विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1094, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः | १०६७ |
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना
वैशम्पायन उवाच
हासं कुर्वत्सु तेष्वेवं केशवः केशिसूदनः।
उवाच वचनं दूतं गच्छ मद्द्वचनाद् द्विज ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब यादव इस प्रकार उपहास कर रहे थे, उस समय केशिसन्ता भगवान् केशवने दूतसे इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन् ! आप मेरा संदेश लेकर जाइये ॥ १ ॥
तावित्थं हंसडिम्भकौ ब्रूहि त्वरितविक्रमः।
बाणैर्दास्यामि निशितैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ २ ॥
'शीघ्रगतिसे वहाँ जाकर उन हंस और डिम्भकसे इस प्रकार कहिये—मैं शार्ङ्ग धनुषद्वारा छोड़े गये और शिलापर तेज किये गये पैने बाणोंद्वारा तुम दोनोंको कर दूँगा ॥ २ ॥
असिना वाथ दास्यामि निशितेन महात्मनोः।
शिरो वा छेत्स्यते चक्रं मत्करप्रहितं वलिम् ॥ ३ ॥
'अथवा उन महामनस्वी राजाओंको अपनी तीखी तलवारसे कर समर्पित करूँगा। अथवा मेरे हाथसे छोड़ा गया चक्र उनका सिर काट लेगा और उसीको करके रूपमें समर्पित करेगा ॥ ३ ॥
यो वरं दत्तवान् रुद्रो युवयोर्धाष्टर्यकारणम्।
स एव रक्षिता वां स्यात् तं जित्वा वां निहन्म्यहम् ॥ ४ ॥
'भगवान् रुद्रने तुम दोनोंको जो वर दिया है, वही तुम दोनोंकी ढिठाईका कारण है। यदि वे रुद्रदेव ही तुम दोनोंके रक्षक हो जायें तो मैं उनको भी जीतकर तुम दोनोंको मार डालूँगा ॥ ४ ॥
देशोऽयं संविधातव्यो यत्र नः संगतिर्भवेत्।
तत्र गन्ता तथा चास्मि सबलः सहवाहनः ॥ ५ ॥
'राजाओ ! कोई ऐसा स्थान निश्चित कर लेना चाहिये, जहाँ हमलोगोंका समागम हो। मैं सेना और सवारियोंसहित वहाँ उस स्थानमें आ जाऊँगा ॥ ५ ॥
भवन्तौ निर्भयौ भूत्वा गच्छेतां सबलौ नृपौ।
पुष्करे वा प्रयागे वा मथुरायामथापि वा ॥ ६ ॥
तत्राहं सबलो याता नात्र कार्या विचारणा।
'नरेश्वरो ! तुम दोनों वीर भी निर्भय होकर सेनासहित वहाँ आ जाना। पुष्करमें या प्रयागमें अथवा मथुरामें जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं मैं सेनासहित आ जाऊँगा, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ६½ ॥
अथवा मित्रभावाच्च वक्तुमेवं न ते क्षमम् ॥ ७ ॥
न शक्यं यत् त्वया वक्तुं तच्च वक्ष्यति सात्यकिः।
त्वया सह ततो गत्वा साक्षिभूतो भव द्विज ॥ ८ ॥
'अथवा मित्रताके नाते आपसे ऐसी बात कहलाना उचित न होगा। आप जिसे नहीं कह सकेंगे, उसे आपके साथ जाकर यह सात्यकि कहेंगे। ब्रह्मन् ! आप केवल साक्षी बने रहें ॥ ७-८ ॥
इदं च जाने विप्रेन्द्र स्नेहो मयि सदा तव।
तेन त्वं विजयी भूत्वा संसारे दुःखसंकुले।
मत्कथापरमो नित्यं सदा भव जनार्दन ॥ ९ ॥
'विप्रेन्द्र ! मैं यह भी जानता हूँ कि आपका सदा मेरे ऊपर स्नेह बना रहता है। अतः जनार्दनजी ! आप दुःखोंसे भरे हुए इस संसारमें विजयी होकर सदा नित्य-निरन्तर मेरी कथा-वार्तामें लगे रहिये' ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना तथा हंसका जनार्दनसे कार्यसिद्धिके विषयमें पूछना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं कृष्णः सात्यकिं पुनराह सः।
गत्वा शैनेय विप्रेण ब्रूहि मद्द्वचनात् तयोः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिसे फिर कहा—'शिनिनन्दन ! तुम इन ब्राह्मण देवता जनार्दनके साथ जाकर मेरे कथनानुसार उन दोनों भाई हंस और डिम्भकसे कहो ॥ १ ॥
यन्मयोक्तमशेषेण वद गत्वा तयोः पुरः।
यथा नः संगतिर्युद्धे तथा वद बलात् तदा ॥ २ ॥
'मैंने जो कुछ कहा है, वह सब उन दोनोंके सामने जाकर कहो, जिससे हमलोगोंका युद्ध-स्थलमें शीघ्र समागम