विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भविष्यपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः १०६३
'ऐसी दशामें मेरा कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह मित्रता ही मुझसे ऐसा कार्य कराती है। मैं जो घोर बात कहनेके लिये उद्यत हुआ हूँ, उसके लिये भगवान् विष्णु सर्वथा मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥
द्रक्ष्याम्यहं जगन्नाथं नीलकुञ्चितमूर्धजम्।
कम्बुग्रीवधरं विष्णुं श्रीवत्साच्छादितोरसम्॥ २३॥
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और रक्षक हैं, जिनके सिर-पर काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो शङ्खके समान ग्रीवा धारण करते हैं तथा जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स-चिह्नसे आच्छादित है, उन भगवान् विष्णुका मैं दर्शन करूँगा ॥
स्फुरत्पद्ममहाबाहुं रत्नच्छायाविराजितम्।
द्रक्ष्यामि केशवं विष्णुं चक्रिणं यादवेश्वरम् ॥ २४॥
'जिनकी विशाल भुजाओंमें पद्मरागमणिके आभूषण शोभा पाते हैं तथा जो कौस्तुभ आदि रत्नोंकी कान्तिसे प्रकाशित होते हैं, उन सर्वव्यापी, चक्रधारी, यादवेश्वर श्रीकृष्णका मैं दर्शन करूँगा ॥ २४॥
अचिन्त्यविभवं देवं भूतभव्यभवत्प्रभुम्।
आत्मेच्छया जगद्रक्षं द्रक्ष्यामि जलशायिनम्॥ २५॥
'जिनका वैभव अचिन्त्य है, जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, जो अपनी ही इच्छासे जगत्की रक्षामें तत्पर रहते हैं, उन एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीनारायण-देवका मैं दर्शन करूँगा ॥ २५ ॥
कृतार्थः सर्वथा चाहं भवामि विगतज्वरः।
अद्य मे सफलं जन्म साक्षाद् दृष्टवतो हरिम् ॥ २६॥
'उनका दर्शन करके मैं सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा। मेरी सारी चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ दूर हो जायँगी। आज श्रीहरिका साक्षात् दर्शन कर लेनेपर मेरा जन्म सफल हो जायगा ॥२६॥
अद्य मे सफला यज्ञाः साक्षात्कृतवतो हरिम्।
नेत्रे मे सफले विष्णुं पश्यतश्च जगन्मयम् ॥ २७॥
'आज श्रीहरिका साक्षात्कार करनेपर मेरे यज्ञ सफल हो जायेंगे। जगन्मय विष्णुका दर्शन करनेसे मेरे दोनों नेत्र भी सफल हो जायेंगे ॥ २७ ॥
प्रीतिमानस्तु मे विष्णुर्वक्तुर्घोरस्य कर्मणः।
उन्मिषन्नेत्रयुग्मेन द्रक्ष्यामि सकृदीश्वरम् ॥ २८॥
'मैं भयंकर कर्मके लिये प्रस्ताव करनेवाला हूँ। उस समय भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न रहें। क्या मैं अपनी खुली हुई दोनों आँखोंसे एक बार उन जगदीश्वरका दर्शन करूँगा ॥ २८ ॥
आमूलमसकृद् विष्णुं पश्यामि च पुनः पुनः।
पिवामि नेत्रयुग्मेन वपुः कृष्णस्य केवलम् ॥ २९॥
'मैं नीचेसे ऊपरतक बारंबार भगवान् विष्णुका दर्शन करूँगा, दोनों नेत्रोंसे केवल श्रीकृष्णके शरीरकी रूपमाधुरीका पान करूँगा ॥ २९ ॥
धारयिष्याम्यहं पांसुं तत्पादप्रभवं शिवम्।
ततः कृतार्थतां यास्ये स्वर्गमार्गो हि तद्रजः ॥ ३० ॥
'तदनन्तर उनके चरणोंसे प्रकट हुई कल्याणमयी धूल-को सिरपर धारण करूँगा। ऐसा करके कृतार्थ हो जाऊँगा, क्योंकि उनकी चरणरज स्वर्गका सोपान है ॥ ३० ॥
मेघगम्भीरनिर्घोषं श्रोष्यामि च हरेः स्वरम्।
पादाब्जं चक्रिणो विष्णोः पश्यामि च जगत्पतेः ॥ ३१ ॥
'मैं श्रीहरिके मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान स्वरको सुनूँगा और चक्रधारी जगदीश्वर विष्णुके चरणारविन्दका दर्शन करूँगा ॥
पश्यामि च हरेर्वक्त्रं पूर्णेन्दुसदृशप्रभम्।
हरेरिदं जगद् रूपं पश्यामीव च सर्वतः ॥ ३२ ॥
प्रसीदतु सदा विष्णुरयुक्तं वक्तुमिच्छतः।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान जो श्रीकृष्णका मनोहर मुख है, उसका अवलोकन करूँगा। यह सारा जगत् श्रीहरिका ही रूप है, इस रूपमें मैं सब ओर उन्हींका दर्शन-सा कर रहा हूँ। अनुचित बात कहनेकी इच्छावाले मुझ सेवकके ऊपर भगवान् विष्णु सदा प्रसन्न रहें ॥ ३२३ ॥
आलोलकुण्डलयुतं हरिचन्दनचर्चितम् ॥ ३३॥
स्फुरत्केयूररत्नार्चिर्बाहुद्वयविराजितम् ।
सव्ये द्योतन्महाशङ्खं रश्मिजालविराजितम् ॥ ३४॥
प्रोग्रभास्करवर्णाभं चक्रज्वालाविराजितम्।
प्रोज्ज्वलत्कङ्कणयुतं तप्तजाम्बूनदाङ्गदम् ॥ ३५॥
पीतकौशेयवसनं विस्तीर्णोरस्कमच्युतम्।
कदा द्रक्ष्यामि देवेशमिदानीमथवान्यदा ॥ ३६॥
'जिनके कानोंमें हिलते हुए कुण्डल जगमगा रहे हैं, जो हरिचन्दनसे चर्चित हैं, चमकीले बाजूबंदोंमें जड़े गये रत्नोंकी प्रभासे उद्भासित दोनों भुजाओंसे जिनकी विशेष शोभा होती है, जिनके बायें हाथमें महान् पाञ्चजन्य शङ्ख देदीप्यमान है, जो किरणजालसे प्रकाशित हैं, उदयकालके सूर्यके समान जिनकी सुनहरी कान्ति शोभा पाती है, जो सुदर्शनचक्रकी ज्वालामालाओंसे उद्भासित है, जिनके हाथोंमें जगमगाते हुए कङ्कण तथा तपे हुए सुवर्णके बने बाजूबंद शोभा पाते हैं, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं तथा जिनकी छाती चौड़ी है, उन देवेश्वर अच्युतका मैं इस समय अथवा दूसरे समयमें कब दर्शन करूँगा ॥ ३३-३६॥
सर्वथा कृतकृत्योऽहं यद्वपुर्द्रष्टुमुद्यतः।
नमो मह्यं नमो मह्यं यतो द्रष्टुमहं हरिम् ॥ ३७॥
'मैं सर्वथा कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आज मैं श्रीहरिके साक्षात् शरीरका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। मैं श्रीहरिका दर्शन करनेको कटिबद्ध हूँ, इसलिये मुझे नमस्कार है ! मुझे नमस्कार है ! ॥ ३७ ॥
उद्यतोऽस्मि जगन्नाथं बलभद्रकृतास्पदम्।
द्रक्ष्याम्यवद्यमद्यैव जिष्णुं विष्णुं जगद्गुरुम् ॥ ३८॥
| १०६४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [हरिवंशे |
|---|
‘शेषस्वरूप बलभद्रपर शयन करनेवाले जगदीश्वर श्रीकृष्णके दर्शनके लिये आज मैं उद्यत हूँ। उन विजयशील सर्वव्यापी जगद्गुरु श्रीकृष्णका अवश्य आज ही मैं दर्शन करूँगा ॥ ३८ ॥’
श्रीकौस्तुभोज्ज्वलरुचि स्फुरितोरुवक्षः पीताम्बरं मकरकुण्डलपङ्कजाक्षम् । कृष्णं किरीटवरचक्रगदोर्ध्वहस्तं तेजोमयं मम हरेर्वपुरस्तु भूत्यै ॥ ३९ ॥
‘जो श्रीकौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित है, जिसका विशाल वक्षःस्थल उसी कौस्तुभ एवं श्रीवत्सकी शोभासे उदीप्त हो रहा है, जिसने पीताम्बर धारण कर रखा है, जो मकराकार कुण्डल तथा कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित है, जिसके मस्तकपर उत्तम किरीट और ऊपर उठे हुए हाथोंमें चक्र एवं गदा विराजमान हैं, श्रीहरिका वह श्यामवर्णमय तेजस्वी विग्रह मेरा कल्याण करनेवाला हो ॥ ३९ ॥
वेदोदधौ विशदशास्त्रमहाहियोगे निष्णातशुद्धमतिमन्दरमथ्यमाने । उद्योतमानममरैरनिशं निषेव्यं नारायणाख्यममृतं प्रपिवामि चाद्य ॥ ४० ॥
‘विशद शास्त्ररूपी महान् सर्प (वासुकि) से जुड़े हुए निष्णात शुद्धबुद्धिरूपी मन्दराचलद्वारा मथे जानेवाले वेदरूपी समुद्रसे जिसका प्राकट्य हुआ है तथा अमरगण निरन्तर जिसका सेवन करते हैं, उस नारायण नामक' अमृतका आज मैं अपने नेत्रोंद्वारा पान करूँगा ॥ ४० ॥’
ध्येयं मुमुक्षुभिरमेयमनाद्यनन्तं स्थूलं सुसूक्ष्मतरमेकमनेकमाद्यम् । ज्योतिस्त्रिलोकजनकं त्रिदशैकवन्द्य- मक्ष्णोर्ममास्तु सततं हृदयेऽच्युताख्यम् ॥ ४१ ॥
‘जो मुमुक्षुओंके द्वारा चिन्तन करनेके योग्य, अप्रमेय, अनादि, अनन्त, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, एक, अनेक, आद्य, त्रिभुवनका जनक तथा देवताओंद्वारा एकमात्र वन्दनीय है, वह अच्युत नामक तेज सदा मेरे नेत्रोंके समक्ष और हृदयमें प्रकाशित होता रहे' ॥ ४१ ॥
चिन्तयन्निति विप्रेन्द्रो ययौ द्वारवतीं पुरीम् । मत्वा कृतार्थमात्मानं वाहयन् हयमुत्तमम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सोचते हुए विप्रवर जनार्दन अपनेको कृतार्थ मानकर उस उत्तम अश्वको हाँकते हुए द्वारकापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने विप्रस्य द्वारवतीगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणका द्वारकागमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका सुधर्मा सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवन-पूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना
वैशम्पायन उवाच
स निवेदितसर्वस्वो द्वाःस्थेन हि जनार्दनः । अथ प्रविश्य धर्मात्मा सुधर्मां वै द्विजोत्तमः ॥ १ ॥ अपश्यद् देवदेवेशं सुधर्माकृतिसंस्थितम् । बलभद्रेण संयुक्तमध्यासितमहासनम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उन द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा जनार्दनने द्वारपालकी सहायतासे सुधर्मा-सभामें प्रवेश करके देवदेवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो वहाँ उत्तम धर्ममय स्वरूपसे विराजमान थे और बलभद्रजीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे ॥ १-२ ॥
अग्रतः स्थितशैनेयं पार्श्वतः स्थितनारदम् । दुर्वाससा कृतकथमुग्रसेनपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥
उनके सामने सात्यकि खड़े थे तथा उनके पार्श्वभागमें नारदजी विराजमान थे। भगवान् श्रीकृष्ण दुर्वासा मुनिसे बातचीत कर रहे थे। राजा उग्रसेन उनके सामने थे ॥ ३ ॥
गायद्गन्धर्वमुख्यैश्च नृत्यदप्सरसां गणैः । सेव्यमानं महाराज सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४ ॥
महाराज ! गाते हुए मुख्य-मुख्य गन्धर्व, नाचती हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ तथा सूत, मागध एवं वन्दीजन योग्यतानुसार उनकी सेवा कर रहे थे ॥ ४ ॥
उद्गीयमानयशसं माधवं मधुसूदनम् । उद्गीयमानं विप्रैश्च सामभिः सामगैर्हरिम् ॥ ५ ॥
वहाँ माधव मधुसूदनके यशका उच्चस्वरसे गान हो रहा था तथा सामगान करनेवाले ब्राह्मण भी साममन्त्रोंद्वारा श्रीहरिका गुणगान करते थे ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा प्रीतमना विष्णुं प्रोद्भूतपुलकच्छविः । नाम्ना जनार्दनोऽस्मीति ननाम चरणौ हरेः ॥ ६ ॥ बलभद्रं ततो देवं ववन्दे शिरसा द्विजः । दूतोऽस्मि देवदेवेश हंसस्य डिम्भकस्य च ।
भविष्यपर्व ] पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः १०६५
भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर जनार्दनका मन प्रसन्न हो गया। अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। 'मैं जनार्दन हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण जनार्दनने भगवान् बलभद्रको मस्तक झुकाया और श्रीकृष्णसे कहा— 'देवदेवेश्वर ! मैं हंस और डिम्भकका दूत हूँ' ॥ ६३ ॥
इति ब्रुवाणं विप्रेन्द्रमिदमाह स माधवः ॥ ७ ॥
आस्स्वेदं विष्टरं पूर्वं पश्चाद् ब्रूहि प्रयोजनम् ।
तथेति चाब्रवीद् विप्रो महदासनमास्थितः ॥ ८ ॥
इस तरह कहते हुए विप्रवर जनार्दनसे भगवान् श्रीकृष्ण बोले— 'ब्रह्मन् ! पहले आप इस आसनपर बैठिये, इसके बाद अपने आगमनका प्रयोजन बताइये।' तब ब्राह्मणने 'बहुत अच्छा' कहा और वे एक महान् आसनपर विराजमान हुए ॥ ७-८ ॥
वाचा सम्पूज्य विप्रेन्द्रमपृच्छत् कुशलं हरिः।
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ९ ॥
राजेन्द्र ! भगवान् श्रीकृष्णने वाणीद्वारा विप्रवर जनार्दनका स्वागत-सत्कार करके फिर उनसे ब्रह्मदत्त, हंस और डिम्भकका कुशल-समाचार पूछा ॥ ९ ॥
श्रुतं चापि तयोर्वीर्यं प्रयोजनमतो द्विज ।
अपि वा कुशलं विप्र पितुस्तव जनार्दन ॥ १० ॥
वे बोले— 'विप्र जनार्दन ! मैंने हंस और डिम्भकका पराक्रम और प्रयोजन पहलेसे सुन रखा है। तुम्हारे पिताजी तो कुशलपूर्वक हैं न ?' ॥ १० ॥
जनार्दन उवाच
कुशलं ब्रह्मदत्तस्य पितुश्च मम केशव ।
तयोरेव जगन्नाथ हंसस्य डिम्भकस्य च ॥ ११ ॥
जनार्दनने कहा— केशव ! राजा ब्रह्मदत्त और मेरे पिताजी सकुशल हैं। जगन्नाथ ! दोनों भाई हंस और डिम्भक भी कुशलसे ही हैं ॥ ११ ॥
श्रीभगवानुवाच
किमाहतुर्महीपालौ तौ हंसडिम्भकौ नृपौ ।
ब्रूहि सर्वमशेषेण नात्र शङ्का द्विजोत्तम ॥ १२ ॥
श्रीभगवान् बोले— द्विजश्रेष्ठ ! राजा हंस और डिम्भकने क्या संदेश दिया है ? आप सारी बातें विस्तारपूर्वक बतावें। इसके लिये आपके मनमें कोई शङ्का नहीं होनी चाहिये ॥ १२ ॥
