विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८१
अत्यद्भुतं सुविक्रान्तौ परस्परवधैषिणौ ।
कृतश्रमौ महायुद्धे हंसविक्रान्तगामिनौ ॥ १४ ॥
वे दोनों परम पराक्रमी, एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले, महायुद्धके लिये परिश्रम करनेवाले और हंसके समान चलनेवाले थे। उनमें अत्यन्त अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ १४ ॥
यथा देवासुरे युद्धे शक्रवृत्रौ पुराम्वरे ।
उभौ संसिक्तसर्वाङ्गौ शोणितेन महारणे ॥ १५ ॥
जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर इन्द्र और वृत्रासुर आकाशमें जूझते थे, उसी प्रकार वे हंस और बलभद्र भी परस्पर युद्ध कर रहे थे। उस महासमरमें दोनोंके सारे अङ्ग खूनसे रँग गये थे ॥ १५ ॥
अत्यन्तखेदिनौ युद्धे परस्परबलेन ह ।
ततश्च दक्षिणं मार्गं बलभद्रोऽन्वगच्छत ॥ १६ ॥
उस युद्धस्थलमें एक-दूसरेके बलसे दोनोंको अत्यन्त खेद हो रहा था। तदनन्तर बलभद्रने दाहिने मार्गका अनुसरण किया ॥ १६ ॥
सव्यं तु हंसो राजेन्द्र व्यगृह्लात् स्वयमेव हि ।
पोथयाञ्चक्रतुर्युद्धे गदाभ्यां गजविक्रमौ ॥ १७ ॥
राजेन्द्र ! हंसने स्वयं ही बायें पैंतरेको अपनाया। हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों वीरोंने युद्धमें एक दूसरेको गदाद्वारा घायल किया ॥ १७ ॥
यथाप्राणं महाबाहू जघ्नतुर्मरणाय तौ ।
अतिप्रवृद्धं संग्रामं देवासुररणोपमम् ॥ १८ ॥
विदधाते महारङ्गे पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ।
उन महाबाहु वीरोंने पूरा बल लगाकर एक दूसरेके वधके लिये परस्पर प्रहार किया। उस महान् समराङ्गणमें समस्त देवताओंके देखते-देखते वे दोनों वीर देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥
देवाश्च मुनयश्चैव विस्मयं परिजग्मिरे ॥ १९ ॥
अहो खल्वीदृशं युद्धं दृष्टं पूर्वं न च श्रुतम् ।
इत्यूचुर्विस्मयवशाद् देवगन्धर्वकिन्नराः ॥ २० ॥
देवता और मुनि भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। देवता, गन्धर्व और किन्नर विस्मयके वशीभूत होकर इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ऐसा युद्ध हमने न तो पहले कभी देखा है और न सुना ही है' ॥ १९-२० ॥
परस्परकृतोत्साहौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।
अथ हंसो महारङ्गे दक्षिणं दक्षिणोत्तमः ॥
व्यचरन्मार्गमप्यर्थं सव्यं तु बलवान् बलः ॥ २१ ॥
एक दूसरेको जीतनेका उत्साह मनमें लिये वे दोनों वीर उत्तम युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर उदार पुरुषोंमें श्रेष्ठ हंसने उस महासमरमें दाहिने पैंतरेपर विचरना आरम्भ किया और बलवान् बलभद्र बायें पैंतरेपर अत्यन्त तीव्र गतिसे विचरने लगे ॥ २१ ॥
निकुञ्च्य जानुनी पूर्वं चक्रतुर्गदया भृशम् ।
रणे रणविदां श्रेष्ठौ पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ॥ २२ ॥
युद्धकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र और हंसने देवताओंके देखते-देखते पहले दोनों घुटनोंको मोड़कर रणभूमिमें एक-दूसरेको गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसबलभद्रयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और बलभद्रका युद्ध-विषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और डिम्भकका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
युद्धं चक्रतुरत्यर्थं ततो डिम्भकसात्यकी ।
तावुभौ बलिनौ वीरौ विख्यातौ क्षत्रियेषु च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर डिम्भक और सात्यकि अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। वे दोनों बलवान् वीर क्षत्रियोंमें विख्यात थे ॥ १ ॥
कृतश्रमौ महायुद्धे सततं वृद्धसेविनौ ।
सात्यकिर्दशभिर्वीरौ डिम्भकं वेदपारगम् ॥ २ ॥
अविध्यन्निशितैर्बाणैः स्तने वक्त्रे तथोरसि ।
उन्होंने महायुद्धमें बड़ा परिश्रम किया था। वे दोनों सदा वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाले थे। वीर सात्यकिने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् डिम्भकके स्तन, मुख और छातीमें दस पैने बाणोंसे प्रहार किया ॥ २ ॥
स तेन विद्धो बलिना डिम्भकः क्षत्रियोत्तमः ॥ ३ ॥
नाराचैः पञ्चसाहस्रैर्विव्याध युधि गर्वितः ।
तानन्तरे वृष्णिवीरो निभिन्दन् निनदन् ब्रुवन् ॥ ४ ॥
उस बलवान् वीरके द्वारा घायल किये गये क्षत्रियशिरोमणि डिम्भकने जिसे युद्धमें अपने पराक्रमपर बड़ा गर्व था, सात्यकिको पाँच हजार नाराचोंद्वारा चोट पहुँचायी, परंतु वृष्णिवीर सात्यकिने उन नाराचोंको बीचमें ही गर्जना करके तथा बोलकर हुंकारमात्रसे ही खण्डित कर दिया ॥ ३-४ ॥
अथ क्रुद्धो नृपवरो विद्धः सप्तभिराशुगैः ।
१०८२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
पुनः शतसहस्रेण प्रत्यविध्यत सात्यकिम् ॥ ५ ॥ तब सात शीघ्रगामी बाणोंसे घायल होकर कुपित हुए नृपश्रेष्ठ डिम्भकने पुनः एक लाख बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥
सात्यकिस्त्वथ विक्रान्तो धनुश्चिच्छेद तस्य तत् । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन डिम्भकस्य स यादवः ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पराक्रमी यादव वीर सात्यकिने एक तीखे अर्धचन्द्राकार बाणसे डिम्भकके उस धनुषको काट डाला ॥ ६ ॥
आजघ्ने डिम्भको वीरश्चापमादाय चापरम् । क्षुरप्रेणाथ रौद्रेण तैलधौतेन विक्रमी ॥ ७ ॥ तब पराक्रमी वीर डिम्भकने दूसरा धनुष लेकर तेलसे धुले हुए भयंकर क्षुरप्रके द्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७ ॥
स तेन विद्धो बाणेन वमञ्छोणितकं नृप । अतीव शुशुभे राजन् वसन्ते किंशुको यथा ॥ ८ ॥ राजन् ! उस बाणसे घायल हो रक्त वमन करते हुए सात्यकि वसन्तमें खिले हुए पलाशके समान बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ८ ॥
धनुश्चिच्छेद भूयस्तु गृहीतं यत् पुनर्महत् । ततोऽन्यद् धनुरादाय डिम्भको यादवेश्वरम् ॥ ९ ॥ जघान निशितैर्बाणैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । तब उन्होंने पुनः डिम्भकके उस विशाल धनुषको काट डाला, जिसको उसने दुबारा हाथमें लिया था। तदनन्तर डिम्भकने पुनः दूसरा धनुष हाथमें लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते यादवेश्वर सात्यकिको पैने बाणोंसे घायल करना आरम्भ किया ॥ ९ १/२ ॥
स धनुः पुनरत्युग्रं चिच्छेद युधि सात्यकिः ॥ १० ॥ शरेण तीक्ष्णपुङ्खेन डिम्भकस्य दुरात्मनः । सात्यकिने युद्धस्थलमें दुरात्मा डिम्भकके उस अत्यन्त भयंकर धनुषको तीखे पंखवाले बाणसे पुनः काट डाला ॥ १० १/२ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय सत्वरं स नृपोत्तमः ॥ ११ ॥ धनुषा तेन राजेन्द्र सात्यकिं विव्यधे पुनः । राजेन्द्र ! फिर नृपश्रेष्ठ डिम्भकने तुरंत दूसरा धनुष लेकर उसके द्वारा सात्यकिको पुनः बींधना आरम्भ किया ॥ ११ १/२ ॥
एवं धनूंषि राजेन्द्र शतं पञ्च च पञ्च च ॥ १२ ॥ छित्त्वा ननाद शैनेयः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । राजाधिराज जनमेजय ! इस प्रकार सात्यकिने सब क्षत्रियोंके देखते-देखते डिम्भकके एक सौ दस धनुष काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १२ १/२ ॥
धनुषी तौ परित्यज्य वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १३ ॥ खड्गौ प्रगृह्य बाल्यग्रौ युद्धाय समुपस्थितौ । तौ हि खड्गविदां श्रेष्ठौ वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १४ ॥ तब डिम्भक और सात्यकि दोनों वीर अपने धनुषोंको त्यागकर अत्यन्त भयंकर खड्ग हाथमें ले परस्पर युद्धके लिये उपस्थित हुए। वे दोनों वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥ १३-१४ ॥
दौःशासनिर्महाभागः सोमदत्तिस्तथैव च । अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च ॥ १५ ॥ एते खड्गविदां श्रेष्ठाः कीर्तिता युधि सत्समाः । महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—ये युद्धस्थलके छः श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं ॥ १५ १/२ ॥
एतेष्वेतो नृपश्रेष्ठौ षट्सु वै नृपसत्तम ॥ १६ ॥ तावेतावासिना युद्धं चक्रतुर्युद्धलालसौ । नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं। वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे ॥ १६ १/२ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धं प्रविद्धं बाहुनिःसृतम् ॥ १७ ॥ आकरं विकरं भिन्नं निर्मर्यादममानुषम् । संकोचितं कुलचितं सव्यजानु विजानु च ॥ १८ ॥ आह्निकं चित्रकं क्षिप्तं कुसुम्यं लम्बनं धुतम् । सर्वबाहु विनिर्बाहु सव्येतरमथोत्तरम् ॥ १९ ॥ त्रिबाहु तुङ्गबाहुञ्च सन्योन्नसमुदासि च । पट्टिकं मौष्टिकं चैव यौधिकं प्रथितं तथा ॥ २० ॥ इति प्रकारान् द्वात्रिंशच्चक्रतुः खड्गयोधिनौ । पुनः पुनः प्रहरन्तौ न च श्रममुपेयतुः ॥ २१ ॥ पुष्करस्थौ महाराज युद्धाय कृतनिश्चयौ । भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनिःसृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मर्याद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आह्निक, चित्रक, क्षिप्त, कुसुम्य, लम्बन, धुत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुङ्गबाहु, सन्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित--ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये। वे बारंवार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज ! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १७--२१ १/२ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ २२ ॥ तुष्टुवुस्तौ महाराज जये कृतपरिश्रमौ । जनमेजय ! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे- ॥ २२ १/२ ॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमनयोर्बाहुशालिनोः ॥ २३ ॥
भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८३
एतावेव रणे शक्तौ खड्गे धनुषि पारगौ।
एकः शिष्यो गिरीशस्य द्रोणस्यान्यो हि धीमतः॥ २४॥
'अहो ! बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले इन दोनों वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों युद्धमें समर्थ हैं तथा खड्गविद्या और धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् हैं। इनमेंसे एक तो भगवान् शङ्करका शिष्य है और दूसरा बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका ॥ २३-२४ ॥
अर्जुनः सात्यकिश्चैव वासुदेवो जगत्पतिः।
त्रय एते महावीराः प्रथिताः सङ्गरे सदा ॥ २५ ॥
'अर्जुन, सात्यकि और जगदीश्वर भगवान् वासुदेव— ये तीन सदा ही युद्धस्थलमें 'महावीर' के नामसे विख्यात हैं॥ २५॥
डिम्भकः शक्तिभृच्छर्वस्त्रय एते महारथाः।
प्रसिद्धाः सर्व एवैते वीर्येषु च बलेषु च ॥ २६ ॥
'डिम्भक, कुमार कार्तिकेय और भगवान् शिव— ये तीन मुख्य 'महारथी' हैं। ये सभी बल और वीर्यमें विख्यात हैं'॥ २६ ॥
इति ते देवगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महोरगाः।
दिविस्थिताः समं ब्रूयुर्युद्धदर्शनलालसाः ॥ २७॥
इस प्रकार वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और बड़े-बड़े नाग युद्ध देखनेकी इच्छासे खड़े होकर एक साथ उपर्युक्त बातें कर रहे थे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिडिम्भकयुद्धे पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें सात्यकि और डिम्भकका युद्धविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
हिडिम्बके साथ वसुदेव और उग्रसेनका युद्ध तथा बलभद्रके द्वारा हिडिम्बका वध
वैशम्पायन उवाच
वसुदेवोग्रसेनौ च वृद्धौ युद्धे सुनिर्वृतौ।
जराजर्जरितसर्वाङ्गौ पलितार्द्धशिरोरुहौ ॥ १ ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नौ राजमार्गाविशारदौ।
युयुधाते महारङ्गे राक्षसेन दुरात्मना ॥ २ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामासतू रणे।
राक्षसेन्द्रं दुरात्मानं हिडिम्बं पुरुषादकम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेव और उग्रसेन बूढ़े होनेपर भी युद्धमें परम सुख माननेवाले थे। उनके सारे अङ्ग जरासे जीर्ण हो गये थे, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं और सिरके बाल सफेद हो गये थे ॥ १॥ वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा राजमार्ग (क्षत्रियधर्म—युद्ध) में चतुर थे। ये दोनों उस महासमरमें दुरात्मा राक्षस हिडिम्बके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ उन दोनोंने अनेक सहस्र बाणोंद्वारा रणभूमिमें नरभक्षी राक्षसराज दुरात्मा हिडिम्बको पीड़ित कर दिया ॥ ३ ॥
हिडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भक्षयन् सर्वतो नरान्।
अतिप्रवृद्धो दुष्टात्मा लम्बबाहुर्महाहनुः ॥ ४ ॥
लम्बोदरो विरूपाक्षः पिङ्गकेशो विलोचनः।
श्येननासो महारौद्र ऊर्ध्वरोमा महाभुजः ॥ ५ ॥
राक्षसराज हिडिम्ब सब ओरसे मनुष्योंको खाता हुआ अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट हो गया था। उसकी भुजाएँ और ठोढ़ी विशाल थी। वह बड़ा दुष्टात्मा था, पेट लंबा और नेत्र विकराल थे। सिरके बाल पिंगल वर्णके दिखायी देते थे। उसकी आँखें विकृत थीं। नासिका बाजकी चोंचके समान जान पड़ती थी। वह महाभयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके रोम ऊपरको उठे हुए थे ॥ ४-५ ॥
पर्वताकारवर्ष्मा च दीर्घदंष्ट्रः शिवाननः।
लम्बोदरो दीर्घदन्तो जगद्ग्रासपरस्तथा ॥ ६ ॥
शरीर पर्वताकार दिखायी देता था। दाढ़ें बड़ी-बड़ी थीं और मुँह गीदड़के समान प्रतीत होता था। लंबे पेट और बड़े-बड़े दाँतोंवाला वह राक्षस सम्पूर्ण जगत्को अपना ग्रास बना लेनेके लिये तत्पर जान पड़ता था ॥ ६ ॥
उत्तुङ्गांसो महोरस्को दीर्घग्रीवो गजॊपमः।
भक्षयन् मांसपिटकं पिवञ्शोणितसंचयम् ॥ ७ ॥
उसके कंधे ऊँचे, छाती चौड़ी और गर्दन लंबी थी। वह देखनेमें हाथी-जैसा जान पड़ता था। वह पिटारी भर मांस खाता और संचित करके रखे हुए घड़ों रक्त पी जाता था ॥ ७ ॥
गजान् नागैः समाहत्य हयैरश्वान् नृपोत्तम।
रथान् रथैः समाहत्य सादिनः सादिभिस्तथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वह हाथियोंसे हाथियोंको, घोड़ोंसे घोड़ोंको, रथोंसे रथोंको और सवारोंसे सवारोंको मारकर कुचल देता था ॥ ८ ॥
...यान् स पुरो दृष्ट्वा नास्यत्रासं चकार सः।
...ाडयित्वा महाराज वृष्णिपालान् समन्ततः ॥ ९ ॥
| १०८४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भक्षयामास सहसा हिडिम्बः पुरुषादकः ।
यान् पश्यन् पुरतो रक्षस्तांश्चघान विरूपधृक् ॥ १० ॥
वह मनुष्योंको अपने सामने देखकर उन्हें नासिकाका ग्रास बना लेता था—नसकी तरह श्वासमार्गसे भीतर खींच लेता था। महाराज ! नरभक्षी हिडिम्बने सब ओरसे आक्रमण करके कुछ वृष्णिपालक योद्धाओंको मारकर सहसा अपना आहार बना लिया। उस विकराल रूपधारी राक्षसने जिन्हें सामने देखा, उन्हींका वध कर डाला ॥ ९-१० ॥
भक्षयन्नपरान् वृष्णीन् यादवान् राक्षसेश्वरः ।
चिक्षेप सहसा कांश्चिद्धिडिम्बः पुरुषादकः ॥ ११ ॥
पुरुषभक्षी राक्षसराज हिडिम्बने कितने ही वृष्णियों और यादवोंको खाते हुए उनमेंसे कुछको उठाकर सहसा दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥
अन्तकाले यथा क्रुद्धो रुद्रः प्राणभृतो नृप ।
क्षणेनैकेन सर्वांस्तान् भक्षयामास राक्षसः ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! जैसे कुपित हुए रुद्रदेव अन्तकालमें प्राणियोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस राक्षसने एक ही क्षणमें उन सबका भक्षण कर लिया ॥ १२ ॥
केचिद् भीता दिशः प्रापुर्वृष्णयो वीर्यशालिनः ।
केचित् तु भक्षितास्तेन रक्षसा वृष्णिपुङ्गवाः ॥ १३ ॥
कुछ पराक्रमशाली वृष्णिवंशी भयभीत हो विभिन्न दिशाओंमें भाग गये तथा कितने ही वृष्णिवंशके श्रेष्ठ योद्धा उस राक्षसके आहार बन गये ॥ १३ ॥
कुम्भकर्णो यथा राजन् भक्षयामास वानरान् ।
निःशेषं वृष्णिसैन्यं तु चकार पुरुषादकः ॥ १४ ॥
राजन् ! जैसे कुम्भकर्ण वानरोंको खा गया था। उसी प्रकार उस नरभक्षी निशाचरने वृष्णिवंशकी सेनाको समाप्त-सी कर दिया ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धौ वृद्धौ यादवपुङ्गवौ ।
धनुर्गृह्य महाघोरं राक्षसस्य पुरः स्थितौ ॥ १५ ॥
यथा क्रुद्धस्य सिंहस्य मृगौ वृद्धतमाविव ।
इसी बीचमें बूढ़े यादवशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन कुपित हो महाभयंकर धनुष हाथमें लेकर उस राक्षसके सामने खड़े हुए, मानो क्रोधमें भरे हुए सिंहके समक्ष दो अत्यन्त वृद्ध मृग आ गये हों ॥ १५½ ॥
व्यादायास्यं महारक्षस्तौ वृद्धावभ्यधावत ॥ १६ ॥
विखादिषुर्विरूपाक्षः पातालतलसंनिभः ।
उस समय वह महाराक्षस मुँह बाकर उन दोनों बूढ़ोंको खा जानेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ा। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। वह अपने खुले हुए मुखसे पाताल-तलके समान प्रतीत होता था ॥ १६½ ॥
ततोरक्षः पर्यधावत् खादत् खादत् कलेवरम् ॥ १७ ॥
पूरयामासतुर्वीरौ शरैर्युद्धधुरंधरौ नृप ।
हिडिम्बस्य महाघोरं व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर मनुष्यके शरीरको बारंबार चबाता हुआ वह राक्षस उन दोनोंकी ओर वेगपूर्वक दौड़ा। उस समय उन युद्धश्रेष्ठ वीरोंने अपने बाणोंद्वारा हिडिम्बके महाभयंकर खुले हुए मुखको, जो मुँह बाये हुए यमराजके समान जान पड़ता था, अपने बाणोंसे भर दिया ॥ १७-१८॥
सर्वोस्तान् वारयामास देवशत्रुर्विरूपधृक् ।
धावति स्म ततो रक्षो व्यादितास्यं भयानकम् ॥ १९ ॥
तब उस विकराल रूपधारी देवद्रोही भयानक राक्षसने उन सब बाणोंका निवारण कर दिया और पुनः मुँह फैलाकर उनपर धावा किया ॥ १९ ॥
तयोर्गृहीत्वा धनुषी बभञ्ज युधि सत्वरम् ।
बाहू प्रसार्य दुष्टात्मा राक्षसो विकृताननः ॥ २० ॥
वसुदेवं महीपालं राजानं वृद्धसेविनम् ।
ग्रहीतुं राक्षसंश्रेष्ठो यतते नृपसंसदि ॥ २१ ॥
उसने उन दोनोंके धनुष छीनकर तुरंत उस युद्धस्थलमें ही तोड़ डाले; फिर वह विकराल मुखवाला दुष्टात्मा राक्षस अपनी दोनों बाहें फैलाकर वृद्धसेवी भूपाल राजा वसुदेवको उस राजसमाजमें ही पकड़नेकी चेष्टा करने लगा। वह राक्षसोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ २०-२१ ॥
हिडिम्ब उवाच
एष वां भक्षयिष्यामि वसुदेवं त्वया सह ।
उग्रसेन किमर्थं त्वं तिष्ठसे मत्पुरोगमः ॥ २२ ॥
हिडिम्ब बोला—उग्रसेन ! तुम किस लिये मेरे सामने खड़े हो। मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा । तुम्हारे साथ वसुदेवको भी चट कर जाऊँगा ॥ २२ ॥
आगच्छ प्रविशास्यं मे ग्रासभूतौ तु वां मम ।
विधिना निर्मितो वृद्धो वसुदेवो हरेः पिता ॥ २३ ॥
बुभुक्षितः श्रमात्तश्च युद्धे त्वरितविक्रमः ।
मन्मुखान्नैव गच्छेतां प्रविशेतां त्वरान्वितौ ॥ २४ ॥
आओ ! मेरे मुखमें प्रवेश करो। तुम दोनों मेरे ग्रास-स्वरूप हो। जिसे विधाताने श्रीकृष्णका पिता बना दिया है, वह बूढ़ा वसुदेव भूखसे पीड़ित है, परिश्रमसे कष्ट पाता है और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करता है। अब तुम दोनों मेरे मुँहसे छूटकर नहीं जा सकते, तुरंत ही मेरे मुखके भीतर प्रवेश करो ॥ २३-२४ ॥
युवयोः शोणितं पीत्वा तृप्तिं यास्यामि निर्वृतः ।
खादामि च पुनर्मांसं वृद्धयोर्युवयोः सुखम् ॥ २५ ॥
तुम दोनोंका रक्त पीकर मैं तृप्त होऊँगा और संतोष प्राप्त करूँगा । इसके बाद तुम दोनों वृद्धोंके मांसको मैं सुखपूर्वक खाऊँगा ॥ २५ ॥
इति ब्रुवंस्तथा रक्षो व्यादितास्यो महाहनुः ।
भविष्यपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८५
धावति स्म; तदा क्षिप्रं हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ २६ ॥
ऐसा कहता हुआ विशाल ठोड़ीवाला राक्षसराज निशाचर हिडिम्ब उस समय मुँह वाकर उनकी ओर दौड़ा ॥ २६ ॥
वसुदेवोग्रसेनौ च भीतौ विप्रेक्ष्य सर्वतः ।
दिशोऽभ्यभजतां राजन् निःशस्त्रौ वृष्णिपुङ्गवौ ॥ २७॥
राजन् ! तब शस्त्रहीन हुए वृष्णिशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन भयभीत हो सब ओर देखकर विभिन्न दिशाओंमें भागने लगे ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा बलभद्रः प्रतापवान् ।
दृष्ट्वा च तौ तथाभूतौ वसुदेवोग्रसेनकौ ॥ २८ ॥
वासुदेवे समादिश्य हंसं युध्यन्तमीश्वरे ।
निर्गत्य चान्तरं तस्य राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ २९ ॥
इसी बीचमें प्रतापी बलभद्रने वसुदेव और उग्रसेनको वैसी अवस्थामें पड़ा देख, जूझते हुए हंसका भार बलवान् श्रीकृष्णको सौंप दिया और स्वयं वे उस दुरात्मा राक्षसके बीचमें आकर इस प्रकार बोले—॥ २८-२९ ॥
मा कृथाः साहसं रक्षो मुञ्चैतौ राजसत्तमौ ।
स्थितोऽस्मि युध्यतां रक्षो मया शत्रूञ्जिघांसता ॥३०॥
अहमेव हनिष्ये त्वां का चेयं तव भीषिका ।
'ओ राक्षस ! ऐसा दुःसाहस न कर। इन दोनों भूप-शिरोमणियोंको छोड़ दे। मैं खड़ा हूँ। शत्रुओंके वधकी इच्छा-से यहाँ आये हुए मुझ बलभद्रके साथ तू युद्ध कर। केवल मैं ही तुझे मार डालूँगा, यह क्या तेरी विभीषिका है ! ॥
इति ब्रुवाणं हलिनं तौ विसृज्य महारणे ॥ ३१ ॥
महानयमसो दुष्टो भक्षयाम्येनमग्रतः ।
विदार्य पूर्ववद् वक्त्रं बलभद्रमुपाद्रवत् ॥ ३२ ॥
इस तरह बोलते हुए हलधरकी बात सुनकर हिडिम्बने उस महासमरमें वसुदेव और उग्रसेनको तो छोड़ दिया और सोचा—'यह महान् दुष्ट है, अतः पहले इसीको खा जाऊँ' ऐसा विचारकर पूर्ववत् मुँह फैलाये हुए उसने बलभद्रपर धावा किया ॥ ३१-३२ ॥
विसृज्य सशरं चापं राक्षसस्य पुरः स्थितः ।
मुष्टिं प्रगृह्य बलवान् स्फोटयन् बाहुमुत्तमम् ॥ ३३ ॥
बलवान् बलभद्र बाणसहित धनुषको त्यागकर अपनी उत्तम भुजापर ताल ठोंकते हुए उस राक्षसके आगे मुट्ठी बाँधकर खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
हिडिम्बस्त्वथ दुष्टात्मा मुष्टिकृत्वा भयानकम्।
जघान वक्षो रामस्य व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३४ ॥
दुष्टात्मा हिडिम्बने भी मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति भयंकर मुट्ठी बाँधकर बलरामके वक्षःस्थलपर प्रहार किया ॥
क्रुद्धोऽथ गलभद्रस्तु मुष्टिना तेन ताडितः ।
जघान मुष्टिना तेन राक्षसेशमनिन्दितः ॥ ३५ ॥
उसके मुक्केकी मार खाकर अनिन्द्य बलशाली बलभद्रजी कुपित हो उठे। फिर उन्होंने भी उस राक्षसराजको मुक्केसे मारा॥
मुष्टियुद्धं समभवन्नरराक्षसवीरयोः ।
युध्यतोर्युद्धरङ्गेऽथ नरराक्षससिंहयोः ॥ ३६ ॥
तयोश्चटचटाशब्दः प्रादुरासीद् भयानकः ।
फिर तो उन नर और निशाचर वीरोंमें मुक्केसे ही युद्ध होने लगा। युद्धकी रङ्गभूमिमे जूझते हुए नरसिंह बलभद्र और राक्षससिंह हिडिम्बके मुक्कोंका भयंकर चट-चट शब्द प्रकट होने लगा ॥ ३६१/२ ॥
अथ राक्षसराजस्तु मुष्टिना राममाहवे ॥ ३७॥
जघान वक्षोदेशे तु वज्रेणेव पुरंदरः ।
तदनन्तर राक्षसराज हिडिम्बने समराङ्गणमें बलरामके वक्षःस्थलपर मुक्केसे प्रहार किया, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रसे आघात किया हो ॥ ३७१/२ ॥
अथ रामो बली साक्षान्मुष्टिं संवर्त्य यत्नतः ॥ ३८ ॥
हिडिम्बं ताडयामास वक्षस्यमरविद्विषम् ।
तलाभ्यामथ रामस्तु वक्त्रे हत्वा स राक्षसम् ॥ ३९ ॥
इसके बाद साक्षात् बलवान् बलरामने यत्नपूर्वक मुट्ठी बाँधकर देवद्रोही हिडिम्बके वक्षःस्थलपर बड़े जोरसे आघात किया। तत्पश्चात् उन्होंने उस राक्षसके मुँहपर दो तमाचे जड़ दिये ॥ ३८-३९ ॥
आहतस्तलघातेन हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ गतासुर्वीरराक्षसः ॥ ४० ॥
उनके तमाचेकी मार खाकर वीर निशाचर राक्षसराज हिडिम्ब प्राणहीन-सा होकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ा।
तत उत्पत्य रामस्तु दोर्भ्यां संगृह्य राक्षसम् ।
आदाय बहुवेगेन भ्रामयित्वा पदात् पदम् ॥ ४१ ॥
व्याविध्यत् सुचिरं रामो दर्शयन्नात्मनो बलम् ।
उत्क्षिप्य राक्षसेन्द्रं तं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४२ ॥
गव्यूतिमात्रं चिक्षेप ततो देशाद्धलायुधः ।
गतासू राक्षसश्रेष्ठस्ततो देशान्निराक्रमत् ॥ ४३ ॥
फिर बलरामजीने उछलकर उस राक्षसको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और उसे उठाकर पग-पगपर बड़े वेगसे घुमाया। इस तरह अपना बल दिखाते हुए बलरामजी देरतक उसे घुमाते रहे। फिर सब लोगोंके देखते-देखते हलधरने उस राक्षसराजको उछालकर वहाँसे दो कोस दूर फेंक दिया। इस प्रकार राक्षसप्रवर हिडिम्ब प्राणशून्य होकर उस स्थानसे दूर निकल गया* ॥ ४१-४३ ॥
ये केचिद् राक्षसास्तत्र हतशेषा महारणे ।
बलभद्रात् ततो भीता जगमुश्चैव दिशो दश ॥ ४४ ॥
* पाण्डव भीमसेनने एकचक्रा नगरीमें जानेसे पूर्व जिस हिडिम्ब नामक राक्षसको मारा था, वह इससे भिन्न था और वह इससे पहले ही मारा जा चुका था। यह दूसरा हिडिम्ब बलभद्रजीके हाथों मारा गया।
१०८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उस महासमरमें जो कोई भी राक्षस वहाँ मरनेसे बचे हुए थे, वे बलभद्रजी से भयभीत हो वहाँसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥
अथांशुमाली भगवान् दिनेशः संहृत्य तेजांसि सहस्ररश्मिः।
अस्तं ययौ चक्षुरपि प्रजानामीषत्तमश्चापि समाविवेश॥ ४५ ॥
