ब्रह्मन् ! क्या तुम चक्रधारी श्रीकृष्णसे मिले थे ? क्या हमारा अभीष्ट कार्य सिद्ध हुआ ? वहाँका सब समाचार पूर्णरूपसे बताओ, व्यर्थ समय न बिताओ' ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवाक्ये सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वाक्यविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक तिरस्कृत करके चले जानेके लिये कहना, फिर सात्यकिका हंसको श्रीकृष्णका संदेश सुनाते हुए फटकारना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति हंसे च धर्मात्मा जनार्दनः ।
उवाच प्रहसन् वीरः स्तुवन् नारायणं सदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! हंसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा वीर जनार्दनने, जो नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी सदा स्तुति करता था, हँसते हुए कहा—॥ १ ॥
१. 'सव्य' शब्दका अर्थ बायाँ और दाहिना भी है। देखिये संस्कृत शब्दार्थ-कौस्तुभ।
भविष्यपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः १०६९
अद्राक्षमद्राक्षमहं जनार्दनं
हस्तस्थशङ्खं वरचक्रधारिणम्।
आतप्तजाम्बूनदभूषिताङ्गदं
स्फुरत्प्रभाद्योतितरत्नधारिणम्॥ २ ॥
'हाँ! मैंने उन जनार्दनका दर्शन किया है! दर्शन किया है!! जिनके एक हाथमें शङ्ख शोभा पाता है तथा जो दूसरे हाथमें श्रेष्ठ चक्र धारण करते हैं, जिनका बाजूबन्द तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णसे भूषित है तथा जो झलमलाती हुई प्रभासे प्रकाशित रत्न (कौस्तुभमणि) धारण करते हैं॥ २ ॥
अद्राक्षमेनं यदुभिः पुरातनैः
संसेव्यमानं मुनिवृन्दमुख्यैः।
संस्तूयमानं प्रभुभिः समागधैः
स्मितप्रवालाधरपल्लवारुणम्॥ ३ ॥
'मैंने इन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया है, जिनकी सेवामें पुरातन यादव-वीर तथा मुख्य-मुख्य मुनिवृन्द उपस्थित रहते हैं, मागधोंसहित बहुत-से राजा भी इनकी स्तुति करते हैं, मूँगे तथा नूतन पल्लवके समान इनका अरुण अधर मन्द मुसकानकी आभासे प्रकाशित होता रहता है॥ ३ ॥
अद्राक्षमेनं कविभिः पुरातनै-
र्विविच्य वेद्यं विधिवत्सहामरैः।
प्रफुल्लनीलोत्पलशोभितं श्रिया
विनिद्रहेमाब्जविराजितोदरम्॥ ४ ॥
'प्राचीन विद्वान् ऋषि-मुनि देवताओंके साथ बैठकर जिनके स्वरूपका विधिपूर्वक विवेचन करके उसे जाननेके योग्य बताते हैं, जो खिले हुए नीलकमलके समान श्याम-कान्तिसे सुशोभित हैं तथा जिनका उदर विकसित सुवर्णमय कमलसे सुशोभित होता है, उन्हीं पद्मनाभस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है॥ ४ ॥
भूयोऽहमद्राक्षमजं जगद्गुरुं
प्रमोदयन्तं वचनेन यादवान्।
निरूपयन्तं विधिवन्मुनीश्वरैः
प्रवृत्तवेदार्थविधिं पुरातनैः॥ ५ ॥
'मैंने बारंबार उन अजन्मा जगद्गुरुका दर्शन किया, जो अपनी वाणीद्वारा यादवोंको आनन्द प्रदान कर रहे थे और प्राचीन मुनीश्वरोंके साथ प्रवृत्तिमार्गसम्बन्धी वेदार्थके विधानका विधिपूर्वक निरूपण करते थे॥ ५ ॥
अद्राक्षमद्राक्षमहं पुनः पुनः
समस्तलोकैकहितैषिणं हरिम्।
वसन्तमस्मिञ्जगतो हिताय
जगन्मयं तान् परिभूय शत्रून्॥ ६ ॥