वाच्यं वाप्यथवावाच्यं कर्तव्यमथ चेतरत् ।
श्रुत्वा तस्य विधास्यामो युक्तरूपं द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
विप्रवर ! उन्होंने जो कुछ कहा हो, वह कहने योग्य हो या न कहने योग्य हो, करने योग्य हो या न करने योग्य हो, उसे पूरा-पूरा सुनकर हमलोग उसका उचित उत्तर देंगे ॥
दूतोऽसि सर्वथा विप्र न वाच्यावाच्यकल्पना ।
यत् कर्मकारनिर्दिष्टं तद् वाच्यं दूतजन्मना ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् ! आप दूत हैं। आपके लिये वाच्य और अवाच्यका विचार सर्वथा अनावश्यक है। भेजनेवालेने जो कुछ जैसे कहा हो, दूतको वह सब उसी प्रकार कहना चाहिये ॥ १४॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या वक्तव्यस्येतरस्य च ।
अतो वद यथा प्रोक्तं ताभ्यामिह जनार्दन ॥ १५ ॥
जनार्दनजी ! आपको वाच्य और अवाच्यकी शङ्का नहीं करनी चाहिये। अतः हंस और डिम्भकने जैसा कहा है, वैसा ही यहाँ कहिये ॥ १५ ॥
केशवेनैवमुक्तस्तु प्रोवाच स जनार्दनः ।
अजानन्निव किं ब्रूषे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ १६ ॥
भगवान् केशवके ऐसा कहनेपर जनार्दन बोले— 'भगवन् ! आप अनजानकी भाँति क्यों बात कर रहे हैं ? आप तो सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं ॥ १६॥
न चास्ति ते परोक्षं तु जगद्वृत्तान्तमच्युत ।
सर्वं हि मनसा पश्यन् किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ १७ ॥
'अच्युत ! जगत्का कोई भी वृत्तान्त आपकी आँखोंसे ओझल नहीं है। आप अपने मनसे सब कुछ देखते हुए भी मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ १७ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे विष्णुस्त्वमेव जगतीपते ।
इच्छया सर्वमाप्नोषि दृष्टादृष्टविवेचनम् ॥ १८ ॥
'पृथ्वीनाथ ! विद्वान् पुरुष आपको ही विष्णु कहते हैं। आप इच्छा करते ही दृष्ट और अदृष्ट वस्तुका पूर्ण विवेक प्राप्त कर लेते हैं ॥ १८ ॥
त्वमेवेदं जगत् सर्वं जगच्च त्वयि तिष्ठति ।
न त्वया रहितो ह्येकः पदार्थः सचराचरः ॥ १९ ॥
'आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं, आपमें ही इस जगत्की स्थिति है। एक भी ऐसा कोई चर या अचर पदार्थ नहीं है, जो आपसे रहित हो ॥ १९ ॥
नास्ति किंचिदवेद्यं ते सर्वगोऽसि जगत्पते ।
त्वमिन्द्रः सर्वभूतानां रुद्रः संहारकर्मकृत् ॥ २० ॥
'जगदीश्वर ! आप सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापी हैं, आपके लिये कुछ भी अज्ञेय नहीं है। आप ही समस्त भूतोंके इन्द्र हैं और आप ही संहार कर्म करनेवाले रुद्र हैं ॥ २० ॥
रक्षितासि सदा विष्णुः सर्वलोकस्य माधव ।
संसारस्य भवान् स्रष्टा किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २१ ॥
'माधव ! सदा सम्पूर्ण लोककी रक्षा करनेवाले विष्णु आप ही हैं। आप ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हैं। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम बताओ' ॥ २१ ॥
विद्वद्भिर्गीयसे नित्यं ज्ञानात्मेति च माधव ।
प्राणं प्राणविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥
'माधव ! विद्वान् पुरुष सदा आपको ही ज्ञानात्मा कहते
१०६६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [हरिवंशे
हैं। पुरुषोत्तम ! प्राणवेत्ता पुरुष आपको ही प्राण कहते हैं ॥
शब्दं शब्दविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ।
तथा सति हृषीकेश किं त्वमात्थ वदेति माम् ॥ २३ ॥
'पुरुषोत्तम ! शब्दशास्त्रके ज्ञाता वैयाकरण आपको ही शब्द कहते हैं । हृषीकेश ! ऐसी दशामें आप मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम अपने राजाका संदेश कहो' ॥ २३ ॥
तथापि शृणु देवेश चोदितोऽस्मि यतस्त्वया ।
वदेत्यसकृदेवैतत् तस्माद् वक्ष्यामि माधव ॥ २४ ॥
'देवेश्वर माधव ! तथापि सुनिये । आपने मुझे बारंबार कहनेके लिये प्रेरित किया है । इसलिये मैं कहूँगा ॥ २४ ॥
राजसूयेन यज्ञेन ब्रह्मदत्तोऽद्य यक्ष्यते ।
तदर्थं प्रेषितस्ताभ्यां हंसेन डिम्भकेन च ॥ २५ ॥
'भगवन् ! राजा ब्रह्मदत्त अब राजसूय यज्ञ करेंगे । उसीके लिये हंस और डिम्भकने मुझे आपके पास भेजा है ॥
करार्थं यदुमुख्येभ्यस्त्व चामन्त्रणाय हि ।
लवणं बहु देयं ते यज्ञार्थं तस्य केशव ॥ २६ ॥
'उसने मुख्य-मुख्य यादवोंसे कर लेने और आपको आमन्त्रित करनेके लिये मुझे यहाँतक आनेके लिये विवश किया है । केशव ! आपको उसके यज्ञके लिये बहुत-सा नमक देना है ॥ २६ ॥
इत्यर्थं प्रेषितस्ताभ्यां करं देहि तदाज्ञया ।
इदं त्वमपरं ताभ्यामुक्तं शृणु जगत्पते ॥ २७ ॥
'जगत्पते ! उन दोनोंने इसीलिये मुझे यहाँ भेजा है कि आप उनकी आज्ञासे उनके लिये कर दीजिये । उन दोनोंने जो यह दूसरी बात कही है, उसे भी सुन लीजिये ॥ २७ ॥
लवणानि वहन्न्याशु प्रगृह्य त्वरितं भवान् ।
आगच्छतु तयो राज्ञोः सेयं केशव वाग् विभो ॥ २८ ॥
'आप शीघ्र ही बहुत-सा नमक लेकर मेरे यहाँ आइये ।' प्रभो ! केशव ! यही उन दोनों राजाओंका आपके लिये संदेश है' ॥
इत्युक्तवति विप्रेन्द्रे दूते तत्र तयोर्नृप ।
प्रहस्य सुचिरं कृष्णो बभाषे दूतमेश्वरः ॥ २९ ॥
नरेश्वर ! उन दोनोंके दूत विप्रवर जनार्दन जब इस प्रकार कह चुके, तब भगवान् श्रीकृष्णने बहुत देरतक जोर-जोरसे हँसकर उस दूतसे कहा—॥ २९ ॥
शृणु दूत वचो मह्यं युक्तमुक्तं द्विजोत्तम ।
करं दद्यामि ताभ्यां तु करदोऽस्मि यतो नृपः ॥ ३० ॥
'दूत ! द्विजश्रेष्ठ ! तुम मेरी कही हुई यह युक्तियुक्त बात सुनो । मैं उन दोनोंको कर दूंगा; क्योंकि मैं उन्हें कर देने-वाला नरेश हूँ ॥ ३० ॥
धार्ष्ट्यमेतत् तयोर्विप्र मत्तो यस्तु करग्रहः ।
अहो धार्ष्ट्यमहो धार्ष्ट्यं तयोः क्षत्रियबीजयोः ॥ ३१ ॥
'विप्रवर ! मुझसे जो कर लेनेका संकल्प है, यह उन दोनों भाई हंस और डिम्भककी बहुत बड़ी धृष्टता है । अहो ! क्षत्रियके बीजसे उत्पन्न हुए उन दोनोंकी यह कैसी अद्भुत धृष्टता है ! यह कैसी आश्चर्यजनक ढिठाई है ॥ ३१ ॥
इदमश्रुतपूर्वं मे मत्तो यस्तु करग्रहः ।
इत्युक्त्वा केशवो दूतमिदमाह स्म यादवान् ॥ ३२ ॥
'मुझसे कर लेनेकी बात पहले-पहल सुननेमें आयी । इससे पूर्व कभी ऐसी बात नहीं सुनी गयी थी ।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान् केशवने यादवोंसे कहा—॥ ३२ ॥
हास्यमेतद् यदुश्रेष्ठा मत्तो यस्तु करग्रहः ।
यष्टासौ राजसूयस्य ब्रह्मदत्तो महीपतिः ॥ ३३ ॥
तौ तु याजयितारौ हि हंसो डिम्भक एव च ।
वोढा किल यदुश्रेष्ठो लवणस्य दुरात्मनः ॥ ३४ ॥
'यदुवरो ! मुझसे जो कर-ग्रहणकी माँग है, यह कैसी उपहासास्पद बात है ! राजा ब्रह्मदत्त राजसूय यज्ञ करेंगे और इस यज्ञके करानेवाले हैं उन्हींके बेटे हंस और डिम्भक । यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण उस दुरात्माके यहाँ नमक ढोकर ले जायेंगे॥
करदो वासुदेवो हि जितोऽस्मि यदुसत्तमाः ।
हास्यं हास्यमिदं भूयः शृणुध्वं यादवा वचः ॥ ३५ ॥
'यदुश्रेष्ठ वीरो ! मुझ वासुदेवको उसने कर देनेवाला कह दिया, मानो उसने मुझे युद्धमें पराजित कर दिया । यादवो ! यह कितनी हँसीकी बात है, इसे तुमलोग फिर सुनो'॥
इत्युक्तवति देवेशे बलभद्रपुरोगमाः ।
यादवाः सर्व एवैते हासाय समवस्थिताः ॥ ३६ ॥
देवेश्वर श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर बलभद्र आदि समस्त यादव हंस-डिम्भकके उस कथनकी हँसी उड़ानेके लिये खड़े हो गये ॥ ३६ ॥
करदः कृष्ण इत्येवं ब्रुवन्तः सर्वसात्वताः ।
हासं मुमुचुरत्यर्थं तलं दत्त्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
'श्रीकृष्ण कर देनेवाले हैं' ऐसा कहते हुए समस्त यादव परस्पर ताली बजाकर या एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ३७ ॥
तलशब्दो हासशब्दो रोदसी पर्यपूरयत् ।
स च विप्रो नृपश्रेष्ठ निन्दयन् मित्रमात्मनः ॥ ३८ ॥
अहो कष्टमहो कष्टं दौत्यं यत् कृतवानहम् ।
इति लज्जासमाविष्टस्तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ॥ ३९ ॥
ताली बजाने और हँसनेकी गम्भीर ध्वनि पृथ्वी और आकाशमें गूँज उठी । नृपश्रेष्ठ ! ब्राह्मण जनार्दन अपने मित्र हंसकी निन्दा करते हुए मन-ही-मन कहने लगे— 'अहो ! मैंने जो दूतका कार्य किया, यह बड़े कष्टकी बात है ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहकर लज्जित हो वे नीचे मुख करके चुपचाप बैठे रहे ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने वासुदेववाक्ये पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
| भविष्यपर्व ] | सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः | १०६७ |
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना
वैशम्पायन उवाच
हासं कुर्वत्सु तेष्वेवं केशवः केशिसूदनः।
उवाच वचनं दूतं गच्छ मद्द्वचनाद् द्विज ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब यादव इस प्रकार उपहास कर रहे थे, उस समय केशिसन्ता भगवान् केशवने दूतसे इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन् ! आप मेरा संदेश लेकर जाइये ॥ १ ॥
तावित्थं हंसडिम्भकौ ब्रूहि त्वरितविक्रमः।
बाणैर्दास्यामि निशितैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ २ ॥
'शीघ्रगतिसे वहाँ जाकर उन हंस और डिम्भकसे इस प्रकार कहिये—मैं शार्ङ्ग धनुषद्वारा छोड़े गये और शिलापर तेज किये गये पैने बाणोंद्वारा तुम दोनोंको कर दूँगा ॥ २ ॥
असिना वाथ दास्यामि निशितेन महात्मनोः।
शिरो वा छेत्स्यते चक्रं मत्करप्रहितं वलिम् ॥ ३ ॥
'अथवा उन महामनस्वी राजाओंको अपनी तीखी तलवारसे कर समर्पित करूँगा। अथवा मेरे हाथसे छोड़ा गया चक्र उनका सिर काट लेगा और उसीको करके रूपमें समर्पित करेगा ॥ ३ ॥
यो वरं दत्तवान् रुद्रो युवयोर्धाष्टर्यकारणम्।
स एव रक्षिता वां स्यात् तं जित्वा वां निहन्म्यहम् ॥ ४ ॥
'भगवान् रुद्रने तुम दोनोंको जो वर दिया है, वही तुम दोनोंकी ढिठाईका कारण है। यदि वे रुद्रदेव ही तुम दोनोंके रक्षक हो जायें तो मैं उनको भी जीतकर तुम दोनोंको मार डालूँगा ॥ ४ ॥
देशोऽयं संविधातव्यो यत्र नः संगतिर्भवेत्।
तत्र गन्ता तथा चास्मि सबलः सहवाहनः ॥ ५ ॥
'राजाओ ! कोई ऐसा स्थान निश्चित कर लेना चाहिये, जहाँ हमलोगोंका समागम हो। मैं सेना और सवारियोंसहित वहाँ उस स्थानमें आ जाऊँगा ॥ ५ ॥
भवन्तौ निर्भयौ भूत्वा गच्छेतां सबलौ नृपौ।
पुष्करे वा प्रयागे वा मथुरायामथापि वा ॥ ६ ॥
तत्राहं सबलो याता नात्र कार्या विचारणा।
'नरेश्वरो ! तुम दोनों वीर भी निर्भय होकर सेनासहित वहाँ आ जाना। पुष्करमें या प्रयागमें अथवा मथुरामें जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं मैं सेनासहित आ जाऊँगा, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ६½ ॥
अथवा मित्रभावाच्च वक्तुमेवं न ते क्षमम् ॥ ७ ॥
न शक्यं यत् त्वया वक्तुं तच्च वक्ष्यति सात्यकिः।
त्वया सह ततो गत्वा साक्षिभूतो भव द्विज ॥ ८ ॥
'अथवा मित्रताके नाते आपसे ऐसी बात कहलाना उचित न होगा। आप जिसे नहीं कह सकेंगे, उसे आपके साथ जाकर यह सात्यकि कहेंगे। ब्रह्मन् ! आप केवल साक्षी बने रहें ॥ ७-८ ॥
इदं च जाने विप्रेन्द्र स्नेहो मयि सदा तव।
तेन त्वं विजयी भूत्वा संसारे दुःखसंकुले।
मत्कथापरमो नित्यं सदा भव जनार्दन ॥ ९ ॥
'विप्रेन्द्र ! मैं यह भी जानता हूँ कि आपका सदा मेरे ऊपर स्नेह बना रहता है। अतः जनार्दनजी ! आप दुःखोंसे भरे हुए इस संसारमें विजयी होकर सदा नित्य-निरन्तर मेरी कथा-वार्तामें लगे रहिये' ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना तथा हंसका जनार्दनसे कार्यसिद्धिके विषयमें पूछना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं कृष्णः सात्यकिं पुनराह सः।
गत्वा शैनेय विप्रेण ब्रूहि मद्द्वचनात् तयोः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिसे फिर कहा—'शिनिनन्दन ! तुम इन ब्राह्मण देवता जनार्दनके साथ जाकर मेरे कथनानुसार उन दोनों भाई हंस और डिम्भकसे कहो ॥ १ ॥
यन्मयोक्तमशेषेण वद गत्वा तयोः पुरः।
यथा नः संगतिर्युद्धे तथा वद बलात् तदा ॥ २ ॥
'मैंने जो कुछ कहा है, वह सब उन दोनोंके सामने जाकर कहो, जिससे हमलोगोंका युद्ध-स्थलमें शीघ्र समागम