तदनन्तर सहस्रों किरणोंसे सुशोभित दिनके स्वामी अंशुमाली भगवान् सूर्य अपने तेज समेटकर अस्ताचलको चले गये और प्रजाजनोंके नेत्रोंमें कुछ-कुछ अन्धकारका समावेश हो गया ॥ ४५ ॥
तस्मिन् प्रविष्टेऽथ समुद्रतोयं प्रजापतौ विश्वमुखे जगद्गुरौ।
नक्षत्रनाथः समुपाजगाम संध्यातमोऽपि व्यनशन्नृपोत्तम॥ ४६ ॥
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! सम्पूर्ण विश्वके मुखस्वरूप प्रजापालक जगद्गुरु सूर्यदेवके समुद्रके जलमें प्रवेश कर जानेपर नक्षत्रनाथ चन्द्रमाका उदय हुआ, जिससे संध्याकालका अन्धकार भी नष्ट हो गया ॥ ४६ ॥
प्रभातकाले नृप सत्तमो रणे गोवर्धने किन्नरगीतनादिते।
इति ब्रुवन्तो नृपसत्तमास्तदा व्युपारमंस्तत्र रणोत्सवे नृप॥ ४७ ॥
जनमेजय ! उस समय हंसकी सेनामें जो श्रेष्ठ नरेश थे, वे यह कहते हुए वहाँ समरोत्सवसे विरत हो गये कि 'राजन् ! कल प्रातःकालका युद्ध किन्नरोंके गीतसे गूँजते हुए गोवर्धन पर्वतपर हो तो अच्छा होगा' (ऐसा कहकर वे सब नरेश वहाँसे भागकर गोवर्धन पर्वतपर चले गये) ॥ ४७ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हिडिम्बपराभवे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हिडिम्बका पराभवविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२६॥
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
गोवर्धन पर्वतके समीप हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भूतेश्वरोंकी पराजय तथा श्रीकृष्ण और हंसका घोर युद्ध
वैशम्पायन उवाच
उभौ तौ हंसडिम्भकौ रात्रावेव महागिरिम्।
जग्मतुः सहितौ राजन् गोवर्धनमथो नृप॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरेश्वर ! तदनन्तर वे दोनों भाई हंस और डिम्भक रातमें ही एक साथ महागिरि गोवर्धन पर्वतको चल दिये ॥ १ ॥
अथ प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ।
गोवर्धनं जगामाशु केशवः केशिसूदनः ॥ २ ॥
जब निर्मल प्रभातकाल आनेपर सूर्यदेवका उदय हुआ, तब केशिहन्ता भगवान् केशव भी शीघ्रतापूर्वक गोवर्धन पर्वतकी ओर चले ॥ २ ॥
शैनेयो बलभद्रश्च यादवाः सारणादयः ।
गन्धर्वरप्सरोभिश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ३ ॥
सात्यकि, बलभद्र और सारण आदि यादव भी गन्धर्वों और अप्सराओंके नाना प्रकारके गीतोंसे निनादित गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ ३ ॥
जग्मुस्ते सहिता राजन् गोवर्धनमथो गिरिम्।
गोधनैश्च सैन्यैश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ४ ॥
राजन् ! वे सब लोग एक साथ गोवर्धन पर्वतपर जा पहुँचे। वह पर्वत गोधनों और सेनाओंके नाना प्रकारके शब्दोंसे प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ४ ॥
तस्योत्तरं नृपश्रेष्ठ पार्श्वं सम्प्राप्य यादवाः ।
निकषा यमुनां राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! राजन् ! जब यादव उस पर्वतके उत्तर तटपर पहुँच गये, तब यमुनाके निकट पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ ५ ॥
विव्याध हंसडिम्भकौ वसुदेवं सप्तभिः ।
सारणः पञ्चविंशत्या दशभिः कङ्क एव च ॥ ६ ॥
वसुदेवने सात बाणोंसे हंस और डिम्भकको घायल कर दिया। सारणने पच्चीस और कङ्कने दस बाण मारे ॥ ६ ॥
हंसेन डिम्भकेनाथ यादवैश्च समन्ततः ।
उग्रसेनस्त्रिसप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका सब ओरसे युद्ध छिड़ गया । उग्रसेनने झुकी हुई गाँठवाले तिहत्तर बाण मारे ॥ ७ ॥
विराटस्त्रिंशता राजन् सात्यकिश्चापि सप्तभिः ।
अशीत्या विष्पृशू राजन्नुद्धवो दशभिः शरैः ॥ ८ ॥
राजन् ! विराटने तीस, सात्यकिने सात, विष्पृशुने अस्सी तथा उद्धवने दस बाणोंका प्रहार किया ॥ ८ ॥
भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८७
प्रद्युम्नस्त्रिंशतां राजन् साम्बश्चापि च सप्तभिः ।
अनाधृष्टिस्त्वेकषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ९ ॥
जनमेजय ! प्रद्युम्नने तीस, साम्बने सात और अनाधृष्टि-ने झुकी हुई गाँठवाले इकसठ बाणोंद्वारा शत्रुओंको घायल कर दिया ॥ ९ ॥
एवं ते संहता राजंश्चक्रुर्युद्धमदीनवत् ।
अत्यद्भुतं महाघोरं यादवाः सर्व एव हि ॥ १० ॥
राजन् ! इस प्रकार वे समस्त यादव एक साथ होकर उत्साहसम्पन्न पुरुषकी भाँति अत्यन्त अद्भुत और महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १० ॥
चक्रुस्ताभ्यां महायुद्धं वासुदेवस्य पश्यतः ।
सर्वानपि महाराज यादवान् बलदर्पितान् ॥ ११ ॥
तावुभौ हंसडिम्भकौ नृपांस्तान् प्रत्यविध्यताम् ।
महाराज ! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते समस्त यादवोंने हंस और डिम्भकके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। दोनों भाई हंस और डिम्भकने भी उन समस्त यादवनरेशोंको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११ १/२ ॥
प्रत्येकं दशभिर्विद्ध्वा बाणैर्निशितनिर्मलैः ॥ १२ ॥
जघ्नतुश्च शरैस्तीक्ष्णैरत्यर्थं यादवेश्वरान् ।
उन दोनोंने तेज धारवाले चमचमाते हुए दस-दस बाणोंद्वारा प्रत्येकको घायल करके पैने बाणोंसे समस्त यादवेश्वरोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२ १/२ ॥
व्यथिताः सर्व एवैते वमन्तः शोणितं बहु ॥ १३ ॥
माधवे किंशुका राजन् पुष्पिता इव ते बभुः ।
राजन् ! उन बाणोंसे व्यथित हो ये सब-के-सब मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए वसन्त ऋतुमें खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान शोभा पाने लगे ॥ १३ १/२ ॥
भीताश्च यादवा राजन् पलायनपरायणाः ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् वसुदेवात्मजो नृप ।
वासुदेवो हली युद्धे प्रमुखे धन्विनौ तयोः ॥ १५ ॥
चक्रतुर्युद्धमतुलं स्कन्दशक्राविवाम्बरे ।
राजन् ! उस समय यादव सैनिक भयभीत होकर भागने लगे। महाराज जनमेजय ! इसी बीचमें वसुदेवके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण और हलधर बलराम धनुष हाथमें लिये युद्धके मुहानेपर उन दोनोंके सामने आकर उसी तरह अनुपम संग्राम करने लगे, जैसे इन्द्र और कार्तिकेय आकाशमें खड़े होकर असुरोंसे युद्ध करते हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥
तयोरेव सगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महर्षयः ॥ १६ ॥
विमानस्थाश्च ददृशुर्युद्धं देवासुरोपमम् ।
उस समय विमानोंपर बैठे हुए गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और महर्षि देवासुर-संग्रामके समान उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ॥ १६ १/२ ॥
ततः प्रादुर्भूतां तौ दूतौ भूतेश्वरौ नृप ॥ १७ ॥
शूलिना प्रेषितौ युद्धे रक्षार्थं बलिनोस्तयोः ।
नरेश्वर ! तदनन्तर वहाँ युद्धमें उन दोनों बलवान् वीर हंस और डिम्भककी रक्षा करनेके लिये महादेवजीके भेजे हुए वे दोनों भूतेश्वर दूत प्रकट हुए ॥ १७ १/२ ॥
हंसोऽथ वासुदेवश्च युद्धं चक्रतुरीश्वरौ ॥ १८ ॥
रामश्च डिम्भकश्चैव संयुगौ युद्धकाङ्क्षया ।
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और हंस दोनों सामर्थ्यशाली वीर एक दूसरेके साथ युद्ध करने लगे। उधर बलराम और डिम्भक भी युद्ध करनेकी इच्छासे परस्पर उलझ गये ॥ १८ १/२ ॥
विक्रान्ताः सर्व एवैते ह्यस्त्रे शस्त्रे तथा बले ॥ १९ ॥
शङ्खान् दध्मुः पृथग्भावं स्वे स्वे सर्वे रथे स्थिताः ।
ये सब-के-सब अस्त्र, शस्त्र और बलमें पराक्रमी थे। इन सबने अपने-अपने रथमें स्थित होकर पृथक्-पृथक् शङ्ख बजाना आरम्भ किया ॥ १९ १/२ ॥
अथ कृष्णो हृषीकेशः पाञ्चजन्यं महारवम् ॥ २० ॥
दध्मौ पद्मपलाशाक्षः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सबको विस्मयमे डालते हुए-से महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ २० १/२ ॥
अथ भूतौ महाघोरौ लम्बोदरशरीरिणौ ॥ २१ ॥
दुद्रुवतुर्महाराज शूलमादाय केशवम् ।
महाराज ! इतनेमें ही लंबे पेट और विशाल शरीरवाले उन महाभयंकर भूतोंने शूल लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ २१ १/२ ॥
शूलेन पोथयां राजञ्चक्रतुर्यादवेश्वरम् ॥ २२ ॥
ताभ्यां समाहतो विष्णुर्देवगन्धर्वसंनिधौ ।
ईषत्स्सिताधरो देवः किंचिदुत्प्लुत्य सत्वरम् ॥ २३ ॥
रथाद् रथिवरश्रेष्ठस्तौ प्रगृह्य जनार्दनः ।
भ्रामयित्वा शतगुणमलातमिव केशवः ॥ २४ ॥
कैलासं च समुद्दिश्य प्रचिक्षेप ततो हरिः ।
राजन् ! उन दोनोंने यादवेश्वर श्रीकृष्णपर एक साथ ही शूलसे प्रहार किया। देवताओं और गन्धर्वोंके समीप उन दोनोंके आघातसे आहत हो भगवान् श्रीकृष्णके अधरपर मन्द मुसकानकी छटा बिखर गयी। वे रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् जनार्दन कुछ उछलकर तुरंत रथसे कूद पड़े और दोनों भूतेश्वरोंको पकड़कर उन्हें अलातचक्रके समान सौ बार घुमानेके पश्चात् उन केशव हरिने कैलासपर्वतकी ओर फेंक दिया ॥ २२-२४ १/२ ॥
तावुपेत्य गिरेः शृङ्गं कैलासस्य महामते ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा तत्कर्म देवस्य विस्मयं जग्मतुः परम् ।
महामते ! वे दोनों कैलासपर्वतके शिखरपर पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देख बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ २५ १/२ ॥
| १०८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
हंसश्च दृष्ट्वा तत्कर्म रोषात्ताम्रायतेक्षणः ॥ २६ ॥
उवाच वचनं हंसः शृण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
श्रीकृष्णका वह कर्म देखकर हंसके बड़े-बड़े नेत्र रोषसे लाल हो गये। उसने समस्त देवताओंके सुनते हुए यह बात कही—॥ २६ १/२ ॥
किमर्थं राजसूयस्य विघ्नं चरसि केशव ॥ २७ ॥
ब्रह्मदत्तो महीपालो यष्टा तस्य महाक्रतोः ।
करं दिश यथायोगं यदि प्राणान् हि रक्षसि ॥ २८ ॥
'केशव ! हमारे राजसूय यज्ञमें क्यों विघ्न डाल रहे हो ? महाराज ब्रह्मदत्त उस महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। यदि अपने प्राणोंकी रक्षा चाहते हो तो उसमें यथायोग्य कर दो ॥
अथवा त्वं क्षणं तिष्ठ ततो ज्ञात्वा परं बहु ।
ददासि त्वं नन्दपुत्र ततो यष्टा स मे गुरुः ॥ २९ ॥
'अथवा नन्दपुत्र ! तुम क्षणभर मेरे सामने खड़े रहो, फिर मेरी श्रेष्ठताको जानकर स्वयं ही बहुत सा कर प्रदान करोगे; फिर मेरे पिता यज्ञका आरम्भ करेंगे ॥ २९ ॥
ईश्वरोऽहं सदा राज्ञां देवानामिव शूलभृत् ।
एष ते वीर्यमतुलं नाशयिष्यामि संयुगे ॥ ३० ॥
'जैसे देवताओंके ईश्वर शूलधारी महादेव हैं; उसी प्रकार सदा समस्त राजाओंका ईश्वर मैं हूँ। इस युद्धमें मैं तुम्हारे अनुपम बलको अभी नष्ट किये देता हूँ' ॥ ३० ॥
इत्युक्त्वा सशरं चापं शालतालोपमं नृप ।
आकृष्य च यथाप्राणं नाराचेन च केशवम् ॥ ३१ ॥
ललाटे विक्षिपे हंसो ललाम इव सोऽभवत् ।
नरेश्वर ! ऐसा कहकर हंसने शाल और तालके समान विशाल धनुष और बाण ले उसे बलपूर्वक खींचकर उस नाराचके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके ललाटमें प्रहार किया । वह नाराच उनके लिये मनोहर आभूषण-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३१ १/२ ॥
उवाच सात्यकिं कृष्णो रथं वाहय मे प्रभो ॥ ३२ ॥
दारुकं पृष्ठवाहं तं कृत्वा देशं तमीश्वरः ।
अथ तेन समादिष्टः सात्यकिर्वाहयन् रथम् ॥ ३३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'प्रभावशाली वीर ! तुम मेरा रथ हाँको।' भगवान्ने जब सात्यकिको इस प्रकार आदेश दिया, तब वे दारुकको पीछे करके उस स्थानपर बैठकर उनका रथ हाँकने लगे ॥ ३२-३३ ॥
मण्डलानि बहून्याजौ दर्शयामास सत्वरम् ।
अथ विद्धो दृढं तेन शरेण हरिरीश्वरः ॥ ३४ ॥
आग्नेयमस्त्रं संयोज्य शरे कस्मिंश्चिदव्ययः ।
उवाच हंसं राजेन्द्र सात्यकिं प्रेरयन् रणे ॥ ३५ ॥
राजेन्द्र ! सात्यकिने युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक रथके बहुत-से पैंतरे दिखाये। उधर हंसके बाणसे गहरी चोट खाकर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने किसी बाणपर आग्नेयास्त्रका आधान करके सात्यकिको रणभूमिमें आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हुए हंससे कहा—॥ ३४-३५ ॥
अनेन त्वां दहे पाप यदि शक्तोऽसि वारय ।
अलं ते बह्वबद्धेन क्षत्रियोऽसि सदा शठ ॥ ३६ ॥
'पापी ! शठ ! मैं इस बाणसे तुझे अभी दग्ध किये देता हूँ, यदि शक्ति हो तो इसे रोक । अब तेरे लिये बहुत-सी असङ्गत बातें बकनेसे कोई लाभ न होगा। तू क्षत्रिय है, सदा अपने कर्तव्यका पालन कर ॥ ३६ ॥
मत्तश्चेत् करमिच्छेस्त्वं दर्शयाद्य पराक्रमम् ।
यतयो बाधिता हंस पुष्करे संस्थितास्त्वया ॥ ३७ ॥
