विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1090, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६३
'ऐसी दशामें मेरा कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह मित्रता ही मुझसे ऐसा कार्य कराती है। मैं जो घोर बात कहनेके लिये उद्यत हुआ हूँ, उसके लिये भगवान् विष्णु सर्वथा मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥
द्रक्ष्याम्यहं जगन्नाथं नीलकुञ्चितमूर्धजम्।
कम्बुग्रीवधरं विष्णुं श्रीवत्साच्छादितोरसम्॥ २३॥
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और रक्षक हैं, जिनके सिर-पर काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो शङ्खके समान ग्रीवा धारण करते हैं तथा जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स-चिह्नसे आच्छादित है, उन भगवान् विष्णुका मैं दर्शन करूँगा ॥
स्फुरत्पद्ममहाबाहुं रत्नच्छायाविराजितम्।
द्रक्ष्यामि केशवं विष्णुं चक्रिणं यादवेश्वरम् ॥ २४॥
'जिनकी विशाल भुजाओंमें पद्मरागमणिके आभूषण शोभा पाते हैं तथा जो कौस्तुभ आदि रत्नोंकी कान्तिसे प्रकाशित होते हैं, उन सर्वव्यापी, चक्रधारी, यादवेश्वर श्रीकृष्णका मैं दर्शन करूँगा ॥ २४॥
अचिन्त्यविभवं देवं भूतभव्यभवत्प्रभुम्।
आत्मेच्छया जगद्रक्षं द्रक्ष्यामि जलशायिनम्॥ २५॥
'जिनका वैभव अचिन्त्य है, जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, जो अपनी ही इच्छासे जगत्की रक्षामें तत्पर रहते हैं, उन एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीनारायण-देवका मैं दर्शन करूँगा ॥ २५ ॥
कृतार्थः सर्वथा चाहं भवामि विगतज्वरः।
अद्य मे सफलं जन्म साक्षाद् दृष्टवतो हरिम् ॥ २६॥
'उनका दर्शन करके मैं सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा। मेरी सारी चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ दूर हो जायँगी। आज श्रीहरिका साक्षात् दर्शन कर लेनेपर मेरा जन्म सफल हो जायगा ॥२६॥
अद्य मे सफला यज्ञाः साक्षात्कृतवतो हरिम्।
नेत्रे मे सफले विष्णुं पश्यतश्च जगन्मयम् ॥ २७॥
'आज श्रीहरिका साक्षात्कार करनेपर मेरे यज्ञ सफल हो जायेंगे। जगन्मय विष्णुका दर्शन करनेसे मेरे दोनों नेत्र भी सफल हो जायेंगे ॥ २७ ॥
प्रीतिमानस्तु मे विष्णुर्वक्तुर्घोरस्य कर्मणः।
उन्मिषन्नेत्रयुग्मेन द्रक्ष्यामि सकृदीश्वरम् ॥ २८॥
'मैं भयंकर कर्मके लिये प्रस्ताव करनेवाला हूँ। उस समय भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न रहें। क्या मैं अपनी खुली हुई दोनों आँखोंसे एक बार उन जगदीश्वरका दर्शन करूँगा ॥ २८ ॥
आमूलमसकृद् विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः।
पिवामि नेत्रयुग्मेन वपुः कृष्णस्य केवलम् ॥ २९॥
'मैं नीचेसे ऊपरतक बारंबार भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा, दोनों नेत्रोंसे केवल श्रीकृष्णके शरीरकी रूपमाधुरीका पान करूँगा ॥ २९ ॥
धारयिष्याम्यहं पांसुं तत्पादप्रभवं शिवम्।
ततः कृतार्थतां यास्ये स्वर्गमार्गो हि तद्रजः ॥ ३० ॥
'तदनन्तर उनके चरणोंसे प्रकट हुई कल्याणमयी धूल-को सिरपर धारण करूँगा। ऐसा करके कृतार्थ हो जाऊँगा, क्योंकि उनकी चरणरज स्वर्गका सोपान है ॥ ३० ॥
मेघगम्भीरनिर्घोषं श्रोष्यामि च हरेः स्वरम्।
पादाब्जं चक्रिणो विष्णोः पश्यामि च जगत्पतेः ॥ ३१ ॥
'मैं श्रीहरिके मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान स्वरको सुनूँगा और चक्रधारी जगदीश्वर विष्णुके चरणारविन्दका दर्शन करूँगा ॥
पश्यामि च हरेर्वक्त्रं पूर्णेन्दुसदृशप्रभम्।
हरेरिदं जगद् रूपं पश्यामीव च सर्वतः ॥ ३२ ॥
प्रसीदतु सदा विष्णुरयुक्तं वक्तुमिच्छतः।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान जो श्रीकृष्णका मनोहर मुख है, उसका अवलोकन करूँगा। यह सारा जगत् श्रीहरिका ही रूप है, इस रूपमें मैं सब ओर उन्हींका दर्शन-सा कर रहा हूँ। अनुचित बात कहनेकी इच्छावाले मुझ सेवकके ऊपर भगवान् विष्णु सदा प्रसन्न रहें ॥ ३२३ ॥
आलोलकुण्डलयुतं हरिचन्दनचर्चितम् ॥ ३३॥
स्फुरत्केयूररत्नार्चिर्बाहुद्वयविराजितम् ।
सव्ये द्योतन्महाशङ्खं रश्मिजालविराजितम् ॥ ३४॥
प्रोग्रभास्करवर्णाभं चक्रज्वालाविराजितम्।
प्रोज्ज्वलत्कङ्कणयुतं तप्तजाम्बूनदाङ्गदम् ॥ ३५॥
पीतकौशेयवसनं विस्तीर्णोरस्कमच्युतम्।
कदा द्रक्ष्यामि देवेशमिदानीमथवान्यदा ॥ ३६॥
'जिनके कानोंमें हिलते हुए कुण्डल जगमगा रहे हैं, जो हरिचन्दनसे चर्चित हैं, चमकीले बाजूबंदोंमें जड़े गये रत्नोंकी प्रभासे उद्भासित दोनों भुजाओंसे जिनकी विशेष शोभा होती है, जिनके बायें हाथमें महान् पाञ्चजन्य शङ्ख देदीप्यमान है, जो किरणजालसे प्रकाशित हैं, उदयकालके सूर्यके समान जिनकी सुनहरी कान्ति शोभा पाती है, जो सुदर्शनचक्रकी ज्वालामालाओंसे उद्भासित है, जिनके हाथोंमें जगमगाते हुए कङ्कण तथा तपे हुए सुवर्णके बने बाजूबंद शोभा पाते हैं, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं तथा जिनकी छाती चौड़ी है, उन देवेश्वर अच्युतका मैं इस समय अथवा दूसरे समयमें कब दर्शन करूँगा ॥ ३३-३६॥
सर्वथा कृतकृत्योऽहं यद्वपुर्द्रष्टुमुद्यतः।
नमो मह्यं नमो मह्यं यतो द्रष्टुमहं हरिम् ॥ ३७॥
'मैं सर्वथा कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आज मैं श्रीहरिके साक्षात् शरीरका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। मैं श्रीहरिका दर्शन करनेको कटिबद्ध हूँ, इसलिये मुझे नमस्कार है ! मुझे नमस्कार है ! ॥ ३७ ॥
उद्यतोऽस्मि जगन्नाथं बलभद्रकृतास्पदम्।
द्रक्ष्याम्यवद्यमद्यैव जिष्णुं विष्णुं जगद्गुरुम् ॥ ३८॥