भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1089, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1089

१०६२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

द्रक्ष्यामि देवदेवस्य चक्रिणः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ७ ॥ 'मैं शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके उस मुखका दर्शन करूँगा, जो विकसित सुवर्णमय कमलके केसरकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ७ ॥

वपुर्द्रक्ष्याम्यहं विष्णोर्नीलोत्पलदलच्छवि । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ॥ ८ ॥ 'मैं श्रीकृष्णके नीलकमलदलकी-सी कान्तिवाले उस श्यामसुन्दर शरीरका दर्शन करूँगा, जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित है ॥ ८ ॥

नेत्रे ते देवदेवस्य पद्माकिञ्जल्कसप्रभे । पश्याम्यहमदीनात्मा नष्टदुःखोऽस्मि निर्वृतः ॥ ९ ॥ 'मैं देवाधिदेव श्रीकृष्णके उन दोनों नेत्रोंका दर्शन करूँगा, जो विकसित कमलदलके समान कान्तिमान् हैं। उस समय मेरे हृदयका सारा दैन्य दूर हो जायगा, दुःख मिट जायेंगे और मैं परमानन्दमें निमग्न हो जाऊँगा ॥ ९ ॥

अपि द्रक्ष्यति योगात्मा सौम्येनैव स्वचक्षुषा । अपि वा मत्प्रियं ब्रूयात् स्वस्ति चेति च वा वदेत् ॥ १०॥ 'क्या योगात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सौम्यदृष्टिसे ही मेरी ओर देखेंगे, अथवा मुझे प्रिय लगनेवाली बातें कहेंगे, या 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसी वाणीका प्रयोग करेंगे ॥ १० ॥

द्रक्ष्यामि चक्रिणो वर्ष्म ततस्त्रैलोक्यसंनिभम् । पादाब्जं चक्रिणो द्रष्टुं त्वरत्येव च मे मनः ॥ ११ ॥ 'वहाँ चलकर मैं चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णके उस विग्रहका दर्शन करूँगा, जो तीनों लोकोंको अपने भीतर रखनेके कारण त्रिलोकीके समान है। मेरा मन उन चक्रपाणि-के चरणारविन्दोंका दर्शन करनेके लिये उतावला हो उठा है ॥ ११ ॥

वक्षःस्थलं सदा विष्णोः स्फुरद्रत्नप्रभायुतम् । पश्यन्निव च गच्छामि स्मरन्नानिशमीश्वरम् ॥ १२ ॥ 'मैं भगवान् विष्णुके उस वक्षःस्थलको देखता हुआ-सा चलता हूँ, जो सदा उद्दीप्त कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित होता है तथा उन्हीं परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करता हुआ उनकी सेवामें चल रहा हूँ ॥ १२ ॥

पीतकौशेयवसनं लम्बहारविभूषितम् । ईषत्स्मिताधरं विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः ॥ १३ ॥ 'जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, नीचेतक लटकी हुई विशाल वनमालासे विभूषित हैं तथा जिनके अधरोंपर मन्द मुसकानकी छटा छायी रहती है, उन भगवान् श्रीकृष्णका आज मैं वारंवार दर्शन करूँगा ॥ १३ ॥

स्मरतश्च हरे रूपं रोमहर्षोऽयमीदृशः । गच्छतश्च पुरो भाति शङ्खचक्रगदासिमान् ॥ १४ ॥ 'श्रीहरिके उस रूपका स्मरण करते ही मेरे शरीरमें यह इस तरह रोमाञ्च हो रहा है। चलते समय मेरे सामने शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये भगवान् खड़े जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥

यातीव च पुरो भाति महां देवो जगद्गुरुः । एषोऽयमिति मे वक्तुं जिह्वा प्रस्फुरतीव तम् ॥ १५॥ 'देव जगद्गुरु श्रीकृष्ण मेरे आगे-आगे जाते हुए-से प्रतीत होते हैं। मेरी जिह्वा बार-बार यह कहनेके लिये उद्यत-सी होती है कि 'ये रहे मेरे भगवान्' ॥ १५ ॥

इदं दुःखतरं मन्ये करं देहीति मद्द्वचः । इदं तत्साहसं मन्ये तद्वचस्तस्य भूपतेः ॥ १६ ॥ 'मैं जो उनके सामने यह कहनेके लिये जा रहा हूँ कि 'मुझे कर दीजिये', अपनी इस बातको मैं अत्यन्त दुःखजनक मानता हूँ तथा मैं इसे राजा हंसका अत्यन्त दुःसाहसपूर्ण वचन समझता हूँ ॥ १६ ॥

हंसस्य करदो विष्णुस्तदाज्ञापरिचारकः । तस्य सर्वं पुरो गत्वा वक्तव्यं किल निर्दयः ॥ १७ ॥ 'भगवान् विष्णु हंसको कर दें, उसकी आज्ञाका पालन और सेवा करें, ये सारी बातें मुझे उनके सामने जाकर कहनी पड़ेंगी। निश्चय ही मैं बड़ा निर्दय हूँ ॥ १७ ॥

मूढानामग्रणीरस्मि निर्लज्जश्च तथा वदन् । करं देहि हरे विष्णो हंसस्य यदुपुङ्गव ॥ १८ ॥ 'हरे ! विष्णो ! यदुपुङ्गव ! आप हंसको कर दीजिये' ऐसी बात कहता हुआ मैं मूर्खोंका अगुआ और निर्लज्ज समझा जाऊँगा ॥ १८ ॥

लवणानि बहून्यद्य दातव्यानि करात्मना । इति वक्तुं न मे युक्तं पुरतस्तस्य शार्ङ्गिणः ॥ १९ ॥ 'आपको कररूपमें शीघ्र ही बहुत-सा नमक देना होगा' शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके सामने ऐसी बात कहना मेरे लिये कदापि उचित न होगा ॥ १९ ॥

तथापि मित्रभावात्तु वक्तव्यं घोरमीदृशम् । कष्टो ह्ययं मित्रभावो मनुष्याणां कृतात्मनाम् ॥ २० ॥ 'तथापि मित्रताके कारण मुझे ऐसा घोर वचन कहना होगा। पवित्रात्मा पुरुषोंके लिये यह मित्रभाव भी कष्टप्रद ही होता है ॥ २० ॥

अथवा सर्वविद् विष्णुः सर्वस्य हृदि संस्थितम् । जानात्येव सदा भावं प्राणिनां शोभने रतः ॥ २१ ॥ 'अथवा भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं। वे सबके हार्दिक भावको सदा जानते हैं और प्राणियोंके कल्याणमें तत्पर रहते हैं ॥ २१ ॥

तथा सति न मे दोषो मित्रभावो यतो ह्ययम् । सर्वथा रक्षतां विष्णुर्घोरं वक्तुं यतस्य मे ॥ २२ ॥