भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1086, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1086

भविष्यपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५९


अनजानमें जो अनुचित बात कह दी हो, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ॥ १५ ॥

त्वमेवाहं जगन्नाथ नावयोरन्तरं पृथक्।
अतः क्षमस्व भगवन् क्षमासारा हि साधवः ॥ १६ ॥
'जगन्नाथ ! मैं आपका ही स्वरूप हूँ। हम दोनोंमें कोई भेद या पार्थक्य नहीं है। अतः भगवन्! आप मुझे क्षमा करें; क्योंकि साधुपुरुषोंका सारतत्त्व क्षमा ही है' ॥ १६ ॥

श्रीभगवानुवाच
क्षन्तव्यं भवता विप्र क्षमासारा वयं सदा।
संन्यासिनः क्षमासाराः क्षमा तेषां परं बलम् ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् बोले—विप्रवर ! क्षमा तो आपको करनी चाहिये। हमलोग तो सदा आप महापुरुषोंकी ही क्षमाका आश्रय लेनेवाले हैं। संन्यासियोंका सारतत्त्व क्षमा ही है। क्षमा ही उनका उत्तम बल है ॥ १७ ॥

क्षमा मोक्षकरी नित्यं तत्त्वज्ञानमिव द्विज।
क्षमा धर्मः क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा यशः ॥ १८ ॥
क्षमा स्वर्गस्य सोपानमिति वेदविदो विदुः।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन क्षमां पालयत स्वकाम् ॥ १९ ॥
ब्रह्मन् ! क्षमा तत्त्वज्ञानकी भाँति सदा ही मोक्ष प्रदान करनेवाली है। क्षमा धर्म, क्षमा सत्य, क्षमा दान और क्षमा यश है। वेदज्ञ पुरुष ऐसा मानते हैं कि क्षमा ही स्वर्गकी सीढ़ी है। अतः आपलोग पूरा प्रयत्न करके अपने क्षमा-धर्मका पालन करें ॥ १८-१९ ॥

प्रत्यक्षज्ञानसंयुक्ता यूयं सर्वे यतीश्वराः।
य एते यतयो विप्राः पूजनीया मयाद्य वै ॥ २० ॥
भोक्तव्या यतयो विप्रा भिक्षुकाः सर्व एव हि।
यतीश्वरो ! आप सब लोग प्रत्यक्ष ज्ञानसे संयुक्त हैं। यहाँ जो यति-ब्राह्मण पधारे हैं, उन सबका आज मुझे पूजन करना है। यतिधर्ममें तत्पर रहनेवाले इन सभी भिक्षु ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना है ॥ २०½ ॥

तथेति ते प्रतिज्ञाय भोक्तुमैच्छन् हरेर्गृहे ॥ २१ ॥
ततः स्वभवनं विष्णुः प्रविश्य हरिरीश्वरः।
चतुर्विधं तथाऽऽहारं कारयित्वा यथाविधि ॥ २२ ॥
भोजयामास तान् सर्वान् यतीन् यतिवरार्चितः।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन सबने भगवान्‌के भवनमें भिक्षा ग्रहण करनेका विचार किया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु हरिने अपने भवनके भीतर प्रवेश करके विधिपूर्वक चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार करायी और उन समस्त यतियोंको भोजन कराया। उस समय यतिश्रेष्ठ दुर्वासाने श्रीकृष्णका सम्मान किया ॥ २१-२२½ ॥

छित्त्वा छित्त्वा च देवेशो दुकूलानि मृदूनि सः ॥ २३ ॥
ददौ तेभ्यस्तदा विष्णुः सर्वेभ्यो जनमेजय।
ते च प्रीता यथायोगं यथापूर्वं ततो गताः ॥ २४ ॥
जनमेजय ! देवेश्वर श्रीकृष्णने उस समय कोमल वस्त्र फाड़-फाड़कर उन सब संन्यासियोंके लिये कौपीन आदि बनानेके लिये दिया वे उन्हें पूर्ववत् यथायोग्य पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सब लोग वहाँसे चले गये ॥ २३-२४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने यतिभोजने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें यतियोंका भोजनविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥


त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना

वैशम्पायन उवाच
दुर्वासास्त्वथ तत्रैव नारदेन महात्मना।
चिन्तयन् ब्रह्मतत्त्वं च विजहार यथासुखम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दुर्वासा मुनि वहाँ महात्मा नारदजीके साथ ब्रह्मतत्त्वका चिन्तन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करने लगे ॥ १ ॥

भगवानपि गोविन्दस्तयोर्वासममन्यत।
ततस्तौ हंसडिम्भकौ तस्मिन् काले महीपतिम् ॥ २ ॥
ब्रह्मदत्तं महीपालं पितरं वीर्यशालिनम्।
प्रावोचतामिदं वाक्यं समन्ताज्जनसंसदि ॥ ३ ॥
भगवान् गोविन्दने भी वहाँ उन दोनोंको रहनेकी अनुमति दे दी। तदनन्तर दोनों भाई हंस और डिम्भक उस समय अपने पराक्रमशाली पिता महाराज ब्रह्मदत्तके पास जाकर सब ओरसे भरे हुए दरबारमें उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥

राजसूयं महायज्ञं पितः कुरु सुयत्नतः।


१. खाने, पीने, चाटने और चूसनेके भेदसे चार प्रकारकी भोजन-सामग्री होती है।

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