१०६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
हो। उक्त उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तुम बलपूर्वक भी बात कर सकते हो ॥ २ ॥
धनुरादाय गच्छ त्वं बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
एकेनाश्वेन गच्छ त्वमसहायो यदूत्तम ॥ ३ ॥
'यदुकुलतिलक सात्यके ! तुम धनुष लेकर जाओ; हाथमें गोहके चमड़ेके बने दस्तानेको भी बाँध लेना, एकमात्र अश्वके साथ जाना, दूसरे किसी सहायकको साथ न लेना' ॥ ३ ॥
सात्यकिस्तं तथेत्युक्त्वा हयमारुह्य शीघ्रगम् ।
गन्तुमैच्छत् ततो राजन्नसहायः स सात्यकिः ॥ ४ ॥
सात्यकिने 'बहुत अच्छा' कहकर एक शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ हो वहाँसे जानेका विचार किया। राजन् ! उन्होंने कोई दूसरा सहायक साथ नहीं लिया था ॥ ४ ॥
जनार्दनं विसृज्याशु दूतं तं यादवेश्वरः ।
अहो धाष्टर्यमहो धाष्टर्यमित्युवाच जनार्दनः ॥ ५ ॥
जनार्दन नामक दूतको शीघ्र ही विदा करके यादवेश्वर जनार्दन बोले—'अहो ! हंस और डिम्भककी धृष्टता अद्भुत है, उनकी ढिठाई आश्चर्यजनक है' ॥ ५ ॥
नमस्कृत्य तदा दूतो माधवं माधवेश्वरम् ।
स ययौ शाल्वनगरं शैनेयेन समन्वितः ॥ ६ ॥
उस समय माधवेश्वर माधवको नमस्कार करके दूत जनार्दन सात्यकिके साथ शाल्वनगरको गये ॥ ६ ॥
ततः प्रविश्य धर्मात्मा ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ।
आसनं महदास्थाय विसृज्य यादवे पुनः ॥ ७ ॥
आस्ते सुखं यदा विप्रः शैनेयेन समन्वितः ।
अथ तं हंसडिम्भयोर्दर्शयामास सात्यकिम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दन वहाँ राजसभामें प्रवेश करके सात्यकिको एक महान् आसन देकर जब स्वयं भी उस श्रेष्ठ आसनपर उनके साथ सुखपूर्वक बैठ गये, तब उन्होंने हंस और डिम्भकसे सात्यकिको मिलाया ॥ ७-८ ॥
दूतोऽयं सात्यकिः प्राप्तः सव्यो बाहुरयं हरेः।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हंसः प्राह वचस्तदा ॥ ९ ॥
उस समय वे बोले—'राजन् ! यह सात्यकि द्वारकासे दूत होकर आये हैं। ये भगवान् श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजाके समान हैं।<sup>१</sup> जनार्दनकी यह बात सुनकर हंस बोला—॥ ९ ॥
श्रुतः समागमः पूर्वमद्य दृष्टो मया त्वसौ ।
धनुर्वेदे च वेदे च शास्त्रे शस्त्रे तथैव च ॥ १० ॥
निपुणोऽयं सदा धीर इत्येवमनुशुश्रुम ।
अथो दृष्टिपथं प्राप्तः प्रीतिं नौ विदधात्यसौ ॥ ११ ॥
'पहले इसके समागम होनेकी बात सुननेमें आयी थी, आज मुझे इसका दर्शन हो गया। हमने सुना है कि यह वीर सात्यकि वेद, धनुर्वेद, शास्त्र-विद्या और शस्त्र-विद्यामें सदा निपुण एवं धीर है। अब हमारी दृष्टिपथमें आकर यह हम दोनों भाइयोंको प्रीति प्रदान कर रहा है ॥ १०-११ ॥
कुशलं वासुदेवस्य वलभद्रस्य वा पुनः ।
कुशलाः सात्वताः सर्वे उग्रसेनपुरोगमाः ॥ १२ ॥
'सात्यके ! वासुदेव श्रीकृष्ण और बलभद्र कुशलसे तो हैं न ? उग्रसेन आदि सभी यादव सकुशल हैं न ?'॥ १२ ॥
तथेति सात्यकिः प्राह मन्दमुन्मथिताननः ।
ततो जनार्दनं प्राह हंसो वाक्यविशारदः ॥ १३ ॥
तब सात्यकिने मन्दस्वरमें कहा—'जी हाँ ! सब लोग कुशल हैं। उस समय उनका मुख रोषसे तमतमा उठा था। तदनन्तर बातचीत करनेमें कुशल हंसने जनार्दनसे कहा—॥ १३ ॥
अपि दृष्टस्त्वया चक्री सिद्धं नः कार्यमीहितम् ।
वद सर्वमशेषेण मा वृथा कालमत्यागाः ॥ १४ ॥
'ब्रह्मन् ! क्या तुम चक्रधारी श्रीकृष्णसे मिले थे ? क्या हमारा अभीष्ट कार्य सिद्ध हुआ ? वहाँका सब समाचार पूर्णरूपसे बताओ, व्यर्थ समय न बिताओ' ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवाक्ये सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वाक्यविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक तिरस्कृत करके चले जानेके लिये कहना, फिर सात्यकिका हंसको श्रीकृष्णका संदेश सुनाते हुए फटकारना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति हंसे च धर्मात्मा जनार्दनः ।
उवाच प्रहसन् वीरः स्तुवन् नारायणं सदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! हंसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा वीर जनार्दनने, जो नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी सदा स्तुति करता था, हँसते हुए कहा—॥ १ ॥
१. 'सव्य' शब्दका अर्थ बायाँ और दाहिना भी है। देखिये संस्कृत शब्दार्थ-कौस्तुभ।
भविष्यपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः १०६९
अद्राक्षमद्राक्षमहं जनार्दनं
हस्तस्थशङ्खं वरचक्रधारिणम्।
आतप्तजाम्बूनदभूषिताङ्गदं
स्फुरत्प्रभाद्योतितरत्नधारिणम्॥ २ ॥
'हाँ! मैंने उन जनार्दनका दर्शन किया है! दर्शन किया है!! जिनके एक हाथमें शङ्ख शोभा पाता है तथा जो दूसरे हाथमें श्रेष्ठ चक्र धारण करते हैं, जिनका बाजूबन्द तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णसे भूषित है तथा जो झलमलाती हुई प्रभासे प्रकाशित रत्न (कौस्तुभमणि) धारण करते हैं॥ २ ॥
अद्राक्षमेनं यदुभिः पुरातनैः
संसेव्यमानं मुनिवृन्दमुख्यैः।
संस्तूयमानं प्रभुभिः समागधैः
स्मितप्रवालाधरपल्लवारुणम्॥ ३ ॥
'मैंने इन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया है, जिनकी सेवामें पुरातन यादव-वीर तथा मुख्य-मुख्य मुनिवृन्द उपस्थित रहते हैं, मागधोंसहित बहुत-से राजा भी इनकी स्तुति करते हैं, मूँगे तथा नूतन पल्लवके समान इनका अरुण अधर मन्द मुसकानकी आभासे प्रकाशित होता रहता है॥ ३ ॥
अद्राक्षमेनं कविभिः पुरातनै-
र्विविच्य वेद्यं विधिवत्सहामरैः।
प्रफुल्लनीलोत्पलशोभितं श्रिया
विनिद्रहेमाब्जविराजितोदरम्॥ ४ ॥
'प्राचीन विद्वान् ऋषि-मुनि देवताओंके साथ बैठकर जिनके स्वरूपका विधिपूर्वक विवेचन करके उसे जाननेके योग्य बताते हैं, जो खिले हुए नीलकमलके समान श्याम-कान्तिसे सुशोभित हैं तथा जिनका उदर विकसित सुवर्णमय कमलसे सुशोभित होता है, उन्हीं पद्मनाभस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है॥ ४ ॥
भूयोऽहमद्राक्षमजं जगद्गुरुं
प्रमोदयन्तं वचनेन यादवान्।
निरूपयन्तं विधिवन्मुनीश्वरैः
प्रवृत्तवेदार्थविधिं पुरातनैः॥ ५ ॥
'मैंने बारंबार उन अजन्मा जगद्गुरुका दर्शन किया, जो अपनी वाणीद्वारा यादवोंको आनन्द प्रदान कर रहे थे और प्राचीन मुनीश्वरोंके साथ प्रवृत्तिमार्गसम्बन्धी वेदार्थके विधानका विधिपूर्वक निरूपण करते थे॥ ५ ॥
अद्राक्षमद्राक्षमहं पुनः पुनः
समस्तलोकैकहितैषिणं हरिम्।
वसन्तमस्मिञ्जगतो हिताय
जगन्मयं तान् परिभूय शत्रून्॥ ६ ॥
'मैंने समस्त लोकोंके एकमात्र हितैषी उन जगन्मय श्रीहरिका बारंबार दर्शन किया है, जो जगत्के हितके लिये इसके समस्त शत्रुओंको पराजित करके इस भूलोकमें निवास करते हैं॥ ६॥
भूयोऽप्यपश्यं सह यादवेश्वरै-
र्विंक्रीडमानं च विहारकाले।
रमन्तमीड्यथं रमयन्तमीश्वरान्
यदूतमान् यादवमुख्यमीश्वरम्॥ ७॥
'यादवकुलके प्रधान पुरुष तथा स्तवनीय ईश्वररूप उन श्रीकृष्णका मैंने अनेक बार दर्शन किया है, जो विहारकालमें यादवेश्वरोंके साथ नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं तथा स्वयं तो क्रीड़ाओंमें रत रहते ही हैं, सामर्थ्यशाली यादवशिरोमणियोंको भी उनमें प्रवृत्त करते रहते हैं॥ ७॥
भूयोऽप्यपश्यं सरसीरुहेक्षणं
समेतया भीष्मतनूजया हरिम्।
वसन्तमम्भोनिधिशायिनं विभुं
भक्तप्रियं भक्तजनास्पदं शिवम्॥ ८॥
'मैंने पुनः उन कमलनयन श्रीहरिका दर्शन किया, जो पत्नीरूपमें प्राप्त हुई भीष्मनन्दिनी रुक्मिणी देवीके साथ द्वारकामें निवास करते हैं, नारायणरूपसे समुद्रके जलमें सोते हैं तथा जो वैभवशाली, भक्तप्रिय, भक्तजनोंके आश्रय तथा कल्याणस्वरूप हैं॥ ८॥
अद्राक्षमद्राक्षमहं सुनिर्वृतः
पिबन् पिबंस्तस्य वपुः पुरातनम्।
नेत्रेण मीलद्विवरेण केवलं
धन्योऽहमस्मीति तदा व्यचिन्तयम्॥ ९॥
'मैंने अत्यन्त आनन्दमग्न होकर बारंबार भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया है और अपलक नेत्रके द्वारा उनके पुरातन श्रीअङ्गकी शोभाका पान किया है। उस समय मैं अपने विषयमें केवल यही सोचता रहा कि 'मैं धन्य हो गया'॥ ९॥
अद्राक्षमम्भोजयुगं दधानं
प्रभुं विभुं भूतमयं विभावनम्।
आद्यं ककुद्मानमुरं विभावसुं
संस्मृत्य संस्मृत्य तमेव निर्वृतः॥ १०॥
'मैंने देखा कि वे सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी, भूतमय तथा सबका पालन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने हाथोंमें दो कमल लिये हुए थे। मैं उन्हीं माहात्म्यशाली, प्रकाशमान, आदि पुरुष एवं महान् ईश्वरका बारंबार स्मरण करके आनन्दमग्न हो रहा हूँ॥ १०॥
अद्राक्षं जगतामीशं वक्षोराजितकौस्तुभम्।
वीज्यमानं हरिं कृष्णं चामराणां शतैः सदा॥ ११॥
'जिनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि प्रकाशित होती
| १०७० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
है तथा जिनपर सौ-सौ चँवर डुलाये जाते हैं, उन जगदीश्वर श्रीकृष्ण हरिका मैंने दर्शन किया है ॥ ११ ॥
युवां विद्वेषयुक्तेन चेतसा यादवेश्वरम् ।
स्मरन्तं सर्वदा विष्णुं क चैवं क च वेत्ति कः ॥ १२ ॥
'वे यादवेश्वर विष्णु विद्वेषयुक्त चित्तसे सदा तुम दोनोंका स्मरण करते थे और जानना चाहते थे कि वे दोनों कहाँ हैं ? तथा कहाँ और कौन उन्हें जानता है ?॥
क्व च द्रक्ष्यामि तौ मन्दौ कुतो वा मत्पुरोगतौ ।
ध्यायन्तमित्थं देवेशं करे शङ्खवहं सदा ॥ १३ ॥
'उन दोनों मूर्खोंको मैं कब देखूँगा ? वे किस उपायसे मेरे सामने उपस्थित होंगे ? हाथमें शङ्ख लिये हुए वे देवेश्वर निरन्तर ऐसी ही बात सोच रहे थे ॥ १३ ॥
हसन्तमेनमद्राक्षं करदं हास्यतत्परम् ।
वदन्तं नारदे वाचं दुर्वाससि यतीश्वरे ॥ १४ ॥
'अपनेको करदाता सुनकर वे हँसने लगे और तुम्हारे उपहासमें तत्पर हो गये, उस अवस्थामें मैंने उन्हें देखा था । वे देवर्षि नारद तथा यतीश्वर दुर्वासासे बात करते थे ॥ १४ ॥
ब्रह्मसूत्रपदां वाणीं दापयन्तं मुनीश्वरम् ।
दृष्ट्वाहं तं हरिं देवं पुनः पुनरचिन्तयम् ॥ १५ ॥
'वे मुनीश्वर दुर्वासाको ब्रह्मसूत्रके पदोंसे युक्त वेदान्तमयी वाणीका शिष्योंको उपदेश देने या पढ़ानेके लिये अनुमति दे रहे थे । उस समय उन भगवान् श्रीहरिका दर्शन करके मैंने बारंबार इस प्रकार विचार किया ॥ १५ ॥
असाध्यमिदमारब्धं ताभ्यामिति नृपोत्तम ।
नारब्धव्यमिदं कार्यमितःप्रभृति भूमिप ॥ १६ ॥
'मेरे उन मित्रोंने यह असाध्य कार्य आरम्भ किया है। नृपश्रेष्ठ ! भूमिपाल ! अबसे आप दोनोंको इस कार्यका आरम्भ नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
निवृत्ता सा कथा हंसाचिन्तयद् ग्रहणं तव ।
तद् वृत्तमखिलं सर्वं वदिष्यति हि सात्यकिः ।
एतद् वचनमाकर्ण्य हंसः क्रुद्धोऽब्रवीद् वचः ॥ १७ ॥
'श्रीकृष्णसे कर लेना है, यह तुम्हारी बात जब वहाँ समाप्त हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें कैद करनेकी बात सोची थी। यह सारा वृत्तान्त सात्यकि ही तुम्हें बतायेंगे।' जनार्दनकी यह बात सुनकर हंसने कुपित होकर कहा ॥१७॥
हंस उवाच
अरे ब्राह्मणदायाद का नाम तव वागियम् ।
आवयोः पुरतो वक्तुं त्रैलोक्यं जेतुमिच्छतोः ॥ १८ ॥
**हंस बोला—**अरे ओ ब्राह्मणके बेटे ! यह तुम्हारे मुखसे कैसी बात निकल रही है । तीनों लोकोंको जीतनेकी इच्छा करनेवाले हम दोनों वीरोंके आगे कहनेके लिये क्या तुम्हें यही बात मिली है ॥ १८ ॥
मायया त्वां भ्रामयति कृष्णो लीलाविधानवित् ।
तं दृष्ट्वा भ्रम एवैष तव संजायते महान् ॥ १९ ॥
लीलाविधानके ज्ञाता श्रीकृष्ण तुम्हें मायासे चक्करमें डाल रहे हैं । उनका दर्शन करके तुम्हारे मनमें यह महान् भ्रम ही उत्पन्न हो गया है ॥ १९ ॥
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ।
वृष्णिवीरं समावेक्ष्य समुच्छ्रितयशोधरम् ॥ २० ॥
सूतमागधसंस्तावप्रकटद्बाहुवीर्यकम् ।
अत्यद्भुतयशोराशिं विक्रमाल्लोकमण्डनम् ॥ २१ ॥
चतुर्भुजं वलाक्रान्तं वृष्णियादवसम्मतम् ।
अहोऽद्य भ्रम एवैष दर्शनात् तस्य चक्रिणः ॥ २२ ॥
जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सब ओर फैले हुए यशको धारण करते हैं। सूतों और मागधोंद्वारा की गयी स्तुतिमात्रसे जिनके बाहुबलका कुछ पता चलता है। जो अत्यन्त अद्भुत यशकी राशि हैं और अपने पराक्रमसे लोकको अलंकृत करते हैं। जिनके चार भुजाएँ हैं । जो सेनाओंसे घिरे हुए तथा वृष्णि और यादवकुलके सम्मानित पुरुष हैं, उन वृष्णिवीर श्रीकृष्णका दर्शन करके तुम चक्करमें पड़ गये हो। अहो ! उस चक्रपाणिके दर्शनसे आज तुम्हें भ्रम ही हो गया ॥२०–२२॥
इदानीं च महाराज भ्रामयन्त्येव दुर्मतिः ।
त्वामेव विप्र मन्दात्मन्निन्द्रजालिकता हि या ॥ २३ ॥
महाराज ! मन्दमते विप्र ! इस समय भी यह दुर्बुद्धि कृष्ण तुम्हें चक्करमें ही डाले हुए है। उसकी जो इन्द्रजालिकता (बाजीगरी) है, वह तुमपर ही प्रभाव डालती है ॥ २३ ॥
चापत्यमिदमेवैतत् तव विप्र भ्रमोद्भवम् ।
अहो हि खलु सादृश्यं वक्तव्यं भवता मम ॥ २४ ॥
विप्र ! यह तुम्हारा भ्रमजनित चापल्य ही प्रकट हुआ है । अहो ! तुम्हें मेरी और उनकी समानता बतानी चाहिये थी (किंतु तुमने हमारी लघुता व्यक्त की है) ॥ २४ ॥
अहमेव त्वया विप्र मर्षये प्रोदितं वचः ।
सखिभावाद् द्विजश्रेष्ठ अन्यथा कः सहेदिदम् ॥ २५ ॥
ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ ! एक मैं ही हूँ, जिसने मित्रताके कारण तुम्हारी इस अनुचित बातको सह लिया, अन्यथा कौन ऐसी बात सह सकता है ? ॥ २५ ॥
गच्छ मन्दमते विप्र यथेष्टं साम्प्रतं तव ।
द्विज गच्छ यथेष्टं त्वं पृथिवीं पृथिवी तव ॥ २६ ॥
मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चले जाओ, इस समय सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये खुली हुई है । द्विज ! तुम भूतलपर चाहे जहाँ जा सकते हो ॥ २६ ॥
जित्वा गोपालदायादं हत्वा यादवकान् बहून् ।
एष नः प्रथमः कल्पो जेष्याम इति यादवान् ॥ २७ ॥
मैं उस ग्वालबालको जीतकर और बहुत-से यादवोंका
भविष्यपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०७१
संहार करके अपना यज्ञ करूँगा। हमारा पहला संकल्प यही है कि 'हम यादवोंको जीतेंगे'॥ २७॥
गच्छ गच्छेति विप्र त्वं धृष्टं परुषवादिनम्।
शत्रुपक्षस्तुतिपरं सह युक्तवा सदा मया ॥ २८॥
ब्राह्मण ! जाओ ! जाओ !! तुम धृष्ट और कटुवादी हो ! सदा मेरे साथ रहकर भी शत्रुपक्षकी स्तुतिमें लगे रहे हो (इसलिये मैंने तुम्हें त्याग दिया) ॥ २८॥
न मे विप्रवधः कार्यः कष्टादपि हि सर्वतः।
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं भूयो हंसः सात्यकिमब्रवीत् ॥ २९॥
सब ओरसे कष्ट प्राप्त होनेपर भी मुझे ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये (इसीलिये तुम्हें जीवित छोड़ रहा हूँ)। ब्राह्मणसे ऐसा कहकर हंसने फिर सात्यकिसे कहा—॥ २९॥
भो भो यादवदायाद किमर्थं प्राप्तवानिह।
किमब्रवीन्नन्दसुतः किं वाऽसौ मेऽदिशत् करम् ॥ ३०॥
'ओ यादवकुमार ! तुम किसलिये यहाँ आये हो ? उस नन्दपुत्रने तुमसे क्या कहा है ? अथवा उसने मेरे लिये कौन-सा कर प्रदान किया है ?' ॥ ३० ॥
सात्यकिरुवाच
इदं सत्यं वचो हंस शङ्खचक्रगदाभृतः।
शरैर्निशितधाराग्रैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ३१ ॥
दास्यामि करसर्वस्वमसिना निशितेन ते।
शिरश्छेत्स्यामि ते हंस करदानस्य संग्रहम् ॥ ३२॥
सात्यकि बोले—हंस ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका यह सत्य वचन सुनो। उनका कहना है कि 'मैं शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए, शिलापर तेज किये गये और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा तुम्हारा सारा कर चुका दूँगा। हंस ! अपनी तीखी तलवारसे तेरा सिर काट लूँगा' यह तेरे लिये करदानका अच्छा संग्रह होगा' ॥ ३१-३२॥
धार्ष्ट्यं हि तव मन्दात्मन् किमतोऽपि नृपाधम।
देवदेवाज्जगन्नाथात् करमिच्छति यो नृपः ॥ ३३ ॥
तस्यैष करसंक्षेपो जिह्वाच्छेदो नराधम।
मन्दात्मन् ! नृपाधम ! इससे बढ़कर तेरी धृष्टता क्या हो सकती है ? नराधम ! जो राजा देवाधिदेव जगन्नाथसे कर लेना चाहता है, उसकी जीभ काट ली जाय, यही उसके करको समाप्त करनेका उपाय है ॥ ३३॥
तस्य शार्ङ्गरवं श्रुत्वा शङ्खस्य च हरेः पुनः ॥ ३४ ॥
को नाम जीवितं काङ्क्षेत् तिष्ठेदानीं त्वमद्य वै।
श्रीहरिके शार्ङ्गधनुषकी टङ्कार और पाञ्चजन्य शङ्खका हुंकार सुनकर कौन जीवित रहनेकी आशा कर सकता है। तू अब हमारे सामने खड़ा तो हो ॥ ३४॥
गिरीशवरदर्पेण को ब्रूयादीदृशं वचः ॥ ३५ ॥
सहाया वयमेवैते बलभद्रपुरोगमाः।
भगवान् शङ्करसे मिले वरके घमंडमें आकर कौन पुरुष भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसी बात कह सकता है, जैसी तूने कही है। बलभद्र आदि हम सभी वीर श्रीकृष्णके सहायक हैं॥
प्रथमो बलभद्रोऽसौ द्वितीयोऽहं च सात्यकिः ॥ ३६॥
कृतवर्मा तृतीयस्तु चतुर्थो निशठो बली।
पञ्चमोऽथ च बभ्रुस्तु षष्ठश्चैवोल्कलः स्मृतः ॥ ३७ ॥
सप्तमस्तारणो धीमानस्त्रशस्त्रविशारदः।
अष्टमस्त्वथ सारङ्गो नवमो विप्रथुस्तथा ॥ ३८॥
दशमश्चोद्धवो धीमान् वयमेते बलान्विताः।
प्रथम तो बलभद्रजी हैं, दूसरा मैं सात्यकि हूँ, तीसरा कृतवर्मा है, चौथा बलवान् निशठ है, पाँचवाँ बभ्रु, छठा उल्कल, सातवाँ अस्त्रशस्त्रविशारद बुद्धिमान् तारण, आठवाँ सारङ्ग, नवाँ विपृथु और दसवें बुद्धिमान् उद्धवजी हैं। ये हम सभी सहायक बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ३६-३८॥
त एते पुरतो गोप्तुः शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ३९ ॥
देवदेवस्य युद्धेषु तिष्ठन्त्येव दिवानिशम्।
ये सभी वीर समस्त युद्धोंमें अपने रक्षक शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके आगे ही खड़े होते हैं ॥ ३९॥
यौ हि वीरौ सुतौ तस्य नासत्यसदृशौ बले ॥ ४० ॥
तावेव वां क्षमौ युद्धे हन्तुं बलमदान्वितौ।
उनके जो दो विख्यात पुत्र (प्रद्युम्न और साम्ब) हैं, वे दोनों बलमें अश्विनीकुमारोंके समान हैं। केवल वे दोनों ही युद्धमें बलके मदसे उन्मत्त हुए तुम दोनों भाइयोंको मार सकते हैं ॥ ४०॥
यो गिरीशो गिरां देवो वरं दत्त्वा स तिष्ठति ॥ ४१ ॥
युवां हि किंबलौ युद्धे तिष्ठतः सशरं धनुः।
गृहीत्वा शत्रुभिः सार्धं युद्धं कर्तुं समुद्यतौ ॥ ४२ ॥
वाणीके देवता जो गिरीश शिव हैं, वे तो वर देकर अलग खड़े हैं। तुम दोनों किसके बलका सहारा लेकर युद्धमें खड़े हुए हो और धनुष-बाण लेकर शत्रुओंके साथ जूझनेको तैयार हुए हो ? ॥ ४१-४२ ॥
ईदृशेष्वथ भृत्येषु युद्धं कुर्वत्सु शत्रुभिः।
त्रैलोक्यं रक्षतस्तस्मात् करमिच्छन् व्रजेत्कः॥ ४३॥
जिनके हम-जैसे सेवक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे हों, त्रिलोकीकी रक्षा करनेवाले उन जगदीश्वरसे कर लेनेकी इच्छा रखकर कौन जीवित लौट सकता है ? ॥ ४३ ॥
हनिष्यत्येव वां युद्धे त्रैलोक्यं यो हि रक्षति।
शरेण निशितेनाऽसौ शार्ङ्गमुक्तेन केवलम् ॥ ४४॥
जो तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें केवल शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए पैने बाणसे तुम दोनोंको अवश्य मार डालेंगे ॥ ४४ ॥
क्व नः संग्राम इत्येवं पुनराह जगत्पतिः।
पुष्करे पुण्यदे नित्यमुत गोवर्धने गिरौ ॥ ४५॥
| १०७२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
मथुरायां प्रयागे वा दर्शयन्तो बलानि मे ।
उन जगदीश्वरने फिर यह पूछा था कि हमलोगोंका यह संग्राम कहाँ होगा ? सदा ही पुण्य प्रदान करनेवाले पुष्करमें, गोवर्धन पर्वतपर, मथुरामें अथवा प्रयागमें । जहाँ इच्छा हो मुझे अपना बल दिखानेके लिये आ जायँ ॥ ४५ ॥
शङ्खचक्रधरे देवे जगत्पालनतत्परे ॥ ४६ ॥
राजसूयं महायज्ञं कर्तुमिच्छति कः स्वयम् ।
वदन् वा स्वस्तिमान् मर्त्यस्त्वां विना को व्रजेत् सुखम्
शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण जब जगत्के पालनमें तत्पर हों, उस समय कौन उनकी आज्ञा लिये बिना स्वयं राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करना चाहेगा ? अथवा तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो ऐसी बात कहकर सकुशल एवं सुखपूर्वक घरको जा सकता है ?॥ ४६-४७ ॥
इदमीच्छसि चेन्मूढ हास्यतां यासि भूतले ।
इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरो हसन्निव भुवि स्थितः ॥ ४८ ॥
मूढ ! यदि तू ऐसा चाहता है तो इस भूतलपर उपहासका पात्र बनेगा । ऐसा कहकर वीर सात्यकि हँसते हुए-से भूतलपर खड़े हो गये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिवाक्ये
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें
सात्यकिका वाक्यविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
एकोनविंशाधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भकके सात्यकिके प्रति रोषपूर्ण वचन तथा सात्यकिका उन्हें वैसा ही उत्तर देकर द्वारकाको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धौ महाराज हंसो डिम्भक एव च ।
इदं वै प्रोचतुर्वाक्यं रोषव्याकुलितेक्षणौ ॥ १ ॥
विधक्षन्तौ दिशः सर्वाः सर्वान् वीक्ष्य नृपोत्तमान् ।
करेण निष्पीड्य करं स्मरन्तौ तद्वचो महत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! सात्यकिकी यह बात सुनकर हंस और डिम्भक कुपित हो उठे । उनके नेत्र रोषसे चञ्चल हो उठे । वे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं । उन्होंने समस्त श्रेष्ठ नरेशोंकी ओर देखकर और एक हाथसे दूसरे हाथको दबाकर सात्यकिके उस महान् वचनका स्मरण करते हुए इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
क्व नु क्व वा नन्दसूनुः क्व वा रामो बलोत्कटः ।
इति ब्रुवाणौ साक्षेपौ सात्यकिं सत्यसंगरम् ॥ ३ ॥
'कहाँ है ? कहाँ है ? वह नन्दका बेटा, और कहाँ है वह बलोन्मत्त बलराम' सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिपर आक्षेप करके ऐसी बातें कहते हुए वे दोनों फिर बोले—॥ ३ ॥
अरे यादवदायाद किं ब्रूषे नः पुरो गतः ।
इतो निर्गच्छ मन्दात्मन् दूतस्त्वमसि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
अन्यथा वध्य एव त्वं प्रलपन् परुषं वचः ।
'अरे ओ यादवके बच्चे ! हमारे सामने आकर तू यह क्या बक रहा है ? मन्दात्मन् ! तू यहाँसे निकल जा । इस समय दूत बनकर आया है, नहीं तो ऐसा कठोर वचन कहनेके कारण तू मार डालनेके योग्य था ॥ ४ ॥
सत्यं निर्लज्ज एवासि यद् ब्रूया ईदृशं वचः ॥ ५ ॥
आवामिदं जगत् सर्वं शासितुं संयतौ नृपौ ।
को नाम मानुषे लोके करदो नैव जीवति ॥ ६ ॥
'सचमुच तू निर्लज्ज ही है, जो ऐसी बातें बक रहा है । हम दोनों नरेश इस सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेके लिये उद्यत हैं । मनुष्यलोकमें कौन ऐसा पुरुष है, जो हमें कर न देकर जीवित रह सके ? ॥ ५-६ ॥
हत्वा गोपालकान् सर्वान् बद्ध्वा यादवकान् बहून् ।
गृहीमः सर्वसर्वस्वं ततो गच्छ नराधम ॥ ७ ॥
'हम समस्त ग्वालों और बहुसंख्यक यादवोंको कैद करके उनका सर्वस्व करके रूपमें ग्रहण करेंगे । अतः नराधम ! तू यहाँसे चला जा ॥ ७ ॥
अवध्यो दूततां प्राप्तो बह्वबद्धं प्रभाषसे ।
ईश्वरो नौ वरं दाता ह्याह्वानानामपि च प्रभुः ॥ ८ ॥
रक्षितारौ महाभूतौ संग्रामं गच्छतोश्च नौ ।
पितरं याजयिष्यावो जित्वा गोपालकं रणे ॥ ९ ॥
'तू बहुत अंट-संट बक रहा है, किंतु क्या किया जाय, दूत बनकर आया है, इसलिये अवध्य है । भगवान् शङ्करने हम दोनोंको वर दिया है और वे ही हमारे आह्वानोंके भी दाता हैं । संग्राममें जाते समय दो महाभूत हम दोनोंकी रक्षा करते हैं । हमलोग उस ग्वालेको जीतकर अपने पितासे राजसूय यज्ञ करायेंगे ॥ ८-९ ॥
एते प्रोक्ता भृशं युद्धे कातराः सर्व एव ते ।
हत्वा तान् सबलान् युद्धे पुनर्जेष्यामि केशवम् ॥ १०
भविष्यपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७३
'तुमने जिन सहायकोंके नाम बताये हैं, वे सब-के-सब युद्धमें अत्यन्त कायर हैं। मैं रणभूमिमें सेनासहित उन सबको मारकर फिर केशवको पराजित करूँगा ॥ १० ॥
संहर्तव्या महासेना प्रगृहीतशरासना ।
गृहीतप्रासमुशला गृहीतकवचा सदा ॥ ११ ॥
आरूढरथसाहस्रा गदापरिघसंकुला ।
सुप्रभूतेन्धनवती प्रभूतबलसाधना ॥ १२ ॥
चाल्यतां वाहिनी घोरा बलाध्यक्षाः समन्ततः ।
अवध्य एव गच्छ त्वं न ते मरणतो भयम् ॥ १३ ॥
