भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1106, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1106

भविष्यपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७९


शचीपति इन्द्रके देखते-देखते प्रहार किया ॥ ४-५ ॥

तेन विद्धोऽथ भगवान् वक्षोदेशे जनार्दनः।
अवमच्छोणितं विष्णुरादिकाले यथा प्रजाः ॥ ६ ॥

वक्षःस्थलमें उसके बाणकी चोट खाकर भगवान् जनार्दन विष्णु रक्त वमन करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सृष्टिके आदि कालमें उन्होंने प्रजावर्गको अपने मुखसे प्रकट किया था॥

ततः क्रुद्धो हृषीकेशः क्षुरप्रेणाहनद् ध्वजम्।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा सारथिं च शरैस्त्रिभिः ॥ ७ ॥
ततो दध्मौ महाशङ्खं यथा तारामये रणे।

तदनन्तर कुपित हुए भगवान् हृषीकेशने एक क्षुरप्रसे उस दानवकी ध्वजा काट डाली, फिर उसके चारों घोड़ोंको मारकर तीन बाणोंसे सारथिको भी कालके गालमें डाल दिया। तदनन्तर तारकामय संग्रामकी भाँति उन्होंने अपना महान् शङ्ख बजाया ॥ ७ १/२ ॥

रथादुत्प्लुत्य सहसा दानवः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ८ ॥
गदां गृह्य महाघोरां दुःसहां वीर्यशालिनीम्।
तया जघान दैत्येन्द्रः किरीटे केशवस्य ह ॥ ९ ॥
ललाटे च पुनुर्विष्णुं सिंहनादं व्यनीनदत्।

तब क्रोधसे मूर्च्छित हुए उस दानवने सहसा रथसे उछलकर एक दुःसह शक्तिशाली एवं महाभयंकर गदा हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस दैत्यराजने पहले तो श्रीकृष्णके किरीटपर आघात किया, फिर उनके ललाटमें चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् वह जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ ८-९ १/२ ॥

ततः शिलां च महतीं प्रगृह्य दनुजः किल ॥ १० ॥
भ्रामयित्वा दशगुणं प्राहरत् केशवोरसि।

इसके बाद उस दानवने एक बहुत बड़ी शिला उठायी और उसे दस बार घुमाकर भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर दे मारा॥

तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य हस्तेनादाय केशवः ॥ ११ ॥
जघान च तया दैत्यं स पपातार्दितः क्षितौ।
गतासुरिव संजज्ञे श्वसन्निव पपात ह ॥ १२ ॥

उस शिलाको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने हाथसे पकड़ लिया और उसीसे उस दैत्यपर आघात किया। उस प्रहारसे पीड़ित हो वह दैत्य प्राणहीन-सा हो गया और लंबी साँस-सा खींचता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१२ ॥

प्राप्य संज्ञां ततो दैत्यः क्रोधाद् द्विगुणमाबभौ।
आदाय परिघं घोरमिदमाह जनार्दनम् ॥ १३ ॥

तदनन्तर होशमें आकर वह दैत्य कुपित हो उठा। क्रोधसे उसकी आभा दुगुनी हो गयी। उसने भयंकर परिघ लेकर भगवान् जनार्दनसे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥

अनेन तव गोविन्द दर्पजातं निहन्म्यहम्।
विक्रमज्ञस्तदा चासि मम देवासुरे रणे ॥ १४ ॥

'गोविन्द ! इस परिघसे मैं तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण किये देता हूँ। उन दिनों जब देवासुर-संग्राम हो रहा था, तुम मेरा पराक्रम जान चुके हो ॥ १४ ॥'

तावेव विपुलौ बाहू स एवास्मि जनार्दन।
तथापि युध्यसे वीर ज्ञात्वा त्वं मामकं बलम् ॥ १५ ॥
वारयैनं महाबाहो परिघं बाहुनिःसृतम्।

'जनार्दन ! वे ही दोनों मेरी विशाल भुजाएँ हैं और वही मैं हूँ। वीर ! तुम मेरे बलको जान चुके हो, तो भी मुझसे युद्ध करते हो। महाबाहो ! मेरी भुजाओंसे छूटे हुए इस परिघको रोको तो सही' ॥ १५ १/२ ॥

इत्युक्त्वा देवदेवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्।
चिक्षेप दैत्यो लोकेशं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ १६ ॥

ऐसा कहकर उस दैत्यने सब लोगोंके देखते-देखते शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर जगदीश्वर श्रीकृष्णपर वह परिघ चला दिया ॥ १६ ॥

तं गृह्य बाहुना कृष्णो हतोऽसीति वदन् हरिः।
खण्डशः कारयामास खड्गेन निशितेन ह ॥ १७ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने उस परिघको हाथसे पकड़ लिया और 'अब तू शीघ्र ही मारा जायगा' ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी तीखी तलवारसे उस परिघके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥

उत्पाट्य वृक्षं दैत्येशः शतशाखं महाशिखम्।
तेन सम्पोथयामास विष्टरश्रवसं विभुम् ॥ १८ ॥

तब उस दैत्यराजने सौ शाखा और बहुत ऊँची शिखा-वाले एक विशाल वृक्षको उखाड़कर उसे विस्तृत यशवाले भगवान् श्रीकृष्णपर दे मारा ॥ १८ ॥

छित्त्वा तं चापि खड्गेन तिलशश्च चकार ह।
विक्रीड्य सुचिरं विष्णुस्तेन दैत्येन माधवः ॥ १९ ॥
हन्तुमैच्छत् तदा दैत्यमादाय निशितं शरम्।
आग्नेयास्त्रेण संयोज्य जघानैनं महान् हरिः ॥ २० ॥

माधव श्रीकृष्णने अपनी तलवारसे उस वृक्षको भी तिल-तिल करके काट डाला। इस प्रकार उस दैत्यके साथ चिरकालतक क्रीड़ा करके भगवान् महाविष्णुने उस समय उसे मार डालनेकी इच्छा की और एक तीखा बाण हाथमें लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे संयुक्त करके उसके द्वारा उस दैत्य-पर आघात किया ॥ १९-२० ॥

संदह्य स शरो दैत्यं सर्वलोकस्य पश्यतः।
यथापूर्वं जगामाशु करं भगवतः पुनः ॥ २१ ॥

उस बाणने सब लोगोंके देखते-देखते दैत्यको जलाकर भस्म कर दिया और पहलेकी भाँति वह शीघ्र ही भगवान्‌के हाथमें चला गया ॥ २१ ॥

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