'यदि मुझसे कर लेना चाहता है तो आज दिखा अपना पराक्रम ! हंस ! तूने पुष्करमें रहनेवाले यतियोंको सताया है ॥
शास्ता त्वं खलु विप्राणां स्थिते मयि नराधम ।
स्थिते मयि जगन्नाथे हत्वा क्षत्रियकण्टकान् ॥ ३८ ॥
शास्तास्म्यद्य सतां लोके दुष्टानां ब्रह्मविद्विषाम् ।
'नराधम ! मैं इस सम्पूर्ण जगत्का ईश्वर हूँ। तू मेरे रहते ब्राह्मणोंपर शासन करता है। मैं तुझ-जैसे क्षत्रियरूपी कण्टकोंका वध करके सत्पुरुषोंके जगत्में ब्रह्मद्रोही दुष्टोंका शासन करनेवाला हूँ ॥ ३८ १/२ ॥
शापेन यतिमुख्यानां हत एव नराधम ॥ ३९॥
मृत्युवे त्वां नियोद्याद्य रक्षिता ब्राह्मणानहम् ।
'नराधम ! तू मुख्य-मुख्य यतियोंके शापसे ही मर चुका है। आज तुझे मृत्युके हवाले करके मैं ब्राह्मणोंकी रक्षा करूँगा' ॥ ३९ १/२ ॥
इति ब्रुवंस्तदस्त्रं तु मुमोच युधि केशवः ॥ ४० ॥
तदस्त्रं वारुणेनाथ हंसोऽपि प्रत्यपेधयत् ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें हंसपर उस आग्नेयास्त्रको छोड़ दिया; तब हंसने भी वारुणास्त्रसे उस अस्त्रका निवारण कर दिया ॥ ४० १/२ ॥
वायव्यमथ गोविन्दो मुमोच युधि हंसके ॥ ४१ ॥
तदस्त्रं वारयामास माहेन्द्रेण नृपोत्तमः ।
यह देख गोविन्दने रणभूमिमें हंसपर वायव्यास्त्र चलाया, किंतु नृपश्रेष्ठ हंसने माहेन्द्रास्त्रसे उसका वारण कर दिया ॥ ४१ १/२ ॥
अथ माहेश्वरं कृष्णो मुमोचात्युग्रमाहवे ॥ ४२ ॥
रौद्रेण तत् ततो हंसो वारयामास तत्क्षणात् ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अत्यन्त भयंकर माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, परंतु हंसने रौद्रास्त्रद्वारा तत्काल उसका निवारण कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥
गान्धर्वं राक्षसं चैव पैशाचमथ केशवः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मास्त्रमथ कौवेरमासुरं याम्यमेव च ।
चत्वार्येतानि हंसस्तु मुमोच युधि सत्वरम् ॥ ४४ ॥
वारणार्थं तदस्त्राणां चतुर्णां माधवस्य ह ।
भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८९
तत्र श्रीकृष्णने लगातार गान्धर्व, राक्षस और पैशाच अस्त्र छोड़े (पूर्वोक्त माहेश्वर अस्त्रको लेकर ये चार हुए)। माधवके उन चारों अस्त्रोंका निवारण करनेके लिये हंसने युद्धस्थलमें तुरंत ही ब्रह्मास्त्र, कौवेरास्त्र, आगुरास्त्र और याम्यास्त्र—ये चार अस्त्र छोड़े ॥ ४२-४४ ½ ॥
अथ ब्रह्मशिरो नाम घोरमस्त्रं विनाशकम् ॥ ४५ ॥
मुमोच हंसमुद्दिश्य देवदेवो जनार्दनः ।
योजयामास तद्धंसे महाघोरपराक्रमम् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर देवाधिदेव जनार्दनने ब्रह्मशिर नामक महान् विनाशकारी भयानक अस्त्र हंसपर छोड़ा। उन्होंने महान् एवं घोर पराक्रमवाले उस अस्त्रका हंसके लिये ही प्रयोग किया था ॥ ४५-४६ ॥
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तमः ।
हंसोऽपि तेन राजेन्द्र वारयामास तं शरम् ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर नृपश्रेष्ठ हंस भयभीत हो उठा; फिर उसने भी उसी अस्त्रसे उस बाणका वारण किया ॥ ४७ ॥
यमुनाप उपस्पृश्य देवदेवो जनार्दनः ।
अस्त्रं वैष्णवमादाय शरे सं निशिते हरिः ॥ ४८ ॥
योजयामास भूतात्मा भूतभावनभावनः ।
तदनन्तर सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भूतात्मा देवाधिदेव जनार्दन हरिने यमुनाजीके जलका आचमन करके एक तीखे बाणपर वैष्णवास्त्रकी संयोजना की ॥
येन देवा रणे हत्वा राज्यमापुः पुरासुरान् ।
तदस्त्रं योजयामास वधार्थं तस्य भूपतेः ॥ ४९ ॥
पूर्वकालमें देवताओंने रणभूमिमें जिसके द्वारा असुरोंका वध करके अपना राज्य प्राप्त किया था, उसी अस्त्रका राजा हंसके वधके लिये श्रीकृष्णने प्रयोग किया ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसकेशवयुद्धे
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और श्रीकृष्णका युद्धविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा हंसका वध
वैशम्पायन उवाच
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तम ।
हंसो राजा महाराज निश्चेष्ट इव सम्बभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! महाराज ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर राजा हंस भयके मारे निश्चेष्ट-सा प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
उत्प्लुत्य स रथात् तस्माद् यमुनाम्अभ्यधावत ।
यत्र कृष्णो हृषीकेशः कालियाहिं ममर्द्द ह ॥ २ ॥
वह उस रथसे उछलकर यमुनाजीकी ओर भागा, जहाँ पूर्वकालमे हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णने कालियनागका मर्दन किया था ॥ २ ॥
महाह्रदं महारौद्रं यावत्पातालसंस्थितम् ।
तावद्वतीर्णं महानीलं कालाञ्जननिभं हि यत् ॥ ३ ॥
वह महान् ह्रद बड़ा भयंकर और पातालपर्यन्त गहरा था। उसका विस्तार भी उतना ही था। वह काली अञ्जन-राशि (अथवा कोयले) के समान महानील (या काला) प्रतीत होता था ॥ ३ ॥
तस्मिन् हृदे महाघोरे पपाताथ स हंसकः ।
हंसे पतति तस्मिंस्तु महान् रावो बभूव ह ॥ ४ ॥
गिरीणां पात्यमानानां समुद्रे इव वज्रिणा ।
उसी महाघोर कालियह्रदमें हंस कूद पड़ा। उसके कूदनेपर वहाँ बड़ा भारी धमाके-सा शब्द हुआ, मानो इन्द्रके द्वारा समुद्रमें गिराये जाते हुए पर्वतोंका कोलाहल प्रकट हुआ हो ॥ ४ ½ ॥
रथादुत्प्लुत्य कृष्णोऽपि तस्योपरि पपात ह ॥ ५ ॥
देवदेवो जगन्नाथो जगद् विस्मापयन्निव ।
तब जगदीश्वर देवाधिदेव श्रीकृष्ण भी सम्पूर्ण जगत्को विस्मयमें डालते हुए-से रथसे उछलकर उस कुण्डमें हंसके ऊपर कूद पड़े ॥ ५ ½ ॥
प्राहरन् तं महाबाहुः पादाभ्यामथ केशवः ॥ ६ ॥
पादक्षेपं नृपस्तस्माल्लब्ध्वा हंसो नृपोत्तम ।
ममार च नृपश्रेष्ठ केचिदेवं वदन्ति हि ॥ ७ ॥
उस समय महाबाहु केशवने उसपर दोनों पैरोंसे प्रहार किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! श्रीकृष्णके चरणोंका प्रहार पाकर राजा हंस मर गया—ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ ६-७ ॥
अन्ये पातालमायातो भक्षितः पन्नगैरिति ।
अद्यापि नैव राजेन्द्र दृष्ट इत्यनुशुश्रुम ॥ ८ ॥
राजेन्द्र ! दूसरोंका कहना है कि वह पातालमें धँस गया और वहाँ सर्प उसे खा गये। वह अबतक वहाँसे लौटा नहीं देखा गया—ऐसा उसके विषयमें हमने सुना है ॥ ८ ॥
यथापूर्वं जगन्नाथो रथं समुपजग्मिवान् ।
हते तस्मिन् महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
| १०९० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अकरोद् राजसूयं च तव पूर्वपितामहः।
यदि जीवेदसौ हंसः को नमस्यति तं क्रतुम् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्ण पूर्ववत् रथपर आ गये। महाराज ! हंसके मारे जानेपर ही तुम्हारे पूर्वपितामह धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञ किया था। यदि हंस जीवित होता तो कौन उस यज्ञके सामने मस्तक झुकाता ॥ ९-१० ॥
स च सर्वास्त्रविन्नित्यं रुद्राल्लब्धवरः प्रभो।
क्षणादेव महाराज वार्तेयं गामगाहत ॥ ११ ॥
हतो हंसो हतो हंसः कृष्णेन रिपुमर्दिना।
जगुर्गन्धर्वपतयो देवलोके दिवानिशम् ॥ १२ ॥
प्रभो ! वह भगवान् रुद्रसे वर पाकर सदाके लिये सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता हो गया था। महाराज ! क्षणभरमें यह समाचार भूमण्डलमें फैल गया। 'शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णने हंसको मार डाला, हंसको मार डाला'—यह गन्धर्वराजगण देवलोकमें दिन-रात गान करने लगे ॥ ११-१२ ॥
कृष्णेन लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना।
यमुनाया ह्रदे घोरे हंसो निहत इत्यपि ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रभावशाली विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाके भयंकर ह्रदमें हंसको मार डाला।' इस प्रकार उनके यशका सर्वत्र गान होने लगा ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवधे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वधविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
डिम्भककी आत्महत्या
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा निहतमत्युग्रं भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे ॥ १ ॥
डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान्।
तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुधः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान् डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया ॥ १-२ ॥
हंसो हि यत्र पतितस्तत्रासौ निपपात ह।
यमुनायां महाराज विलोड्य जलसंचयम् ॥ ३ ॥
महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलराशिको मथ डाला ॥ ३ ॥
अथ क्रुद्धः स डिम्भको भ्रामयित्वा जलं बहु।
उन्मज्ज्योन्मज्ज्य सहसा निमज्ज्य च पुनः पुनः ॥ ४ ॥
न ददर्श तदा राजन् भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
क्रोधमें भरा हुआ डिम्भक उस जलमें चक्कर लगाकर सहसा गोता लगाता और ऊपरको निकल आता था। राजन् ! इस प्रकार बारंबार डुबकी लगानेपर भी उसने अपने पराक्रमशाली भाईको वहाँ नहीं देखा ॥ ४ ॥
उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च ॥ ५ ॥
उवाच वचनं राजन् डिम्भको वीर्यवत्तमः।
राजन् ! तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु डिम्भक जलसे ऊपर आकर वासुदेव श्रीकृष्णको सामने देख उनसे इस प्रकार बोला—॥ ५½ ॥
अरे गोपप्रदायाद क्वासौ हंस इति स्थितः ॥ ६ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा यमुनां पृच्छ राजक।
'अरे गोपपुत्र ! वह हंस कहाँ है ?' धर्मात्मा वासुदेवने भी उत्तर दिया—'नीच नरेश ! यमुनाजीसे पूछ' ॥ ६½ ॥
इत्यब्रवीत् प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा यमुनां भूयः प्रविश्य डिम्भकः किल।
बहुप्रकारमुद्वीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ८ ॥
विललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानसः।
प्रतापी वासुदेवने जब प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार कहा, तब भ्रातृवत्सल डिम्भकने उनकी बात सुनकर पुनः यमुनामें प्रवेश किया और नाना प्रकारसे अपने भाईकी खोज करके भ्रान्तचित्त हुआ वह राजा विलाप करने लगा ॥ ७-८½ ॥
क्व नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम् ॥ ९ ॥
कुतो भ्रातरितो गच्छेः परित्यज्यैव मामिह।
'राजेन्द्र ! इस बन्धुहीन डिम्भकको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? भैया ! मुझे यहीं छोड़कर यहाँसे कहाँ चले जा रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
विलप्यैवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सलः ॥ १० ॥
आत्मत्यागे मनः कुर्वन् यमुनाया महाह्रदे।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! इस प्रकार विलाप करके भ्रातृवत्सल
भविष्यपर्व ] त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९१
डिम्भकने यमुनाजीके महान् कुण्डमें अपने शरीरको त्याग देनेका विचार किया ॥ १०१/२ ॥
निमज्ज्योन्मज्ज्य सहसा मरणे कृतनिश्चयः ॥ ११ ॥
हस्तेन जिह्वामाकृष्य भूयो भूयो विलप्य च ।
ततः समूलामाकृष्य जिह्वां साहसकृत् स्वयम् ॥ १२ ॥
ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै ।
सहसा गोता लगाकर वह जलसे ऊपरको उठा और मरनेका निश्चय करके बारंबार विलाप करनेके पश्चात् स्वयं दुःसाहस करनेवाला वह डिम्भक हाथसे जिह्वाको जड़सहित बाहर खींचकर जलके भीतर मर गया। राजन्! उसका यह दुर्मरण नरककी प्राप्ति करानेवाला था ॥ ११-१२१/२ ॥
एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि ॥ १३ ॥
आगमत् पुण्डरीकाक्षो भूतान् विस्मापयन्निव ।
इस प्रकार पराक्रमशाली हंस और डिम्भकके मारे जाने पर कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भूतोंको विस्मयमें डालते हुए-से लौट आये ॥ १३१/२ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
गोवर्धनेऽथ विश्रम्य वलभद्रसहायवान् ।
कंचित् कालं महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह ॥ १५ ॥
महाराज ! इससे प्रीतियुक्त और प्रसन्नचित्त हुए प्रतापी भगवान् वासुदेवने वलभद्रजीके साथ गोवर्धन पर्वतपर विश्राम करके अपने पूर्वभुक्त स्थानपर कुछ कालतक निवास किया ॥ १४-१५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि डिम्भकमरणे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें डिम्भकका मरणविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और वलभद्रसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