'मैंने समस्त लोकोंके एकमात्र हितैषी उन जगन्मय श्रीहरिका बारंबार दर्शन किया है, जो जगत्के हितके लिये इसके समस्त शत्रुओंको पराजित करके इस भूलोकमें निवास करते हैं॥ ६॥
भूयोऽप्यपश्यं सह यादवेश्वरै-
र्विंक्रीडमानं च विहारकाले।
रमन्तमीड्यथं रमयन्तमीश्वरान्
यदूतमान् यादवमुख्यमीश्वरम्॥ ७॥
'यादवकुलके प्रधान पुरुष तथा स्तवनीय ईश्वररूप उन श्रीकृष्णका मैंने अनेक बार दर्शन किया है, जो विहारकालमें यादवेश्वरोंके साथ नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं तथा स्वयं तो क्रीड़ाओंमें रत रहते ही हैं, सामर्थ्यशाली यादवशिरोमणियोंको भी उनमें प्रवृत्त करते रहते हैं॥ ७॥
भूयोऽप्यपश्यं सरसीरुहेक्षणं
समेतया भीष्मतनूजया हरिम्।
वसन्तमम्भोनिधिशायिनं विभुं
भक्तप्रियं भक्तजनास्पदं शिवम्॥ ८॥
'मैंने पुनः उन कमलनयन श्रीहरिका दर्शन किया, जो पत्नीरूपमें प्राप्त हुई भीष्मनन्दिनी रुक्मिणी देवीके साथ द्वारकामें निवास करते हैं, नारायणरूपसे समुद्रके जलमें सोते हैं तथा जो वैभवशाली, भक्तप्रिय, भक्तजनोंके आश्रय तथा कल्याणस्वरूप हैं॥ ८॥
अद्राक्षमद्राक्षमहं सुनिर्वृतः
पिबन् पिबंस्तस्य वपुः पुरातनम्।
नेत्रेण मीलद्विवरेण केवलं
धन्योऽहमस्मीति तदा व्यचिन्तयम्॥ ९॥
'मैंने अत्यन्त आनन्दमग्न होकर बारंबार भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया है और अपलक नेत्रके द्वारा उनके पुरातन श्रीअङ्गकी शोभाका पान किया है। उस समय मैं अपने विषयमें केवल यही सोचता रहा कि 'मैं धन्य हो गया'॥ ९॥
अद्राक्षमम्भोजयुगं दधानं
प्रभुं विभुं भूतमयं विभावनम्।
आद्यं ककुद्मानमुरं विभावसुं
संस्मृत्य संस्मृत्य तमेव निर्वृतः॥ १०॥
'मैंने देखा कि वे सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी, भूतमय तथा सबका पालन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने हाथोंमें दो कमल लिये हुए थे। मैं उन्हीं माहात्म्यशाली, प्रकाशमान, आदि पुरुष एवं महान् ईश्वरका बारंबार स्मरण करके आनन्दमग्न हो रहा हूँ॥ १०॥
अद्राक्षं जगतामीशं वक्षोराजितकौस्तुभम्।
वीज्यमानं हरिं कृष्णं चामराणां शतैः सदा॥ ११॥
'जिनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि प्रकाशित होती
| १०७० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
है तथा जिनपर सौ-सौ चँवर डुलाये जाते हैं, उन जगदीश्वर श्रीकृष्ण हरिका मैंने दर्शन किया है ॥ ११ ॥
युवां विद्वेषयुक्तेन चेतसा यादवेश्वरम् ।
स्मरन्तं सर्वदा विष्णुं क चैवं क च वेत्ति कः ॥ १२ ॥
'वे यादवेश्वर विष्णु विद्वेषयुक्त चित्तसे सदा तुम दोनोंका स्मरण करते थे और जानना चाहते थे कि वे दोनों कहाँ हैं ? तथा कहाँ और कौन उन्हें जानता है ?॥
क्व च द्रक्ष्यामि तौ मन्दौ कुतो वा मत्पुरोगतौ ।
ध्यायन्तमित्थं देवेशं करे शङ्खवहं सदा ॥ १३ ॥
'उन दोनों मूर्खोंको मैं कब देखूँगा ? वे किस उपायसे मेरे सामने उपस्थित होंगे ? हाथमें शङ्ख लिये हुए वे देवेश्वर निरन्तर ऐसी ही बात सोच रहे थे ॥ १३ ॥
हसन्तमेनमद्राक्षं करदं हास्यतत्परम् ।
वदन्तं नारदे वाचं दुर्वाससि यतीश्वरे ॥ १४ ॥
