भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1085

१०५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमाप्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना

वैशम्पायन उवाच
यतेर्वचनमाकर्ण्य मन्दमुच्छ्वस्य केशवः।
दुर्वाससं समालोक्य बभाषे यादवेश्वरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यतिका यह वचन सुनकर यादवेश्वर श्रीकृष्णने धीरेसे उच्छ्वास लेकर दुर्वासाकी ओर देखा और इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १ ॥

क्षन्तव्यं भवता सर्वं दोष एव ममैव हि।
शृणु वाक्यं ममैतत् तु श्रुत्वा शान्तिपरो भव ॥ २ ॥

'भगवन् ! अब जो कुछ हो गया, उस सबके लिये आप क्षमा करें; वास्तवमें यह मेरा ही दोष है। आप मेरी यह बात सुनें और सुनकर शान्त हो जायें ॥ २ ॥

जेष्यामि तौ रणे विप्र हंसं डिम्भकमेव च।
गिरीशो वा वरं दद्याच्छक्रो वा धनदोऽपि वा ॥ ३ ॥
यमो वा वरुणो वापि ब्रह्मा वाथ चतुर्मुखः।
सबलो सानुजौ हत्वा पुनर्दास्यामि वो रतिम् ॥ ४ ॥

'विप्रवर ! मैं हंस और डिम्भकको युद्धमें पराजित करूँगा। उन्हें भगवान् शङ्कर, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा कोई भी वर क्यों न दे, मैं सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित उन दोनोंका वध करके पुनः आप-लोगोंको प्रसन्नता प्रदान करूँगा ॥ ३-४ ॥

सत्येनैव शपाम्यद्य मा रोषवशगो भव।
रक्षां वोऽहं करिष्यामि हत्वा तौ च नृपाधमौ ॥ ५ ॥

'आज मैं सत्यकी ही शपथ लेकर कहता हूँ कि आप रोषके वशीभूत न होइये। मैं उन दोनों नीच नरेशोंका वध करके आपलोगोंकी रक्षा करूँगा ॥ ५ ॥

जानामि तौ दुरात्मानौ युष्मद्दोषकरौ हि तौ।
श्रुतं च पूर्वमस्माभिस्तीक्ष्णदण्डधराविति ॥ ६ ॥
अत्यन्तबलिनौ मत्तौ गिरीशवरदर्पितौ।
नाल्पप्रयत्नसंसाध्यौ जरासंधहितैषिणौ ॥ ७ ॥

'मैं उन दोनों दुरात्माओंको जानता हूँ, उन्हीं दोनोंने आपलोगोंका अपराध किया है। मैंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वे दोनों कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान् और मदमत्त हैं। भगवान् शङ्करका वर पानेसे उनका घमंड बढ़ा हुआ है। थोड़े-से प्रयत्नद्वारा उन्हें वशमें नहीं किया जा सकता। वे जरासंधके हितैषी हैं ॥ ६-७ ॥'

प्राणानपि तयो राजा दास्यत्येव न संशयः।
जरासंधो न भूपालो विना तौ जयते महीम् ॥ ८ ॥

'इसमें संदेह नहीं कि राजा जरासंध उन दोनोंके लिये अपने प्राण भी दे डालेगा; क्योंकि उन दोनोंके बिना राजा जरासंध इस पृथ्वीपर विजय नहीं पा सकता ॥ ८ ॥

जये तयोर्विप्रवर्य तत्र श्रेयो भवेत् ततः।
यत्र यत्र तु तौ गत्वा स्थितावित्यनुशुश्रुम ॥ ९ ॥
तत्र तत्र च हन्ताहं नात्र कार्या विचारणा।

'विप्रवर ! उन दोनोंको पराजित करते समय उन्हें वहाँ जरासंधकी ओरसे श्रेष्ठ सहायता प्राप्त हो सकती है, तो भी वे दोनों जहाँ-जहाँ जाकर खड़े होंगे और इसका समाचार हम सुन लेंगे, वहाँ-वहाँ पहुँचकर मैं उन दोनोंका वध करूँगा, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥

गच्छध्वं यतयः स्वैरं निजकार्यपरायणाः ॥ १० ॥
अचिरेणैव कालेन जेप्यामि रणपुङ्गवौ।

'संन्यासियो ! आपलोग अपने कर्तव्य-पालनमें तत्पर रहकर जहाँ चाहें इच्छानुसार जायें। मैं थोड़े ही समयमें उन रणकुशल वीरोंको परास्त करूँगा' ॥ १० ॥

ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा यादवेश्वरमाह सः ॥ ११ ॥
स्वस्त्यस्तु भवते कृष्ण जगतां स्वस्ति कुर्वते।
किं नु नाम जगन्नाथ दुःसाध्यं तव केशव ॥ १२ ॥

तब प्रेमपूर्वक प्रसन्नचित्त हो दुर्वासाने यादवेश्वर श्रीकृष्णसे कहा—'श्रीकृष्ण ! तीनों लोकोंका कल्याण करने-वाले आपका मङ्गल हो। जगन्नाथ ! केशव ! कौन-सा ऐसा कार्य है, जो आपके लिये दुष्कर हो ॥ ११-१२ ॥

त्रिलोकेश त्रिधामासि सर्वसंहारकारकः।
देवानार्माप देवेशः सर्वत्र समदर्शनः ॥ १३ ॥

'त्रिलोकीनाथ ! आप त्रिधामा हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले हैं, देवताओंके भी देवेश्वर हैं। आपकी सर्वत्र समान दृष्टि है ॥ १३ ॥

विष्णो देव हरे कृष्ण नमस्ते चक्रपाणये।
नमः स्वभावशुद्धाय शुद्धाय नियताय च ॥ १४ ॥

'विष्णो ! देव ! हरे ! कृष्ण ! हाथमें चक्र धारण करने-वाले ! आपको नमस्कार है। आप स्वभावसे शुद्ध हैं, शुद्ध-स्वरूप हैं तथा शौच, संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न एवं सर्वव्यापी हैं ॥ १४ ॥

शब्दगोचर देवेश नमस्ते भक्तवत्सल।
अज्ञानादथवा ज्ञानाद् यन्मयोक्तं क्षमस्व तत् ॥ १५ ॥

'देवेश्वर ! आप ही वैदिक शब्दोंके चरम तात्पर्य हैं। भक्तवत्सल ! आपको मेरा नमस्कार है। मैंने जानकर अथवा