यशोदा नन्दगोपश्च कृष्णदर्शनलालसौ ।
गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ १ ॥
नवनीतं च दधि च पायसं कृसरं तथा ।
वन्यं पुष्पं महाराज मयूराङ्गमथैव च ॥ २ ॥
वल्लवैरपरैः सार्धं गोपिभिश्च समन्ततः ।
जग्मतुः सहसा प्रीतौ गोवर्धनमथो नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ १-३ ॥
क्वचिद् वृक्षे समासक्तं कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम् ।
ददर्शतुरमहाबाहुं वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ ४ ॥
वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेव-नन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षके नीचे उससे सटकर बैठे देखा ॥ ४ ॥
प्रणेमतुः सुसंहृष्टौ तत्र दृष्ट्वा महाबलौ ।
दर्शयामासतुर्देवौ पायसानि महान्ति च ॥ ५ ॥
उन्हें देखकर नन्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाको प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया ॥ ५ ॥
तात मातर्व्रजे गोष्ठे कुशलं वा स्वगोधनम् ।
अपि गावः क्षीरवत्यो वत्सा वत्सतराः पितः ॥ ६ ॥
उस समय श्रीकृष्णने पूछा—चाचा! मैया! व्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी! गौएँ दूध देती हैं न? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न ॥ ६ ॥
अपि वा सुशुभं क्षीरमपि गावः सुशोभनाः ।
अपि वा दारका मातर्वत्सपालाः पिबन्ति च ॥ ७ ॥
'क्या व्रजकी गोओंका दूध शुद्ध एवं मङ्गलकारी होता है? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं! मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न ? ॥ ७ ॥
बहूनि चापि दामानि कीलका अपि वा बहु ।
तृणानि बहुरूपाणि किं वा सन्ति पितः सदा ॥ ८ ॥
'तात! क्या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं? ॥ ८ ॥
शकटानि सुगन्धीनि किं वा सन्ति पितुर्गृहम् ।
अपि गोप्यः पुत्रवत्यो दारकान् किमजीजनन् ॥ ९ ॥
'पिताजी! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं? क्या गोपियाँ पुत्रवती हुई हैं? क्या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है ? ॥ ९ ॥
| १०९२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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घटाः किं बहवो मातरभिन्नाः सर्वतो व्रजे ।
किं गावः क्षीरमतुलं स्रवन्त्यहरहः पितः ॥ १० ॥
'मैया ! क्या ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत-से घड़े हैं ? बाबा ! क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध प्रदान करती हैं ? ॥ १० ॥
हैयङ्गवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन् ।
गोधनं सर्वमेवेदं नीरोगं प्रतिपद्यते ॥ ११ ॥
'क्या अपनी गौओंने दूध-दही और मक्खनकी उपज बढ़ायी है ? अपना सारा गोधन नीरोग तो है न ?' ॥ ११ ॥
नन्द उवाच
सर्वमेतद् यदुश्रेष्ठ नीरोगं बहुशः प्रभो ।
कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव ॥ १२ ॥
नन्द बोले--'प्रभो ! यदुश्रेष्ठ ! अपना यह सारा गोधन प्रायः नीरोग ही है । केशव ! गोधन तो सदा ही सकुशल है ॥ १२ ॥
रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम् ।
सगोधनाः सवत्साश्च नीरोगा इव केशव ॥ १३ ॥
देवेश्वर ! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा कुशलपूर्वक रहते हैं । केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित नीरोग-से ही हैं ॥ १३ ॥
एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव ।
यदेतत् केवलं दुःखमिति धीः शीर्यते सदा ॥ १४ ॥
श्रीकृष्ण ! मुझे तो सदा एक ही दुःख बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता हूँ । यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्तःकरण व्यथित रहता है ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशवः ।
यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इस तरह विलाप करते हुए नन्दसे भगवान् श्रीकृष्णने कहा--'बाबा ! रोओ मत ! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने यशोदासे कहा--'मैया ! तुम भी घर जाओ ॥ १५ ॥
ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयुः ।
ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतराः सदा ॥ १६ ॥
मद्भक्ताः सर्वदा सन्तु गच्छेत्याह च तां हरिः ।
'जो लोग तुम्हारा कीर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायेंगे तथा जो कोई तुम्हे नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम प्रिय भक्त होंगे।' ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा--'तुम जाओ' ॥ १६ १/२ ॥
इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेवः सनातनः ॥ १७ ॥
गाढमालिङ्ग्य तौ प्रीतौ प्रेषयामास केशवः ।
यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ १८ ॥
माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान् वासुदेवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा किया। तत्पश्चात् यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट गये ॥ १७-१८ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशो यादवैः सह वृष्णिभिः ।
गन्तुमैच्छत् तदा विष्णुः पुरीं द्वारवतीं किल ॥ १९ ॥
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीको लौट जानेकी इच्छा की ॥ १९ ॥
य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेद् वापि समाहितः ।
पुत्रवान् धनवांश्चैव अन्ते मोक्षं च गच्छति ॥ २० ॥
जो एकाग्रचित्त हो सदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस लोकमें पुत्रवान् और धनवान् होता है तथा अन्तमे मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि यशोदानन्दगोपबलभद्रकृष्णसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें यशोदा, नन्दगोप, बलभद्र और श्रीकृष्णका समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥
एकत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः
द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन
| वैशम्पायन उवाच<br>गच्छन्नथ महाविष्णुः पुष्करं प्राप्य यादवैः ।<br>अपश्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुष्करस्थान् नृपोत्तम ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया ॥ १ ॥ | ते समेत्य महादेवमुपयो वीतमत्सराः ।<br>अर्घ्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम् ॥ २ ॥<br>प्रोचुर्विश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।<br><br>उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुलतिलक महान् देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्घ्य आदि निवेदन करनेके पश्चात् भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--॥ २ १/२ ॥ |
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९३
अत्यद्भुतमिदं विष्णो तव वीर्यं जनार्दन ॥ ३ ॥
येन तौ निहतौ युद्धे हंसो डिम्भक एव च।
'विष्णो ! जनार्दन ! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला ॥ ३½ ॥'
यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः ॥ ४ ॥
संगरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः ।
'देव ! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला ! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है ॥ ४½ ॥'
क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम् ॥ ५ ॥
निष्कल्मषा भविष्यामस्त्वत्संस्मरणाद्धरे ।
'अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया। हरे ! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायेंगे ॥ ५½ ॥'
त्वं हि सर्वस्य दुःखस्य हर्तात्वां ध्यायतां सदा॥ ६ ॥
त्वदनुस्मरणं जन्तोः सदा पुण्यप्रदं प्रभो।
'जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं। प्रभो ! आपका वारंवार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य-प्रदान करनेवाला है ॥ ६½ ॥'
त्वं हि नः सततं धाता विधाता तपसो हरे ॥ ७ ॥
त्वमोंकारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः ।
'हरे ! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही ओंकार हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं ॥ ७½ ॥'
त्वं ज्योतिर्ब्रह्मणो मूर्तिंस्त्वं ब्रह्मा रुद्र एव च ॥ ८ ॥
प्राणस्त्वं सर्वभूतानामन्तरात्मेति कथ्यते।
उपास्यः सर्वभूतानां यज्ञैर्दानैर्जगत्पते ॥ ९ ॥
'आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं। आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं। आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते ! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं ॥ ८-९ ॥'
नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये ।
पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विषः सदा ॥ १० ॥
'देव ! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव ! आप ब्रह्मद्रोहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये' ॥ १० ॥
स तथेति हरिर्विष्णुर्ययौ द्वारवतीं पुरीम् ।
अवसद् वृष्णिभिः सार्धं स्तूयमानः समागधैः ॥ ११ ॥
अथ 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंके साथ वहाँ निवास करने लगे ॥ ११ ॥
इयं च देवदेवस्य चेष्टा हि जनमेजय ।
प्रोक्ता ते पृच्छते राजन् किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है। तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि द्वारकायां कृष्णस्य प्रत्यागमने एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रत्यागमन-विषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः ।
फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्ठिषु ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—भगवन् ! विद्वान् पुरुषोंको महाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिये ? इसका फल क्या है ? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये ? ॥ १ ॥
देयं समाप्तौ भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि ।
वाचकः कीदृशश्चात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
भगवन् ! प्रत्येक पर्वके समाप्त होनेपर क्या दान देना चाहिये ? तथा इसमे कैसे वाचकका पूजन करना चाहिये ? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् ।
श्रुताद् भवति राजेन्द्र यत् त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महाभारत सुननेकी इस विधिको सुनिये। राजेन्द्र ! महाभारत श्रवण करनेसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वह भी बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
१०९४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गताः ।
कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्च दिवमागताः ॥ ४ ॥
महीपाल ! स्वर्गके देवता लीलाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे। वे यह (अवतार-) कार्य करके वहाँसे देवलोकको लौट आये ॥ ४ ॥
हन्त यत् ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः ।
ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले ॥ ५ ॥
जनमेजय ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भूतलपर ऋषियों और देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥
अत्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्च शाश्वताः ।
आदित्याश्चाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षयः ॥ ६ ॥
गुह्यकाश्च सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा ।
सिद्धा धर्मः स्वयम्भूश्च मुनिः कात्यायनोवरः ॥ ७ ॥
गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः ।
ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥ ८ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् ।
भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमारनामक देवता, लोकपाल, महर्षि, गुह्यक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्माजी, श्रेष्ठ कात्यायन मुनि, पर्वत, सागर, नदियाँ, अप्सराएँ, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, स्थावर-जङ्गमस्वरूप सारा जगत्, देवता और असुर—ये इस महाभारतमें एकत्र स्थित देखे जाते हैं ॥ ६–९ ॥
तेषां श्रुतिप्रतिष्ठानां नामकर्मानुकीर्तनात् ।
कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥ १० ॥