'अपनेको करदाता सुनकर वे हँसने लगे और तुम्हारे उपहासमें तत्पर हो गये, उस अवस्थामें मैंने उन्हें देखा था । वे देवर्षि नारद तथा यतीश्वर दुर्वासासे बात करते थे ॥ १४ ॥
ब्रह्मसूत्रपदां वाणीं दापयन्तं मुनीश्वरम् ।
दृष्ट्वाहं तं हरिं देवं पुनः पुनरचिन्तयम् ॥ १५ ॥
'वे मुनीश्वर दुर्वासाको ब्रह्मसूत्रके पदोंसे युक्त वेदान्तमयी वाणीका शिष्योंको उपदेश देने या पढ़ानेके लिये अनुमति दे रहे थे । उस समय उन भगवान् श्रीहरिका दर्शन करके मैंने बारंबार इस प्रकार विचार किया ॥ १५ ॥
असाध्यमिदमारब्धं ताभ्यामिति नृपोत्तम ।
नारब्धव्यमिदं कार्यमितःप्रभृति भूमिप ॥ १६ ॥
'मेरे उन मित्रोंने यह असाध्य कार्य आरम्भ किया है। नृपश्रेष्ठ ! भूमिपाल ! अबसे आप दोनोंको इस कार्यका आरम्भ नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
निवृत्ता सा कथा हंसाचिन्तयद् ग्रहणं तव ।
तद् वृत्तमखिलं सर्वं वदिष्यति हि सात्यकिः ।
एतद् वचनमाकर्ण्य हंसः क्रुद्धोऽब्रवीद् वचः ॥ १७ ॥
'श्रीकृष्णसे कर लेना है, यह तुम्हारी बात जब वहाँ समाप्त हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें कैद करनेकी बात सोची थी। यह सारा वृत्तान्त सात्यकि ही तुम्हें बतायेंगे।' जनार्दनकी यह बात सुनकर हंसने कुपित होकर कहा ॥१७॥
हंस उवाच
अरे ब्राह्मणदायाद का नाम तव वागियम् ।
आवयोः पुरतो वक्तुं त्रैलोक्यं जेतुमिच्छतोः ॥ १८ ॥
**हंस बोला—**अरे ओ ब्राह्मणके बेटे ! यह तुम्हारे मुखसे कैसी बात निकल रही है । तीनों लोकोंको जीतनेकी इच्छा करनेवाले हम दोनों वीरोंके आगे कहनेके लिये क्या तुम्हें यही बात मिली है ॥ १८ ॥
मायया त्वां भ्रामयति कृष्णो लीलाविधानवित् ।
तं दृष्ट्वा भ्रम एवैष तव संजायते महान् ॥ १९ ॥
लीलाविधानके ज्ञाता श्रीकृष्ण तुम्हें मायासे चक्करमें डाल रहे हैं । उनका दर्शन करके तुम्हारे मनमें यह महान् भ्रम ही उत्पन्न हो गया है ॥ १९ ॥
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ।
वृष्णिवीरं समावेक्ष्य समुच्छ्रितयशोधरम् ॥ २० ॥
सूतमागधसंस्तावप्रकटद्बाहुवीर्यकम् ।
अत्यद्भुतयशोराशिं विक्रमाल्लोकमण्डनम् ॥ २१ ॥
चतुर्भुजं वलाक्रान्तं वृष्णियादवसम्मतम् ।
अहोऽद्य भ्रम एवैष दर्शनात् तस्य चक्रिणः ॥ २२ ॥
जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सब ओर फैले हुए यशको धारण करते हैं। सूतों और मागधोंद्वारा की गयी स्तुतिमात्रसे जिनके बाहुबलका कुछ पता चलता है। जो अत्यन्त अद्भुत यशकी राशि हैं और अपने पराक्रमसे लोकको अलंकृत करते हैं। जिनके चार भुजाएँ हैं । जो सेनाओंसे घिरे हुए तथा वृष्णि और यादवकुलके सम्मानित पुरुष हैं, उन वृष्णिवीर श्रीकृष्णका दर्शन करके तुम चक्करमें पड़ गये हो। अहो ! उस चक्रपाणिके दर्शनसे आज तुम्हें भ्रम ही हो गया ॥२०–२२॥
इदानीं च महाराज भ्रामयन्त्येव दुर्मतिः ।
त्वामेव विप्र मन्दात्मन्निन्द्रजालिकता हि या ॥ २३ ॥
महाराज ! मन्दमते विप्र ! इस समय भी यह दुर्बुद्धि कृष्ण तुम्हें चक्करमें ही डाले हुए है। उसकी जो इन्द्रजालिकता (बाजीगरी) है, वह तुमपर ही प्रभाव डालती है ॥ २३ ॥
चापत्यमिदमेवैतत् तव विप्र भ्रमोद्भवम् ।