'इस समय धनुष-बाण धारण करनेवाली विशाल सेनाका संग्रह करना है। वह प्रास, मुसल, कवच आदिसे सम्पन्न होगी। उसमें सहस्रों रथ होंगे, जिनमें रथी वीर आरूढ रहेंगे। वह सेना गदा और परिघ आदि अस्त्रोंसे भरी-पूरी होगी, उसके पास बहुत-से ईंधन होंगे तथा वह प्रचुर बल एवं साधनसे सम्पन्न होगी। ऐसी भयङ्कर वाहिनी युद्धके लिये कूच करे। सेनानायकगण चारों ओरसे इसकी देख-रेख करें, तू अवध्य रहकर ही चला जा। तुझे यहाँ मृत्युसे भय नहीं है ॥ ११-१३ ॥
संग्रामः पुष्करेऽस्माकं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।
ततो ज्ञास्यामहे वीर्यं केशवस्य बलस्य च ।
ये त्वयोक्ता नृपाः संख्ये तेषामपि च यद् बलम् ॥ १४ ॥
'नरेश्वर ! कल-परसोंतक हमलोगोंका पुष्करमें संग्राम होगा। उस समय हम समझ लेंगे कि श्रीकृष्ण और बलराममें कितना बल है। तूने जिन नरेशोंके नाम बताये हैं, उनमें भी युद्धके मुहानेपर कितना बल है, इसका पता लग जायगा' ॥ १४ ॥
सात्यकिरुवाच
हंसागच्छामि वां हन्तुं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।
अद्यैव हि मया वध्यौ न चेद् दूतो भवाम्यहम् ॥ १५ ॥
सात्यकि बोले—राजा हंस ! मैं तुम दोनों भाइयोंका वध करनेके लिये कल या परसों भी आऊँगा। यदि मैं दूत न होता तो आज ही तुम दोनों मेरे हाथसे मार डाले जाते ॥ १५ ॥
न हि श्वो वा परश्वो वा युवां कटुकभाषिणौ ।
दौत्ये हि दुःखमतुलं वहाम्येव सदा नृणाम् ॥ १६ ॥
तुम दोनों कटुभाषियोंको मैं कल या परसोंके लिये जीवित नहीं छोड़ता। मनुष्योंको दूत बननेपर भी सदा अनुपम दुःखका सामना करना पड़ता है। मैं भी उस महान् दुःख-का भार ढो रहा हूँ ॥ १६ ॥
अन्यथाहं युवां हत्वा ततो यास्यामि निर्वृतिम् ।
स्ववीर्यं बाहुदर्पं च दर्शयन् वां नृपाधमौ ॥ १७ ॥
अन्यथा नीच नरेशो ! मैं अपने पराक्रम और बाहुबल-का घमंड दिखाता हुआ तुम दोनों भाइयोंको मारकर परम संतोष प्राप्त करता ॥ १७ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिः शाङ्खधन्वा किरीटभृत् ।
नीलकुञ्चितकेशाढ्यो लम्बबाहुः श्रिया वृतः ॥ १८ ॥
स सर्वलोकप्रभवो विश्वरूपः सुरूपवान् ।
दैत्यदानवहन्तासौ योगिध्येयः पुरातनः ॥ १९ ॥
पद्मकिञ्जल्कनयनः श्यामलः सिंहविक्रमः ।
सृष्टिस्थितिलयेष्वेकः कर्ता त्रिजगतो गुरुः ॥ २० ॥
शरेण निशितेनाजौ दर्पं वां व्यपनेष्यति ।
इत्युक्त्वा रथमारुह्य प्रययौ सात्यकिः किल ॥ २१ ॥
जो अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्गधनुष धारण करते हैं, जिनके मस्तकपर मुकुट शोभा पाता है, जो काले-काले घुँघराले केशोंसे अलंकृत हैं, जिनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं, जो अनुपम शोभासे सम्पन्न हैं, सम्पूर्ण जगत्-की उत्पत्तिके कारण हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो परम सुन्दर रूपसे सुशोभित हैं, योगीजन जिनका ध्यान करते हैं, जो दैत्यों और दानवोंका वध करनेवाले पुराणपुरुष हैं, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है, जो सिंहके समान बल-विक्रमशाली तथा सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कर्ता हैं, वे तीनों लोकोंके गुरु भगवान् श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें तीखे बाणोंसे तुम दोनों भाइयोंका घमंड चूर करेंगे। ऐसा कहकर सात्यकि रथपर आरूढ़ हो चले गये ॥ १८-२१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिप्रतिप्रयाणे एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें सात्यकिका प्रत्यागमनविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्ण तथा यादवसेनाका पुष्करतीर्थमें जाकर हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करना
वैशम्पायन उवाच
प्रविश्य स पुरं विष्णोः सात्यकिः शिनिपुङ्गवः ।
आचचक्षेऽथ कृष्णाय यथा वृत्तं तयोस्तथा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! शिनिवंश-शिरोमणि सात्यकिने श्रीकृष्णपुरीमें प्रवेश करके उनसे हंस और डिम्भकका सारा समाचार ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ १ ॥
१०७४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
ततः प्रभाते विमले केशवः केशिसूदनः ।
बलाध्यक्षानुवाचेदं चक्रपाणिर्गदाधरः ॥ २ ॥
तदनन्तर निर्मल प्रातःकाल आनेपर हाथमें चक्र और गदा धारण करनेवाले केशिहन्ता केशवने समस्त सेनापतियोंसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
संह्यतां बलं सर्वं रथकुञ्जरवाजिमत् ।
अनेकभेरीपणवं प्रासासिसपरिघाकुलम् ॥ ३ ॥
सध्वजं सपताकं च सालंकारपरिच्छदम् ।
'रथ, हाथी और घोड़ोंसे युक्त सारी सेनाको युद्धके लिये तैयार करो। उसके साथ अनेकानेक भेरी, पणव आदि बाजे भी होने चाहिये। प्रास, खड्ग और परिघ आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे वह सेना सम्पन्न होनी चाहिये। ध्वजा, पताका, अलङ्कार तथा अन्य आवश्यक उपकरणोंसे सारी सेनाको सुसज्जित किया जाय' ॥ ३॥
ते तथेति प्रतिज्ञाय सर्वे चक्रुरधीनगाः ॥ ४ ॥
आदाय सुदृढं चापं रथमारुह्य दंशिताः ।
अग्रतो जग्मुरत्यर्थं सेनायाः पुरुषोत्तमाः ॥ ५ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्णके अधीन रहनेवाले उन सेनापतियोंने सब कुछ उसी प्रकार किया। वे पुरुषप्रवर वीर कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो सुदृढ़ धनुष ले सेनाके आगे-आगे तीव्रगतिसे चलने लगे ॥ ४-५ ॥
सात्यकिश्च तथा राजन् प्रगृहीतशरासनः ।
बभौ क्रोधसमायुक्तो जगामाग्रे महाबलः ॥ ६ ॥
राजन् ! महाबली सात्यकि भी धनुष हाथमें लेकर अद्भुत शोभा पाने लगे। वे क्रोधमें भरकर आगे-आगे चले ॥ ६ ॥
अन्ये च यादवाः शूराः प्रगृहीतमहायुधाः ।
सिंहनादं प्रकुर्वन्तो जग्मुरत्यर्थमुत्तमाः ॥ ७ ॥
अन्य श्रेष्ठ एवं शूरवीर यादव भी महान् आयुध लेकर सिंहनाद करते हुए तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ७ ॥
हरिस्तु रथमारुह्य संस्कृतं दारुकेण ह ।
शार्ङ्गं भारसहं घोरं गृहीत्वा सशरं धनुः ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके द्वारा सुसज्जित किये गये रथपर आरूढ़ हो, भार सहन करनेमें समर्थ भयङ्कर शार्ङ्ग-धनुष और बाण लेकर प्रस्थित हुए ॥ ८ ॥
चक्रपाणिस्तदा शङ्खी गदाशरवरासिमान् ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पीतवासा जनार्दनः ॥ ९ ॥
पद्ममालावृतोरस्को नवजीमूतसंनिभः ।
ययौ रथगतो विप्रैः स्तूयमानो मुदान्वितः ॥ १० ॥
उस समय उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा, बाण और उत्तम खड्ग शोभा पाते थे। उन्होंने हाथोंमें गोह-चर्मके बने दस्ताने भी बाँध रखे थे। वे पीताम्बरधारी जनार्दन नूतन जलधरके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित थे। उनका वक्षःस्थल कमलपुष्पोंकी मालासे आच्छादित था। वे रथपर बैठ-कर आनन्दमग्न ब्राह्मणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए जा रहे थे ॥ ९-१० ॥
सूतैर्मागधपुत्रैश्च गीयमानस्ततस्ततः ।
आनीय सेनां सकलां ययौ काष्ठामथोत्तराम ॥ ११ ॥
जहाँ-तहाँ सूत, मागध और वन्दीजन उनके गुण गाते रहते थे। उन्होंने सारी सेनाको एकत्रित करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ११ ॥
पाञ्चजन्यं मुखे न्यस्य सर्वप्राणेन केशवः ।
दध्मौ महारवं कुर्वञ्छत्रूणां भयवर्धनम् ॥ १२ ॥
पाञ्चजन्य शङ्खको अपने मुखपर रखकर केशवने सम्पूर्ण प्राणशक्ति लगाकर उसे बड़े जोरसे बजाया। उसका महान् शब्द प्रकट करके वे शत्रुओंके भयकी वृद्धि करने लगे ॥ १२॥
आध्मातस्तेन हरिणा सचक्रे शङ्खराड् ध्रुवम् ।
रवः स रोदसी राजन् पूरयामास सर्वतः ॥ १३ ॥
राजन् ! श्रीहरिके बजानेपर उस शङ्खराज पाञ्चजन्यने महानाद किया। उसका वह शब्द पृथ्वी और आकाशमें सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥
तस्मिञ्छङ्खे तथाऽऽध्माते दध्मुः शङ्खान् सहस्रशः ।
भेर्यश्चापि समाध्माता मृदङ्गा बहवो नृप ॥ १४ ॥
नरेश्वर ! पाञ्चजन्य शङ्खके उस प्रकार बजाये जानेपर दूसरे-दूसरे वीरोंने भी सहस्रों शङ्ख बजाये। बहुत-सी भेरियाँ और मृदङ्ग भी बज उठे ॥ १४ ॥
नेदुरत्यर्थमतुलं घर्मान्ते जलदा यथा ।
अथाययुर्महाराज पुष्करं पुण्यवर्धनम् ॥ १५ ॥
महाराज ! वर्षाऋतुमें जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेघोंकी भाँति वे मृदङ्ग आदि बाजे अनुपम गम्भीर स्वरमें बजने लगे। इस प्रकार समस्त यादव सैनिक पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे ॥ १५ ॥
सरसस्तस्य राजेन्द्र पुष्करस्य नृपोत्तमाः ।
प्रतीक्ष्य हंसडिम्भकौ युद्धाय समवस्थिताः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र ! वे नृपश्रेष्ठ यादव वीर युद्धके लिये हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करते हुए उस पुष्कर सरोवरके तटपर ठहर गये ॥ १६ ॥
निवेशं कारयामासुर्यादवाः सर्व एव हि ।
स्वं स्वं ययुः सुखं राजन् प्रगृहीतकुटीमठम् ॥ १७ ॥
राजन् ! सभी यादवोंने वहाँ सेनाकी छावनी डाल दी। सब लोग अपने-अपने लिये स्वीकृत कुटी और मठ आदिमें सुखपूर्वक गये ॥ १७ ॥
भगवानपि गोविन्दः सरो दृष्ट्वा सुशोभनम् ।
उपस्पृश्य जले तस्मिन् प्रणम्य यतिपुङ्गवान् ॥ १८ ॥
तयोरागमनं लिप्सुरास्ते तीरे यथासुखम् ।
शृण्वन् वेदध्वनिं विष्णुर्ब्राह्मणानां समन्ततः ॥ १९ ॥
[भविष्यपर्व] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७५
उस शोभाशाली सरोवरको देखकर भगवान् गोविन्दने भी उसके जलमें आचमन किया और वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ यतियोंको नमस्कार करके हंस और डिम्भकके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए उसके तटपर सुखपूर्वक बैठे। वे भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सब ओर ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि सुन रहे थे ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णपुष्करप्रवेशे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकके उपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णका पुष्करमें प्रवेशविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भककी सेनाओंका पुष्करतीर्थमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
अथ तौ हंसडिम्भकौ जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
प्रगृहीतमहाचापौ सरथौ सध्वजौ नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर हंस और डिम्भक भी विशाल धनुष लिये रथ और ध्वजसहित पुष्करतीर्थमें गये ॥ १ ॥
पुरःसरमहाभूतौ संहरन्ताविबोल्बणौ ।
प्रकुर्वन्तौ सिंहरवं भस्मना परिलेपितौ ॥ २ ॥
उन दोनोंके आगे दो बड़े-बड़े भूत चल रहे थे। वे इतने भयङ्कर थे कि संहार करनेके लिये उद्यत-से जान पड़ते थे। उन्होंने अपने सारे अङ्गोंमें भस्म रमा रखा था तथा वे जोर-जोरसे सिंहनाद करते थे ॥ २ ॥
त्रिपुण्ड्रकललाटान्तौ रुद्राक्षपरिशोभितौ ।
अन्यौ द्वाविव रुद्रौ तौ लोकसंहारकारकौ ॥ ३ ॥
उनके ललाटके प्रान्तभागोंतक फैली हुई त्रिपुण्ड्रकी रेखा शोभा पाती थी। वे दोनों रुद्राक्षकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो दो दूसरे रुद्र सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये आ गये हों ॥ ३ ॥
ततोऽनुजग्मुः शतशः सैन्यानि नृपसत्तम ।
अक्षौहिण्यो दशैवासंस्तयोरथ समागताः ॥ ४ ॥
नृपश्रेष्ठ! उन दोनोंके पीछे-पीछे सैकड़ों सैनिक चल रहे थे। हंस और डिम्भककी दस अक्षौहिणी सेनाएँ वहाँ आ गयी थीं ॥ ४ ॥
विचक्रस्तु महाराज दानवो नगसंनिभः ।
तयोरेव सखा पूर्वमासीच्च बलशालिनोः ॥ ५ ॥
महाराज! उन दोनोंके साथ विचक्र नामक पर्वताकार दानव भी था, जो उन बलशाली बन्धुओंका पहलेसे ही मित्र था ॥ ५ ॥
शक्रो यस्य पुरःसरः स्थातुं शक्तो न वज्रभृत् ।
यो हि वीरो महाराज देवदैत्यसमागमे ॥ ६ ॥
देवान् निघ्नंस्तथा राजन् देवेन्द्रमजयन्महान् ।
वज्रधारी इन्द्र भी उसके आगे आकर ठहर नहीं सकते थे। महाराज जनमेजय! देवताओं और दैत्योंके संग्राममें उस महान् वीरने देवताओंपर चोट करते हुए वहाँ देवराज इन्द्रको भी पराजित कर दिया था ॥ ६ १/२ ॥
अकरोच्च पुरा युद्धं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ७ ॥