श्रुतिमें प्रतिष्ठित हुए इन सबके नाम और कर्मोंका बारंबार कीर्तन करनेसे मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उससे तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥
इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः ।
संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥ ११ ॥
तेषां शृणु त्वं श्राद्धानि श्रुत्वा भारत भारतम् ।
ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥ १२ ॥
महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च ।
गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ १३ ॥
भारत ! मनुष्य संयतचित्त एवं पवित्र हो इस इतिहासको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर समूचे महाभारतके पार जाकर भारतयुद्धमें काम आये हुए वीरोंके किस प्रकार श्राद्ध करने चाहिये, यह बताता हूँ सुनो। भरतश्रेष्ठ ! महाभारत सुनकर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक उनके लिये ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न एवं बड़े-बड़े दान देने चाहिये। गौएँ, काँसके दुग्धपात्र तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ देनी चाहिये ॥ ११–१३ ॥
सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च ।
भाजनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥ १४ ॥
वे कन्याएँ सम्पूर्ण कमनीय गुणोंसे सम्पन्न हों। इनके सिवा, नाना प्रकारके वाहन, विचित्र पात्र, पृथ्वी, वस्त्र एवं सुवर्णका दान करना चाहिये ॥ १४ ॥
वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः ।
शयनं शिविकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥ १५ ॥
वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिविका और सजे-सजाये रथ भी देने चाहिये ॥ १५ ॥
यद् यद् गृहे वरं किंचिद् यद् यदस्ति महद्धसु ।
तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥ १६ ॥
अपने घरमें जो-जो कोई श्रेष्ठ वस्तु हो और जो-जो महान् धन हो, उसका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। अपने स्त्री-पुत्र और शरीरको भी उनकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिये ॥ १६ ॥
श्रद्धया परया दद्यात् क्रमशस्तस्य पारगः ।
शक्तितः सुमना हृष्टः शुश्रूषुरविकत्थनः ॥ १७ ॥
क्रमशः महाभारतको समाप्त करनेवाला पुरुष शुद्ध हृदयसे हर्षपूर्वक मनमें सेवाभाव रखते हुए स्थिरतापूर्वक बड़ी श्रद्धाके साथ यथाशक्ति पूर्वोक्त वस्तुओंका दान करे ॥ १७ ॥
सत्यार्जवरतो यत्तः शुचिः शौचपरायणः ।
श्रद्दधानो जितक्रोधो यथा सिद्ध्यति तच्छृणु ॥ १८ ॥
सत्य और सरलतामे तत्पर, प्रयत्नशील, पवित्र, शौचाचारपरायण, क्रोधको जीतनेवाला तथा श्रद्धालु श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ, सुनो ॥ १८ ॥
शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः ।
संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥ १९ ॥
रूपवान् सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
दानमानग्रहीता च कार्यो भवति वाचकः ॥ २० ॥
जो शुद्ध, सुशील, सदाचारी, श्वेतवस्त्रधारी, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता, श्रद्धालु, अदोषदर्शी, रूपवान्, सौभाग्यशाली, मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, सत्यवादी, इन्द्रियविजयी तथा दान-मानको ग्रहण करनेवाला हो, ऐसे विद्वान् पुरुषको ही वाचक बनाना चाहिये ॥ १९-२० ॥
अविलम्बितमनायस्तमद्रुतं घोरमूर्जितम् ।
असंसक्ताक्षरपदं न च भावसमन्वितम् ॥ २१ ॥
त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् ।
वाचयेद् वाचकः स्वस्थः स्वाधीनः सुसमाहितः ॥ २२ ॥
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९५
स्वस्थ वाचक स्वाधीन और एकाग्रचित्त हो इस तरह कथा बाँचे कि विलम्बसे या रुक-रुककर शब्द न निकले (धारावाहिकरूपसे कथा चलती रहे), कठोर अक्षरका उच्चारण न करे, जल्दबाजी न करे, अस्पष्ट रूपसे शब्दोंका उच्चारण न करे—इस तरह बोले कि कोई अक्षर या पद टूटने न पावे, मनमें कोई विशेष अभिप्राय (लोभ आदि) रखकर कथा न बाँचे । आठ स्थानोंसे उच्चरित होनेवाले तिरसठ वर्णोंसे युक्त महाभारतका इस तरह पाठ करे कि प्रत्येक वर्णका स्पष्टतः विवेक होता रहे ॥ २१-२२ ॥
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २३ ॥
वाचक पहले अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास, पुराण एवं महाभारत) का पाठ आरम्भ करे ॥ २३ ॥
ईदृशाद् वाचकाद् राजञ्छ्रुत्वा भारत भारतम् ।
नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन् स फलमश्नुते ॥ २४ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो श्रोता शौच, संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर एवं पवित्र रहकर ऐसे वाचकसे महाभारत सुनता है, वह उसके पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
पारणां प्रथमां प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयेत् ।
अग्निष्टोमस्य यागस्य फलं वै लभते नरः ॥ २५ ॥
प्रथम बार नियमपूर्वक हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण पूरा करके ब्राह्मणोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंसे तृप्त करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोम यागका फल पाता है ॥ २५ ॥
अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् ।
प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥ २६ ॥
उसे अप्सराओंसे भरा हुआ महान् विमान प्राप्त होता है और वह हर्षसे उत्फुल्ल एवं एकाग्रचित्त होकर देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २६ ॥
द्वितीयां पारणां प्राप्य अतिरात्रफलं लभेत् ।
सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ २७ ॥
दूसरी बार हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण कर लेनेपर श्रोताको अतिरात्रयज्ञका फल मिलता है तथा वह सम्पूर्ण रत्नोंसे बने हुए दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ २७ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः ।
दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥ २८ ॥
वहाँ वह दिव्य माला और वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे विभूषित हो, दिव्य अङ्गद आदि आभूषण पहनकर सदा देवलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ ॥
तृतीयां पारणां प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् ।
वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥ २९ ॥
तीसरी पारणा पूरी करनेपर उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह देवताओंके समान तेजस्वी रूप धारण करके दस हजार वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है ॥
चतुर्थ्यां वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् ।
उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥ ३० ॥
विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति ।
वर्षाण्ययुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥ ३१ ॥
चौथी पारणापर वाजपेय यज्ञका और पाँचवींपर उससे दूना फल मिलता है। वह उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर देवताओंके साथ आरूढ़ हो देवलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥ ३०-३१ ॥
षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।
कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ॥ ३२ ॥
परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।
विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ॥ ३३ ॥
सर्वलोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।
पाद-टिप्पणी:
१. कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और हृदय—ये वर्णोंके उच्चारणके आठ स्थान हैं।
२. पाणिनीय शिक्षामें तिरसठ वर्णोंकी गणना इस प्रकार दी गयी है—इकीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, ᳵ क, ᳶ प तथा दुःस्पृष्ट—ये सब मिलाकर तिरसठ वर्ण हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है—‘अ इ उ ऋ’ ये चार स्वर ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके भेदसे तीन-तीन तरहके माने गये हैं, अतः ये बारह हुए। लृकारका केवल ह्रस्वरूप ही ग्रहण किया गया है—इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए। इनके सिवा, ‘ए ओ ऐ औ’ ये दीर्घ और प्लुतके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं, अतः आठ हुए। पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं। ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं। इनको मिलानेसे ४६ अक्षर हुए। ‘य’ से लेकर ‘ह’ तकके आठ अक्षरोंको जोड़ लेनेपर इनकी संख्या ५४ होती है। प्रातिशाख्यके अनुसार चार यम होते हैं। यथा—‘प॒लिक्नी’ ‘च॒ख्नतुः’ ‘अ॒ग्निः’ ‘घ्॒घ्नन्ति’ इन उदाहरणोंमें क् ख् ग् घ्’ से परे जो इन्हींके सदृश वर्ण हैं, इन्हींकी ‘यम’ संज्ञा है। इन चार यमोंको जोड़ लेनेसे अक्षरोंकी संख्या ५८ तक पहुँचती है। इनके सिवा, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अः) ᳵ क (जिह्वामूलीय), ᳶ प (उपध्मानीय) तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरोंके मध्यमें वर्तमान ळकार)—ये पाँच अक्षर और हैं। इन सबका योग तिरसठ होता है। ये ही तिरसठ अक्षर हैं।
| १०९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
छठी पारणामें इससे दूना अर्थात् चार वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। सातवेंमे तीन गुने अर्थात् बारह वाजपेय यज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है। वह कैलास शिखरके समान उज्ज्वल एवं विशाल वैदूर्यमणिकी वेदीसे विभूषित, अनेक प्रकारके मण्डलाकार मागोंसे युक्त, मणियों और मूँगोंसे अलंकृत, अप्सराओंसे परिपूर्ण तथा इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यके समान सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है॥ ३२-३३ १/२ ॥
अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ॥ ३४ ॥
चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।
चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ॥ ३५ ॥
आठवीं पारणा पूरी होनेपर उसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। वह चन्द्रोदयके समान रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है। जिसमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल और मनके समान वेगशाली घोड़े जुते होते हैं॥ ३४-३५॥
सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रकान्तरैर्मुखैः।
मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ॥ ३६ ॥
अङ्के परमनारीणां सुखं सुप्तो विबुध्यते ।
वह देवसुन्दरीयोंके चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंसे, उनकी मेखलाओंकी ध्वनिसे तथा नूपुरोंकी झनकारोंसे सेवित हो दिव्याङ्गनाओंके अङ्कमें सुखपूर्वक सोता और जागता है॥ ३६ १/२ ॥
नवमं क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ॥ ३७ ॥
काञ्चनस्तम्भनिर्व्यूहं वैदूर्यकृतवेदिकम् ।
जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ॥ ३८ ॥
सेवितं चाप्सरःसङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।
विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ३९ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनभूषितः।
मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ॥ ४० ॥
भरतनन्दन ! नवीं पारणा पूर्ण करके श्रोता यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल पाता है। वह सोनेके खंभों और कँगूरोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी वेदीसे अलंकृत, सब ओर बने हुए सुवर्णमय दिव्य गवाक्षोंसे आवृत तथा स्वर्गमें विचरनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित विमानपर बैठकर अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रकाशित होता है तथा दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य चन्दनसे चर्चित हो दूसरे देवताकी भाँति देवलोकमें देवगणोंके साथ आनन्द भोगता है ॥३७–४०॥
दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च।
किङ्किणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् ॥ ४१ ॥
रत्नवेदिकसंकाशं वैदूर्यमणितोरणम् ।
हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम् ॥ ४२ ॥
गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।
विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते ॥ ४३ ॥
दसवीं पारणा पूरी करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, ऐसा करके श्रोता पुण्यात्माओंके आवासस्थान दिव्य विमानको सुखपूर्वक पा लेता है। उस विमानमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती है। ध्वजा और पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। वह रत्नमयी वेदिकाओंसे प्रकाशित होता है। उसमें वैदूर्यमणि-के फाटक लगे होते हैं। वह सब ओरसे सोनेकी जालीसे घिरा रहता है। उसके छज्जोंका मुखभाग मूँगोंसे अलंकृत होता है तथा गीतकुशल गन्धर्व और अप्सराएँ उस विमानपर सेवाके लिये उपस्थित रहती हैं॥ ४१-४३॥
मुकुटेनाकंस्वर्णेन जाम्बूनदविभूषणः ।
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः ॥ ४४ ॥
दिव्याँल्लोकान् प्रचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः ।
विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः ॥ ४५ ॥
वह पुरुष अपने मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुटसे सुशोभित हो जाम्बूनद (सुवर्ण) के आभूषण धारण करके सारे अङ्गोंमें दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य मालाओं-से विभूषित हो, दिव्य भोगों तथा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न होकर देवताओंके प्रसादसे दिव्य लोकोंमें विचरता है॥
अथ वर्षगणान्वेवं स्वर्गलोके महीयते ।
ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ४६ ॥
पुरंदरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते ।
इस प्रकार बहुत वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमे प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर गन्धर्वोंके साथ रमणीय पुरन्दरपुरी अमरावतीमें रहकर इक्कीस हजार वर्षोंतक इन्द्रके साथ आनन्द भोगता है॥
दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च ॥ ४७ ॥
दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा ।
इसके बाद नाना प्रकारके पुण्यलोकोंमें दिव्य यानों और विमानोंपर दिव्य नारियोंसे घिरा रहकर वहाँ देवताके समान निवास करता है॥ ४७ १/२ ॥
ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥ ४८ ॥
शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् ।
राजन् ! तत्पश्चात् वह क्रमशः सूर्यभवनमें, चन्द्रलोकमें तथा भगवान् शिवके धाममे निवास करके अन्तमे भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त कर लेता है॥ ४८ १/२ ॥
एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥४९॥
श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।
महाराज ! यह ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमे अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। इसपर श्रद्धा करनी चाहिये। यह मेरे गुरु व्यासजीका कथन है॥ ४९ १/२ ॥
वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति ॥ ५० ॥
हस्त्यश्वरथयानादि वाहनं च विशेषतः ।
भविष्यपर्व ] द्वातत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९७
वाचकको वह मनसे जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करे, वही देनी चाहिये। विशेषतः हाथी, घोड़े, रथ और शिविका आदि वाहन-का दान करना उचित है ॥ ५०३ ॥
कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथापरम् ॥ ५१ ॥
वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैवं विशेषतः ।
देववत् पूजयेत् तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥
उसके लिये कड़े, कुण्डल, नूतन यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र तथा विशेषतः गन्ध आदि देकर देवताके समान उनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ५१-५२ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते ।
वाच्यमानेऽथ विप्रेभ्यो राजन् पर्वणि पर्वणि ॥ ५३ ॥
राजन् ! अब मैं यह बता रहा हूँ कि जब महाभारतका पारायण आरम्भ हो जाय, तब प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर ब्राह्मणोंके लिये किन-किन वस्तुओंका दान देना चाहिये ॥
जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ ।
धर्मवृत्तिं च विज्ञाय ब्राह्मणानां नराधिप ॥ ५४ ॥
स्वस्ति वाच्यं द्विजैरादौ ततः कार्यं प्रवर्तयेत् ।
समाप्तपर्वणि ततः स्वशक्त्या तर्पयेद् द्विजान् ॥ ५५ ॥
भरतश्रेष्ठ ! नरेश्वर ! पर्वके आरम्भमे ब्राह्मणोंकी जाति, देश, सत्य, माहात्म्य तथा धर्मवृत्तिको जानकर पहले उनके द्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। तदनन्तर कार्य (कथा-श्रवण) आरम्भ करे। फिर उस पर्वकी समाप्ति होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको तृप्त करे ॥ ५४-५५ ॥
आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् ।
विधिवद् भोजयेद् राजन् मधुपायससंयुतम् ॥ ५६ ॥
राजन् ! आदिपर्वके अनुक्रमणिकापर्वमें पहले वाचककी वस्त्र और गन्ध आदिसे पूजा करके उसे मधुयुक्त खीरका विधिवत् भोजन कराये ॥ ५६ ॥
ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा ।
आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम् ॥५७॥
नरेश्वर ! तदनन्तर आस्तीकपर्वमें प्रायः फल-मूल तथा मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये तथा गुड़ और चावलका दान करे ॥ ५७ ॥
अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् ।
सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र ! फिर सभापर्वमें पूप (पुआ), अपूप (माल-पुआ) और मोदक (लड्डू) के साथ खीर ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥ ५८ ॥
आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेच्च द्विजोत्तमान् ।
अरणीपर्व आसाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत् ॥ ५९ ॥
आरण्यक (वन) पर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलसे तृप्त करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान करे ॥ ५९ ॥
तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च ।
सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत् ॥ ६० ॥
तृप्तिके मुख्य साधन, जंगली फल-मूल तथा मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका ब्राह्मणोंको दान करे ॥ ६० ॥
विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च ।
उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् ॥ ६१ ॥
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे। भरतश्रेष्ठ ! उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके उन्हें मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका भोजन कराये ॥ ६१३ ॥
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ॥ ६२॥
राजेन्द्र ! भीष्मपर्वमे परम उत्तम शिविकाका दान करके अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किये गये सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान करे ॥ ६२ ॥
द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ।
शराश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरांस्तथा ॥ ६३ ॥
राजेन्द्र ! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन अर्पित करे तथा उन्हें धनुष, बाण एवं उत्तम खङ्ग दे ॥ ६३ ॥
कर्णपर्वण्यपि तथा भोजनं सार्वकामिकम् ।
विप्रेभ्यः संस्कृतं सम्यग् दद्यात् संयतमानसः ॥ ६४ ॥
कर्णपर्वमें भी मनको संयममें रखकर ब्राह्मणोंको सबकी-रुचिके अनुकूल उत्तम संस्कारयुक्त भोजन दे ॥ ६४ ॥
शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकैः सगुडौदनैः ।
अपूपैस्तर्पयेच्चैव सर्वमन्नं प्रदापयेत् ॥ ६५ ॥
महाराज ! शल्यपर्वमें लड्डू, गुडमिश्रित ओदन और पूओंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करे तथा उन्हे सब प्रकारके अन्नका दान दे ॥ ६५ ॥
गदापर्वण्यपि तथा मुद्गमिश्नं प्रदापयेत् ।
स्त्रीपर्वणि तथा रत्नैस्तर्पयेत् तु द्विजोत्तमान् ॥ ६६ ॥
गदापर्वमें भी मूँग मिलायी हुई खिचड़ीका दान करे। स्त्रीपर्वमे उत्तम ब्राह्मणोंको रत्नोंद्वारा तृप्त करे ॥ ६६ ॥
घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत् पुनः ।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ॥ ६७ ॥
ऐषीकपर्वमें पहले घी मिलाये हुए भातका दान करे। तत्पश्चात् अच्छी तरह छौंक-बघारकर बनाया हुआ सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान दे ॥ ६७ ॥
शान्तिपर्वण्यपि गते हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।
आश्वमेधिकमासाद्य भोजनं सार्वकामिकम् ॥ ६८ ॥
| १०९८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
शान्तिपर्व पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको हविष्यका भोजन कराये। फिर आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचकर सबकी रुचिके अनुकूल भोजन दे ॥ ६८ ॥
तथाऽऽश्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद् द्विजान्।
मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम् ॥ ६९ ॥
आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न तथा गन्ध, माला और अनुलेपनका दान करे ॥ ६९ ॥
महाप्रस्थानिके तद्वत् सर्वकामगुणान्वितम्।
स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ॥ ७० ॥
उसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका तथा स्वर्गारोहणपर्वमें हविष्यका ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥ ७० ॥
हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्रं भोजयेद् द्विजान्।
गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ७१ ॥
हरिवंशकी समाप्ति होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णपदकसे युक्त एक गौका ब्राह्मणको दान करे ॥ ७१ ॥
तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव।
प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः ॥ ७२ ॥
सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत्।
पृथ्वीनाथ ! दरिद्रको भी पूरा नहीं तो आधा दान अवश्य करना चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर वाचकको सुवर्णयुक्त पुस्तक अर्पित करे ॥७२१/२॥
हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत् ॥ ७३ ॥
श्लोकं वा श्लोकपादं वा अक्षरं वा नृपात्मज।
शृणुयादेकचित्तस्तु स विष्णुदयितो भवेत् ॥ ७४ ॥
हरिवंशपर्वमें ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराये। राजकुमार ! जो एकाग्रचित्त होकर हरिवंशके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त होता है ॥ ७३-७४ ॥
व्यासं चैव सपत्नीकं पूजयेच्च यथाविधि।
लक्ष्मीनारायणं देवं पूजितं तं च पूजयेत् ॥ ७५ ॥
कथावाचक व्यासकी उसकी पत्नीके साथ विधिवत् पूजा करे। इससे भगवान् लक्ष्मीनारायणका पूजन हो जाता है। फिर पूर्वपूजित भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी भी पूजा करे ॥७५॥
वाचकं पूजयेद् यस्तु भूमिवस्त्रसुधेनुभिः।
विष्णुः सम्पूजितस्तेन स साक्षाद् देवकीसुतः ॥७६॥
जो भूमि, वस्त्र और उत्तम धेनु देकर वाचककी पूजा करता है, उसके द्वारा साक्षात् विष्णुरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जाता है ॥ ७६ ॥
पारणे पारणे राजन् यथावद् भरतर्षभ।
समाप्य सर्वाः प्रयततः संहिताः शास्त्रकोविदः ॥ ७७ ॥
शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः।
शुक्लाम्बरधरः श्रीमाञ्छुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः ॥ ७८ ॥
अर्चयेत् तं यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक् पृथक्।
संहितापुस्तकञ्च राजन् प्रयततः शिष्टसम्मतः ॥७९॥
राजन् ! भरतवंशावतंस जनमेजय ! शास्त्रज्ञ पुरुष इन्द्रिय-संयमपूर्वक यथोचित रूपसे सम्पूर्ण महाभारत-संहिताको (हरिवंशसहित) पूर्ण करके प्रत्येक पारणामें वाचकको शुभ स्थानमें बैठाकर रेशमी वस्त्र अथवा शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करके शोभा-सम्पन्न, पवित्र एवं अलंकृत हो यथोचित रीतिसे पृथक्-पृथक् गन्ध, माल्य आदि अर्पित करके उस वाचककी पूजा करे। राजन् ! संयतचित्त एवं शिष्ट पुरुषों-द्वारा सम्मानित पुरुष संहिताकी पुस्तकोंका भी पूजन करे ॥ ७७-७९ ॥
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः।
हिरण्यं गां च वस्त्रं च दक्षिणामथ दापयेत् ॥ ८० ॥
