विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1087, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्मिन् मासि नृपश्रेष्ठ यतावो यज्ञसिद्धये ॥ ४ ॥ 'पिताजी ! आप यत्नपूर्वक राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान कीजिये। नृपश्रेष्ठ ! हम दोनों इसी मासमें आपके इस यज्ञकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करेंगे ॥ ४ ॥' आवां तेऽद्य महाराज दिशां विजयतत्परौ । यतिष्यावो बलैः सार्धं गजैराश्वै रथैरपि ॥ ५ ॥ सम्भारा यज्ञसिद्धयर्थमानेतव्या नृपोत्तम । 'महाराज ! हम दोनों भाई आपके लिये दिग्विजय करनेके लिये तत्पर हैं। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरंगिणी सेनाएँ साथ लेकर हम सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पानेका प्रयत्न करेंगे। नृपश्रेष्ठ ! आपको यज्ञकी सिद्धिके लिये सामग्रियोंका संग्रह कराना चाहिये' ॥ ५ ॥ तथेति स महाबाहो ब्रह्मदत्तोऽब्रवीत् तदा ॥ ६ ॥ जनार्दनस्तु विप्रेन्द्रो दृष्ट्वा साहसत्तत्परौ । अशक्यमिति मन्वानो वयस्यं हंसमब्रवीत् ॥ ७ ॥ शृणु हंस वचो मह्यं श्रुत्वा निश्चित्य वीर्यवान् । महाबाहु जनमेजय ! तब राजा ब्रह्मदत्तने 'तथास्तु' कहकर उन दोनोंकी बात मान ली। उन दोनोंको दुःसाहसमें तत्पर होते देख, उनके प्रयासको असम्भव मानकर विप्रवर जनार्दनने अपने मित्र हंससे कहा—'हंस ! पहले मेरी बात सुनो । सुनकर उसपर भलीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचो और उसके अनुसार पराक्रमपूर्वक कार्य करो ॥ ६-७॥ आयुष्मन् साहसं कर्तुमुद्यतोऽसि नृपोत्तम ॥ ८ ॥ स्थिते भीष्मे जरासंधे बाह्लीके च नृपोत्तमे । किं च वीरेषु सर्वेषु यादवेषु नृपोत्तम ॥ ९ ॥ 'आयुष्मन् ! नृपश्रेष्ठ ! भीष्म, जरासंध, नृपशिरोमणि बाह्लीक तथा समस्त यादव वीरोंके रहते हुए तुम दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेके लिये उद्यत हुए हो ॥ ८-९ ॥ भीष्मो हि बलवान् वृद्धः सत्यसंधो जितेन्द्रियः॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं यो जिगाय भृगूत्तमः ॥ १० ॥ तं युद्धे जितवान् भीष्मः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । 'भीष्मजी बलवान्, वृद्ध, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। जिन भृगुकुलतिलक परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीपर विजय पायी है, उन्हें भीष्मने सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते युद्धमें जीत लिया था ॥१०॥ जरासंधस्य यद् वीर्यं तद् भवान् वेत्ति संयुगे ॥ ११ ॥ वृष्णीवीरास्तु ते सर्वे कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । तत्र कृष्णो हृषीकेशो जितशत्रुः कृती सदा ॥ १२ ॥ 'जरासंधका युद्धमें जो पराक्रम है, उसे तुम अच्छी तरह जानते हो। समस्त वृष्णिवंशी वीर भी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं। उनमें जो भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे सबकी इन्द्रियोंके नियन्ता, शत्रुविजयी तथा सदा ही रणकुशल हैं ॥ ११-१२ ॥ जरासंधेन सहितः सदा युद्धे जितश्रमः । प्रमुखे तस्य न स्थातुं शक्तो जीवन् नृपोत्तमः ॥ १३ ॥ 'जरासंधके साथ सदा युद्ध करके उन्होंने परिश्रमको जीत लिया है। कोई भी श्रेष्ठ नरेश उनके सामने जीते-जी नहीं ठहर सकता ॥ १३ ॥' बलभद्रस्तथा मत्तः क्रुद्धो यदि भवेद् बली ॥ लोकानिमान् समाहर्तुं शक्नोतीति मतिर्मम ॥ १४ ॥ 'बलवान् बलभद्रजी बलके मदसे उन्मत्त रहते हैं, वे यदि कुपित हो जायें तो अकेले ही इन तीनों लोकोंका संहार कर सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १४ ॥ तथा च सात्यकिर्वीरः शक्तो जेतुं रणे रिपून् । तथान्ये यादवाः सर्वे कृष्णमाश्रित्य दंशिताः ॥ १५ ॥ 'इसी तरह वीर सात्यकि भी रणभूमिमें शत्रुओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं। अन्य सब यादव भी श्रीकृष्णका आश्रय लेकर सदा युद्धके लिये कवच बाँधे रहते हैं ॥ १५ ॥ अस्माभिश्च कृतः पूर्वं विरोधो यतिभिः सह । दुर्वासा यतिभिः सार्धं गतो द्रष्टुंस केशवम् ॥ १६ ॥ 'हमलोगोंने पहले यतियोंके साथ विरोध किया था। उन सब यतियोंके साथ दुर्वासा मुनि भगवान् श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये गये हैं ॥ १६ ॥ इति श्रुतं नृपश्रेष्ठ ब्राह्मणाद् भोक्तुमागतात् । तथा सति यथा सिद्ध्येत् तथा चिन्त्यं चमन्त्रिभिः॥१७॥ ततः पश्चाद् विधास्यामो राजसूयं महाक्रतुम् । 'नृपश्रेष्ठ ! यह बात मैंने अपने घर भोजन करनेके लिये आये हुए एक ब्राह्मणसे सुनी है। ऐसी अवस्थामें जिस प्रकार अपना कार्य सिद्ध हो, उस उपायका मन्त्रियोंके साथ विचार करना चाहिये। इसके बाद हम राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे' ॥ १७॥
हंस उवाच को नाम भीष्मो मन्दात्मा वृद्धो हीनबलः सदा ॥ १८ ॥ आवयोः पुरतः स्थातुं शक्तः स किल वृद्धकः । हंस बोला—मन्दबुद्धि बूढ़ा और सदाका बलहीन भीष्म कौन-सा वीर है ? क्या वह बूढ़ा हम दोनोंके सामने ठहर सकता है ॥ १८॥ यादवा इति चित्रं नः शक्ताः स्थातुं रणे द्विज ॥ १९ ॥ कश्च कृष्णः पुरः स्थातुं बलदेवश्च मत्तकः । शैनेयश्चापि विप्रेन्द्र स्थातुं न इति चिन्तय ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! युद्धमे यादव हमारे सामने ठहर सकते हैं, यह तुम्हारी बात भी विचित्र ही है। वह कृष्ण और मतवाला बलभद्र भी कौन ऐसे वीर हैं, जो हमारे सामने ठहर सकें। विप्रवर ! तुम यह निश्चय समझो कि सात्यकि भी हम दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता ॥ १९-२० ॥