भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1091
१०६४श्रीमद्भारते खिलभागे[हरिवंशे

‘शेषस्वरूप बलभद्रपर शयन करनेवाले जगदीश्वर श्रीकृष्णके दर्शनके लिये आज मैं उद्यत हूँ। उन विजयशील सर्वव्यापी जगद्गुरु श्रीकृष्णका अवश्य आज ही मैं दर्शन करूँगा ॥ ३८ ॥’

श्रीकौस्तुभोज्ज्वलरुचि स्फुरितोरुवक्षः पीताम्बरं मकरकुण्डलपङ्कजाक्षम् । कृष्णं किरीटवरचक्रगदोर्ध्वहस्तं तेजोमयं मम हरेर्वपुरस्तु भूत्यै ॥ ३९ ॥

‘जो श्रीकौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित है, जिसका विशाल वक्षःस्थल उसी कौस्तुभ एवं श्रीवत्सकी शोभासे उदीप्त हो रहा है, जिसने पीताम्बर धारण कर रखा है, जो मकराकार कुण्डल तथा कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित है, जिसके मस्तकपर उत्तम किरीट और ऊपर उठे हुए हाथोंमें चक्र एवं गदा विराजमान हैं, श्रीहरिका वह श्यामवर्णमय तेजस्वी विग्रह मेरा कल्याण करनेवाला हो ॥ ३९ ॥

वेदोदधौ विशदशास्त्रमहाहियोगे निष्णातशुद्धमतिमन्दरमथ्यमाने । उद्योतमानममरैरनिशं निषेव्यं नारायणाख्यममृतं प्रपिवामि चाद्य ॥ ४० ॥

‘विशद शास्त्ररूपी महान् सर्प (वासुकि) से जुड़े हुए निष्णात शुद्धबुद्धिरूपी मन्दराचलद्वारा मथे जानेवाले वेदरूपी समुद्रसे जिसका प्राकट्य हुआ है तथा अमरगण निरन्तर जिसका सेवन करते हैं, उस नारायण नामक' अमृतका आज मैं अपने नेत्रोंद्वारा पान करूँगा ॥ ४० ॥’

ध्येयं मुमुक्षुभिरमेयमनाद्यनन्तं स्थूलं सुसूक्ष्मतरमेकमनेकमाद्यम् । ज्योतिस्त्रिलोकजनकं त्रिदशैकवन्द्य- मक्ष्णोर्ममास्तु सततं हृदयेऽच्युताख्यम् ॥ ४१ ॥

‘जो मुमुक्षुओंके द्वारा चिन्तन करनेके योग्य, अप्रमेय, अनादि, अनन्त, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, एक, अनेक, आद्य, त्रिभुवनका जनक तथा देवताओंद्वारा एकमात्र वन्दनीय है, वह अच्युत नामक तेज सदा मेरे नेत्रोंके समक्ष और हृदयमें प्रकाशित होता रहे' ॥ ४१ ॥

चिन्तयन्निति विप्रेन्द्रो ययौ द्वारवतीं पुरीम् । मत्वा कृतार्थमात्मानं वाहयन् हयमुत्तमम् ॥ ४२ ॥

इस प्रकार सोचते हुए विप्रवर जनार्दन अपनेको कृतार्थ मानकर उस उत्तम अश्वको हाँकते हुए द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने विप्रस्य द्वारवतीगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणका द्वारकागमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥


पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः

जनार्दनका सुधर्मा सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवन-पूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना

वैशम्पायन उवाच

स निवेदितसर्वस्वो द्वाःस्थेन हि जनार्दनः । अथ प्रविश्य धर्मात्मा सुधर्मां वै द्विजोत्तमः ॥ १ ॥ अपश्यद् देवदेवेशं सुधर्माकृतिसंस्थितम् । बलभद्रेण संयुक्तमध्यासितमहासनम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उन द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा जनार्दनने द्वारपालकी सहायतासे सुधर्मा-सभामें प्रवेश करके देवदेवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो वहाँ उत्तम धर्ममय स्वरूपसे विराजमान थे और बलभद्रजीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे ॥ १-२ ॥

अग्रतः स्थितशैनेयं पार्श्वतः स्थितनारदम् । दुर्वाससा कृतकथमुग्रसेनपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥

उनके सामने सात्यकि खड़े थे तथा उनके पार्श्वभागमें नारदजी विराजमान थे। भगवान् श्रीकृष्ण दुर्वासा मुनिसे बातचीत कर रहे थे। राजा उग्रसेन उनके सामने थे ॥ ३ ॥

गायद्गन्धर्वमुख्यैश्च नृत्यदप्सरसां गणैः । सेव्यमानं महाराज सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४ ॥

महाराज ! गाते हुए मुख्य-मुख्य गन्धर्व, नाचती हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ तथा सूत, मागध एवं वन्दीजन योग्यतानुसार उनकी सेवा कर रहे थे ॥ ४ ॥

उद्गीयमानयशसं माधवं मधुसूदनम् । उद्गीयमानं विप्रैश्च सामभिः सामगैर्हरिम् ॥ ५ ॥

वहाँ माधव मधुसूदनके यशका उच्चस्वरसे गान हो रहा था तथा सामगान करनेवाले ब्राह्मण भी साममन्त्रोंद्वारा श्रीहरिका गुणगान करते थे ॥ ५ ॥

दृष्ट्वा प्रीतमना विष्णुं प्रोद्भूतपुलकच्छविः । नाम्ना जनार्दनोऽस्मीति ननाम चरणौ हरेः ॥ ६ ॥ बलभद्रं ततो देवं ववन्दे शिरसा द्विजः । दूतोऽस्मि देवदेवेश हंसस्य डिम्भकस्य च ।