यो हि द्वारवतीं प्राप्य बबाधे यदुपुङ्गवान् ।
पूर्वकालमे इस विचक्रने प्रभावशाली भगवान् विष्णुके साथ युद्ध किया था और द्वारकापुरीमें जाकर श्रेष्ठ यादवोंको बड़ा कष्ट दिया था ॥ ७ १/२ ॥
स तदानीं महाराज श्रुत्वा युद्धमुपस्थितम् ॥ ८ ॥
अनेकशतसाहस्रैर्दानवैः परिघायुधैः ।
वृतः समभवद् दैत्यो वृष्णिद्वेषान् नृपोत्तम ॥ ९ ॥
हंसस्य डिम्भकस्याथ साहाय्यं कर्तुमुद्यतः ।
महाराज नृपश्रेष्ठ! उस समय युद्ध उपस्थित हुआ सुनकर कई लाख परिघधारी दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य वृष्णिवंशियोंसे द्वेष रखनेके कारण हंस और डिम्भककी सहायता करनेके लिये उद्यत हो गया ॥ ८-९ १/२ ॥
विचक्रस्याथ दैत्यस्य हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ १० ॥
अतीव मित्रतां यातो दद्यात् प्राणान्श्च संयति ।
उन दिनों राक्षसराज हिडिम्ब विचक्रनामक दैत्यका बड़ा भारी मित्र हो गया था। वह युद्धमें उसके लिये प्राण भी दे सकता था ॥ १० १/२ ॥
राक्षसैरपरैः सार्धं शिलाशूलासिपाणिभिः ॥ ११ ॥
ययौ तस्य सहायार्थं हिडिम्बः पुरुषादपः ।
राक्षसराज हिडिम्ब शिला, शूल और खड्ग धारण करनेवाले दूसरे राक्षसोंके साथ विचक्रकी सहायताके लिये वहाँ गया ॥ ११ १/२ ॥
अष्टाशीति सहस्राणि राक्षसास्तस्य चाभवन् ॥ १२ ॥
अनुयाता महाराज शिलापरिघबाहवः ।
महाराज! अपने हाथोंमें शिला और परिघ लिये अठासी हजार राक्षस उस हिडिम्बके अनुगामी होकर वहाँ गये थे ॥ १२ १/२ ॥
तयोस्तत्र महासैन्यं गच्छतोः केशवं प्रति ॥ १३ ॥
मिश्रितं दैत्यसंघैश्च राक्षसैश्च समन्ततः ।
१०७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अन्यद्भूतं महारौद्रं त्रैलोक्यभयदायकम् ॥ १४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णपर चढ़ाईके लिये जाते हुए हंस और डिम्भककी विशाल सेना वहाँ सब ओरसे दैत्यसमूहों तथा राक्षसोंसे मिश्रित हो गयी। वह अत्यन्त अद्भुत और महा-भयंकर सेना तीनों लोकोंको भय देनेवाली थी ॥ १३-१४॥
दैत्येन सहितौ तौ हि जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
तावेतो हंसडिम्भकौ हन्तुं केशवमञ्जसा ॥ १५ ॥
विचक्र नामक दैत्यके साथ ये दोनों हंस और डिम्भक श्रीकृष्णका अनायास वध करनेके लिये पुष्करतीर्थको गये ॥ १५ ॥
ततः श्रुत्वा जरासंधो विग्रहं यदुभिः सह ।
नाकरोन्नृपसाहाय्यं पापं मे भवितेति ह ॥ १६ ॥
तदनन्तर यादवोंके साथ हंस और डिम्भकके युद्धका समाचार सुनकर जरासंधने उन दोनों नरेशोंकी सहायता नहीं की । उसने सोचा कि ऐसा करनेसे मुझे पाप लगेगा*॥ १६ ॥
गच्छतोः समितिं राजन् हंसस्य डिम्भकस्य च ।
अतित्वरितविक्रान्तास्ते ययुः पुष्करं प्रति ॥ १७ ॥
राजन् ! युद्धमें जाते हुए हंस और डिम्भकके साथ वे शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेशगण भी पुष्करको गये ॥ १७ ॥
सिंहनादं विमुञ्चन्तः कथयन्तः परस्परम् ।
अहमेव नृपा युद्धं करोमि प्रथमं हरेः ॥ १८ ॥
वे सब-के-सब सिंहनाद करते हुए परस्पर कहते थे कि 'राजाओ ! पहले मैं ही श्रीकृष्णके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १८ ॥
इत्यब्रुवन् नृपा राजञ्छतशः केशवं प्रति ।
सम्प्राप्तास्ते नृपश्रेष्ठाः पुष्करं पुण्यवर्धनम् ॥ १९ ॥
राजन् ! इस तरह सैकड़ों नरेशोंने श्रीकृष्णसे युद्ध करनेकी बात कही । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे श्रेष्ठ नरेश पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे ॥ १९ ॥
मुनिजुष्टं तपोवृद्धैर्ऋषिभिश्च निषेवितम् ।
अत्यन्तभद्रं लोकेषु पुष्करं प्रथमं नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! तपस्यामें बढ़े-चढ़े ऋषि-मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। पुष्कर ही वह प्रथम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें अत्यन्त कल्याणकारी बताया गया है ॥ २० ॥
पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव जगतीपते ।
दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव किल्विषच्छेदिनौ नृप ॥ २१ ॥
पृथ्वीनाथ ! राजा जनमेजय ! पुष्करतीर्थ और पुण्डरीकाक्ष भगवान् श्रीकृष्ण—ये दो ही ऐसे हैं, जो दर्शन और स्पर्शसे सारे पापोंका उच्छेद करनेवाले हैं ॥ २१ ॥
पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव नृपसत्तम ।
सेव्यमानौ मुनिश्रेष्ठैरमरैर्धर्महात्मभिः ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ ! पुष्कर और पुण्डरीकाक्ष—इन दोका ही श्रेष्ठ मुनि तथा महामनस्वी देववृन्द सेवन करते हैं ॥ २२ ॥
द्वावेव हि नृपश्रेष्ठ सर्वपापप्रणाशकौ ।
तावुभौ यत्र सहितौ तत्र ते संस्थिता नृपाः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वे दो ही सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। वे दोनों जहाँ एक साथ हो गये थे, वहाँ वे सब नरेश उपस्थित हुए ॥ २३ ॥
दृष्टवन्तो हरिं विष्णुं विश्रुतश्रवसं परम् ।
पुष्करं पुण्यनिलयं तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम् ॥ २४ ॥
उन सबने वहाँ विस्तृत यशवाले परम पुरुष भगवान् विष्णु हरिका तथा ब्रह्माजीके द्वारा सेवित पुण्य-स्थान पुष्करतीर्थका दर्शन साथ ही किया ॥ २४ ॥
ताभ्यां कुरु नमस्कारं मनसा नृपसत्तम ।
अहो निःशेषमभवत् तत्र भूयो न संशयः ॥ २५ ॥
सैन्यं तत्र च सम्प्राप्तं दैत्यरक्षःसमाकुलम् ।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! तुम भी अपने मनसे पुष्करतीर्थ और भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करो। अहो ! वहाँ दैत्यों और राक्षसोंसे भरी हुई जो सेना पहुँची थी, वह सारी-की-सारी फिर नष्ट हो गयी, इसमें संशय नहीं है ॥ २५३/४ ॥
अनेकभेरीपणवझर्झरीडिण्डिमाकुलम् ॥ २६ ॥
नानापणवसम्मिश्रं रक्षोनादविनादितम् ।
वह सेना अनेकानेक भेरी, पणव, झाँझ और नगाड़ोंकी ध्वनिसे व्याप्त थी, नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे मिश्रित राक्षसोंके सिंहनादसे गूँज रही थी ॥ २६३/४ ॥
प्रविश्य सरसस्तीरं पुष्करस्य विशाम्पते ।
दर्शयामास देवेशं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ २७ ॥
प्रजानाथ ! उस सेनाने पुष्कर-सरोवरके तटपर पहुँचकर युद्धके लिये उपस्थित हुए देवेश्वर श्रीकृष्णका एक दूसरेको दर्शन कराया ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने युद्धार्थं हंसडिम्भकसैन्यानां पुष्करागमने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें युद्धके लिये हंस और डिम्भककी सेनाका पुष्करतीर्थमें आगमनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
* शास्त्रकी आज्ञा है कि 'परासक्तः परेण न हन्तव्यः' (दूसरेके साथ युद्धमें फँसे हुए पुरुषको दूसरा न मारे), हंसकी सहायतामें जानेसे जरासंधको उक्त शास्त्राज्ञाके उल्लङ्घनजनित दोषकी प्राप्ति होती, इसलिये वह नहीं गया ।
भविष्यपर्व ] द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७७
द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः उभयपक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध
वैशम्पायन उवाच द्वे सेने संगते राजन् सध्वजे सपरिच्छदे । महापरिघसंकीर्णे गदाशक्तिसमाकुले ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन् ! वे दोनों ओरकी सेनाएँ वहाँ एक दूसरीसे मिल गयीं । वे ध्वज तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न थीं । दोनों ही दलोंमें बड़े-बड़े परिघ सञ्चित थे । दोनों ही सेनाएँ गदा और शक्तियोंसे भरी-पूरी थीं ॥ १ ॥
भेरीझर्झरसम्पूर्णे डिण्डिमारावसंकुले । प्रगृहीतमहाशस्त्रशूलासिवरकार्मुके ॥ २ ॥ दोनोंमें भेरी और झाँझकी ध्वनि हो रही थी । दोनों ही डिंडिम-घोषसे व्याप्त थीं। दोनों ही दलोंके सैनिकोंने बड़े-बड़े शस्त्र, शूल, खङ्ग और श्रेष्ठ धनुष ले रखे थे ॥ २॥
परस्परकृतोत्साहे चक्राते युद्धमुल्बणम् । ते शराः कार्मुकोत्सृष्टा निर्भिद्याथ शरीरिणाम् ॥ ३॥ शरीराणि महाराज जग्मुर्दूरं सहस्रशः । महाराज ! दोनों सेनाएँ एक दूसरीको जीतनेका उत्साह रखती थीं । दोनों भयंकर युद्ध करने लगीं । उनके धनुषोंसे छूटे हुए सहस्रों बाण देहधारियोंके शरीरोंको विदीर्ण करके दूरतक चले जाते थे ॥ ३ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥
भटबाहुविनिर्मुक्ताः खङ्गा निर्भिद्य वक्षसि ॥ ४ ॥ स्फुरन्तश्च तथा राजञ्छिरांस्याहृत्य खं ययुः । राजन् ! योद्धाओंकी भुजाओंसे छूटे हुए खङ्ग शत्रु की छातीमे घाव करके जब उछलते, तब उनके सिर काटकर आकाशमें चले जाते ॥ ४ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥
परिघाश्च तथा राज्ञां बाहुभिः परिचोदिताः ॥ ५ ॥ तिलशश्चक्रतुस्त्वं शरीरं नृपरक्षसाम् । दैत्यानां कुर्वतां नादमन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ॥ ६ ॥ क्षत्रियोंकी भुजाओं द्वारा फेंके गये परिघ राजाओं तथा राक्षसोंके अनुपम शरीरको तिल-तिल करके काट डालते थे तथा एक दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले दैत्योंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ५-६ ॥
दैत्या रक्षांसि राजेन्द्र राजानश्च समन्ततः । अन्योन्यं परिघैर्जघ्नुश्चापमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ७ ॥ शरैश्च भोगिभोगाभैस्तीक्ष्णमन्ये महाबलाः । राजेन्द्र ! दैत्य, राक्षस और राजा लोग सब ओर एक दूसरेपर परिघोंद्वारा प्रहार करते थे तथा अन्य महाबली वीर शिलापर तेज करके धनुषसे छोड़े गये सर्पाकार बाणोंद्वारा गहरा आघात करते थे ॥ ७ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥
राक्षसा दानवाश्चान्ये मत्तमातङ्गविक्रमाः ॥ ८ ॥ अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैर्महाशरैः । राजन् ! मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी राक्षस और अन्य दानव धनुषसे छोड़े गये महान् बाणोंद्वारा परस्पर चोट पहुँचाते थे ॥ ८ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥
नागा नागैर्महाराज हया अश्वैः समन्ततः ॥ ९ ॥ रथा रथैः समाजग्मुः सादिनः सादिभिस्तथा । महाराज ! वहाँ सब ओर हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ ९ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥
पट्टिशाशिशरवातैः कुन्तैः सायककर्पणैः ॥ १० ॥ सशक्तिपरिघप्रासपरश्वधसमाकुलैः । भिन्दिपालैर्महारौद्रैरर्जुन्युरन्योन्यमाहवे ॥ ११ ॥ पट्टिश, खङ्ग, बाणसमूह, सायकोंको भी काट गिरानेवाले कुन्त, शक्ति, परिघ, प्रास और फरसोंसहित महाभयंकर भिन्दिपाल आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सभी योद्धा रणभूमिमें एक दूसरेको मारने लगे ॥ १०-११ ॥
अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैः शिलाशितैः । राक्षसा दानवा राजन् क्षत्रियाश्च समन्ततः । इतश्चेतश्च धावन्तः कुर्वन्तो विस्तरं रवम् ॥ १२ ॥ राजन् ! इधर-उधर दौड़ते और विकट गर्जना करते हुए राक्षस, दानव तथा क्षत्रिय शिलापर तेज कर धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा सब ओर परस्पर प्रहार करते थे ॥ १२ ॥
हताः केचिन्महाराज पेतुरुर्व्यां महासिभिः । केचिन्मथितमस्तिष्का गदाभिर्वीर्यवत्तमाः ॥ १३ ॥ महाराज ! कोई बड़ी-बड़ी तलवारोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े । कितने ही महापराक्रमी वीरोंके मस्तक गदाओंके आघातसे चूर-चूर हो गये ॥ १३ ॥
भिन्नग्रीवा महाराज परिघैः परिघायुधैः । यमराष्ट्रं गताः केचित् केचित् स्वर्गं समाययुः ॥ १४ ॥ महाराज ! कितने ही परिघधारी योद्धाओंने अपने परिघोंद्वारा शत्रुओंकी गर्दनें तोड़ डालीं, उन मारे शत्रुओंमें से कुछ तो यमराजके राज्यमें गये और कुछ स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १४ ॥
अप्सरोभिः समासेदुः पश्यन्तः स्वं कलेवरम् । केचित् स्वांश्च परांश्चैव हत्वा भ्रान्ता इवाभवन् ॥ १५ ॥ वे अपने मृत शरीरको देखते हुए अप्सराओंसे जा मिले । कितने ही योद्धा परायों तथा अपनोंको भी मारकर भ्रान्त-से हो गये थे ॥ १५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजञ्छङ्खा भेर्यः सहस्रशः । सस्वनुः सर्वतः सैन्ये मृदङ्गा बहवस्तथा ॥ १६ ॥
