विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1110, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८३
एतावेव रणे शक्तौ खड्गे धनुषि पारगौ।
एकः शिष्यो गिरीशस्य द्रोणस्यान्यो हि धीमतः॥ २४॥
'अहो ! बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले इन दोनों वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों युद्धमें समर्थ हैं तथा खड्गविद्या और धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् हैं। इनमेंसे एक तो भगवान् शङ्करका शिष्य है और दूसरा बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका ॥ २३-२४ ॥
अर्जुनः सात्यकिश्चैव वासुदेवो जगत्पतिः।
त्रय एते महावीराः प्रथिताः सङ्गरे सदा ॥ २५ ॥
'अर्जुन, सात्यकि और जगदीश्वर भगवान् वासुदेव— ये तीन सदा ही युद्धस्थलमें 'महावीर' के नामसे विख्यात हैं॥ २५॥
डिम्भकः शक्तिभृच्छर्वस्त्रय एते महारथाः।
प्रसिद्धाः सर्व एवैते वीर्येषु च बलेषु च ॥ २६ ॥
'डिम्भक, कुमार कार्तिकेय और भगवान् शिव— ये तीन मुख्य 'महारथी' हैं। ये सभी बल और वीर्यमें विख्यात हैं'॥ २६ ॥
इति ते देवगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महोरगाः।
दिविस्थिताः समं ब्रूयुर्युद्धदर्शनलालसाः ॥ २७॥
इस प्रकार वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और बड़े-बड़े नाग युद्ध देखनेकी इच्छासे खड़े होकर एक साथ उपर्युक्त बातें कर रहे थे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिडिम्भकयुद्धे पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें सात्यकि और डिम्भकका युद्धविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
हिडिम्बके साथ वसुदेव और उग्रसेनका युद्ध तथा बलभद्रके द्वारा हिडिम्बका वध
वैशम्पायन उवाच
वसुदेवोग्रसेनौ च वृद्धौ युद्धे सुनिर्वृतौ।
जराजर्जरितसर्वाङ्गौ पलितार्द्धशिरोरुहौ ॥ १ ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नौ राजमार्गाविशारदौ।
युयुधाते महारङ्गे राक्षसेन दुरात्मना ॥ २ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामासतू रणे।
राक्षसेन्द्रं दुरात्मानं हिडिम्बं पुरुषादकम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेव और उग्रसेन बूढ़े होनेपर भी युद्धमें परम सुख माननेवाले थे। उनके सारे अङ्ग जरासे जीर्ण हो गये थे, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं और सिरके बाल सफेद हो गये थे ॥ १॥ वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा राजमार्ग (क्षत्रियधर्म—युद्ध) में चतुर थे। ये दोनों उस महासमरमें दुरात्मा राक्षस हिडिम्बके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ उन दोनोंने अनेक सहस्र बाणोंद्वारा रणभूमिमें नरभक्षी राक्षसराज दुरात्मा हिडिम्बको पीड़ित कर दिया ॥ ३ ॥
हिडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भक्षयन् सर्वतो नरान्।
अतिप्रवृद्धो दुष्टात्मा लम्बबाहुर्महाहनुः ॥ ४ ॥
लम्बोदरो विरूपाक्षः पिङ्गकेशो विलोचनः।
श्येननासो महारौद्र ऊर्ध्वरोमा महाभुजः ॥ ५ ॥
राक्षसराज हिडिम्ब सब ओरसे मनुष्योंको खाता हुआ अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट हो गया था। उसकी भुजाएँ और ठोढ़ी विशाल थी। वह बड़ा दुष्टात्मा था, पेट लंबा और नेत्र विकराल थे। सिरके बाल पिंगल वर्णके दिखायी देते थे। उसकी आँखें विकृत थीं। नासिका बाजकी चोंचके समान जान पड़ती थी। वह महाभयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके रोम ऊपरको उठे हुए थे ॥ ४-५ ॥
पर्वताकारवर्ष्मा च दीर्घदंष्ट्रः शिवाननः।
लम्बोदरो दीर्घदन्तो जगद्ग्रासपरस्तथा ॥ ६ ॥
शरीर पर्वताकार दिखायी देता था। दाढ़ें बड़ी-बड़ी थीं और मुँह गीदड़के समान प्रतीत होता था। लंबे पेट और बड़े-बड़े दाँतोंवाला वह राक्षस सम्पूर्ण जगत्को अपना ग्रास बना लेनेके लिये तत्पर जान पड़ता था ॥ ६ ॥
उत्तुङ्गांसो महोरस्को दीर्घग्रीवो गजॊपमः।
भक्षयन् मांसपिटकं पिवञ्शोणितसंचयम् ॥ ७ ॥
उसके कंधे ऊँचे, छाती चौड़ी और गर्दन लंबी थी। वह देखनेमें हाथी-जैसा जान पड़ता था। वह पिटारी भर मांस खाता और संचित करके रखे हुए घड़ों रक्त पी जाता था ॥ ७ ॥
गजान् नागैः समाहत्य हयैरश्वान् नृपोत्तम।
रथान् रथैः समाहत्य सादिनः सादिभिस्तथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वह हाथियोंसे हाथियोंको, घोड़ोंसे घोड़ोंको, रथोंसे रथोंको और सवारोंसे सवारोंको मारकर कुचल देता था ॥ ८ ॥
...यान् स पुरो दृष्ट्वा नास्यत्रासं चकार सः।
...ाडयित्वा महाराज वृष्णिपालान् समन्ततः ॥ ९ ॥