अहो हि खलु सादृश्यं वक्तव्यं भवता मम ॥ २४ ॥
विप्र ! यह तुम्हारा भ्रमजनित चापल्य ही प्रकट हुआ है । अहो ! तुम्हें मेरी और उनकी समानता बतानी चाहिये थी (किंतु तुमने हमारी लघुता व्यक्त की है) ॥ २४ ॥
अहमेव त्वया विप्र मर्षये प्रोदितं वचः ।
सखिभावाद् द्विजश्रेष्ठ अन्यथा कः सहेदिदम् ॥ २५ ॥
ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ ! एक मैं ही हूँ, जिसने मित्रताके कारण तुम्हारी इस अनुचित बातको सह लिया, अन्यथा कौन ऐसी बात सह सकता है ? ॥ २५ ॥
गच्छ मन्दमते विप्र यथेष्टं साम्प्रतं तव ।
द्विज गच्छ यथेष्टं त्वं पृथिवीं पृथिवी तव ॥ २६ ॥
मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चले जाओ, इस समय सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये खुली हुई है । द्विज ! तुम भूतलपर चाहे जहाँ जा सकते हो ॥ २६ ॥
जित्वा गोपालदायादं हत्वा यादवकान् बहून् ।
एष नः प्रथमः कल्पो जेष्याम इति यादवान् ॥ २७ ॥
मैं उस ग्वालबालको जीतकर और बहुत-से यादवोंका
भविष्यपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०७१
संहार करके अपना यज्ञ करूँगा। हमारा पहला संकल्प यही है कि 'हम यादवोंको जीतेंगे'॥ २७॥
गच्छ गच्छेति विप्र त्वं धृष्टं परुषवादिनम्।
शत्रुपक्षस्तुतिपरं सह युक्तवा सदा मया ॥ २८॥
ब्राह्मण ! जाओ ! जाओ !! तुम धृष्ट और कटुवादी हो ! सदा मेरे साथ रहकर भी शत्रुपक्षकी स्तुतिमें लगे रहे हो (इसलिये मैंने तुम्हें त्याग दिया) ॥ २८॥
न मे विप्रवधः कार्यः कष्टादपि हि सर्वतः।
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं भूयो हंसः सात्यकिमब्रवीत् ॥ २९॥
सब ओरसे कष्ट प्राप्त होनेपर भी मुझे ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये (इसीलिये तुम्हें जीवित छोड़ रहा हूँ)। ब्राह्मणसे ऐसा कहकर हंसने फिर सात्यकिसे कहा—॥ २९॥
भो भो यादवदायाद किमर्थं प्राप्तवानिह।
किमब्रवीन्नन्दसुतः किं वाऽसौ मेऽदिशत् करम् ॥ ३०॥
'ओ यादवकुमार ! तुम किसलिये यहाँ आये हो ? उस नन्दपुत्रने तुमसे क्या कहा है ? अथवा उसने मेरे लिये कौन-सा कर प्रदान किया है ?' ॥ ३० ॥
सात्यकिरुवाच
इदं सत्यं वचो हंस शङ्खचक्रगदाभृतः।
शरैर्निशितधाराग्रैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ३१ ॥
दास्यामि करसर्वस्वमसिना निशितेन ते।
शिरश्छेत्स्यामि ते हंस करदानस्य संग्रहम् ॥ ३२॥
सात्यकि बोले—हंस ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका यह सत्य वचन सुनो। उनका कहना है कि 'मैं शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए, शिलापर तेज किये गये और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा तुम्हारा सारा कर चुका दूँगा। हंस ! अपनी तीखी तलवारसे तेरा सिर काट लूँगा' यह तेरे लिये करदानका अच्छा संग्रह होगा' ॥ ३१-३२॥
धार्ष्ट्यं हि तव मन्दात्मन् किमतोऽपि नृपाधम।
देवदेवाज्जगन्नाथात् करमिच्छति यो नृपः ॥ ३३ ॥
तस्यैष करसंक्षेपो जिह्वाच्छेदो नराधम।
मन्दात्मन् ! नृपाधम ! इससे बढ़कर तेरी धृष्टता क्या हो सकती है ? नराधम ! जो राजा देवाधिदेव जगन्नाथसे कर लेना चाहता है, उसकी जीभ काट ली जाय, यही उसके करको समाप्त करनेका उपाय है ॥ ३३॥