१०७८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
राजन् ! इसी बीचमें सहस्रों शङ्खों और भेरियोंकी ध्वनि होने लगी। सेनामें सब ओर बहुत-से मृदङ्ग बजने लगे ॥ १६ ॥
मध्यंदिनगते सूर्ये तापं दधति घोरवत्।
ततः पिशाचा विकृताः करालचिततोदराः ॥ १७ ॥
राक्षसाश्च महाघोराः पिशितं केशशाद्वलम्।
मुदिता भक्षयामासुः पिबन्तः शोणितं बहु ॥ १८ ॥
सूर्य मध्याह्नकालमें पहुँचकर जब घोर ताप देने लगे, उस समय विशाल एवं विकराल पेटवाले विकृताकार पिशाच और महाघोर राक्षस आकर बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत-सा रक्त पीने और केशयुक्त मांस खाने लगे ॥ १७-१८ ॥
संचितानि शवान्यासन् कबन्धाः खड्गपातिताः।
विभज्य देशं बहुशो युद्धभूमौ शवाशिनः ॥ १९ ॥
वहाँ ढेर-की-ढेर लाशें पड़ीं थीं, खड्गोंद्वारा गिराये हुए बिना सिरके धड़ एकत्र हो गये थे। वे शवका भक्षण करनेवाले पिशाच युद्धभूमिमें परस्पर बहुत-से देशका विभाजन करके मृतकोंके मांस खाते थे ॥ १९ ॥
अथ श्येना मृगाश्चैव कङ्का गृध्रास्तथा परे।
तुण्डैः शवान् विनिष्कृष्य भक्षयन्ति ततस्ततः ॥ २० ॥
तदनन्तर बहुत-से बाज, हिंसक जन्तु, कंक, गृध्र तथा अन्य पक्षी इधर-उधरसे आकर अपनी चोंचोंसे मुर्दोंको खींच-खींचकर खाने लगे ॥ २० ॥
सप्ताशीतिसहस्राणि हता नागा नृपोत्तम।
त्रिंशत्सहस्रायुतं निहता हयसत्तमाः ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस युद्धमें सत्तासी हजार हाथी मारे गये तथा तीस करोड़ अच्छे घोड़ोंका संहार हुआ ॥ २१ ॥
हतं लक्षं महाराज रथानां रथिभिः सह।
त्रिंशत्कोट्यो हतास्तत्र सादिनः सायुधा भृशम् ॥ २२ ॥
महाराज ! रथियोंसहित एक लाख रथ नष्ट हुए तथा वहाँ तीस करोड़ शस्त्रधारी घुड़सवार गहरी चोट खाकर मारे गये थे ॥ २२ ॥
मध्यंदिनगते सूर्ये हताः केचन निर्गताः।
केचिच्च तृषिता राजन् विविशुः पुष्करं सरः ॥ २३ ॥
राजन् ! सूर्यके मध्याह्नकालमें पहुँचते-पहुँचते कितने ही योद्धा घायल होकर रणभूमिसे निकल गये और कितने ही प्याससे पीड़ित हो पुष्कर सरोवरमें घुस गये ॥ २३ ॥
केचिद् भूमिं समालिङ्ग्य भीता इत्यब्रुवन् रणे।
मुक्तकेशाः पतन्ति स्म रथान् संत्यज्य केचन ॥ २४ ॥
कितने ही सैनिक पृथ्वीका आलिङ्गन करके पड़ गये और रणभूमिमें अपनेको भयभीत बताने लगे। कितने ही योद्धा केश खोले हुए रथोंको छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ २४ ॥
संदष्टौष्ठपुटाः केचित् सादिनः पुरतो हताः।
अत्यद्भुतं महायुद्धमासीत् पुष्करतीर्थके।
यथा देवासुरं युद्धमासीत् पूर्वे नृपोत्तम ॥ २५ ॥
कितने ही घुड़सवार दाँतोंसे ओठ दबाये सामने मारे गये। नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार पुष्करतीर्थमें अत्यन्त अद्भुत महान् युद्ध हुआ। पूर्वकालमें जिस प्रकार देवासुर-संग्राम हुआ था, वैसा ही यह भी था ॥ २५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने संकुलयुद्धे द्वार्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें संकुल-युद्धविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और विचक्रका घोर युद्ध तथा विचक्रका वध
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्वन्द्वयुद्धमवर्तत।
विचक्रं योधयामास शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इसी बीचमें वहाँ द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। शार्ङ्गधन्वा गदाधारी श्रीकृष्णने विचक्रके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥
बलभद्रोऽथ हंसेन डिम्भकेन च सात्यकिः।
वसुदेवोग्रसेनाभ्यां हिडिम्बः पुरुषादकः ॥ २ ॥
बलभद्रने हंसके साथ और सात्यकिने डिम्भकके साथ लोहा लिया। नरभक्षी हिडिम्ब वसुदेव तथा उग्रसेनके साथ युद्ध करने लगा ॥ २ ॥
शेषाश्च शेषै राजेन्द्र चक्रुर्युद्धमदीनगाः।
वासुदेवस्त्रिसप्तत्या दैत्यं वक्षस्यताडयत् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र ! किसीके सामने दीनता न प्रकट करनेवाले शेष वीर शेष योद्धाओंके साथ जूझने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने दैत्यकी छातीमें तिहत्तर बाण मारे ॥ ३ ॥
शरैर्निशितधाराग्रैर्विस्मयं दर्शयन् रणे।
दानवो देवदेवेशं दृढेन निशितेन च ॥ ४ ॥
शरेणाकर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमीश्वरम्।
जघान स्तनमध्ये च पश्यतस्तु शचीपतेः ॥ ५ ॥
उन बाणोंकी धार बड़ी तीखी थी। उन्होंने रणभूमिमें विस्मय प्रकट करते हुए उस दैत्यपर प्रहार किया था। तब उस दानवने भी अपने श्रेष्ठ धनुषको कानतक खींचकर एक सुदृढ़ और पैने बाणसे देवदेवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी छातीमें
भविष्यपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७९
शचीपति इन्द्रके देखते-देखते प्रहार किया ॥ ४-५ ॥
तेन विद्धोऽथ भगवान् वक्षोदेशे जनार्दनः।
अवमच्छोणितं विष्णुरादिकाले यथा प्रजाः ॥ ६ ॥
वक्षःस्थलमें उसके बाणकी चोट खाकर भगवान् जनार्दन विष्णु रक्त वमन करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सृष्टिके आदि कालमें उन्होंने प्रजावर्गको अपने मुखसे प्रकट किया था॥
ततः क्रुद्धो हृषीकेशः क्षुरप्रेणाहनद् ध्वजम्।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा सारथिं च शरैस्त्रिभिः ॥ ७ ॥
ततो दध्मौ महाशङ्खं यथा तारामये रणे।
तदनन्तर कुपित हुए भगवान् हृषीकेशने एक क्षुरप्रसे उस दानवकी ध्वजा काट डाली, फिर उसके चारों घोड़ोंको मारकर तीन बाणोंसे सारथिको भी कालके गालमें डाल दिया। तदनन्तर तारकामय संग्रामकी भाँति उन्होंने अपना महान् शङ्ख बजाया ॥ ७ १/२ ॥
रथादुत्प्लुत्य सहसा दानवः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ८ ॥
गदां गृह्य महाघोरां दुःसहां वीर्यशालिनीम्।
तया जघान दैत्येन्द्रः किरीटे केशवस्य ह ॥ ९ ॥
ललाटे च पुनुर्विष्णुं सिंहनादं व्यनीनदत्।
तब क्रोधसे मूर्च्छित हुए उस दानवने सहसा रथसे उछलकर एक दुःसह शक्तिशाली एवं महाभयंकर गदा हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस दैत्यराजने पहले तो श्रीकृष्णके किरीटपर आघात किया, फिर उनके ललाटमें चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् वह जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ ८-९ १/२ ॥
ततः शिलां च महतीं प्रगृह्य दनुजः किल ॥ १० ॥
भ्रामयित्वा दशगुणं प्राहरत् केशवोरसि।
इसके बाद उस दानवने एक बहुत बड़ी शिला उठायी और उसे दस बार घुमाकर भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर दे मारा॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य हस्तेनादाय केशवः ॥ ११ ॥
जघान च तया दैत्यं स पपातार्दितः क्षितौ।
गतासुरिव संजज्ञे श्वसन्निव पपात ह ॥ १२ ॥
उस शिलाको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने हाथसे पकड़ लिया और उसीसे उस दैत्यपर आघात किया। उस प्रहारसे पीड़ित हो वह दैत्य प्राणहीन-सा हो गया और लंबी साँस-सा खींचता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१२ ॥
प्राप्य संज्ञां ततो दैत्यः क्रोधाद् द्विगुणमाबभौ।
आदाय परिघं घोरमिदमाह जनार्दनम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर होशमें आकर वह दैत्य कुपित हो उठा। क्रोधसे उसकी आभा दुगुनी हो गयी। उसने भयंकर परिघ लेकर भगवान् जनार्दनसे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥
अनेन तव गोविन्द दर्पजातं निहन्म्यहम्।
विक्रमज्ञस्तदा चासि मम देवासुरे रणे ॥ १४ ॥
'गोविन्द ! इस परिघसे मैं तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण किये देता हूँ। उन दिनों जब देवासुर-संग्राम हो रहा था, तुम मेरा पराक्रम जान चुके हो ॥ १४ ॥'
तावेव विपुलौ बाहू स एवास्मि जनार्दन।
तथापि युध्यसे वीर ज्ञात्वा त्वं मामकं बलम् ॥ १५ ॥
वारयैनं महाबाहो परिघं बाहुनिःसृतम्।
'जनार्दन ! वे ही दोनों मेरी विशाल भुजाएँ हैं और वही मैं हूँ। वीर ! तुम मेरे बलको जान चुके हो, तो भी मुझसे युद्ध करते हो। महाबाहो ! मेरी भुजाओंसे छूटे हुए इस परिघको रोको तो सही' ॥ १५ १/२ ॥
इत्युक्त्वा देवदेवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्।
चिक्षेप दैत्यो लोकेशं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर उस दैत्यने सब लोगोंके देखते-देखते शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर जगदीश्वर श्रीकृष्णपर वह परिघ चला दिया ॥ १६ ॥
तं गृह्य बाहुना कृष्णो हतोऽसीति वदन् हरिः।
खण्डशः कारयामास खड्गेन निशितेन ह ॥ १७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने उस परिघको हाथसे पकड़ लिया और 'अब तू शीघ्र ही मारा जायगा' ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी तीखी तलवारसे उस परिघके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥
उत्पाट्य वृक्षं दैत्येशः शतशाखं महाशिखम्।
तेन सम्पोथयामास विष्टरश्रवसं विभुम् ॥ १८ ॥
तब उस दैत्यराजने सौ शाखा और बहुत ऊँची शिखा-वाले एक विशाल वृक्षको उखाड़कर उसे विस्तृत यशवाले भगवान् श्रीकृष्णपर दे मारा ॥ १८ ॥
छित्त्वा तं चापि खड्गेन तिलशश्च चकार ह।
विक्रीड्य सुचिरं विष्णुस्तेन दैत्येन माधवः ॥ १९ ॥
हन्तुमैच्छत् तदा दैत्यमादाय निशितं शरम्।
आग्नेयास्त्रेण संयोज्य जघानैनं महान् हरिः ॥ २० ॥
माधव श्रीकृष्णने अपनी तलवारसे उस वृक्षको भी तिल-तिल करके काट डाला। इस प्रकार उस दैत्यके साथ चिरकालतक क्रीड़ा करके भगवान् महाविष्णुने उस समय उसे मार डालनेकी इच्छा की और एक तीखा बाण हाथमें लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे संयुक्त करके उसके द्वारा उस दैत्य-पर आघात किया ॥ १९-२० ॥
संदह्य स शरो दैत्यं सर्वलोकस्य पश्यतः।
यथापूर्वं जगामाशु करं भगवतः पुनः ॥ २१ ॥
उस बाणने सब लोगोंके देखते-देखते दैत्यको जलाकर भस्म कर दिया और पहलेकी भाँति वह शीघ्र ही भगवान्के हाथमें चला गया ॥ २१ ॥
१०८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
हतशिष्टास्ततो दैत्याः पलायन्तो दिशो दश ।
अद्यापि न निवर्तन्ते गच्छन्तो वै महोदधिम् ॥ २२ ॥
फिर मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें भागते हुए महासागरको चले गये। वे अब भी वहाँसे लौट नहीं रहे हैं॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णस्योत्कर्षे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णकी विजयविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
हंस और बलभद्रका युद्ध
| वैशम्पायन उवाच<br>बलदेवस्तु धर्मात्मा धनुरुदाय सत्वरम्<br>जघान हंसं दशभिर्बाणैर्बाणभृतां वर ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बाणधारियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा बलदेवजीने तुरंत धनुष लेकर दस बाणोंसे हंसको घायल कर दिया ॥ १ ॥ | ते मुक्ता निशिता घोरा नाराचाश्च सुवाजिनः ॥ ७ ॥<br>रथे ध्वजे तथा चापे चक्रे तूणीद्वये नृप ।<br>पतिताः सर्वतो राजन् व्यथां चैव तथा ददुः ॥ ८ ॥<br><br>राजन् ! उनके धनुषसे छूटे हुए वे सुन्दर पंखवाले तीखे और भयंकर नाराच हंसके रथ, ध्वज, धनुष, चक्र और दोनों तरकसपर पड़कर सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ ७-८ ॥ |
| तं प्रत्यविध्यन्नाराचैर्हंसः पञ्चभिराशुगैः<br>तानन्तरे हली छित्त्वा नाराचैर्दशभिः पुनः ।<br>नाराचेनाशु विव्याध ललाटे हंसमोजसा ॥ २ ॥<br><br>हंसने भी बदलेमें पाँच शीघ्रगामी नाराचोंद्वारा उनपर प्रहार किया; परंतु हलधरने पुनः दस नाराच मारकर बीच-में ही उन्हें काट दिया और शीघ्र ही एक नाराचसे हंसके ललाटमें बलपूर्वक आघात किया ॥ २ ॥ | ततः क्रुद्धो महाराज हंसो वीर्यमदान्वितः ।<br>शरेण हलिनं विद्ध्वा ध्वजं चिच्छेद कालवित् ॥ ९ ॥<br>शरैश्चतुर्भिंरश्वांश्च सूतं प्रेताधिपे ददौ ।<br><br>महाराज ! तब बल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुए और समयका ज्ञान रखनेवाले हंसने कुपित होकर एक बाणसे हलधरको घायल करके उनकी ध्वजा काट डाली; फिर चार बाणोंसे चारों घोड़ोंको मारकर एक बाणसे उनके सारथिको भी यमराजके हवाले कर दिया ॥ ९½ ॥ |
