विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1093, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [हरिवंशे
हैं। पुरुषोत्तम ! प्राणवेत्ता पुरुष आपको ही प्राण कहते हैं ॥
शब्दं शब्दविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ।
तथा सति हृषीकेश किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २३ ॥
'पुरुषोत्तम ! शब्दशास्त्रके ज्ञाता वैयाकरण आपको ही शब्द कहते हैं । हृषीकेश ! ऐसी दशामें आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम अपने राजाका संदेश कहो' ॥ २३ ॥
तथापि शृणु देवेश चोदितोऽस्मि यतस्त्वया ।
वदेत्यसकृदेवैतत् तस्माद् वक्ष्यामि माधव ॥ २४ ॥
'देवेश्वर माधव ! तथापि सुनिये । आपने मुझे बारंबार कहनेके लिये प्रेरित किया है । इसलिये मैं कहूँगा ॥ २४ ॥
राजसूयेन यज्ञेन ब्रह्मदत्तोऽद्य यक्ष्यते ।
तदर्थं प्रेषितस्ताभ्यां हंसेन डिम्भकेन च ॥ २५ ॥
'भगवन् ! राजा ब्रह्मदत्त अब राजसूय यज्ञ करेंगे । उसीके लिये हंस और डिम्भकने मुझे आपके पास भेजा है ॥
करार्थं यदुमुख्येभ्यस्त्व चामन्त्रणाय हि ।
लवणं बहु देयं ते यज्ञार्थं तस्य केशव ॥ २६ ॥
'उसने मुख्य-मुख्य यादवोंसे कर लेने और आपको आमन्त्रित करनेके लिये मुझे यहाँतक आनेके लिये विवश किया है । केशव ! आपको उसके यज्ञके लिये बहुत-सा नमक देना है ॥ २६ ॥
इत्यर्थं प्रेषितस्ताभ्यां करं देहि तदाज्ञया ।
इदं त्वमपरं ताभ्यामुक्तं शृणु जगत्पते ॥ २७ ॥
'जगत्पते ! उन दोनोंने इसीलिये मुझे यहाँ भेजा है कि आप उनकी आज्ञासे उनके लिये कर दीजिये । उन दोनोंने जो यह दूसरी बात कही है, उसे भी सुन लीजिये ॥ २७ ॥
लवणानि वहन्न्याशु प्रगृह्य त्वरितं भवान् ।
आगच्छतु तयो राज्ञोः सेयं केशव वाग् विभो ॥ २८ ॥
'आप शीघ्र ही बहुत-सा नमक लेकर मेरे यहाँ आइये ।' प्रभो ! केशव ! यही उन दोनों राजाओंका आपके लिये संदेश है' ॥
इत्युक्तवति विप्रेन्द्रे दूते तत्र तयोर्नृप ।
प्रहस्य सुचिरं कृष्णो बभाषे दूतमेश्वरः ॥ २९ ॥
नरेश्वर ! उन दोनोंके दूत विप्रवर जनार्दन जब इस प्रकार कह चुके, तब भगवान् श्रीकृष्णने बहुत देरतक जोर-जोरसे हँसकर उस दूतसे कहा—॥ २९ ॥
शृणु दूत वचो मह्यं युक्तमुक्तं द्विजोत्तम ।
करं दद्यामि ताभ्यां तु करदोऽस्मि यतो नृपः ॥ ३० ॥
'दूत ! द्विजश्रेष्ठ ! तुम मेरी कही हुई यह युक्तियुक्त बात सुनो । मैं उन दोनोंको कर दूंगा; क्योंकि मैं उन्हें कर देने-वाला नरेश हूँ ॥ ३० ॥
धार्ष्ट्यमेतत् तयोर्विप्र मत्तो यस्तु करग्रहः ।
अहो धार्ष्ट्यमहो धार्ष्ट्यं तयोः क्षत्रियबीजयोः ॥ ३१ ॥
'विप्रवर ! मुझसे जो कर लेनेका संकल्प है, यह उन दोनों भाई हंस और डिम्भककी बहुत बड़ी धृष्टता है । अहो ! क्षत्रियके बीजसे उत्पन्न हुए उन दोनोंकी यह कैसी अद्भुत धृष्टता है ! यह कैसी आश्चर्यजनक ढिठाई है ॥ ३१ ॥
इदमश्रुतपूर्वं मे मत्तो यस्तु करग्रहः ।
इत्युक्त्वा केशवो दूतमिदमाह स्म यादवान् ॥ ३२ ॥
'मुझसे कर लेनेकी बात पहले-पहल सुननेमें आयी । इससे पूर्व कभी ऐसी बात नहीं सुनी गयी थी ।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान् केशवने यादवोंसे कहा—॥ ३२ ॥
हास्यमेतद् यदुश्रेष्ठा मत्तो यस्तु करग्रहः ।
यष्टासौ राजसूयस्य ब्रह्मदत्तो महीपतिः ॥ ३३ ॥
तौ तु याजयितारौ हि हंसो डिम्भक एव च ।
वोढा किल यदुश्रेष्ठो लवणस्य दुरात्मनः ॥ ३४ ॥
'यदुवरो ! मुझसे जो कर-ग्रहणकी माँग है, यह कैसी उपहासास्पद बात है ! राजा ब्रह्मदत्त राजसूय यज्ञ करेंगे और इस यज्ञके करानेवाले हैं उन्हींके बेटे हंस और डिम्भक । यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण उस दुरात्माके यहाँ नमक ढोकर ले जायेंगे॥
करदो वासुदेवो हि जितोऽस्मि यदुसत्तमाः ।
हास्यं हास्यमिदं भूयः शृणुध्वं यादवा वचः ॥ ३५ ॥
'यदुश्रेष्ठ वीरो ! मुझ वासुदेवको उसने कर देनेवाला कह दिया, मानो उसने मुझे युद्धमें पराजित कर दिया । यादवो ! यह कितनी हँसीकी बात है, इसे तुमलोग फिर सुनो'॥
इत्युक्तवति देवेशे बलभद्रपुरोगमाः ।
यादवाः सर्व एवैते हासाय समवस्थिताः ॥ ३६ ॥
देवेश्वर श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर बलभद्र आदि समस्त यादव हंस-डिम्भकके उस कथनकी हँसी उड़ानेके लिये खड़े हो गये ॥ ३६ ॥
करदः कृष्ण इत्येवं ब्रुवन्तः सर्वसात्वताः ।
हासं मुमुचुरत्यर्थं तलं दत्त्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
'श्रीकृष्ण कर देनेवाले हैं' ऐसा कहते हुए समस्त यादव परस्पर ताली बजाकर या एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ३७ ॥
तलशब्दो हासशब्दो रोदसी पर्यपूरयत् ।
स च विप्रो नृपश्रेष्ठ निन्दयन् मित्रमात्मनः ॥ ३८ ॥
अहो कष्टमहो कष्टं दौत्यं यत् कृतवानहम् ।
इति लज्जासमाविष्टस्तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ॥ ३९ ॥
ताली बजाने और हँसनेकी गम्भीर ध्वनि पृथ्वी और आकाशमें गूँज उठी । नृपश्रेष्ठ ! ब्राह्मण जनार्दन अपने मित्र हंसकी निन्दा करते हुए मन-ही-मन कहने लगे— 'अहो ! मैंने जो दूतका कार्य किया, यह बड़े कष्टकी बात है ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहकर लज्जित हो वे नीचे मुख करके चुपचाप बैठे रहे ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने वासुदेववाक्ये पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