भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1084

भविष्यपर्व ] एकादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५७


सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो! विष्णो! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं॥ ५६$\frac{१}{२}$॥

कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ ॥ ५७॥
नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन।
गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताचिति केशव ॥ ५८॥

‘जनार्दन! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं। उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं॥

इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम्।
अयुक्तं बहु भाषन्तौ घर्षयन्तौ च नः सदा ॥ ५९॥

‘वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं॥ ५९॥

इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते।
पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः ॥ ६०॥
शक्यं च दारवं पात्रं द्विदलान् वेणुकांन् बहून् ।

‘देव! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है—देखिये! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं॥ ६०$\frac{१}{२}$॥

इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम् ॥ ६१॥
कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम्।

‘उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है॥ ६१$\frac{१}{२}$॥

कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो ॥ ६२॥
त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः।
चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम् ॥ ६३ ॥

‘जगदीश्वर! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़-फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं, तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी॥


किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभाग्या वयं विभो।
किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते ॥ ६४॥

‘प्रभो! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ? हम सब लोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते! इस समय हम किसकी शरणमें जायें, यह बताइये॥ ६४॥

जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः।
न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः ॥ ६५ ॥

‘यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायेंगे और न शूद्र॥ ६५॥

अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप।
न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः ॥ ६६॥

‘नरेश्वर! वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते॥ ६६॥

न च भीष्मो न वा राजा बाह्लीको भीमविक्रमः।
यो हि वीरो जरासंधः क्षत्रियाणां भयंकरः ॥ ६७॥
नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पिणोः।
तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः ॥ ६८॥

‘न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्लीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण! हरे! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्करके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता॥ ६७-६८॥

तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो।
अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते ॥ ६९॥

‘प्रभो! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा ‘आप रक्षा करते हैं’ यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है॥ ६९॥

बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जगत्त्रयम्।
इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७० ॥

‘यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कीजिये! रक्षा कीजिये!’ ऐसा कहकर क्रोधसे मूच्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये॥ ७०॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासःसमागमे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और दुर्वासाका समागमविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