| दृढं पतन् स नाराचस्तस्य संज्ञां समाददे ।<br>रथोपस्थे चिरं स्थित्वा तूणाद् बाणं समाददे ॥ ३ ॥<br>लब्ध्वा हंसः स संज्ञां तु विद्ध्वा तेन यदूत्तमम् ।<br>सिंहवद् व्यनदद्धंसो देवान् विस्मापयन् रणे ॥ ४ ॥<br><br>उस नाराचने गहरी चोट पहुँचाकर हंसको अचेत कर दिया । वह देरतक रथके पिछले भागमें बैठा रहा । इसके बाद होशमें आकर हंसने तरकससे बाण निकाला और उससे यदुश्रेष्ठ बलभद्रको घायल करके रणभूमिमें देवताओंको विस्मयमें डालते हुए उसने सिंहके समान गर्जना की ॥ ३-४॥ | ततः क्रुद्धो हली तस्मै गदां गृह्य महारणे ॥ १० ॥<br>आपपात महाबाहुर्हंसं शेष इव श्वसन् ।<br><br>तब क्रोधमें भरे हुए महाबाहु हलधर उस महान् समर-में गदा लेकर फुफकारते हुए शेषनागके समान हंसपर टूट पड़े ॥ १०½ ॥ |
| ततः क्रुद्धो हली विद्धस्तेन बाणेन माधवः ।<br>वमञ्शोणितमत्युष्णं निःश्वसंश्च रणाजिरे ॥ ५ ॥<br><br>उसके बाणसे आहत होकर माधव हलधर कुपित हो उठे और समराङ्गणमें अत्यन्त उष्ण रक्त वमन करते हुए लंबी साँस खींचने लगे ॥ ५ ॥ | तया रथं ध्वजं चक्रमश्वान् सूतं हलायुधः ।<br>बभञ्ज तिलशः सर्वं ननाद च पुनः पुनः ॥ ११ ॥<br><br>हलधर बलरामजीने उस गदाके द्वारा हंसके रथ, ध्वज, चक्र, अश्व तथा सारथि सबको तिल-तिल करके काट डाला और बारंबार गर्जना की ॥ ११ ॥ |
| लोहिताविष्टगात्रस्तु कुंकुमार्ड्र इवाभवत् ।<br>नाराचैः शतसाहस्रैरर्दयामास माधवः ॥ ६ ॥<br>हंसं हंसगतिं वीरं नीलवासा हलायुधः ।<br><br>उनका शरीर रक्तसे रञ्जित हो कुङ्कुमसे भीगा हुआ सा प्रतीत होने लगा । तब नीलवस्त्रधारी हलधर माधवने हंसके समान गतिवाले वीर हंसको लाखों नाराचोंसे पीड़ित कर दिया ॥ ६½ ॥ | भूयश्च गदया हंसं चिक्षेप च बली किल ।<br>सोऽपि हंसो गदां गृह्य रथात् तस्मादवापतत् ॥ १२ ॥<br><br>बलवान् वीर बलभद्रने पुनः गदाद्वारा हंसको चोट पहुँचायी । यह देख हंस भी गदा लेकर अपने रथसे कूद पड़ा ॥ १२ ॥ |
| ततस्तौ हंसहलिनौ युयुधाते महारणे ।<br>महारथौ महाबाहू लोके प्रथिततेजसौ ॥ १३ ॥<br><br>तदनन्तर लोकमें विख्यात तेजवाले महाबाहु महारथी हंस और हलधर उस महासमरमें युद्ध करने लगे ॥ १३ ॥ |
भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८१
अत्यद्भुतं सुविक्रान्तौ परस्परवधैषिणौ ।
कृतश्रमौ महायुद्धे हंसविक्रान्तगामिनौ ॥ १४ ॥
वे दोनों परम पराक्रमी, एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले, महायुद्धके लिये परिश्रम करनेवाले और हंसके समान चलनेवाले थे। उनमें अत्यन्त अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ १४ ॥
यथा देवासुरे युद्धे शक्रवृत्रौ पुराम्वरे ।
उभौ संसिक्तसर्वाङ्गौ शोणितेन महारणे ॥ १५ ॥
जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर इन्द्र और वृत्रासुर आकाशमें जूझते थे, उसी प्रकार वे हंस और बलभद्र भी परस्पर युद्ध कर रहे थे। उस महासमरमें दोनोंके सारे अङ्ग खूनसे रँग गये थे ॥ १५ ॥
अत्यन्तखेदिनौ युद्धे परस्परबलेन ह ।
ततश्च दक्षिणं मार्गं बलभद्रोऽन्वगच्छत ॥ १६ ॥
उस युद्धस्थलमें एक-दूसरेके बलसे दोनोंको अत्यन्त खेद हो रहा था। तदनन्तर बलभद्रने दाहिने मार्गका अनुसरण किया ॥ १६ ॥
सव्यं तु हंसो राजेन्द्र व्यगृह्लात् स्वयमेव हि ।
पोथयाञ्चक्रतुर्युद्धे गदाभ्यां गजविक्रमौ ॥ १७ ॥
राजेन्द्र ! हंसने स्वयं ही बायें पैंतरेको अपनाया। हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों वीरोंने युद्धमें एक दूसरेको गदाद्वारा घायल किया ॥ १७ ॥
यथाप्राणं महाबाहू जघ्नतुर्मरणाय तौ ।
अतिप्रवृद्धं संग्रामं देवासुररणोपमम् ॥ १८ ॥
विदधाते महारङ्गे पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ।
उन महाबाहु वीरोंने पूरा बल लगाकर एक दूसरेके वधके लिये परस्पर प्रहार किया। उस महान् समराङ्गणमें समस्त देवताओंके देखते-देखते वे दोनों वीर देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥
देवाश्च मुनयश्चैव विस्मयं परिजग्मिरे ॥ १९ ॥
अहो खल्वीदृशं युद्धं दृष्टं पूर्वं न च श्रुतम् ।
इत्यूचुर्विस्मयवशाद् देवगन्धर्वकिन्नराः ॥ २० ॥
देवता और मुनि भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। देवता, गन्धर्व और किन्नर विस्मयके वशीभूत होकर इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ऐसा युद्ध हमने न तो पहले कभी देखा है और न सुना ही है' ॥ १९-२० ॥
परस्परकृतोत्साहौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।
अथ हंसो महारङ्गे दक्षिणं दक्षिणोत्तमः ॥
व्यचरन्मार्गमप्यर्थं सव्यं तु बलवान् बलः ॥ २१ ॥
एक दूसरेको जीतनेका उत्साह मनमें लिये वे दोनों वीर उत्तम युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर उदार पुरुषोंमें श्रेष्ठ हंसने उस महासमरमें दाहिने पैंतरेपर विचरना आरम्भ किया और बलवान् बलभद्र बायें पैंतरेपर अत्यन्त तीव्र गतिसे विचरने लगे ॥ २१ ॥
निकुञ्च्य जानुनी पूर्वं चक्रतुर्गदया भृशम् ।
रणे रणविदां श्रेष्ठौ पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ॥ २२ ॥
युद्धकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र और हंसने देवताओंके देखते-देखते पहले दोनों घुटनोंको मोड़कर रणभूमिमें एक-दूसरेको गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसबलभद्रयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और बलभद्रका युद्ध-विषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और डिम्भकका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
युद्धं चक्रतुरत्यर्थं ततो डिम्भकसात्यकी ।
तावुभौ बलिनौ वीरौ विख्यातौ क्षत्रियेषु च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर डिम्भक और सात्यकि अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। वे दोनों बलवान् वीर क्षत्रियोंमें विख्यात थे ॥ १ ॥
कृतश्रमौ महायुद्धे सततं वृद्धसेविनौ ।
सात्यकिर्दशभिर्वीरौ डिम्भकं वेदपारगम् ॥ २ ॥
अविध्यन्निशितैर्बाणैः स्तने वक्त्रे तथोरसि ।
उन्होंने महायुद्धमें बड़ा परिश्रम किया था। वे दोनों सदा वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाले थे। वीर सात्यकिने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् डिम्भकके स्तन, मुख और छातीमें दस पैने बाणोंसे प्रहार किया ॥ २ ॥
स तेन विद्धो बलिना डिम्भकः क्षत्रियोत्तमः ॥ ३ ॥
नाराचैः पञ्चसाहस्रैर्विव्याध युधि गर्वितः ।
तानन्तरे वृष्णिवीरो निभिन्दन् निनदन् ब्रुवन् ॥ ४ ॥
उस बलवान् वीरके द्वारा घायल किये गये क्षत्रियशिरोमणि डिम्भकने जिसे युद्धमें अपने पराक्रमपर बड़ा गर्व था, सात्यकिको पाँच हजार नाराचोंद्वारा चोट पहुँचायी, परंतु वृष्णिवीर सात्यकिने उन नाराचोंको बीचमें ही गर्जना करके तथा बोलकर हुंकारमात्रसे ही खण्डित कर दिया ॥ ३-४ ॥
अथ क्रुद्धो नृपवरो विद्धः सप्तभिराशुगैः ।
१०८२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
पुनः शतसहस्रेण प्रत्यविध्यत सात्यकिम् ॥ ५ ॥ तब सात शीघ्रगामी बाणोंसे घायल होकर कुपित हुए नृपश्रेष्ठ डिम्भकने पुनः एक लाख बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥
सात्यकिस्त्वथ विक्रान्तो धनुश्चिच्छेद तस्य तत् । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन डिम्भकस्य स यादवः ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पराक्रमी यादव वीर सात्यकिने एक तीखे अर्धचन्द्राकार बाणसे डिम्भकके उस धनुषको काट डाला ॥ ६ ॥
आजघ्ने डिम्भको वीरश्चापमादाय चापरम् । क्षुरप्रेणाथ रौद्रेण तैलधौतेन विक्रमी ॥ ७ ॥ तब पराक्रमी वीर डिम्भकने दूसरा धनुष लेकर तेलसे धुले हुए भयंकर क्षुरप्रके द्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७ ॥
स तेन विद्धो बाणेन वमञ्छोणितकं नृप । अतीव शुशुभे राजन् वसन्ते किंशुको यथा ॥ ८ ॥ राजन् ! उस बाणसे घायल हो रक्त वमन करते हुए सात्यकि वसन्तमें खिले हुए पलाशके समान बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ८ ॥
धनुश्चिच्छेद भूयस्तु गृहीतं यत् पुनर्महत् । ततोऽन्यद् धनुरादाय डिम्भको यादवेश्वरम् ॥ ९ ॥ जघान निशितैर्बाणैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । तब उन्होंने पुनः डिम्भकके उस विशाल धनुषको काट डाला, जिसको उसने दुबारा हाथमें लिया था। तदनन्तर डिम्भकने पुनः दूसरा धनुष हाथमें लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते यादवेश्वर सात्यकिको पैने बाणोंसे घायल करना आरम्भ किया ॥ ९ १/२ ॥
स धनुः पुनरत्युग्रं चिच्छेद युधि सात्यकिः ॥ १० ॥ शरेण तीक्ष्णपुङ्खेन डिम्भकस्य दुरात्मनः । सात्यकिने युद्धस्थलमें दुरात्मा डिम्भकके उस अत्यन्त भयंकर धनुषको तीखे पंखवाले बाणसे पुनः काट डाला ॥ १० १/२ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय सत्वरं स नृपोत्तमः ॥ ११ ॥ धनुषा तेन राजेन्द्र सात्यकिं विव्यधे पुनः । राजेन्द्र ! फिर नृपश्रेष्ठ डिम्भकने तुरंत दूसरा धनुष लेकर उसके द्वारा सात्यकिको पुनः बींधना आरम्भ किया ॥ ११ १/२ ॥
एवं धनूंषि राजेन्द्र शतं पञ्च च पञ्च च ॥ १२ ॥ छित्त्वा ननाद शैनेयः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । राजाधिराज जनमेजय ! इस प्रकार सात्यकिने सब क्षत्रियोंके देखते-देखते डिम्भकके एक सौ दस धनुष काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १२ १/२ ॥
धनुषी तौ परित्यज्य वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १३ ॥ खड्गौ प्रगृह्य बाल्यग्रौ युद्धाय समुपस्थितौ । तौ हि खड्गविदां श्रेष्ठौ वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १४ ॥ तब डिम्भक और सात्यकि दोनों वीर अपने धनुषोंको त्यागकर अत्यन्त भयंकर खड्ग हाथमें ले परस्पर युद्धके लिये उपस्थित हुए। वे दोनों वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥ १३-१४ ॥
दौःशासनिर्महाभागः सोमदत्तिस्तथैव च । अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च ॥ १५ ॥ एते खड्गविदां श्रेष्ठाः कीर्तिता युधि सत्समाः । महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—ये युद्धस्थलके छः श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं ॥ १५ १/२ ॥
एतेष्वेतो नृपश्रेष्ठौ षट्सु वै नृपसत्तम ॥ १६ ॥ तावेतावासिना युद्धं चक्रतुर्युद्धलालसौ । नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं। वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे ॥ १६ १/२ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धं प्रविद्धं बाहुनिःसृतम् ॥ १७ ॥ आकरं विकरं भिन्नं निर्मर्यादममानुषम् । संकोचितं कुलचितं सव्यजानु विजानु च ॥ १८ ॥ आह्निकं चित्रकं क्षिप्तं कुसुम्यं लम्बनं धुतम् । सर्वबाहु विनिर्बाहु सव्येतरमथोत्तरम् ॥ १९ ॥ त्रिबाहु तुङ्गबाहुञ्च सन्योन्नसमुदासि च । पट्टिकं मौष्टिकं चैव यौधिकं प्रथितं तथा ॥ २० ॥ इति प्रकारान् द्वात्रिंशच्चक्रतुः खड्गयोधिनौ । पुनः पुनः प्रहरन्तौ न च श्रममुपेयतुः ॥ २१ ॥ पुष्करस्थौ महाराज युद्धाय कृतनिश्चयौ । भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनिःसृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मर्याद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आह्निक, चित्रक, क्षिप्त, कुसुम्य, लम्बन, धुत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुङ्गबाहु, सन्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित--ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये। वे बारंवार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज ! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १७--२१ १/२ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ २२ ॥ तुष्टुवुस्तौ महाराज जये कृतपरिश्रमौ । जनमेजय ! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे- ॥ २२ १/२ ॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमनयोर्बाहुशालिनोः ॥ २३ ॥