विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1083, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०५६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जाता है। प्रभो ! जो विज्ञानसे तृप्त निष्पाप योगी जन हैं, वे भी अपने हृदयकमलमें आपके इसी स्वरूपका दर्शन करते हैं ॥ ३९-४० ॥
वेदैर्यद् गीयते तेजो ब्रह्मेति प्रतिपाद्य वै ।
तदेवेदं विजानेऽहं रूपमैश्वरमेव च ॥ ४१ ॥
'वेदोंद्वारा ब्रह्म कहकर जिस तेजोमय परमतत्त्वका गान किया जाता है, आपका यह ऐश्वर्यशाली रूप वही है (उस परब्रह्मसे अभिन्न ही है), ऐसा मैं जानता हूँ ॥ ४१ ॥
वैष्णवं परमं तेज इति वेदेषु पठ्यते ।
अवगच्छाम्यहं विष्णो तदेवेदं वपुस्तव ॥ ४२ ॥
'विष्णो ! वेदोंमें 'तद्विष्णोः परमं पदम्' इत्यादिरूपसे विष्णुके जिस परम तेजोमय तत्त्वका प्रतिपादन किया जाता है, वही आपका यह स्वरूप है—यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ४२ ॥
य ओमित्युच्यते शब्दो यस्य वागिति गीयते ।
स एवासि प्रभो विष्णो न जाने इति मा वद ॥ ४३ ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जिस ॐ शब्दका उच्चारण होता है, वह जिनकी वाणीके रूपमें गाया जाता है, वे ही परमात्मा आप हैं; अतः आप यह न कहिये कि मैं आपके आनेका कारण नहीं जानता ॥ ४३ ॥
परोक्षं यदि किंचित् स्यात् तव वक्तुं प्रयुज्यते ।
न जाने इति गोविन्द मा वादीः साहसं हरे ॥ ४४ ॥
'गोविन्द ! हरे ! यदि आपके लिये कोई भी वस्तु परोक्ष होती तो आपका ऐसा कहना उचित हो सकता था; अतः 'मैं नहीं जानता' यह साहसपूर्ण वचन आप मत कहिये ॥
विश्वं यतः प्रादुरासीद् यस्मिँल्लीनं क्षये सति ।
इदं तदैश्वरं तेजस्त्ववगच्छामि केशव ॥ ४५ ॥
'केशव ! पूर्वकालमें यह विश्व जिससे प्रकट हुआ था और संहारकालमें यह फिर जिसमें लीन हो जायगा, वही आपका यह ईश्वरीय तेजोमय विग्रह है, ऐसा मैं जानता हूँ ॥
कर्ता त्वं भूतभव्येश प्रतिभासि सदा हृदि ।
यद् यद् रूपं स्मरे नित्यं तत् तदेवासि मे हृदि ॥ ४६ ॥
'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी हरे ! आप ही सबके कर्ता हैं और सदा मेरे हृदयमें प्रकाशित होते रहते हैं। मैं जिस-जिस रूपका स्मरण करता हूँ, आप सदा उसी-उसी रूपसे मेरे हृदयमें विद्यमान हैं ॥ ४६ ॥
वायुरेव यदा विष्णुरिति मे धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४७ ॥
'विभो ! जब मेरी बुद्धि ऐसा निश्चय करती है कि वायु भी विष्णु हैं, तब आप वायुरूपसे ही मेरे हृदयमें विराजमान होते हैं ॥ ४७ ॥
आकाशो विष्णुरित्येव कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ४८ ॥
'प्रभो ! जब मेरी बुद्धि कभी इस निश्चयपर पहुँचती है कि आकाश ही विष्णु है, तब आप उसी रूपसे मेरेमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ४८ ॥
पृथिवी विष्णुरित्येतत् कदाचिद्धीयते मतिः ।
तदा पार्थिवरूपस्त्वं प्रतिभासि सदा मम ॥ ४९ ॥
'जब कभी मेरी बुद्धिका यह निश्चय होता है कि 'पृथिवी ही विष्णु है', तब आप सदा मुझे पार्थिवरूप ही प्रतीत होते हैं ॥ ४९ ॥
रसोऽयं देव इत्येव कदाचिच्चिन्त्यते मया ।
तदा रसात्मना विष्णो हृन्मध्ये संस्थितो विभो ॥ ५० ॥
'प्रभो ! विष्णो ! जब कभी मैं यह सोचता हूँ, कि 'यह रस ही नारायणदेव है', तब आप रसरूपसे मेरे हृदयमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ५० ॥
यदा त्वां तेज इत्येवं स्मर्ता स्यां पुरुषोत्तम ।
तदा तद्रूपसम्पन्नः प्रतिभासि सदा हृदि ॥ ५१ ॥
'पुरुषोत्तम ! जब मैं आपका तेजोरूपसे स्मरण करता हूँ, तब आप सदा उसी रूपसे सम्पन्न होकर मेरे हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५१ ॥
चन्द्रमा हरिरित्येवं तदा चान्द्रमसं वपुः ।
निरीक्ष्य चक्षुषा देव ततः प्रीतोऽस्मि केशव ॥ ५२ ॥
'देव ! केशव ! जब मैंने ऐसा निश्चय किया कि 'चन्द्रमा ही श्रीहरि हैं,' तब मैं चन्द्रमाके रूपमें ही आपके स्वरूपका नेत्रोंद्वारा दर्शन करके प्रसन्न होता हूँ ॥ ५२ ॥
यदा सौरं वपुरिति स्मर्ता स्यां जगतीपते ।
तदा तद्भावनावोगात् सूर्य एव विराजसे ॥ ५३ ॥
'पृथ्वीनाथ ! जब मैं ऐसा चिन्तन करता हूँ कि 'यह सूर्यमण्डल ही आपका स्वरूप है,' तब आप मेरी उस भावनाके योगसे सूर्यरूप होकर ही विराजमान होते हैं ॥ ५३ ॥
तस्मात् सर्वं त्वमेवासि निश्चिता मतिरीदृशी ।
अतो न जानेऽहमिति वक्तुं नेशो जनार्दन ॥ ५४ ॥
'अतः सब कुछ आप ही हैं, यह मेरी बुद्धिका निश्चय है; इसलिये जनार्दन ! आप यह नहीं कह सकते कि 'मैं आपलोगोंके आनेका कारण नहीं जानता' ॥ ५४ ॥
इत्यर्थे संस्थितो विष्णो पीडां नो नैव चिन्तयेः ।
अत्यन्तदुःखिता विष्णो वयं त्वामनुसंस्थिताः ॥ ५५ ॥
'विष्णो ! इस सिद्धान्तमें प्रतिष्ठित होकर भी आप हमारी पीड़ाका कुछ विचार नहीं कर रहे हैं। भगवन् ! हम अत्यन्त दुःखित होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ५५ ॥
ईदृशीमवस्था नो नेतां स्मरसि केशव ।
एतत् पुनर्भाग्यमतो नष्टमित्येव चिन्तये ॥ ५६ ॥
मन्दभाग्या वयं विष्णो यतो नो न स्मरेः प्रभो ।
'केशव ! हमारी तो ऐसी दुर्दशा हो रही है और आप इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते हैं; इससे हम बार-बार यही