वाचकको उत्तमोत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, पेय रस आदि तथा नाना प्रकारकी शुभ मनोवाञ्छित वस्तुओंके साथ सुवर्ण, गौ, वस्त्र तथा दक्षिणा समर्पित करे ॥ ८० ॥
सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रणतात्मना।
तदर्धे पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम् ॥ ८१ ॥
सभी पारणाओंमें प्रणतभावसे तीन पल (तीन भर) सुवर्ण देना चाहिये। इतना सम्भव न हो तो सवा दो भर या डेढ़ भर अवश्य दे। धन रहते हुए कंजूसी न करे ॥ ८१ ॥
यद् यदेवात्मनोऽभीष्टं तत् तद् देयं द्विजातये।
सर्वथा तोषयेद् भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः।
देवताः कीर्तयेत् सर्वा नरनारायणौ तथा ॥ ८२ ॥
जो-जो वस्तु अपनेको अभीष्ट हो, उसी-उसीका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। वाचक अपना गुरु है, अतः भक्ति-भावसे उसको सर्वथा संतुष्ट करे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंका तथा नर-नारायणका कीर्तन करे ॥ ८२ ॥
ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलंकृतद्विजोत्तमान्।
तर्पयेद् विविधैः कामैर्दानैश्चोच्चावचैस्तथा ॥ ८३ ॥
तदनन्तर गन्ध, माल्य आदिसे भलीभाँति अलंकृत किये गये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके कमनीय पदार्थ तथा अनेक प्रकारके छोटे-बड़े दान देकर तृप्त करे ॥ ८३ ॥
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः।
प्राप्नुयाच्च क्रतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि ॥ ८४ ॥
ऐसा करनेवाला मनुष्य अतिरात्र यज्ञका फल पाता है। प्रत्येक पर्वपर ऐसा करनेसे यज्ञ-फलकी प्राप्ति होती है ॥८४॥
वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वरः।
भविष्यं श्रावयेद् विप्रान् भारतं भरतर्षभ ॥ ८५ ॥
भरतकुलतिलक जनमेजय ! वाचकको चाहिये कि वह
[ भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९९
सुस्पष्ट अक्षर, पद एवं स्वरके साथ ब्राह्मणोंके भविष्यपर्व एवं भारतका श्रवण कराये ॥ ८५ ॥
भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत् सम्प्रदापयेत् ।
वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ॥ ८६ ॥
भरतश्रेष्ठ ! श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वाचकको भी भोजन कराकर उसे भलीभाँति अलंकृत करके यथोचित रूपसे दक्षिणा दे ॥ ८६ ॥
वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरुत्तमा ।
ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः ॥ ८७ ॥
वाचकके संतुष्ट होनेपर परम उत्तम मङ्गलमयी प्रीति प्राप्त होती है। अन्य ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ८७ ॥
ततो हि भरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ ।
सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च यथाक्रमम् ॥ ८८ ॥
भरतभूषण ! तत्पश्चात् यथोचित रूपसे सब प्रकारके उत्तम, मनोवाञ्छित पदार्थ देकर क्रमशः सभी द्विजोंका भरण-पोषण करना चाहिये ॥ ८८ ॥
इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर ।
श्रद्धानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ८९ ॥
नरश्रेष्ठ ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुमसे महाभारत और हरिवंश सुननेकी यह विधि बतायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये ॥ ८९ ॥
भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम ।
सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥ ९० ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! जो परम कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे हरिवंशसहित महाभारत सुनने और उसकी पारणा पूरी करनेके लिये सदा यत्नशील रहना चाहिये ॥ ९० ॥
भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् ।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥ ९१ ॥
प्रतिदिन भारतका श्रवण करे। नित्य-प्रति भारतका कीर्तन करे। जिसके घरमें महाभारतकी पुस्तक है, उसके हाथमें विजय है ॥ ९१ ॥
भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः ।
भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परिकीर्तयेत् ॥ ९२ ॥
भारत परम पुण्यमय ग्रन्थ है। भारतमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवतालोग भी भारतका सेवन करते हैं, अतः भारतका अवश्य कीर्तन करे ॥ ९२ ॥
भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ ।
भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९३ ॥
भरतश्रेष्ठ ! भारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। भारतके अनुशीलनसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुम्हे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ ॥ ९३ ॥
महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् ।
ब्राह्मणं केशवं चापि कीर्तयन् नावसीदति ॥ ९४ ॥
जो महाभारत इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन करता है, वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता ॥ ९४ ॥
वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ९५ ॥
भरतभूषण ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका गान किया जाता है ॥ ९५ ॥
यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः ।
तच्छ्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥ ९६ ॥
जो इस लोकमें परम पदकी इच्छा रखता हो, उस मनुष्यको चाहिये कि जिसमें भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हैं, उस महाभारत एवं हरिवंशका वह श्रवण करे ॥ ९६ ॥
एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् ।
एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥ ९७ ॥
यह परम पवित्र है। यह धर्मका निरूपण करनेवाला शास्त्र है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त है। अतः कल्याण-कामी पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिये ॥ ९७ ॥
क्रियतेऽसारसंसारे वाञ्छितस्यैव कारणम् ।
हरिवंशस्य श्रवणमिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ९८ ॥
इस असार संसारमें हरिवंशका श्रवण सभी मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ पुरुष इसका श्रवण करते हैं। ऐसा द्वैपायन वेदव्यासका कथन है ॥ ९८ ॥
अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैस्तथा ।
यत् फलं प्राप्यते पुंभिस्तद्धरेर्वंशपारणात् ॥ ९९ ॥
एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञ करनेसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह हरिवंशका पारायण करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ॥ ९९ ॥
अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं
सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।
निरुपममनुमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं
त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो ॥ १०० ॥
विष्णो ! आप अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्यान करने योग्य, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि-कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, अनुमानके योग्य, योगियोंके लिये ज्ञानगम्य, तीनों लोकोंके गुरु तथा ईश्वर हैं, अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १०० ॥
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ।
११०० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्वेषां वाञ्छिता अर्था भवन्त्यस्य च पारणात् ॥ १०१ ॥
इस ग्रन्थके नियमपूर्वक पठन एवं श्रवणसे सब लोग दुर्गम संकटोंसे पार हो जायं, सब कल्याणका दर्शन करें तथा सबके मनोवाञ्छित अर्थ सिद्ध हो जायें ॥ १०१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि श्रवणफलकथने द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें महाभारत और हरिवंशके श्रवणके फलका वर्णनविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
त्रिपुर-वधकी कथा
जनमेजय उवाच
त्र्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
त्रयाणां पुरसंज्ञानां खेचराणां समासतः ॥ १ ॥
जनमेजयनें पूछा— ब्रह्मन् ! दैत्योंके जो आकाशमें विचरनेवाले तीन पुर थे, उनका त्रिनेत्रधारी महादेवजीके हाथसे किस प्रकार वध हुआ ? इस प्रसङ्गको मैं ठीक-ठीक और संक्षेपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरतः सर्वं यन्मां पृच्छसि नैधनम् ।
दैत्यानां बाहुबलिनां सर्वप्राणिविरोधिनाम् ॥ २ ॥
शंकरेण वधं राजञ्छूलैस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
कृतं पुरासुरेन्द्राणां सर्वभूतवधैषिणाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! जो समस्त प्राणियोंके विरोधी थे, उन बाहुबलशाली दैत्योंका भगवान् शङ्करके हाथ किस प्रकार निधन हुआ ? यह जो तुम मुझसे पूछते हो, यह सारा प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक सुनो—पूर्वकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके वधकी इच्छावाले उन असुरेन्द्रोंका वध भगवान् शिवने अपने सीधे जानेवाले तीन शूलोंद्वारा किया था ॥ २-३ ॥
त्रिपुरं पुरुषव्याघ्र बृहद्धातुसमीरितम् ।
विक्रामति नभोमध्ये मेघवृन्दमिवोत्थितम् ॥ ४ ॥
नरव्याघ्र ! वे तीनों पुर बृहद् (बहुमूल्य एवं महान्) धातुओंसे निर्मित हुए थे । वे आकाशमें उमड़े हुए मेघ-समूहोंकी भाँति प्रकट होकर सर्वत्र विचरते थे ॥ ४ ॥
प्राकारेण प्रवृद्धेन काञ्चनेन विराजता ।
मणिभिश्च प्रकाशद्भिः सर्वरत्नैश्च तोरणैः ॥ ५ ॥
बभासे नभसो मध्ये श्रिया परमया ज्वलत् ।
गन्धर्वाणामिवोद्विग्नं कर्मणा साधितं पुरम् ॥ ६ ॥
सुवर्णनिर्मित ऊँचे विशाल एवं प्रकाशमान परकोटेसे उद्दीप्त होनेवाली मणियोंसे तथा सर्वरत्नमय फाटकोंसे वे तीनों पुर आकाशमण्डलमें चमकते रहते थे । वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रज्वलित हो रहे थे । तपस्यारूपी कर्मसे साधित हुए वे भयंकर पुर गन्धर्वोंके नगर-से जान पड़ते थे ॥ ५-६ ॥
वाजिनः पक्षसंयुक्ता वहन्ति बलदर्पिताः ।
पुरं प्रभाकरश्रेष्ठं मनोभिः कामवृंहणैः ॥ ७ ॥
बलके अभिमानसे युक्त, पङ्खवाले घोड़े सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान उस पुरको इच्छानुसार बढ़नेवाले मनके तुल्य वेगसे ढोया करते थे ॥ ७ ॥
धावन्ति हेषमाणास्ते विक्रमैः प्राणसम्भृतैः ।
आह्वयत इवाकाशं खुरैः श्यामदलप्रभैः ॥ ८ ॥
सारी प्राणशक्ति लगाकर संचित किये गये बल-विक्रमसे जब वे घोड़े हिनहिनाते हुए दौड़ते थे, उस समय उनकी काली टापोंसे आकाश आहत होता-सा प्रतीत होता था ॥ ८ ॥
वायुवेगसमैर्वेगैः कालयन्त इवाम्बरम् ।
असुराः समदृश्यन्त चक्षुर्भिर्विदितात्मभिः ॥ ९ ॥
ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्विषैः ।
जिन्होंने तपस्यासे सारे पापोंको दग्ध कर दिया था तथा जो अग्निके समान तेजस्वी थे, वे आत्मज्ञानी महर्षि ही अपने नेत्रोंद्वारा उन असुरोंको देख पाते थे । वे वायुके समान वेगसे समूचे आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए-से जान पड़ते थे ॥
गीतवादित्रबहुलं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ १० ॥
चित्राद्युधसमाकीर्णैः प्रतप्तकनकप्रभैः ।
भवनैर्बहुभिश्चैव प्रांशुभिः समलंकृतैः ॥ ११ ॥
देवेन्द्रभवनाकारैः शुशुभे तन्महाद्युति ।
उन पुरोंमें प्रायः गीत और वाद्यके समारोह होते रहते थे । वे गन्धर्वनगरके समान प्रतीत होते थे । विचित्र आयुधोंसे भरे हुए, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा विविध अलंकारोंसे अलंकृत बहुसंख्यक ऊँचे भवन, जो देवराज इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होते थे, उन महातेजस्वी पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १०-११ १/२ ॥
प्रासादाग्रैः प्रवृद्धैश्च कैलासशिखरप्रभैः ॥ १२ ॥
शुशुभे दैत्यनगरं बहुसूर्यमिवाम्बरम् ।
कैलासके शृङ्गोंकी भाँति प्रकाशित होनेवाले बड़े-बड़े प्रासादशिखरोंसे युक्त दैत्योंका वह नगर अनेक सूर्योंसे प्रकाशित आकाशके समान सुशोभित होता था ॥ १२ १/२ ॥
वराट्टालकसम्पन्नं तप्तकाञ्चनप्रभम् ॥ १३ ॥
प्रदीप्तमिव तेजोभी रराजार्थ महाप्रभो ।
महाराज ! बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे सम्पन्न, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा तेजसे प्रज्वलित-सा वह दैत्य-नगर बड़ी शोभा पाता था ॥ १३ १/२ ॥