भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1095, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1095

१०६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

हो। उक्त उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तुम बलपूर्वक भी बात कर सकते हो ॥ २ ॥

धनुरादाय गच्छ त्वं बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
एकेनाश्वेन गच्छ त्वमसहायो यदूत्तम ॥ ३ ॥

'यदुकुलतिलक सात्यके ! तुम धनुष लेकर जाओ; हाथमें गोहके चमड़ेके बने दस्तानेको भी बाँध लेना, एकमात्र अश्वके साथ जाना, दूसरे किसी सहायकको साथ न लेना' ॥ ३ ॥

सात्यकिस्तं तथेत्युक्त्वा हयमारुह्य शीघ्रगम् ।
गन्तुमैच्छत् ततो राजन्नसहायः स सात्यकिः ॥ ४ ॥

सात्यकिने 'बहुत अच्छा' कहकर एक शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ हो वहाँसे जानेका विचार किया। राजन् ! उन्होंने कोई दूसरा सहायक साथ नहीं लिया था ॥ ४ ॥

जनार्दनं विसृज्याशु दूतं तं यादवेश्वरः ।
अहो धाष्टर्यमहो धाष्टर्यमित्युवाच जनार्दनः ॥ ५ ॥

जनार्दन नामक दूतको शीघ्र ही विदा करके यादवेश्वर जनार्दन बोले—'अहो ! हंस और डिम्भककी धृष्टता अद्भुत है, उनकी ढिठाई आश्चर्यजनक है' ॥ ५ ॥

नमस्कृत्य तदा दूतो माधवं माधवेश्वरम् ।
स ययौ शाल्वनगरं शैनेयेन समन्वितः ॥ ६ ॥

उस समय माधवेश्वर माधवको नमस्कार करके दूत जनार्दन सात्यकिके साथ शाल्वनगरको गये ॥ ६ ॥

ततः प्रविश्य धर्मात्मा ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ।
आसनं महदास्थाय विसृज्य यादवे पुनः ॥ ७ ॥
आस्ते सुखं यदा विप्रः शैनेयेन समन्वितः ।
अथ तं हंसडिम्भयोर्दर्शयामास सात्यकिम् ॥ ८ ॥

ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दन वहाँ राजसभामें प्रवेश करके सात्यकिको एक महान् आसन देकर जब स्वयं भी उस श्रेष्ठ आसनपर उनके साथ सुखपूर्वक बैठ गये, तब उन्होंने हंस और डिम्भकसे सात्यकिको मिलाया ॥ ७-८ ॥

दूतोऽयं सात्यकिः प्राप्तः सव्यो बाहुरयं हरेः।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हंसः प्राह वचस्तदा ॥ ९ ॥

उस समय वे बोले—'राजन् ! यह सात्यकि द्वारकासे दूत होकर आये हैं। ये भगवान् श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजाके समान हैं।<sup></sup> जनार्दनकी यह बात सुनकर हंस बोला—॥ ९ ॥

श्रुतः समागमः पूर्वमद्य दृष्टो मया त्वसौ ।
धनुर्वेदे च वेदे च शास्त्रे शस्त्रे तथैव च ॥ १० ॥
निपुणोऽयं सदा धीर इत्येवमनुशुश्रुम ।
अथो दृष्टिपथं प्राप्तः प्रीतिं नौ विदधात्यसौ ॥ ११ ॥

'पहले इसके समागम होनेकी बात सुननेमें आयी थी, आज मुझे इसका दर्शन हो गया। हमने सुना है कि यह वीर सात्यकि वेद, धनुर्वेद, शास्त्र-विद्या और शस्त्र-विद्यामें सदा निपुण एवं धीर है। अब हमारी दृष्टिपथमें आकर यह हम दोनों भाइयोंको प्रीति प्रदान कर रहा है ॥ १०-११ ॥

कुशलं वासुदेवस्य वलभद्रस्य वा पुनः ।
कुशलाः सात्वताः सर्वे उग्रसेनपुरोगमाः ॥ १२ ॥

'सात्यके ! वासुदेव श्रीकृष्ण और बलभद्र कुशलसे तो हैं न ? उग्रसेन आदि सभी यादव सकुशल हैं न ?'॥ १२ ॥

तथेति सात्यकिः प्राह मन्दमुन्मथिताननः ।
ततो जनार्दनं प्राह हंसो वाक्यविशारदः ॥ १३ ॥

तब सात्यकिने मन्दस्वरमें कहा—'जी हाँ ! सब लोग कुशल हैं। उस समय उनका मुख रोषसे तमतमा उठा था। तदनन्तर बातचीत करनेमें कुशल हंसने जनार्दनसे कहा—॥ १३ ॥

अपि दृष्टस्त्वया चक्री सिद्धं नः कार्यमीहितम् ।
वद सर्वमशेषेण मा वृथा कालमत्यागाः ॥ १४ ॥

'ब्रह्मन् ! क्या तुम चक्रधारी श्रीकृष्णसे मिले थे ? क्या हमारा अभीष्ट कार्य सिद्ध हुआ ? वहाँका सब समाचार पूर्णरूपसे बताओ, व्यर्थ समय न बिताओ' ॥ १४ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवाक्ये सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वाक्यविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥


अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः

जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक तिरस्कृत करके चले जानेके लिये कहना, फिर सात्यकिका हंसको श्रीकृष्णका संदेश सुनाते हुए फटकारना

वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति हंसे च धर्मात्मा जनार्दनः ।
उवाच प्रहसन् वीरः स्तुवन् नारायणं सदा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! हंसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा वीर जनार्दनने, जो नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी सदा स्तुति करता था, हँसते हुए कहा—॥ १ ॥


१. 'सव्य' शब्दका अर्थ बायाँ और दाहिना भी है। देखिये संस्कृत शब्दार्थ-कौस्तुभ।

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