तस्य शार्ङ्गरवं श्रुत्वा शङ्खस्य च हरेः पुनः ॥ ३४ ॥
को नाम जीवितं काङ्क्षेत् तिष्ठेदानीं त्वमद्य वै।
श्रीहरिके शार्ङ्गधनुषकी टङ्कार और पाञ्चजन्य शङ्खका हुंकार सुनकर कौन जीवित रहनेकी आशा कर सकता है। तू अब हमारे सामने खड़ा तो हो ॥ ३४॥
गिरीशवरदर्पेण को ब्रूयादीदृशं वचः ॥ ३५ ॥
सहाया वयमेवैते बलभद्रपुरोगमाः।
भगवान् शङ्करसे मिले वरके घमंडमें आकर कौन पुरुष भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसी बात कह सकता है, जैसी तूने कही है। बलभद्र आदि हम सभी वीर श्रीकृष्णके सहायक हैं॥
प्रथमो बलभद्रोऽसौ द्वितीयोऽहं च सात्यकिः ॥ ३६॥
कृतवर्मा तृतीयस्तु चतुर्थो निशठो बली।
पञ्चमोऽथ च बभ्रुस्तु षष्ठश्चैवोल्कलः स्मृतः ॥ ३७ ॥
सप्तमस्तारणो धीमानस्त्रशस्त्रविशारदः।
अष्टमस्त्वथ सारङ्गो नवमो विप्रथुस्तथा ॥ ३८॥
दशमश्चोद्धवो धीमान् वयमेते बलान्विताः।
प्रथम तो बलभद्रजी हैं, दूसरा मैं सात्यकि हूँ, तीसरा कृतवर्मा है, चौथा बलवान् निशठ है, पाँचवाँ बभ्रु, छठा उल्कल, सातवाँ अस्त्रशस्त्रविशारद बुद्धिमान् तारण, आठवाँ सारङ्ग, नवाँ विपृथु और दसवें बुद्धिमान् उद्धवजी हैं। ये हम सभी सहायक बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ३६-३८॥
त एते पुरतो गोप्तुः शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ३९ ॥
देवदेवस्य युद्धेषु तिष्ठन्त्येव दिवानिशम्।
ये सभी वीर समस्त युद्धोंमें अपने रक्षक शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके आगे ही खड़े होते हैं ॥ ३९॥
यौ हि वीरौ सुतौ तस्य नासत्यसदृशौ बले ॥ ४० ॥
तावेव वां क्षमौ युद्धे हन्तुं बलमदान्वितौ।
उनके जो दो विख्यात पुत्र (प्रद्युम्न और साम्ब) हैं, वे दोनों बलमें अश्विनीकुमारोंके समान हैं। केवल वे दोनों ही युद्धमें बलके मदसे उन्मत्त हुए तुम दोनों भाइयोंको मार सकते हैं ॥ ४०॥
यो गिरीशो गिरां देवो वरं दत्त्वा स तिष्ठति ॥ ४१ ॥
युवां हि किंबलौ युद्धे तिष्ठतः सशरं धनुः।
गृहीत्वा शत्रुभिः सार्धं युद्धं कर्तुं समुद्यतौ ॥ ४२ ॥
वाणीके देवता जो गिरीश शिव हैं, वे तो वर देकर अलग खड़े हैं। तुम दोनों किसके बलका सहारा लेकर युद्धमें खड़े हुए हो और धनुष-बाण लेकर शत्रुओंके साथ जूझनेको तैयार हुए हो ? ॥ ४१-४२ ॥
ईदृशेष्वथ भृत्येषु युद्धं कुर्वत्सु शत्रुभिः।
त्रैलोक्यं रक्षतस्तस्मात् करमिच्छन् व्रजेत्कः॥ ४३॥
जिनके हम-जैसे सेवक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे हों, त्रिलोकीकी रक्षा करनेवाले उन जगदीश्वरसे कर लेनेकी इच्छा रखकर कौन जीवित लौट सकता है ? ॥ ४३ ॥
हनिष्यत्येव वां युद्धे त्रैलोक्यं यो हि रक्षति।
शरेण निशितेनाऽसौ शार्ङ्गमुक्तेन केवलम् ॥ ४४॥
जो तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें केवल शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए पैने बाणसे तुम दोनोंको अवश्य मार डालेंगे ॥ ४४ ॥
क्व नः संग्राम इत्येवं पुनराह जगत्पतिः।
पुष्करे पुण्यदे नित्यमुत गोवर्धने गिरौ ॥ ४५॥