भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1108, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1108

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८१

अत्यद्भुतं सुविक्रान्तौ परस्परवधैषिणौ ।
कृतश्रमौ महायुद्धे हंसविक्रान्तगामिनौ ॥ १४ ॥

वे दोनों परम पराक्रमी, एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले, महायुद्धके लिये परिश्रम करनेवाले और हंसके समान चलनेवाले थे। उनमें अत्यन्त अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ १४ ॥

यथा देवासुरे युद्धे शक्रवृत्रौ पुराम्वरे ।
उभौ संसिक्तसर्वाङ्गौ शोणितेन महारणे ॥ १५ ॥

जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर इन्द्र और वृत्रासुर आकाशमें जूझते थे, उसी प्रकार वे हंस और बलभद्र भी परस्पर युद्ध कर रहे थे। उस महासमरमें दोनोंके सारे अङ्ग खूनसे रँग गये थे ॥ १५ ॥

अत्यन्तखेदिनौ युद्धे परस्परबलेन ह ।
ततश्च दक्षिणं मार्गं बलभद्रोऽन्वगच्छत ॥ १६ ॥

उस युद्धस्थलमें एक-दूसरेके बलसे दोनोंको अत्यन्त खेद हो रहा था। तदनन्तर बलभद्रने दाहिने मार्गका अनुसरण किया ॥ १६ ॥

सव्यं तु हंसो राजेन्द्र व्यगृह्लात् स्वयमेव हि ।
पोथयाञ्चक्रतुर्युद्धे गदाभ्यां गजविक्रमौ ॥ १७ ॥

राजेन्द्र ! हंसने स्वयं ही बायें पैंतरेको अपनाया। हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों वीरोंने युद्धमें एक दूसरेको गदाद्वारा घायल किया ॥ १७ ॥

यथाप्राणं महाबाहू जघ्नतुर्मरणाय तौ ।
अतिप्रवृद्धं संग्रामं देवासुररणोपमम् ॥ १८ ॥
विदधाते महारङ्गे पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ।

उन महाबाहु वीरोंने पूरा बल लगाकर एक दूसरेके वधके लिये परस्पर प्रहार किया। उस महान् समराङ्गणमें समस्त देवताओंके देखते-देखते वे दोनों वीर देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥

देवाश्च मुनयश्चैव विस्मयं परिजग्मिरे ॥ १९ ॥
अहो खल्वीदृशं युद्धं दृष्टं पूर्वं न च श्रुतम् ।
इत्यूचुर्विस्मयवशाद् देवगन्धर्वकिन्नराः ॥ २० ॥

देवता और मुनि भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। देवता, गन्धर्व और किन्नर विस्मयके वशीभूत होकर इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ऐसा युद्ध हमने न तो पहले कभी देखा है और न सुना ही है' ॥ १९-२० ॥

परस्परकृतोत्साहौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।
अथ हंसो महारङ्गे दक्षिणं दक्षिणोत्तमः ॥
व्यचरन्मार्गमप्यर्थं सव्यं तु बलवान् बलः ॥ २१ ॥

एक दूसरेको जीतनेका उत्साह मनमें लिये वे दोनों वीर उत्तम युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर उदार पुरुषोंमें श्रेष्ठ हंसने उस महासमरमें दाहिने पैंतरेपर विचरना आरम्भ किया और बलवान् बलभद्र बायें पैंतरेपर अत्यन्त तीव्र गतिसे विचरने लगे ॥ २१ ॥

निकुञ्च्य जानुनी पूर्वं चक्रतुर्गदया भृशम् ।
रणे रणविदां श्रेष्ठौ पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ॥ २२ ॥

युद्धकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र और हंसने देवताओंके देखते-देखते पहले दोनों घुटनोंको मोड़कर रणभूमिमें एक-दूसरेको गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसबलभद्रयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और बलभद्रका युद्ध-विषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥


पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकि और डिम्भकका युद्ध

वैशम्पायन उवाच
युद्धं चक्रतुरत्यर्थं ततो डिम्भकसात्यकी ।
तावुभौ बलिनौ वीरौ विख्यातौ क्षत्रियेषु च ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर डिम्भक और सात्यकि अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। वे दोनों बलवान् वीर क्षत्रियोंमें विख्यात थे ॥ १ ॥

कृतश्रमौ महायुद्धे सततं वृद्धसेविनौ ।
सात्यकिर्दशभिर्वीरौ डिम्भकं वेदपारगम् ॥ २ ॥
अविध्यन्निशितैर्बाणैः स्तने वक्त्रे तथोरसि ।

उन्होंने महायुद्धमें बड़ा परिश्रम किया था। वे दोनों सदा वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाले थे। वीर सात्यकिने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् डिम्भकके स्तन, मुख और छातीमें दस पैने बाणोंसे प्रहार किया ॥ २ ॥

स तेन विद्धो बलिना डिम्भकः क्षत्रियोत्तमः ॥ ३ ॥
नाराचैः पञ्चसाहस्रैर्विव्याध युधि गर्वितः ।
तानन्तरे वृष्णिवीरो निभिन्दन् निनदन् ब्रुवन् ॥ ४ ॥

उस बलवान् वीरके द्वारा घायल किये गये क्षत्रियशिरोमणि डिम्भकने जिसे युद्धमें अपने पराक्रमपर बड़ा गर्व था, सात्यकिको पाँच हजार नाराचोंद्वारा चोट पहुँचायी, परंतु वृष्णिवीर सात्यकिने उन नाराचोंको बीचमें ही गर्जना करके तथा बोलकर हुंकारमात्रसे ही खण्डित कर दिया ॥ ३-४ ॥

अथ क्रुद्धो नृपवरो विद्धः सप्तभिराशुगैः ।

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