भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1107

१०८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


हतशिष्टास्ततो दैत्याः पलायन्तो दिशो दश ।
अद्यापि न निवर्तन्ते गच्छन्तो वै महोदधिम् ॥ २२ ॥

फिर मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें भागते हुए महासागरको चले गये। वे अब भी वहाँसे लौट नहीं रहे हैं॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णस्योत्कर्षे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णकी विजयविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥


चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

हंस और बलभद्रका युद्ध

वैशम्पायन उवाच<br>बलदेवस्तु धर्मात्मा धनुरुदाय सत्वरम्<br>जघान हंसं दशभिर्बाणैर्बाणभृतां वर ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बाणधारियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा बलदेवजीने तुरंत धनुष लेकर दस बाणोंसे हंसको घायल कर दिया ॥ १ ॥ते मुक्ता निशिता घोरा नाराचाश्च सुवाजिनः ॥ ७ ॥<br>रथे ध्वजे तथा चापे चक्रे तूणीद्वये नृप ।<br>पतिताः सर्वतो राजन् व्यथां चैव तथा ददुः ॥ ८ ॥<br><br>राजन् ! उनके धनुषसे छूटे हुए वे सुन्दर पंखवाले तीखे और भयंकर नाराच हंसके रथ, ध्वज, धनुष, चक्र और दोनों तरकसपर पड़कर सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ ७-८ ॥
तं प्रत्यविध्यन्नाराचैर्हंसः पञ्चभिराशुगैः<br>तानन्तरे हली छित्त्वा नाराचैर्दशभिः पुनः ।<br>नाराचेनाशु विव्याध ललाटे हंसमोजसा ॥ २ ॥<br><br>हंसने भी बदलेमें पाँच शीघ्रगामी नाराचोंद्वारा उनपर प्रहार किया; परंतु हलधरने पुनः दस नाराच मारकर बीच-में ही उन्हें काट दिया और शीघ्र ही एक नाराचसे हंसके ललाटमें बलपूर्वक आघात किया ॥ २ ॥ततः क्रुद्धो महाराज हंसो वीर्यमदान्वितः ।<br>शरेण हलिनं विद्ध्वा ध्वजं चिच्छेद कालवित् ॥ ९ ॥<br>शरैश्चतुर्भिंरश्वांश्च सूतं प्रेताधिपे ददौ ।<br><br>महाराज ! तब बल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुए और समयका ज्ञान रखनेवाले हंसने कुपित होकर एक बाणसे हलधरको घायल करके उनकी ध्वजा काट डाली; फिर चार बाणोंसे चारों घोड़ोंको मारकर एक बाणसे उनके सारथिको भी यमराजके हवाले कर दिया ॥ ९½ ॥
दृढं पतन् स नाराचस्तस्य संज्ञां समाददे ।<br>रथोपस्थे चिरं स्थित्वा तूणाद् बाणं समाददे ॥ ३ ॥<br>लब्ध्वा हंसः स संज्ञां तु विद्ध्वा तेन यदूत्तमम् ।<br>सिंहवद् व्यनदद्धंसो देवान् विस्मापयन् रणे ॥ ४ ॥<br><br>उस नाराचने गहरी चोट पहुँचाकर हंसको अचेत कर दिया । वह देरतक रथके पिछले भागमें बैठा रहा । इसके बाद होशमें आकर हंसने तरकससे बाण निकाला और उससे यदुश्रेष्ठ बलभद्रको घायल करके रणभूमिमें देवताओंको विस्मयमें डालते हुए उसने सिंहके समान गर्जना की ॥ ३-४॥ततः क्रुद्धो हली तस्मै गदां गृह्य महारणे ॥ १० ॥<br>आपपात महाबाहुर्हंसं शेष इव श्वसन् ।<br><br>तब क्रोधमें भरे हुए महाबाहु हलधर उस महान् समर-में गदा लेकर फुफकारते हुए शेषनागके समान हंसपर टूट पड़े ॥ १०½ ॥
ततः क्रुद्धो हली विद्धस्तेन बाणेन माधवः ।<br>वमञ्शोणितमत्युष्णं निःश्वसंश्च रणाजिरे ॥ ५ ॥<br><br>उसके बाणसे आहत होकर माधव हलधर कुपित हो उठे और समराङ्गणमें अत्यन्त उष्ण रक्त वमन करते हुए लंबी साँस खींचने लगे ॥ ५ ॥तया रथं ध्वजं चक्रमश्वान् सूतं हलायुधः ।<br>बभञ्ज तिलशः सर्वं ननाद च पुनः पुनः ॥ ११ ॥<br><br>हलधर बलरामजीने उस गदाके द्वारा हंसके रथ, ध्वज, चक्र, अश्व तथा सारथि सबको तिल-तिल करके काट डाला और बारंबार गर्जना की ॥ ११ ॥
लोहिताविष्टगात्रस्तु कुंकुमार्ड्र इवाभवत् ।<br>नाराचैः शतसाहस्रैरर्दयामास माधवः ॥ ६ ॥<br>हंसं हंसगतिं वीरं नीलवासा हलायुधः ।<br><br>उनका शरीर रक्तसे रञ्जित हो कुङ्कुमसे भीगा हुआ सा प्रतीत होने लगा । तब नीलवस्त्रधारी हलधर माधवने हंसके समान गतिवाले वीर हंसको लाखों नाराचोंसे पीड़ित कर दिया ॥ ६½ ॥भूयश्च गदया हंसं चिक्षेप च बली किल ।<br>सोऽपि हंसो गदां गृह्य रथात् तस्मादवापतत् ॥ १२ ॥<br><br>बलवान् वीर बलभद्रने पुनः गदाद्वारा हंसको चोट पहुँचायी । यह देख हंस भी गदा लेकर अपने रथसे कूद पड़ा ॥ १२ ॥
ततस्तौ हंसहलिनौ युयुधाते महारणे ।<br>महारथौ महाबाहू लोके प्रथिततेजसौ ॥ १३ ॥<br><br>तदनन्तर लोकमें विख्यात तेजवाले महाबाहु महारथी हंस और हलधर उस महासमरमें युद्ध करने लगे ॥ १३ ॥