भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1092

भविष्यपर्व ] पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः १०६५


भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर जनार्दनका मन प्रसन्न हो गया। अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। 'मैं जनार्दन हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण जनार्दनने भगवान् बलभद्रको मस्तक झुकाया और श्रीकृष्णसे कहा— 'देवदेवेश्वर ! मैं हंस और डिम्भकका दूत हूँ' ॥ ६३ ॥
इति ब्रुवाणं विप्रेन्द्रमिदमाह स माधवः ॥ ७ ॥
आस्स्वेदं विष्टरं पूर्वं पश्चाद् ब्रूहि प्रयोजनम् ।
तथेति चाब्रवीद् विप्रो महदासनमास्थितः ॥ ८ ॥
इस तरह कहते हुए विप्रवर जनार्दनसे भगवान् श्रीकृष्ण बोले— 'ब्रह्मन् ! पहले आप इस आसनपर बैठिये, इसके बाद अपने आगमनका प्रयोजन बताइये।' तब ब्राह्मणने 'बहुत अच्छा' कहा और वे एक महान् आसनपर विराजमान हुए ॥ ७-८ ॥
वाचा सम्पूज्य विप्रेन्द्रमपृच्छत् कुशलं हरिः।
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ९ ॥
राजेन्द्र ! भगवान् श्रीकृष्णने वाणीद्वारा विप्रवर जनार्दनका स्वागत-सत्कार करके फिर उनसे ब्रह्मदत्त, हंस और डिम्भकका कुशल-समाचार पूछा ॥ ९ ॥
श्रुतं चापि तयोर्वीर्यं प्रयोजनमतो द्विज ।
अपि वा कुशलं विप्र पितुस्तव जनार्दन ॥ १० ॥
वे बोले— 'विप्र जनार्दन ! मैंने हंस और डिम्भकका पराक्रम और प्रयोजन पहलेसे सुन रखा है। तुम्हारे पिताजी तो कुशलपूर्वक हैं न ?' ॥ १० ॥

जनार्दन उवाच
कुशलं ब्रह्मदत्तस्य पितुश्च मम केशव ।
तयोरेव जगन्नाथ हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ११ ॥
जनार्दनने कहा— केशव ! राजा ब्रह्मदत्त और मेरे पिताजी सकुशल हैं। जगन्नाथ ! दोनों भाई हंस और डिम्भक भी कुशलसे ही हैं ॥ ११ ॥

श्रीभगवानुवाच
किमाहतुर्महीपालौ तौ हंसडिम्भकौ नृपौ ।
ब्रूहि सर्वमशेषेण नात्र शङ्का द्विजोत्तम ॥ १२ ॥
श्रीभगवान् बोले— द्विजश्रेष्ठ ! राजा हंस और डिम्भकने क्या संदेश दिया है ? आप सारी बातें विस्तारपूर्वक बतावें। इसके लिये आपके मनमें कोई शङ्का नहीं होनी चाहिये ॥ १२ ॥
वाच्यं वाप्यथवावाच्यं कर्तव्यमथ चेतरत् ।
श्रुत्वा तस्य विधास्यामो युक्तरूपं द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
विप्रवर ! उन्होंने जो कुछ कहा हो, वह कहने योग्य हो या न कहने योग्य हो, करने योग्य हो या न करने योग्य हो, उसे पूरा-पूरा सुनकर हमलोग उसका उचित उत्तर देंगे ॥
दूतोऽसि सर्वथा विप्र न वाच्यावाच्यकल्पना ।
यत् कर्मकारनिर्दिष्टं तद् वाच्यं दूतजन्मना ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् ! आप दूत हैं। आपके लिये वाच्य और अवाच्यका विचार सर्वथा अनावश्यक है। भेजनेवालेने जो कुछ जैसे कहा हो, दूतको वह सब उसी प्रकार कहना चाहिये ॥ १४॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या वक्तव्यस्येतरस्य च ।
अतो वद यथा प्रोक्तं ताभ्यामिह जनार्दन ॥ १५ ॥
जनार्दनजी ! आपको वाच्य और अवाच्यकी शङ्का नहीं करनी चाहिये। अतः हंस और डिम्भकने जैसा कहा है, वैसा ही यहाँ कहिये ॥ १५ ॥
केशवेनैवमुक्तस्तु प्रोवाच स जनार्दनः ।
अजानन्निव किं ब्रूषे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ १६ ॥
भगवान् केशवके ऐसा कहनेपर जनार्दन बोले— 'भगवन् ! आप अनजानकी भाँति क्यों बात कर रहे हैं ? आप तो सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं ॥ १६॥
न चास्ति ते परोक्षं तु जगद्वृत्तान्तमच्युत ।
सर्वं हि मनसा पश्यन् किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ १७ ॥
'अच्युत ! जगत्का कोई भी वृत्तान्त आपकी आँखोंसे ओझल नहीं है। आप अपने मनसे सब कुछ देखते हुए भी मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ १७ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे विष्णुस्त्वमेव जगतीपते ।
इच्छया सर्वमाप्नोषि दृष्टादृष्टविवेचनम् ॥ १८ ॥
'पृथ्वीनाथ ! विद्वान् पुरुष आपको ही विष्णु कहते हैं। आप इच्छा करते ही दृष्ट और अदृष्ट वस्तुका पूर्ण विवेक प्राप्त कर लेते हैं ॥ १८ ॥
त्वमेवेदं जगत् सर्वं जगच्च त्वयि तिष्ठति ।
न त्वया रहितो ह्येकः पदार्थः सचराचरः ॥ १९ ॥
'आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं, आपमें ही इस जगत्की स्थिति है। एक भी ऐसा कोई चर या अचर पदार्थ नहीं है, जो आपसे रहित हो ॥ १९ ॥
नास्ति किंचिदवेद्यं ते सर्वगोऽसि जगत्पते ।
त्वमिन्द्रः सर्वभूतानां रुद्रः संहारकर्मकृत् ॥ २० ॥
'जगदीश्वर ! आप सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापी हैं, आपके लिये कुछ भी अज्ञेय नहीं है। आप ही समस्त भूतोंके इन्द्र हैं और आप ही संहार कर्म करनेवाले रुद्र हैं ॥ २० ॥
रक्षितासि सदा विष्णुः सर्वलोकस्य माधव ।
संसारस्य भवान् स्रष्टा किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २१ ॥
'माधव ! सदा सम्पूर्ण लोककी रक्षा करनेवाले विष्णु आप ही हैं। आप ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हैं। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ २१ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे नित्यं ज्ञानात्मेति च माधव ।
प्राणं प्राणविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥
'माधव ! विद्वान् पुरुष सदा आपको ही ज्ञानात्मा कहते