भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1088, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1088

भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६१

जरासंधस्तु धर्मात्मा बन्धुरेव सदा मम । गच्छ प्रियं यदुश्रेष्ठं ब्रूहि मद्रचनात्त्वरन् ॥ २१ ॥ धर्मात्मा जरासंध तो सदा हमलोगोंका हितैषी बन्धु ही है । विप्रवर ! तुम यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णके पास जाओ और मेरी आज्ञासे तुरंत यह बात उनसे कहो—॥ २१ ॥

दीयतां करसर्वस्वं यज्ञार्थं सुन्दरं बहु । लवणानि बहून्यद्य गृह्य केशव मा चिरम् ॥ २२ ॥ आगच्छ त्वरितं कृष्ण न ते कार्यं विलम्बनम् । ‘केशव ! तुम यज्ञके लिये बहुत सुन्दर सामग्री तथा करके रूपमें अपना सारा धन दे दो, साथ ही बहुत-से नमकका संग्रह करके शीघ्र आओ । श्रीकृष्ण ! तुम्हें इस कार्यमें विलम्ब नहीं करना चाहिये’ ॥ २२३ ॥

इति ब्रूहि यदुश्रेष्ठं याहि त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥ न ब्रूयाश्चोत्तरं विप्र शपेयं त्वां प्रियोऽसि मे । मित्रभावादिदं ब्रूहि पश्यामि त्वां पुनः पुनः ॥ २४ ॥ ब्रह्मन् ! तुम शीघ्रतापूर्वक जाओ और यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे मेरा यह संदेश सुना दो । विप्र ! मैं शपथ दिलाता हूँ, तुम मेरी बातका कोई उत्तर न देना । तुम मेरे प्रिय मित्र हो, मित्रभावसे ही यह बात जाकर कहो । मैं बार बार तुम्हारी ओर देखता हूँ ॥ २३-२४ ॥

इति संचोदितो विप्रो नोत्तरं प्रत्यभाषत । मित्रभावात् तथा राजन् स्नेहाच्च जनमेजय ॥ २५ ॥ राजन् ! जनमेजय ! हंससे इस प्रकार प्रेरित होकर ब्राह्मणने मित्रभाव तथा स्नेहके कारण उसे कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २५ ॥

जनार्दनस्तु धर्मात्मा नित्यं गन्तुं समुद्यतः । अद्य श्वो वा परश्वो वा गच्छामीति यतेत सः ॥ २६॥ सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले जनार्दन श्रीकृष्णके पास जानेके लिये उद्यत हो गये । ‘आज, कल या परसों मैं अवश्य जाऊँगा’ ऐसा कहकर वे जानेकी तैयारी करने लगे ॥ २६ ॥

देवं द्रष्टुं जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम् । एक एव च धर्मात्मा हयमारुह्य सत्वरम् ॥ २७ ॥ प्रातरेव जगामाशु द्रष्टुं द्वारवतीं द्विजः । हरिं कृष्णं हृषीकेशं मनसा संस्मरन् द्विजः ॥ २८ ॥ धर्मात्मा जनार्दन शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगत्कारण श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये अकेले ही तीव्रगामी अश्वपर आरूढ हो प्रातःकाल ही द्वारकाके लिये शीघ्रतापूर्वक चल दिये। उनकी यात्राका एक ही उद्देश्य था—इन्द्रियोंके प्रेरक सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका दर्शन । ब्राह्मण जनार्दन उन्हींका मन-ही-मन स्मरण करते हुए चले ॥ २७-२८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यान-विषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥


चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

जनार्दनकी भगवद्-दर्शनविषयक उत्कण्ठा

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रायाद्धरिं विष्णुं ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः । हयेनैकेन राजेन्द्र त्वरितं स ययौ नृप ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र ! नरेश्वर ! तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण जनार्दन एक अश्वपर सवार हो तुरंत भगवान् विष्णु हरिके पास चल दिये ॥ १ ॥

यथा निदाघसमये सूर्यांशुपरिपीडितः । पान्थो याति जलं दृष्ट्वा त्वरितं तत्पिपासया ॥ २ ॥ धावत्येव तथा विप्रो हरिं द्रष्टुं जनार्दनः । गच्छन् स चिन्तयामास चोदयन् हयमुत्तमम् ॥ ३ ॥ जैसे ग्रीष्म ऋतुमे सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे पीड़ित हुआ पथिक कहीं दूर जल देखकर उसे पीनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक उसके पास जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मण जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये दौड़ते हुए ही चले । वे अपने उत्तम अश्वको हाँकते हुए मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे—॥ २-३ ॥

हंस एव प्रियो मह्यं कुर्यात् प्रियहितं मम । तथा हि प्रेषितस्तेन हरिं पश्यामह्यहं प्रभुम् ॥ ४ ॥ ‘वास्तवमें हंस ही मेरा प्रिय मित्र है। वही मेरा प्रिय और हित कर सकता है; क्योंकि उसीने मुझे द्वारका भेजा है, जहाँ मैं भगवान् श्रीहरिका दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥

अहमेव सदा धन्यो मत्तो ह्यभ्यधिको न हि । यतो द्रक्ष्याम्यहं विष्णुं वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ५ ॥ ‘मैं ही सदा धन्य हूँ, मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि मैं द्वारकापुरीमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥

सा हि मे जननी धन्या हरिं दृष्ट्वा पुनर्गतम् । कृतार्थं सर्वदा देवी द्रक्ष्यत्येषा मनस्विनी ॥ ६ ॥ ‘मेरी वह माता धन्य है, जो मनस्विनीदेवी भगवान्का दर्शन करके सदाके लिये कृतार्थ होकर लौटे हुए मुझ अपने पुत्रको पुनः देखेगी ॥ ६ ॥

मुखमुन्निद्रहेमाब्जकिञ्जल्कसदृशप्रभम् ।

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